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एयर इंडिया की ख़रीद के लिए लगी बोली को टाटा संस ने जीता

टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस ने 18,000 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी, जिसमें से 15,300 करोड़ रुपये का क़र्ज़ लेना और बाकी 2700 करोड़ रुपये का नकद भुगतान करना शामिल है. एयर इंडिया की स्थापना टाटा समूह ने 1932 में की थी, तब इसे टाटा एयरलाइंस कहा जाता था. साल 1953 में इसका राष्ट्रीयकरण किया गया था.

(फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: टाटा संस ने सरकारी एयरलाइन एयर इंडिया के अधिग्रहण की बोली जीत ली है. सरकारी कंपनियों के निजीकरण की जिम्मेदारी संभालने वाले केंद्र सरकार के निवेश एवं लोक संपत्ति प्रबंधन विभाग (दीपम) के सचिव तुहिन कांत पांडेय ने कहा कि टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस की एक विशेष इकाई (एसपीवी) सफल बोलीदाता के रूप में उभरी है.

एयर इंडिया के अधिग्रहण की दौड़ में टाटा संस ने स्पाइसजेट के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक अजय सिंह को पीछे छोड़ा, जिन्होंने व्यक्तिगत क्षमता में बोली लगाई थी. सिंह ने 15,100 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी, जबकि टाटा ने 18,000 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी.

दीपम के सचिव ने कहा कि टाटा की 18,000 करोड़ रुपये की बोली में 15,300 करोड़ रुपये का कर्ज लेना और बाकी 2700 करोड़ रुपये का नकद भुगतान करना शामिल है.

इसके साथ ही 1953 में टाटा समूह से नियंत्रण लेकर इस एयरलाइन का राष्ट्रीयकरण करने वाली सरकार ने इस एयरलाइन में 100 प्रतिशत हिस्सेदारी को छोड़ दिया है.

दीपम के सचिव तुहिन कांत पांडेय ने बताया कि दोनों बोलीदाताओं ने आरक्षित मूल्य से ऊपर बोली लगाई थी और इस सौदे को दिसंबर तक पूरा करने की योजना है.

सचिव ने कहा कि टाटा संस की एयर इंडिया के लिए 18,000 करोड़ रुपये की सफल बोली सरकार द्वारा तय 12,906 करोड़ रुपये के आरक्षित मूल्य से अधिक है.

पांडेय ने कहा कि गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और नागर विमानन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित मंत्रियों के एक समूह ने चार अक्टूबर को एयर इंडिया के लिए विजेता बोली को मंजूरी दी थी.

सरकार ने यह भी कहा कि टाटा को एयर इंडिया के सभी कर्मचारियों को एक साल के लिए रखना होगा, दूसरे साल वह स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना की पेशकश कर सकती है.

इसके साथ ही टाटा समूह में एयर इंडिया की वापसी हुई है.

टाटा कंपनी के संस्थापक जहांगीर रतनजी दादाभाई (जेआरडी) टाटा ने साल 1932 में इस एयरलाइन की स्थापना की थी. तब इसे टाटा एयरलाइंस कहा जाता था. साल 1946 में टाटा संस के विमानन प्रभाग को एयर इंडिया के रूप में सूचीबद्ध किया गया था और साल 1948 में एयर इंडिया इंटरनेशनल को यूरोप के लिए उड़ानों के साथ शुरू किया गया था.

अंतरराष्ट्रीय सेवा भारत में पहली सार्वजनिक-निजी भागीदारी में से एक थी, जिसमें सरकार की 49 प्रतिशत, टाटा की 25 प्रतिशत और जनता की शेष हिस्सेदारी थी. साल 1953 में एयर इंडिया का राष्ट्रीयकरण किया गया था.

केंद्र इस सरकारी स्वामित्व वाली एयरलाइन में अपनी 100 प्रतिशत हिस्सेदारी बेच रही है, जिसमें एयर इंडिया की एआई एक्सप्रेस लिमिटेड में 100 प्रतिशत हिस्सेदारी और एयर इंडिया एसएटीएस एयरपोर्ट सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड में 50 प्रतिशत हिस्सेदारी शामिल है.

ये तीसरा मौका है जब एयर इंडिया को बेचने की कोशिश की गई है, जिसमें सरकार सफल हुई है. इससे पहले साल 2001 और 2018 में भी इसी तरह की कोशिश की गई थी, लेकिन किसी ने भी इसके लिए बोली नहीं लगाई थी.

वर्ष 2018 में सरकार ने एयर इंडिया में 76 प्रतिशत हिस्सेदारी और प्रबंधकीय नियंत्रण निजी हाथों में देने के लिए निविदा जारी की थी.

बाद में सरकार को अपनी बिक्री की शर्तों में परिवर्तन करना पड़ा, जिसके बाद इस बार कुछ लोगों ने बोली लगाई. नई शर्तों में ये प्रवाधान किया गया कि बोली जीतने वाली कंपनी या व्यक्ति को 15 फीसदी राशि सरकार को कैश में देना होगा और बाकी राशि को कर्ज के रूप में चुकाया जा सकता है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)