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मानवाधिकार परिषद ने स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण तक पहुंच को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने स्वच्छ पर्यावरण प्रस्ताव को पारित किया. इसमें देशों से पर्यावरण में सुधार करने की अपनी क्षमताओं को भी बढ़ाने की मांग की गई है. इस प्रस्ताव के समर्थन में 43, जबकि विरोध में एक भी मत नहीं पड़ा. वहीं चार सदस्य देश चीन, भारत, जापान और रूस अनुपस्थित रहे.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

जिनेवा: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) ने बीते शुक्रवार को स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण तक पहुंच को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी. औपचारिक रूप से जलवायु परिवर्तन और इसके विनाशकारी परिणामों के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में यह एक महत्वपूर्ण कदम है.

संयुक्त राष्ट्र की मुख्य मानवाधिकार इकाई ने सुरक्षित, स्वच्छ, स्वस्थ और सतत पर्यावरण को मानवाधिकार के रूप में मान्यता देने और जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में मानवाधिकारों की निगरानी के लिए एक विशेषज्ञ की नियुक्ति करने वाले प्रस्ताव को भारी बहुमत के साथ पारित किया है.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने स्वच्छ पर्यावरण प्रस्ताव को पारित किया. इसमें देशों से पर्यावरण में सुधार करने की अपनी क्षमताओं को भी बढ़ाने की मांग की गई है. इस प्रस्ताव के समर्थन में 43 जबकि विरोध में एक भी मत नहीं पड़ा. वहीं चार सदस्य देश चीन, भारत, जापान और रूस अनुपस्थित रहे.

इस प्रस्ताव को कोस्टा रिका, मालदीव, मोरक्को, स्लोवेनिया और स्विट्जरलैंड द्वारा रखा गया.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक प्रस्ताव, जिस पर पहली बार 1990 के दशक में चर्चा की गई थी, कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन इसमें वैश्विक मानकों को आकार देने की क्षमता है. जलवायु से संबंधित मामलों को देखने वाले वकीलों का कहना है कि इससे उन्हें पर्यावरण और मानवाधिकारों से जुड़े मामलों में तर्क देने में मदद मिल सकती है.

इस निर्णय को ऐतिहासिक सफलता बताते हुए मानवाधिकार और पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत डेविड बॉयड ने कहा, इस दुनिया में जीवन बदलने की क्षमता है, जहां हर साल वैश्विक पर्यावरणीय संकट समय से पहले ही 90 लाख से अधिक मौतों का कारण बनता है.

कोस्टा रिका की राजदूत कैटालिना देवंडास एगुइलर ने कहा कि यह निर्णय जलवायु की कठिनाई से जूझ रहे दुनिया भर के समुदायों को एक शक्तिशाली संदेश भेजेगा कि वे अकेले नहीं हैं.

ह्यूमन राइट्स वॉच में संयुक्त राष्ट्र एडवोकेसी (पक्षधरता) की उप-निदेशक लूसी मैककर्नन ने वैश्विक पर्यावरण संकट से निपटने में मदद करने के लिए स्वच्छ पर्यावरण उपाय को महत्वपूर्ण करार दिया.

उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर इस अधिकार को मान्यता देने से स्थानीय समुदायों को पर्यावरण विनाश के खिलाफ आजीविका, स्वास्थ्य और संस्कृति की रक्षा करने में मदद मिलेगी और सरकारों को यह मजबूत और बेहद सुसंसगत पर्यावरण संरक्षण कानूनों और नीतियों को बनाने में मदद करेगी.

वहीं, एक अन्य प्रस्ताव में ‘विशेष प्रतिवेदक’ का पद तीन साल के लिए सृजित किया गया है, जो अन्य चीजों के साथ इस बात की निगरानी करेगा कि जलवायु परिवर्तन कैसे मानवाधिकारों को प्रभावित करता है. इस प्रस्ताव के लिए 42-1 से मतदान हुआ. रूस ने आपत्ति दर्ज की, जबकि चीन, इरीट्रिया, भारत और जापान अनुपस्थित रहे.

मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बॉशेलेट ने सदस्य देशों से स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को तेजी से वास्तविकता में लागू करने के लिए साहसिक कार्रवाई करने का आह्वान किया.

उन्होंने कहा कि इस तरह के कदम की बहुत समय से जरूरत थी और अब इस घटनाक्रम से पर्यावरणीय क्षय और जलवायु परिवर्तन को आपस में जुड़े हुए मानवाधिकार संकटों के रूप में पहचान मिली है.

उन्होंने कहा कि अब लोगों व प्रकृति की रक्षा करने वाली ऐसी परिवर्तनशील, आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय नीतियां आगे बढ़ाने की जरूरत है, जिनके जरिये एक स्वस्थ पर्यावरण व वातावरण के अधिकार को पहचान देने वाला ये प्रस्ताव तेजी से लागू हो.

मानवाधिकार उच्चायुक्त ने यह ध्यान दिलाते हुए कहा कि गत वर्ष अनेक पर्यावरणीय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुईं. उन्होंने सदस्य देशों से पर्यावरणीय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को सुरक्षा मुहैया कराने और उन्हें सशक्त करने के लिए मजबूत कदम उठाने का भी आह्वान किया.

मानवाधिकार परिषद के प्रस्ताव में दुनिया भर में लाखों-करोड़ों लोगों पर जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय विनाश द्वारा उत्पन्न क्षति को स्वीकार किया गया है.

प्रस्ताव में ये भी रेखांकित किया गया है कि आबादी के बहुत कमजोर वर्गों पर बेहद गंभीर असर पड़ा है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि एक वर्ष में लगभग 1.37 करोड़ मौतें या वैश्विक स्तर पर लगभग 24.3 प्रतिशत मौतें वायु प्रदूषण जैसे पर्यावरणीय कारणों से होती हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)