नॉर्थ ईस्ट

नगालैंड में केंद्र के वार्ताकार आरएन रवि तमिलनाडु के राज्यपाल बनाए गए

नगालैंड के राज्यपाल आरएन रवि नगा समूहों के साथ चल रही शांति वार्ता में केंद्र की ओर से वार्ताकार की भूमिका में भी हैं. बीते एक साल में कई बार नगा समूहों और कार्यकर्ताओं की ओर से उन पर शांति वार्ता को बेपटरी करने की कोशिश करने के आरोप लगाए गए हैं.

आरएन रवि. (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

नई दिल्ली: नगा शांति वार्ता में केंद्र के वार्ताकार और नगालैंड के राज्यपाल आरएन रवि को तमिलनाडु का राज्यपाल बनाया गया है.

राष्ट्रपति भवन ने गुरुवार को एक बयान में कहा कि राष्ट्रपति ने एक राज्यपाल के इस्तीफे को स्वीकार करने के अलावा तीन राज्यपालों की नियुक्ति की है.

रवि की नियुक्ति के अलावा बनवारीलाल पुरोहित, जो अब तक तमिलनाडु के राज्यपाल थे, को पंजाब भेजा गया है. लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह, जो डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ के रूप में सेवानिवृत्त हुए हैं, को बेबी रानी मौर्य के बाद उत्तराखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया है

मालूम हो कि कार्यकाल के दो साल बचे होने पर मौर्य ने इस्तीफा दे दिया.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, लेफ्टिनेंट जनरल सिंह ने रणनीतिक XV कोर, जो कश्मीर में नियंत्रण रेखा को देखता है, के कोर कमांडर के रूप में कार्य किया है. उन्होंने सैन्य संचालन के अतिरिक्त महानिदेशक के रूप में चीन के परिचालन और सैन्य रणनीतिक मुद्दों को भी संभाला है.

आदेश में कहा गया है कि वर्तमान में असम के राज्यपाल जगदीश मुखी नगालैंड का अतिरिक्त प्रभार भी संभालेंगे.

उल्लेखनीय है कि केंद्र के साथ बातचीत करने वाले प्रमुख नगा समूह नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (एनएससीएन-आईएम) और रवि के बीच बिगड़ते रिश्तों के चलते पिछले कुछ समय में नगा शांति प्रक्रिया में मुश्किलें आई हैं.

2015 में नगा शांति समझौते के लिए एक फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए जाने के बावजूद सरकार समझौते को अंतिम रूप नहीं दे पाई है. इस बीच कई बार रवि को वार्ताकार के पद से हटाए जाने की भी मांग उठी है.

इस महीने की शुरुआत में नगा पीपुल्स मूवमेंट फॉर ह्यूमन राइट्स (एनपीएमएचआर) द्वारा आयोजित कॉन्फ्रेंस में शामिल सांसदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों ने नगा शांति वार्ता के लिए नए वार्ताकार को नियुक्त करने की मांग की थी.

रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने आरएन रवि और एनएससीएन-आईएम के बीच विश्वास की कमी की वजह से शांति प्रक्रिया के अचानक पटरी से उतरने को लेकर निराशा जताई थी.

इस दौरान कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच वार्ताकार का होना जरूरी है. शांति बहाल करने के लिए एक वार्ताकार को नियुक्त करना जरूरी है, जो दोनों पक्षों के बीच दोबारा विश्वास बहाल कर सके.

रवि और एनएससीएन-आईएम के बीच संबंधों में 2020 में खटास आ गई थी, जब रवि ने मुख्यमंत्री नेफियू रियो को कानून और व्यवस्था की स्थिति की आलोचना करते हुए पत्र लिखा था.

रवि ने ‘बड़े पैमाने पर जबरन वसूली और हिंसा’ की ओर इशारा करते हुए आरोप लगाया था कि ‘सशस्त्र गिरोह’ समानांतर सरकार चला रहे थे और ‘राज्य सरकार की वैधता को चुनौती दे रहे थे.’ राज्य सरकार ने इसके जवाब में कहा था कि उनका आकलन सही नहीं था.

उस समय भी वार्ताकार बदलने की मांग उठी थी. तब नगा संगठनों के प्रतिनिधि एनएससीएन-आईएम ने कहा था कि वे (रवि) इस प्रक्रिया में बाधा पैदा कर रहे हैं, इसलिए वार्ता आगे बढ़ाने के लिए नया वार्ताकार नियुक्त किया जाना चाहिए.

तब संगठन की ओर से जारी बयान कहा गया कि नगा मुद्दों पर रवि के तीखे हमलों की बदौलत शांति समझौते की प्रक्रिया तनावपूर्ण स्थिति में पहुंच गई है.

गौरतलब है कि उत्तर पूर्व के सभी उग्रवादी संगठनों का अगुवा माने जाने वाला एनएससीएन-आईएम अनाधिकारिक तौर पर सरकार से साल 1994 से शांति प्रक्रिया को लेकर बात कर रहा है.

सरकार और संगठन के बीच औपचारिक वार्ता वर्ष 1997 से शुरू हुई. नई दिल्ली और नगालैंड में बातचीत शुरू होने से पहले दुनिया के अलग-अलग देशों में दोनों के बीच बैठकें हुई थीं.

18 साल चली 80 दौर की बातचीत के बाद अगस्त 2015 में भारत सरकार ने एनएससीएन-आईएम के साथ अंतिम समाधान की तलाश के लिए रूपरेखा समझौते (फ्रेमवर्क एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर किए गए.

एनएससीएन-आईएम के महासचिव थुलिंगलेंग मुइवा और वार्ताकार आरएन रवि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में तीन अगस्त, 2015 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

चार साल पहले केंद्र ने एक समझौते (डीड ऑफ कमिटमेंट) पर हस्ताक्षर कर आधिकारिक रूप से छह नगा राष्ट्रीय राजनीतिक समूहों (एनएनपीजी) के साथ बातचीत का दायरा बढ़ाया था.

आधिकारिक तौर पर अक्टूबर 2019 में इन समूहों के साथ हो रही शांति वार्ता खत्म हो चुकी है, लेकिन नगालैंड के दशकों पुराने सियासी संकट के लिए हुए अंतिम समझौते का आना अभी बाकी है.

उल्लेखनीय है कि एनएससीएन-आईएम ने समझौते पर हस्ताक्षर के आधार पर अलग झंडे और संविधान की मांग की थी, लेकिन रवि ने अक्टूबर 2019 में इसे ख़ारिज कर दिया था.

मालूम हो कि अगस्त 2020 में आरएन रवि और एनएससीएन-आईएम के बीच बढ़ी तनातनी के बाद इस संगठन ने 2015 में सरकार के साथ हुए फ्रेमवर्क एग्रीमेंट की प्रति सार्वजनिक करते हुए कहा था कि आरएन रवि नगा राजनीतिक मसले को संवैधानिक क़ानून-व्यवस्था की समस्या का रंग दे रहे हैं.