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यूजीसी द्वारा स्नातक के प्रस्तावित इतिहास पाठ्यक्रम के विरोध में उतरे इतिहासकार

इरफ़ान हबीब, आदित्य मुखर्जी और पंकज झा जैसे प्रमुख इतिहासकारों ने यूजीसी द्वारा प्रस्तावित पाठ्यक्रम की आलोचना करते हुए इसे इतिहास को ‘विकृत करने’ का प्रयास कहा है, साथ ही एक विषय के तौर पर इतिहास का महत्व कम करने का आरोप लगाया है.

(फोटो साभार: यूजीसी वेबसाइट)

नई दिल्ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने स्नातक के लिए इतिहास का पाठ्यक्रम प्रस्तावित किया है.

द टेलीग्राफ के अनुसार, इतिहासकारों ने इसकी आलोचना करते हुए कहा है कि असत्यापित दावों और इतिहास के ‘नस्लीय सिद्धांत’ को बढ़ावा देने वाले ये बदलाव आर्यों पर केंद्रित एडॉल्फ हिटलर की नाजी जर्मनी की याद दिलाते हैं.

इससे पहले द वायर  ने बताया था कि पाठ्यक्रम को हिंदू पौराणिक कथाओं और धार्मिक ग्रंथों पर केंद्रित करने को लेकर कई लोगों ने इतिहास के ‘भगवाकरण’ और ‘इससे छेड़छाड़’ का होने की बात कही थी.

पिछले हफ्ते ‘प्रिवेंटिंग द हिस्टोरियंस क्राफ्ट’ नाम के एक वेबिनार में इरफ़ान हबीब, आदित्य मुखर्जी और पंकज झा जैसे प्रमुख इतिहासकारों ने इतिहास के मसौदा पाठ्यक्रम की आलोचना की.

हबीब ने कहा, ‘यूजीसी पाठ्यक्रम में एक बड़ा हिस्सा आर्यों को समर्पित है. भारत के आर्यों की मातृभूमि होने का दावा करते हुए हम वही कर रहे हैं जो जर्मनों ने किया था. पूरी तरह से एक नस्लीय सिद्धांत थोपा जा रहा है.’

हबीब ने आगे कहा, ‘हिटलर का मानना था कि जर्मन एक शुद्ध नस्ल हैं. जर्मनी में जो हुआ वह हमारे लिए एक सबक होना चाहिए. आरएसएस और भाजपा द्वारा एक तरह का झूठा इतिहास पेश किया जा रहा है.’

हबीब ने पाठ्यक्रम में जाति व्यवस्था और राजा राममोहन राय के सामाजिक सुधार आंदोलन का जिक्र न होने की भी बात कही.

जब से केंद्र में मोदी सरकार सत्ता में आई है, उसने विभिन्न तरीकों से अकादमिक स्वतंत्रता की कीमत पर पाठ्यक्रम को बार-बार बदलने की कोशिश की है.

प्रस्तावित इतिहास पाठ्यक्रम में जाने-माने इतिहासकारों की कृतियां- प्राचीन भारत पर रोमिला थापर या आर.एस शर्मा और मध्यकालीन भारत पर इरफान हबीब की किताबें गायब हैं.

इसमें 20वीं सदी का ऐतिहासिक महत्व और आधुनिकता को कम तवज्जो मिली है. आधुनिक भारत के निर्माता जैसे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, पंडिता रमाबाई, वल्लभभाई पटेल और बीआर आंबेडकर पर भी प्रस्तावित मसौदा पाठ्यक्रम में कम ध्यान दिया है, वहीं 20वीं सदी की शुरुआत में सांप्रदायिकता के उदय का और भी कम उल्लेख है.

टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, पाठ्यक्रम में अल्प ज्ञात लेखकों की किताबों को शामिल किया गया है, जिनमें से कुछ ‘संघ समर्थक’ हैं. लेडी श्रीराम कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर पंकज झा के अनुसार, प्रस्तावित पाठ्यक्रम ने इतिहास को एक विषय के रूप में चुनौती दी है.

झा ने कहा, ‘सबसे बड़ी समस्या यह है कि आप नहीं जानते कि यह पाठ्यक्रम किसने बनाया है. पाठ्यक्रम बनाने वालो के नाम गोपनीय हैं. एक विषय के रूप में इतिहास का विचार सत्यापन योग्य जानकारी के आधार पर कई तरह के विचारों की विविधता का होता है. इस पाठ्यक्रम में इन सब तथ्यों को पूरी तरह खारिज कर दिया गया है.’

मसौदा पाठ्यक्रम में ‘सिंधु-सरस्वती सभ्यता’ को भी बढ़ावा देता है, जिसकी उत्पत्ति पर सबसे अधिक बहस होती है.

सीपी राजेंद्रन के अनुसार, वैदिक लोगों को हड़प्पावासियों से जोड़ने वाली सिंधु जैसी सरस्वती नदी के अस्तित्व को हाल के वर्षों में प्रकाशित कई शोध पत्रों द्वारा चुनौती दी गई है, जो सैटेलाइट इमेजरी, टोपोग्राफी के विश्लेषण और अधिक सुसंगत तारीखी तकनीकों द्वारा प्रमाणित हैं.

इतिहासकार आदित्य मुखर्जी ने कहा है कि सरकार की शक्ति का इस्तेमाल ‘काल्पनिक इतिहास’ गढ़ने के लिए किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि इतिहास की आड़ में सांप्रदायिक विचारधारा को बढ़ावा देने का मौजूदा पैटर्न अंग्रेजों द्वारा सत्ता में बने रहने के लिए की गई कोशिशों से मेल खाता है.

मुखर्जी ने कहा, ‘स्थायी ब्रिटिश शासन की धारणा लाई गई थी. उन्होंने (अंग्रेजों ने) खुद को इस तरह पेश करने की कोशिश की जैसे वे एक समुदाय को दूसरे से बचाने के लिए यहां हैं. उनका प्रयास फूट डालने और शासन करने का था. सांप्रदायिक पार्टियों द्वारा धर्म के राष्ट्रवाद का वाहक होने के विचार ने अंग्रेजों की मदद की थी.’