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नगालैंड: तबादले के बाद आरएन रवि ने नगा शांति वार्ता के वार्ताकार का पद छोड़ा

आरएन रवि 2014 से नगा संगठनों के साथ चल रही शांति वार्ता में केंद्र सरकार की ओर से बात कर रहे थे और 2019 में उन्हें नगालैंड के राज्यपाल पद की भी ज़िम्मेदारी दी गई थी. बीते एक साल में कई बार नगा समूहों और कार्यकर्ताओं की ओर से उन पर शांति वार्ता बेपटरी करने की कोशिश के आरोप लगाए गए थे. इस महीने की शुरुआत में उन्हें तमिलनाडु का राज्यपाल बनाया गया है.

आरएन रवि. (फोटो साभार: ट्विटर)

नई दिल्ली: तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने नगा शांति वार्ता के वार्ताकार पद से बुधवार को त्यागपत्र दे दिया और उसे तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर लिया गया है. गृह मंत्रालय ने यह जानकारी दी.

रवि 2014 से नगा संगठन एनएससीएन-आईएम के साथ चल रही शांति वार्ता में केंद्र सरकार की ओर से बात कर रहे थे. साल 2019 में उन्हें राज्य के राज्यपाल की भी जिम्मेदारी दी गई थी.

गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, ‘नगा शांति प्रक्रिया के वार्ताकार के रूप में आरएन रवि का त्यागपत्र उनके द्वारा बुधवार को सौंपा गया जिसे भारत सरकार ने स्वीकार कर लिया है.’

केंद्र सरकार ने पहले ही खुफिया ब्यूरो के पूर्व विशेष निदेशक एके मिश्रा को नगा संगठनों के साथ शांति वार्ता में लगा दिया है. बताया गया है कि मिश्रा नगा विद्रोही संगठनों के साथ वार्ता बहाल कर चुके हैं.

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, एक सरकारी अधिकारी ने बताया, ‘बीते दो सालों में आरएन रवि और नगा समूहों के बीच भरोसे की इतनी कमी हो गई कि शांति वार्ता आगे ही नहीं बढ़ी थी. अब यह प्रक्रिया फिर से शुरू की गई है.’

ज्ञात हो कि इस महीने की शुरुआत में रवि का तमिलनाडु के राज्यपाल के तौर पर तबादला कर दिया गया था. इससे पहले बीते एक साल में कई बार नगा समूहों और कार्यकर्ताओं की ओर से आरएन रवि पर शांति वार्ता को बेपटरी करने की कोशिश के आरोप लगाए गए हैं.

एनएससीएन-आईएम ने उन पर शांति वार्ता में अड़ंगा लगाने का आरोप लगाते हुए पिछले साल से उनसे वार्ता करने से इनकार कर दिया था.

उल्लेखनीय है कि केंद्र के साथ बातचीत करने वाले प्रमुख नगा समूह नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (एनएससीएन-आईएम) और रवि के बीच बिगड़ते रिश्तों के चलते पिछले कुछ समय में नगा शांति प्रक्रिया में मुश्किलें आई हैं.

2015 में नगा शांति समझौते के लिए एक फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए जाने के बावजूद सरकार समझौते को अंतिम रूप नहीं दे पाई है. इस बीच कई बार रवि को वार्ताकार के पद से हटाए जाने की भी मांग उठी है.

इस महीने की शुरुआत में नगा पीपुल्स मूवमेंट फॉर ह्यूमन राइट्स (एनपीएमएचआर) द्वारा आयोजित कॉन्फ्रेंस में शामिल सांसदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों ने नगा शांति वार्ता के लिए नए वार्ताकार को नियुक्त करने की मांग की थी.

रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने आरएन रवि और एनएससीएन-आईएम के बीच विश्वास की कमी की वजह से शांति प्रक्रिया के अचानक पटरी से उतरने को लेकर निराशा जताई थी.

रवि और एनएससीएन-आईएम के बीच संबंधों में साल  2020 में खटास आ गई थी, जब रवि ने मुख्यमंत्री नेफियू रियो को कानून और व्यवस्था की स्थिति की आलोचना करते हुए पत्र लिखा था.

रवि ने ‘बड़े पैमाने पर जबरन वसूली और हिंसा’ की ओर इशारा करते हुए आरोप लगाया था कि ‘सशस्त्र गिरोह’ समानांतर सरकार चला रहे थे और ‘राज्य सरकार की वैधता को चुनौती दे रहे थे.’ राज्य सरकार ने इसके जवाब में कहा था कि उनका आकलन सही नहीं था.

उस समय भी वार्ताकार बदलने की मांग उठी थी. तब नगा संगठनों के प्रतिनिधि एनएससीएन-आईएम ने कहा था कि वे (रवि) इस प्रक्रिया में बाधा पैदा कर रहे हैं, इसलिए वार्ता आगे बढ़ाने के लिए नया वार्ताकार नियुक्त किया जाना चाहिए.

तब संगठन की ओर से जारी बयान कहा गया कि नगा मुद्दों पर रवि के तीखे हमलों की बदौलत शांति समझौते की प्रक्रिया तनावपूर्ण स्थिति में पहुंच गई है.

गौरतलब है कि उत्तर पूर्व के सभी उग्रवादी संगठनों का अगुवा माने जाने वाला एनएससीएन-आईएम अनाधिकारिक तौर पर सरकार से साल 1994 से शांति प्रक्रिया को लेकर बात कर रहा है.

सरकार और संगठन के बीच औपचारिक वार्ता वर्ष 1997 से शुरू हुई. नई दिल्ली और नगालैंड में बातचीत शुरू होने से पहले दुनिया के अलग-अलग देशों में दोनों के बीच बैठकें हुई थीं.

18 साल चली 80 दौर की बातचीत के बाद अगस्त 2015 में भारत सरकार ने एनएससीएन-आईएम के साथ अंतिम समाधान की तलाश के लिए रूपरेखा समझौते (फ्रेमवर्क एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर किए गए.

एनएससीएन-आईएम के महासचिव थुलिंगलेंग मुइवा और वार्ताकार आरएन रवि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में तीन अगस्त, 2015 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

चार साल पहले केंद्र ने एक समझौते (डीड ऑफ कमिटमेंट) पर हस्ताक्षर कर आधिकारिक रूप से छह नगा राष्ट्रीय राजनीतिक समूहों (एनएनपीजी) के साथ बातचीत का दायरा बढ़ाया था.

आधिकारिक तौर पर अक्टूबर 2019 में इन समूहों के साथ हो रही शांति वार्ता खत्म हो चुकी है, लेकिन नगालैंड के दशकों पुराने सियासी संकट के लिए हुए अंतिम समझौते का आना अभी बाकी है.

उल्लेखनीय है कि एनएससीएन-आईएम ने समझौते पर हस्ताक्षर के आधार पर अलग झंडे और संविधान की मांग की थी, लेकिन रवि ने अक्टूबर 2019 में इसे ख़ारिज कर दिया था.

मालूम हो कि अगस्त 2020 में आरएन रवि और एनएससीएन-आईएम के बीच बढ़ी तनातनी के बाद इस संगठन ने 2015 में सरकार के साथ हुए फ्रेमवर्क एग्रीमेंट की प्रति सार्वजनिक करते हुए कहा था कि आरएन रवि नगा राजनीतिक मसले को संवैधानिक क़ानून-व्यवस्था की समस्या का रंग दे रहे हैं.

नगा समूहों दे मिली राज्य सरकार की मुख्य समिति

नगा राजनीतिक मुद्दा की मुख्य समिति (सीसीएनपीआई) ने एनएससीएन (आईएम) नेतृत्व के साथ बैठक के बाद केंद्र के नए वार्ताकार एके मिश्रा और नगा विद्रोही समूह के बीच शांति वार्ता बहाल होने पर बुधवार को खुशी जताई.

सीसीएनपीआई में नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो, उपमुख्यमंत्री वाई पैटोन और एनपीएफ विधायक दल के नेता टीआर जेलियांग शामिल हैं, जिन्होंने एनएससीएन-आईएम के महासचिव टीएच मुईवा एवं अन्य बागी नेताओं से दीमापुर में चुमुकेडिमा पुलिस परिसर में मुलाकात की.

यह जानकारी राज्य के मंत्री नेइबा क्रोनू ने दी. मंत्री ने कहा कि मुख्य समिति ने एनएससीएन-आईएम के नेतृत्व से अपील की कि नगा समस्या के जल्द समाधान के लिए वार्ता जारी रखें.

यह पूछने पर कि क्या मुख्य समिति सात विभिन्न धड़ों के समूह वर्किंग कमिटी ऑफ नगा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप्स (एनएनपीजीएस) से भी मुलाकात करेगी, तो उन्होंने कहा कि यह सीसीएनपीआई की अगली बैठक में तय किया जाएगा.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)