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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत में मौत की सीबीआई जांच का निर्देश दिया

उत्तर प्रदेश के जौनपुर ज़िले में 24 वर्षीय एक व्यक्ति की कथित तौर पर पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी. इस मामले में अजय कुमार यादव ने प्राथमिकी दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया है कि पुलिस उनके भाई को 11 फरवरी, 2021 को जबरदस्ती अपने साथ ले गई और उन्हें थाने में रखा था. अगले दिन बताया गया कि उनके भाई की मौत हो गई है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट. (फोटो: पीटीआई)

इलाहाबाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जौनपुर में 24 वर्षीय एक व्यक्ति की कथित तौर पर पुलिस हिरासत में हुई मौत की सीबीआई जांच का बुधवार (सात सितंबर) को निर्देश दिया. अदालत ने इस मामले में कहा, ‘पुलिस का पूर्ण प्रयास किसी तरह आरोपियों को क्लीनचिट देने का है.’

जौनपुर जिले के अजय कुमार यादव द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एसपी केसरवानी और जस्टिस पीयूष अग्रवाल की खंडपीठ ने इस मामले की जांच सीबीआई को हस्तांतरित कर दी.

अदालत ने कहा, ‘अगर जांच न तो प्रभावी हो, न उद्देश्यपूर्ण हो और न ही निष्पक्ष हो तो अदालतें यदि आवश्यक समझें तो निष्पक्ष जांच, आगे की जांच या पुनः जांच का आदेश दे सकती हैं, जिससे सच्चाई सामने आ सके और अन्याय होने से रोका जा सके.’

इस मामले में अजय कुमार यादव ने प्राथमिकी दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया है कि पुलिस उनके भाई कृष्णा यादव उर्फ पुजारी (24 वर्ष) को 11 फरवरी, 2021 को जबरदस्ती अपने साथ ले गई और उन्हें थाने में रखा था. यह घटना जौनपुर जिले में हुई.

प्राथमिकी में कहा गया कि जब सूचनादाता (मृतक का भाई) थाने गए तो उन्हें उनके भाई से मिलने नहीं दिया गया और अगले दिन 12 फरवरी, 2021 को उन्हें बताया गया कि उनके भाई की मौत हो गई है. इसके बाद, आईपीसी की धारा 302 एवं अन्य धाराओं के तहत बक्सा थाने में आरोपी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया था.

वहीं दूसरी ओर, पुलिस ने दावा किया था कि कृष्णा यादव जब मोटरसाइकिल से जा रहे थे तो उन्हें पकड़ने का प्रयास किया गया और वह गिर गए, जिसकी वजह से उन्हें चोटें आईं और लोगों ने उन्हें पीटा.

पुलिस ने दावा किया था जब एक उपनिरीक्षक और दो कॉन्स्टेबलों के साथ उसे प्राथमिक इलाज के लिए भेजा गया, तो डॉक्टर ने उन्हें जिला अस्पताल रेफर कर दिया, जहां उनकी मौत हो गई.

पुलिस हिरासत में मौत की वजह से इस मामले की न्याचिक जांच जौनपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को सौंपी गई और उन्होंने 16 गवाहों के बयान दर्ज किए. हालांकि वह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सके.

इस मामले के रिकॉर्ड को देखने के बाद अदालत ने कहा, ‘पुलिस का पूर्ण प्रयास किसी तरह से आरोपियों को क्लीनचिट देने का है और इस उद्देश्य के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्यों को छोड़ा जा रहा है तथा कुछ साक्ष्य तैयार किए जा रहे हैं. लेकिन फिलहाल हम कुछ और टिप्पणी नहीं करना चाहेंगे, क्योंकि एक स्वतंत्र और निष्पक्ष एजेंसी द्वारा निष्पक्ष जांच अभी की जानी बाकी है.’

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, अदालत ने कहा, ‘हर सभ्य समाज में पुलिस फोर्स को अपराधी को सजा दिलाने के लिए अपराध की जांच करने का अधिकार दिया गया है. यह समाज की भलाई में है कि जांच एजेंसी ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ कार्य करे. सिर्फ दोषसिद्धि तय करने के लिए उसे झूठे सबूत गढ़ने या झूठे सुराग नहीं बनाने चाहिए, क्योंकि इस तरह के कार्य न सिर्फ जांच एजेंसी बल्कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में आम आदमी के भरोसे का हिला देते हैं.’

अदालत ने प्रथमदृष्टया पाया कि आईपीएस रैंक के अधिकारियों की मृतक की हत्या/मृत्यु में कुछ संलिप्तता है.

मामले की जांच को सीबीआई को स्थानांतरित करते हुए अदालत ने मामले की नए सिरे से सुनवाई के लिए 20 सितंबर की तारीख तय की है.

मालूम हो कि हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1997 में एक व्यक्ति की हिरासत में मौत के मामले में पुलिसकर्मी को जमानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि हिरासत में व्यक्ति के साथ हिंसा और उसकी मौत, हमेशा से ही सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय रहा है.

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि 28 दिसंबर, 1997 को कुछ पुलिसकर्मी उनके घर आए और उनके पिता को अपने साथ ले गए. उन्होंने आरोप लगाया है कि उनके पिता को बेरहमी से पीटा गया, जिसकी वजह से थाने में ही उनकी मृत्यु हो गई.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)