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सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालयों से कहा, क़ैदियों की मौत का संज्ञान लें और मुआवज़ा दिलवाएं

शीर्ष अदालत ने कहा, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार उच्च न्यायालय वर्ष 2012 से 2015 के दौरान अस्वाभाविक मृत्यु के शिकार हुए कैदियों के परिजनों की पहचान करें.

(फोटो: पीटीआई)

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नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को जेलों में होने वाली अस्वाभाविक मौतों पर चिंता व्यक्त करते हुए सभी उच्च न्यायालयों से कहा कि वर्ष 2012 के बाद जेल में जिन क़ैदियों की अस्वाभाविक मृत्यु हुई है उनके परिजनों की पहचान करने के लिए स्वत: ही याचिका दर्ज करें और उन्हें उचित मुआवज़ा दिलाएं.

न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने जेल सुधारों के बारे में विस्तृत दिशा निर्देश जारी करते हुए सभी राज्य सरकारों को कैदियों, खासकर पहली बार अपराध करने वालों, की काउंसलिंग के लिए काउंसलर और सहायक व्यक्तियों की नियुक्ति करने के लिए कहा.

यही नहीं, न्यायालय ने सभी राज्यों को निर्देश दिए कि क़ैदियों के लिए चिकित्सीय सहायता की उपलब्धता के बारे में अध्ययन कराया जाए और जहां भी आवश्यक हो वहां सुधारात्मक कदम उठाए जाएं.

पीठ ने कहा, हम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध करते हैं कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2012 से 2015 के दौरान अस्वाभाविक मृत्यु के शिकार हुए कैदियों के परिजनों की पहचान के लिए ऐसे मामलों में स्वत: ही जनहित याचिका दर्ज करें और इसके बाद उन्हें उचित मुआवज़ा दिलाएं बशर्ते पहले पर्याप्त मुआवज़ा नहीं दिया गया हो.

न्यायालय ने शीर्ष अदालत के सेक्रेटरी जनरल से कहा कि इस फैसले की प्रति सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल को एक सप्ताह के भीतर भेजी जाए.

पीठ ने कहा, राज्य सरकारों को निर्देश दिया जाता है कि वे क़ैदियों, ख़ासकर पहली बार अपराध करने वाले की काउंसलिंग के लिए काउंसलर और सहायक कार्मिक नियुक्त करें.

इस संबंध में मान्यता प्राप्त ग़ैर सरकारी संगठनों की सेवाएं ली जा सकती हैं और उन्हें प्रोत्साहित किया जा सकता है.

शीर्ष अदालत ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को निर्देश दिया कि बाल संरक्षण संस्थानों में हिरासत में या संरक्षण और देखभाल की ज़रूरत की ख़ातिर रखे गए बच्चो में से, यदि किसी की अस्वाभाविक मृत्यु हुई हो तो उनकी संख्या का चार्ट बनाने हेतु राज्य सरकारों के संबंधित अधिकारियों के साथ विचार करें.

न्यायालय ने देश की 1382 जेलों में व्याप्त अमानवीय हालात की ओर ध्यान आकर्षित करने और उचित निर्देशों के लिए 2013 में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह निर्देश दिए.