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दिल्ली दंगा यूएपीए केस: आरोपियों ने कहा- 5 महीने बाद भी पुलिस ने नहीं दिए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य

छात्र कार्यकर्ता नताशा नरवाल, देवांगना कलीता और आसिफ़ इक़बाल तन्हा ने दिल्ली दंगे के आरोपों को लेकर दिल्ली पुलिस द्वारा ज़ब्त की गए उनसे संबंधित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मुहैया कराने की मांग की थी.

तिहाड़ जेल से बाहर आने के बाद छात्र कार्यकर्ता नताशा नरवाल, देवांगना कलीता, आसिफ इकबाल तन्हा. (फोटोः पीटीआई)

नई दिल्ली: साल 2020 के उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगे के आरोपी छात्र कार्यकर्ताओं नताशा नरवाल और देवांगना कलीता के वकीलों ने शुक्रवार को दिल्ली की एक अदालत को बताया कि पांच महीने बीते गए हैं, लेकिन अभी तक उन्हें अभियोजन पक्ष द्वारा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मुहैया नहीं कराए गए हैं और न ही इस संबंध में उन्होंने कोई जवाब दिया है.

उन्होंने कहा कि ऐसे आवेदन का क्या औचित्य है जब समयसीमा के भीतर इनका निपटारा न किया जाए.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, वकील अदित पुजारी और तुषारिका मट्टू ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत को बताया कि उन पर जांच में देरी करने का आरोप लगाया गया है, जबकि पुलिस ने उनके आवेदन का अभी तक कोई जवाब नहीं दिया.

पुजारी ने कोर्ट से कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्राप्त करने के लिए उन्होंने अप्रैल में आवेदन दिया था, लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है. उन्होंने कहा, ‘धारा 207 का क्या औचित्य है, जब आवेदनों का तेजी से निपटारा नहीं किया जा रहा है.’

याचिकाकर्ताओं ने दंगे के आरोपों को लेकर पुलिस द्वारा उनके संबंध में जब्त किया गया डिजिटल डेटा मुहैया कराने की मांग की थी.

इस मामले को लेकर सरकारी वकील अमित प्रसाद ने कोर्ट को दलील कि चूंकि उनके पास काफी ज्यादा मात्रा में डेटा इकट्ठा हुए थे और इसमें निजता का भी मामला जुड़ा हुआ है, इसलिए जवाब देने में देरी हो रही है.

उन्होंने कहा, ‘वह सारा डिजिटल डेटा मांग रहे हैं, जिसे जब्त किया गया था. जांच के दौरान एजेंसी ने कई लोगों को बुलाया था और उनसे पूछताछ की गई थी. जो डेटा इकट्ठा हुआ है, वह बहुत बड़ा है. उस डेटा में उन लोगों का व्यक्तिगत डेटा होता है जिनके उपकरण जब्त किए जाते हैं. ऐसे में उनकी निजता का उल्लंघन हो जाएगा.’

प्रसाद ने कहा कि अभी इस डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है और निष्कर्ष निकालकर जवाब दिया जाएगा.

इस पर मट्टू ने कहा कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश के अनुसार कम से कम उन दस्तावेजों की सूची मुहैया करानी चाहिए, जिसके आधार पर आरोप लगाए गए हैं.

सुनवाई के दौरान इस मामले में एक अन्य आसिफ इकबाल तन्हा का भी मामला सामने आया, जिन्होंने अपने फोन की क्लोन कॉपी मांगी थी.

तन्हा की वकील सौजन्या शंकरन ने कहा कि अभियोजन पक्ष ये दलील नहीं दे सकता कि इन डेटा में प्राइवेसी का मामला है, क्योंकि ये आरोपियों के फोन का ही डेटा है. उन्होंने यह भी कहा कि अभियोजन ने पूरा डेटा पेश नहीं किया और उन्होंने सुविधानुसार कुछ डेटा की पेश किया है.

वहीं, एक अन्य आरोपी यूनाइटेड अगेंस्ट हेट के संस्थापक खालिद सैफी ने अदालत से कहा कि वे मामले में चार्जशीट दाखिल करके कागज बर्बाद करने के लिए दिल्ली पुलिस के खिलाफ केस दायर करेंगे.

सैफी ने कहा, ‘मैंने अखबार में कुछ ऐसा पढ़ा कि अस्सलाम-अलैकुम कहकर भाषण शुरू करना अवैध है. ऐसा है तो मुझे ऐसा करना बंद कर देना चाहिए. इस पर कोर्ट ने बताया कि उसने ऐसा नहीं कहा, अभियोजन पक्ष ने यह कहा था.

इस पर हल्के अंदाज़ में सैफी ने कहा, ‘मैं हमेशा दोस्तों से सलाम कहकर मिलता हूं. मुझे लगता है कि ऐसा गैरकानूनी होने की स्थिति में मुझे इसे बंद करना होगा. मैं जब जमानत पर बाहर निकलूंगा तब एनजीटी में मामला दायर करूंगा कि दिल्ली पुलिस ने इस चार्जशीट पर 20 लाख कीमती कागजात बर्बाद कर दिए.’

मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर को होगी.

मालूम हो कि 15 जून को दिल्ली हाईकोर्ट ने गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (यूएपीए) के तहत पिछले साल मई में गिरफ्तार नरवाल, कलीता और तन्हा को जमानत दे दी थी.

जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और जस्टिस एजे भंभानी की पीठ ने जमानत देते हए कहा था, ‘हम यह कहने के लिए बाध्य हैं कि असहमति की आवाज को दबाने की जल्दबाजी में सरकार ने विरोध के संवैधानिक अधिकार और आतंकवादी गतिविधियों के अंतर को खत्म-सा कर दिया है. अगर यह मानसिकता जोर पकड़ती है तो यह लोकतंत्र के लिए दुखद दिन होगा.’

गौरतलब है कि 24 फरवरी 2020 को उत्तर-पूर्व दिल्ली में संशोधित नागरिकता कानून के समर्थकों और विरोधियों के बीच हिंसा भड़क गई थी, जिसने सांप्रदायिक टकराव का रूप ले लिया था.

हिंसा में कम से कम 53 लोगों की मौत हो गई थी तथा करीब 200 लोग घायल हो गए थे. इन तीनों पर इनका मुख्य ‘साजिशकर्ता’ होने का आरोप है.