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प्रेस स्वतंत्रता को निशाना बनाने वालों को दंडित किया जाना चाहिए: इंटरनेशनल प्रेस इंस्टिट्यूट

इंटरनेशनल प्रेस इंस्टिट्यूट ने एक प्रस्ताव पारित किया है, जिसमें चेतावनी दी गई है कि प्रेस की स्वतंत्रता के उल्लंघन के लिए ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ जब तक कार्रवाई नहीं की जाती, तब तक यह दमनकारी अभियान चलता रहेगा, जो आगे चलकर तेज़ ही होगा और स्वतंत्र ख़बरों के भविष्य और दुनियाभर में लोकतंत्र को जोख़िम में डालेगा.

(फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

नई दिल्लीः संपादकों, मीडिया अधिकारियों और पत्रकारों के वैश्विक नेटवर्क इंटरनेशनल प्रेस इंस्टिट्यूट (आईपीआई) ने शुक्रवार को एक प्रस्ताव पारित करते हुए कहा कि विश्व स्तर पर पत्रकारों और स्वतंत्र प्रेस को निशाना बनाने वालों को दंडित किया जाना चाहिए.

इस प्रस्ताव में बेलारूस, म्यांमार, हंगरी, चीन, सऊदी अरब और दुनिया के कई और देशों में प्रेस की स्वतत्रंता पर बढ़ रहे हमलों का उल्लेख किया गया है.

आईपीआई के प्रस्ताव में कहा गया है कि अधिक चिंताजनक यह है कि दोषियों को अधिक खामियाजा भुगतना नहीं पड़ता.

प्रस्ताव में कहा गया, ‘आईपीआई सदस्यों ने चेतावनी दी कि प्रेस की स्वतंत्रता के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ जब तक कार्रवाई नहीं की जाती, तब तक यह दमनकारी अभियान चलता रहेगा, जो आगे चलकर तेज ही होगा और स्वतंत्र खबरों के भविष्य और दुनियाभर में लोकतंत्र को जोखिम में डालेगा.’

प्रस्ताव में कहा गया कि विभिन्न देश पत्रकारों को डराने और उन पर दबाव डालने के लिए कई तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनमें पेगासस जैसे स्पायवेयर का भी इस्तेमाल हो रहा है.

प्रस्ताव में कहा गया, ‘प्रेस की स्वतंत्रता को कमतर करने के लिए पहले से ही विभिन्न सरकारों द्वारा अलग-अलग हथकंडे अपनाए जा रहे हैं. इसमें न सिर्फ हिंसा और जेल में डाल देना शामिल है, बल्कि सर्विलांस जैसे वैकल्पिक तरीके भी शामिल हैं.’

इसके मुताबिक, ‘आईपीआई सदस्य इजरायली कंपनी एनएसओ के पेगासस जैसे स्पायवेयर के दुरुपयोग की कड़ी निंदा करते हैं. इस स्पायवेयर का इस्तेमाल मेक्सिको से लेकर हंगरी और हंगरी से लेकर अजरबैजान तथा भारत तक के प्राधिकारियों ने पत्रकारों की सर्विलांस में किया है.’

प्रस्ताव में कहा गया, ‘स्वतंत्र न्यायिक अधिकारियों को इस सर्विलांस का पता लगाने के लिए तत्काल जांच करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसा दोबारा नहीं हो.’

आईपीआई सदस्यों ने पत्रकारों की सुरक्षा और गोपनीयता के लिए जरूरी एंड टू एंड एन्क्रिप्शन जैसे डिजिटल संचार के माध्यमों को कमजोर करने के विभिन्न सरकारों के प्रयासों को लेकर भी चेताया.

प्रस्ताव में कहा गया, ‘एक अन्य रणनीति आर्थिक दबाव है. सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग कर मीडिया बाजार को स्वतंत्र पत्रकारों के खिलाफ खड़ा कर देने का रुझान बढ़ रहा है.’

आईपीआई नेटवर्क ने हंगरी, पोलैंड और स्लोवेनिया में मीडिया के अधिग्रहण को रोकने के लिए यूरोपीय संघ (ईयू) से कार्रवाई करने का आह्वान किया है. इन देशों में जान-बूझकर राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों को संसाधनों से महरूम रखा जा रहा है, ताकि इन एजेंसियों को सरकार के नियंत्रण में जाने को मजबूर किया जा सके.

प्रस्ताव में कहा गया, ‘आईपीआई सदस्यों ने उन नए कानूनी कदमों पर चिंता जताई जिनके जरिये स्वतंत्र पत्रकारिता में बाधा उत्पन्न की जाएगी. इनमें दक्षिण कोरिया का प्रस्तावित फेक न्यूज कानून शामिल है, जिसमें कथित तौर पर फेक न्यूज को लेकर मीडिया पर मुकदमा चलाए जाने का प्रावधान है और इसके साथ ही उस पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है. ठीक इसी तरह पाकिस्तान का पीएमडीए कानून भी है, जिसमें मीडिया पर सरकार के नियंत्रण के विस्तार का प्रावधान है.’

आईपीआई ने इन दोनों कानूनों को वापस लेने का आह्वान किया है. इसके साथ ही एक अन्य प्रमुख चिंता ऑनलाइन सेंसरशिप बढ़ाने और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नियंत्रण करने के लिए मौजूदा और नए कानूनों का होना है.

इस प्रस्ताव में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आह्वान किया गया है कि वह अफगानिस्तान में तालिबान के नियंत्रण के बाद से वहां अत्यंत अस्थिर परिस्थितियों में काम कर रहे अफगान पत्रकारकों के लिए कुछ जरूरी कदम उठाएं.

प्रस्ताव में कहा गया, ‘अफगानिस्तान में तालिबान के नियंत्रण में देश में पत्रकारों पर हमले बढ़े हैं, जबकि तालिबान ने प्रेस स्वतंत्रता का वादा किया था, जिसे वह तोड़ चुका है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह सुनिश्चित करना होगा कि बीते 20 सालों में अफगानिस्तान में स्वतंत्र और पेशेवर मीडिया के विकास के संदर्भ में हासिल की गईं असाधारण उपलब्धियों को न खोया जाए.’

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)