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हमारी न्याय व्यवस्था का भारतीयकरण करने की ज़रूरत: सीजेआई एनवी रमना

दिवंगत न्यायाधीश जस्टिस मोहन शांतानागौदर को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने कहा कि हमारी न्याय व्यवस्था कई बार आम आदमी के लिए कई अवरोध खड़े कर देती है. अदालतों के कामकाज और कार्यशैली भारत की जटिलताओं से मेल नहीं खाते. हमारी प्रणालियां, प्रक्रियाएं और नियम मूल रूप से औपनिवेशिक हैं और ये भारतीय आबादी की ज़रूरतों से पूरी तरह मेल नहीं खाते.

चीफ जस्टिस एनवी रमना. (फाइल फोटो साभार: यूट्यूब/सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन)

नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने बीते शनिवार को कहा कि देश की न्याय व्यवस्था का भारतीयकरण करना समय की जरूरत है और न्याय प्रणाली को और अधिक सुगम तथा प्रभावी बनाना आवश्यक है.

उन्होंने कहा कि अदालतों को वादी-केंद्रित बनना होगा और न्याय प्रणाली का सरलीकरण अहम विषय होना चाहिए.

जस्टिस रमना ने कहा, ‘हमारी न्याय व्यवस्था कई बार आम आदमी के लिए कई अवरोध खड़े कर देती है. अदालतों के कामकाज और कार्यशैली भारत की जटिलताओं से मेल नहीं खाते. हमारी प्रणालियां, प्रक्रियाएं और नियम मूल रूप से औपनिवेशिक हैं और ये भारतीय आबादी की जरूरतों से पूरी तरह मेल नहीं खाते.’

उच्चतम न्यायालय के दिवंगत न्यायाधीश जस्टिस मोहन एम शांतानागौदर को श्रद्धांजलि देने के लिए बंगलुरु में आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘जब मैं भारतीयकरण कहता हूं तो मेरा आशय हमारे समाज की व्यावहारिक वास्तविकताओं को स्वीकार करने तथा हमारी न्याय देने की प्रणाली का स्थानीयकरण करने की जरूरत से है. उदाहरण के लिए किसी गांव के पारिवारिक विवाद में उलझे पक्ष अदालत में आमतौर पर ऐसा महसूस करते हैं जैसे कि उनके लिए वहां कुछ हो ही नहीं रहा, वे दलीलें नहीं समझ पाते, जो अधिकतर अंग्रेजी में होती हैं.’

जस्टिस रमना ने कहा कि इन दिनों फैसले लंबे हो गए हैं, जिससे वादियों (पार्टीज) की स्थिति और जटिल हो जाती है.

उन्होंने कहा, ‘वादियों को फैसले के असर को समझने के लिए अधिक पैसा खर्च करने को मजबूर होना पड़ता है. अदालतों को वादी-केंद्रित होना चाहिए, क्योंकि अंततोगत्वा लाभार्थी वे ही हैं. न्याय देने की व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी, सुगम तथा प्रभावी बनाना अहम होगा.’

जस्टिस रमना ने कहा कि प्रक्रियागत अवरोध कई बार न्याय तक पहुंच में बाधा डालते हैं. उन्होंने कहा, ‘किसी आम आदमी को अदालत आने में न्यायाधीशों या अदालतों का डर महसूस नहीं होना चाहिए, उसे सच बोलने का साहस मिलना चाहिए, जिसके लिए वादियों और अन्य हितधारकों के लिहाज से सुविधाजनक माहौल बनाने की जिम्मेदारी वकीलों तथा न्यायाधीशों की है.’

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वकीलों एवं जजों की ये जिम्मेदारी है कि वे याचिकाकर्ता एवं अन्य पक्षकारों के लिए सुगम माहौल बनाएं. उन्होंने कहा कि हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी न्याय व्यवस्था का केंद्र बिंदु याचिकाकर्ता होता है, जो न्याय की गुहार लगा रहा होता है.

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘इन चीजों को ध्यान में रखते हुए मध्यस्थता और सुलह जैसे वैकल्पिक विवाद तंत्र के उपयोग से पक्षों के बीच टकराव को कम करने में काफी मदद मिलेगी और संसाधनों की बचत होगी. यह लंबे निर्णयों के साथ लंबी बहस की जरूरत को भी कम करता है.’

भारतीय न्यायपालिका में जस्टिस शांतानागौदर के योगदान को याद करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि वह जस्टिस शांतानागौदर से इन विषयों पर रोज बात करते थे.

उन्होंने कहा, ‘उनके जाने से देश ने आम आदमी के एक न्यायाधीश को खो दिया. मैंने व्यक्तिगत रूप से एक अच्छे मित्र और मूल्यवान सहयोगी को खो दिया.’

मालूम हो कि जस्टिस शांतानागौदर का निधन इसी साल 25 अप्रैल को गुड़गांव के एक निजी अस्पताल में हो गया था, जहां फेफड़े में संक्रमण के कारण उन्हें भर्ती कराया गया था. वह 62 वर्ष के थे.

समारोह में उपस्थित कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने कहा कि जस्टिस शांतानागौदर जमीन से जुड़े व्यक्ति थे और आम आदमी के न्यायाधीश थे.

जस्टिस शांतानागौदर को 17 फरवरी, 2017 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में प्रोन्नत किया गया था. इससे पहले तक वह केरल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)