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गंभीर अपराधों में ज़मानत देने से पहले पीड़ित और परिवार के अधिकारों पर विचार हो: हाईकोर्ट

जघन्य अपराध के दोषियों की ज़मानत के लिए व्यापक मानदंड निर्धारित करने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट को सुझाव दिया कि पीड़ित से परामर्श के बाद उस पर अपराध के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक प्रभाव आदि के आकलन के बाद ही आरोपी को ज़मानत दी जानी चाहिए.

इलाहाबाद हाईकोर्ट. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि गंभीर और जघन्य अपराधों के मामलों में किसी आरोपी को जमानत देने से पहले पीड़ित और उसके परिवार के अधिकारों पर विचार किया जाना चाहिए.

उच्च न्यायालय ने शीर्ष अदालत को सुझाव दिया कि पीड़ित से परामर्श के बाद ‘पीड़ित प्रभाव आकलन’ रिपोर्ट ली जानी चाहिए. रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से सभी चिंताओं के साथ-साथ अपराध के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक प्रभाव तथा पीड़ित पर जमानत के प्रभाव के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी होनी चाहिए.

उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री ने शीर्ष अदालत को पूर्व के एक आदेश के आलोक में अपने सुझाव दिए हैं, जिसमें दोषी ठहराए गए व्यक्तियों की अपील के लंबित रहने के दौरान जमानत अर्जियों के मामलों को विनियमित करने के लिए ‘व्यापक मानदंड’ निर्धारित करने में मदद करने के लिए कहा गया था.

उच्च न्यायालय ने गंभीर और जघन्य अपराधों के संदर्भ में कहा, ‘जमानत देने से पहले पीड़िता के अधिकारों पर विचार किया जाना चाहिए.’

इलाहाबाद हाईकोर्ट की रजिस्ट्री द्वारा दाखिल हलफनामे पर जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ विचार कर सकती है.

शीर्ष अदालत जघन्य अपराधों में दोषी ठहराए गए लोगों की 18 अपीलों पर विचार कर रही है.

याचिकाकर्ता इस आधार पर जमानत दिए जाने का अनुरोध कर रहे हैं कि उन्होंने सात या अधिक साल जेल में बिताए हैं और उन्हें इस आधार पर जमानत दी जाए कि दोषसिद्धि के खिलाफ उनकी अपील को उच्च न्यायालय में नियमित सुनवाई के लिए लंबे समय से सूचीबद्ध नहीं किया गया है.

हलफनामे में कहा गया है, ‘उच्च न्यायालय भारी संख्या में लंबित मामलों के कारण काफी दबाव का सामना कर रहा है. इसलिए, अभियुक्तों को इसका लाभ तब तक नहीं दिया जा सकता जब तक कि अपीलों पर जल्द निर्णय लेने के लिए समर्पित विशेष पीठों का गठन नहीं किया जाता है.’

उच्च न्यायालय ने आगे कहा कि जैसा कि शीर्ष अदालत ने विभिन्न मामलों में कहा है कि उम्रकैद का मतलब ‘पूरी उम्र’ है, और इसे उसी संदर्भ में लेना चाहिए.

उच्च न्यायालय ने कहा, ‘यदि कोई व्यक्ति वर्षों तक जेल में रहने के बाद रिहा हो जाता है, तो आजीवन कारावास की सजा देने का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा. यदि जघन्य अपराधों के आरोपी को वर्षों जेल में बिताने के बाद जमानत पर रिहा किया जाता है, तो वह अपनी अपील पर जल्द निर्णय लेने का कोई प्रयास नहीं करेगा.’

हाईकोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि सफेदपोश अपराधों और राज्य एवं उसके नागरिकों के खिलाफ संगठित अपराधों जैसे अधिक गंभीर अपराधों के मामलों में जमानत देने के लिए अलग-अलग मानदंड विकसित करने होंगे.

उन्होंने कहा, ‘चूंकि यहां शामिल अपराधी आदतन और कठोर अपराधी हैं, जो योजनाबद्ध और व्यवस्थित तरीके से अपराध करते हैं.’

उच्च न्यायालय ने उन अभियुक्तों की जमानत याचिकाओं को विनियमित करने के लिए कई अन्य सुझाव दिए, जिनकी अर्जियां लंबी अवधि से लंबित हैं.

शीर्ष अदालत ने कहा था कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दिए गए किसी भी सुझाव को अपनी आधिकारिक मंजूरी देने से पहले यह उचित होगा कि उच्च न्यायालय खुद इसकी जांच करे और सुझाव दे.