नॉर्थ ईस्ट

नॉर्थ ईस्ट डायरीः विरोध के बीच अडाणी समूह को सौंपा गया गुवाहाटी हवाईअड्डे का संचालन

इस हफ्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में असम, मणिपुर, मेघालय, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर के प्रमुख समाचार.

गुवाहाटी हवाईअड्डा. (फोटो साभार: एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया)

गुवाहाटी/इम्फाल/शिलॉन्ग/गंगटोक/ईटानगर: गुवाहाटी के लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे के संचालन, प्रबंधन और विकास की जिम्मेदारी अडाणी ग्रुप को सौंप दी गई है.

इस संबंध में जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि पूर्वोत्तर के सबसे प्रमुख हवाईअड्डे के विकास और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया की शुरुआत करते हुए भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) के हवाईअड्डा निदेशक रमेश कुमार ने मध्यरात्रि में आयोजित कार्यक्रम में नए हवाईअड्डा संचालक (अडाणी ग्रुप) के मुख्य हवाईअड्डा अधिकारी उत्पल बरुआ को गुवाहाटी हवाई ड्डे की प्रतीकात्मक कुंजी सौंपी.

बयान में कहा गया है कि शुक्रवार से नई हवाईअड्डा संचालक अडाणी गुवाहाटी इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड (एजीआईएएल) हवाईअड्डे के संचालन, प्रबंधन और विकास की जिम्मेदारी संभालेगा.

भारत सरकार ने 2018 में गुवाहाटी हवाईअड्डे को उन छह हवाईअड्डों के समूह में शामिल किया था, जिन्हें 50 वर्षों की अवधि के लिए संचालन, प्रबंधन और विकास (ओएमडी) की खातिर निजीकरण के लिए निर्धारित किया गया है. इसके अलावा बाकी हवाईअड्डों में अहमदाबाद, लखनऊ, मेंगलूर, जयपुर और तिरुवनंतपुरम शामिल हैं.

बता दें कि अडाणी एंटरप्राइज लिमिटेड सभी छह हवाई अड्डों के लिए सफल बोलीदाता के रूप में उभरा था. इसके अनुरूप एएआई और अडाणी एंटरप्राइज लिमिटेड ने इस साल 19 जनवरी को एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

गौरतलब है कि कांग्रेस, असम जातीय परिषद जैसे विपक्षी दलों समेत भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण कर्मचारी यूनियन भी इस समझौते के खिलाफ है.

एनडीटीवी के अनुसार, शुक्रवार को एयरपोर्ट के बाहर कुछ लोगों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते देखा गया. कुछ प्रदर्शनकारियों ने नारेबाजी भी की.

अडाणी समूह को गोपीनाथ बोरदोलोई अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे का संचालन सौंपने के फैसले का कई महीनों से विरोध हो रहा है.

अगस्त में इस फैसले को वापस लेने की मांग करते हुए सामूहिक हस्ताक्षर अभियान शुरू किया गया था. इस सामूहिक हस्ताक्षर अभियान के तहत 500 से अधिक लोगों ने हवाईअड्डे को निजी कंपनी को सौंपने के सरकार के फैसले के विरोध में पत्र पर हस्ताक्षर किए थे.

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने बेदखली अभियान पर असम सरकार से हलफनामा दायर करने को कहा

असम के गुवाहाटी हाईकोर्ट ने गुरुवार को असम सरकार दरांग जिले में 23 सितंबर को हुए बेदखली अभियान पर विस्तृत हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है.

इस बेदखली अभियान के दौरान पुलिस की गोलीबारी में एक नाबालिग सहित दो लोगों की मौत हो गई थी. इस घटना के एक वीडियो में जिला प्रशासन द्वारा हायर किए गए एक फोटोग्राफर को पुलिस की गोली से जमीन पर गिरे ग्रामीण की छाती पर कूदते देखा गया था.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, चीफ जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस सौमित्र सैकिया की पीठ ने कांग्रेस विधायक देबव्रत सैकिया की जनहित याचिका और बेदखली अभियान के संबंध में स्वत: संज्ञान याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा, ‘यह एक बड़ी त्रासदी है, बहुत दुर्भागयपूर्ण है. जो दोषी हैं, उन्हें दंडित किया जाना चाहिए इसमें कोई संदेह नहीं है.’

पीठ ने पूछा कि क्या राज्य को लगता है कि असम में राष्ट्रीय पुनर्वास नीति लागू नहीं है. पीठ ने राज्य सरकार को तीन हफ्तों के भीतर मामले में विस्तृत हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है.

सैकिया ने अपनी याचिका में कहा कि धालपुर से बेदखल किए गए लोग हाशिए के लोग हैं, जो सामाजिक-आर्थिक रूप से समाज से वंचित वर्ग से हैं और जिन्हें 1960 से ही ब्रह्मपुत्र नदी की वजह से बार-बार हो रही बाढ़ और कटाव के कारण पलायन करने को मजबूर होना पड़ा है.

याचिका में कहा गया है कि सरकार ने कृषि परियोजना के लिए दरांग जिले के सिपाझार में लगभग 77,000 बीघा जमीन को खाली कराने के कैबिनेट के फैसले का हवाला देकर बेदखली अभियान को सही ठहराया. अदालत इस मामले में तीन नवंबर को सुनवाई करेगी.

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने कहा- मुझे मिया मुसलमानों के वोट नहीं चाहिए

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा. (फोटो: पीटीआई)

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने कहा कि भाजपा को असम में बंगाली मूल के मुस्लिम समुदाय से वोटों की जरूरत नहीं है. बंगाली मूल के मुस्लिमों को आम बोलचाल की भाषा में मिया मुसलमान कहा जाता है.

हिमंता ने इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2021 के 19वें संस्करण के दौरान कहा, ‘मुझे मिया मुसलमानों के वोट नहीं चाहिए. हम सौहार्द से रहते हैं. मैं उनके पास वोट मांगने नहीं जाऊंगा और वे हमारे पास भी नहीं आते.’

मुख्यमंत्री हिमंता ने कहा कि राज्य में कई लोगों को लगता है कि असम की पहचान, संस्कृति और जमीन खोने के पीछे प्रवासी मुस्लिम मूल कारण हैं.

उन्होंने कहा कि पहले असम में समुदाय आधारित राजनीति नहीं थी. हिमंता ने कहा, ‘अतिक्रमण इसलिए हो रहा है क्योंकि प्रवासी मुस्लिम बड़ी संख्या में उत्पादन कर रहे हैं. असम के कई लोगों इसी तरह सोचते हैं. यह प्रक्रिया आजादी से पहले से शुरू हो गई थी. मैं इतिहास का बोझ अपने साथ लेकर चल रहा हूं.’

उन्होंने कहा, ‘असम में हेट नैरेटिव नहीं है. हमने उन्हें बेदखल किया क्योंकि 77,000 एकड़ की जमीन पर अतिक्रमण किया गया था. 1,000 परिवार इस पर कब्जा नहीं कर सकते. हमारी नीति है कि एक परिवार दो एकड़ से अधिक जमीन पर कब्जा नहीं कर सकता. हमें कई लोगों को जमीनें देनी हैं. अगर लोग जमीनों पर अतिक्रमण करेंगे तो हमें उन्हें बेदखल करना होगा. बेदखली एक सतत प्रक्रिया है. असम के स्थानीय लोगों को भी बेदखल किया जा रहा है. इस मामले में कोई सांप्रदायिकता नहीं है.’

मेघालयः पंजाबी लेन में अवैध तौर पर बसने वालों को नई जगह बसाने का फैसला

मेघालय मंत्रिमंडल ने एक उच्चस्तरीय समिति (एचएलसी) की सिफारिश के आधार पर शहर के थेम इव मावलोंग इलाके में पंजाबी लेन में अवैध रूप से रह रहे लोगों को स्थानांतरित करने का फैसला किया है.

मुख्यमंत्री कोनराड के संगमा ने कहा, ‘एचएलसी ने शहरी मामलों के विभाग से क्षेत्र में रहने वाले लोगों के पुनर्वास के लिए एक उपयुक्त स्थान खोजने की सिफारिश की है क्योंकि राज्य सरकार के कर्मचारियों को संबंधित विभागों के आधिकारिक क्वार्टर में स्थानांतरित किया जाएगा.’

संगमा ने गुरुवार को कैबिनेट की बैठक की अध्यक्षता करने के बाद पत्रकारों से कहा, ‘शहरी मामलों के विभाग को एक प्रस्ताव कैबिनेट के सामने पेश करने को कहा गया है और उन सभी पहलुओं की जांच के बाद सरकार उस पर फैसला करेगी.’

उपमुख्यमंत्री प्रेस्टोन तिनसॉन्ग की अध्यक्षता वाली एचएलसी ने 28 सितंबर को राज्य सरकार को शिलांग नगर बोर्ड (एसएमबी) और अन्य विभागों के कर्मचारियों को शहर के विवादित क्षेत्र से स्थानांतरित करने के लिए एक सिफारिश सौंपी थी, जहां अवैध बसने वालों ने इसे अपना घर बना लिया है.

मोटफ्रान में 2018 के हिंसक विरोध के बाद थेम इव मावलोंग से स्वीपर कॉलोनी के स्थानांतरण के लिए एक व्यवहार्य समाधान खोजने के लिए गठित, एचएलसी ने इस मामले पर कैबिनेट को एक विस्तृत प्रस्तुति दी.

मुख्यमंत्री के अनुसार, ‘थेम आईव मावलोंग में भूमि के स्वामित्व, एसएमबी, अन्य विभागों के कर्मचारियों के स्थानांतरण और अवैध बसने वालों को दूसरी जगह बसाने के संबंध में तीन मुख्य सिफारिशें की गईं हैं.’

सिक्किमः तीस्ता जलविद्युत परियोजनाओं के ख़िलाफ़ स्थानीय लोगों का प्रदर्शन 

तीस्ता जलविद्युत परियोजना. (फोटोः पीटीआई)

सिक्किम के एक सामाजिक-राजनीतिक समूह ने उत्तरी सिक्किम के जोंगु में रह रहे लेप्चा समुदाय के विरोध प्रदर्शन के साथ एकजुटता जाहिर की है.

यह समूह सिक्कमी नागरिक समाज (एसएनजे) तीस्ता नदी पर प्रस्तावित जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण का विरोध कर रहा है.

नॉर्थईस्ट टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, समूह ने कहा कि रीति-रिवाजों, परंपराओं, पर्यावरण और पारिस्थिति तंत्र की रक्षा करना हर सिक्किमवासी का प्रमुख कर्तव्य है.

एसएनएस ने प्रेस रिलीज जारी कर राज्य में अवैध गतिविधियों का हवाला दिया. प्रेस रिलीज में राज्य सरकार से आग्रह किया गया है कि फर्जी कंपनियों को दिए गए सभी कार्यों को तुरंत वापस लिया जाए और इसके बजाय राज्य के स्थानीय उद्यमियों और ठेकेदारों को अवसर दिए जाएं.

यह फैसला सिक्किम के लगों के हितों पर केंद्रित परियोजनाओं और विकास कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए किया गया है.

सिक्किम नागरिक समाज ने चेताया कि राज्य सरकार तुंरत कोई सख्त कदम उठाएं वरना इसका खामियाजा भुगतने के लिए तैयार रहे.
एनजीओ ने सभी सिक्किमवासियों से अपील की कि वे उन सभी अन्यायों के खिलाफ आवाज उठाएं, जिनमसे उनकी भावी पीढ़ियां प्रभावित होंगी.

इसके साथ ही यह भी कहा गया कि सुरक्षित पर्यावरण के लिए राज्य में जलविद्युत परियोजनाओं को तुरंत बंद करने की जरूरत है.

मालूम हो कि तीस्ता नदी पर प्रस्तावित मेगा जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के विरोध में उत्तरी सिक्किम के जोंगु में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.

हाल ही में बड़ी संख्या में लोगों ने नामप्रिकडांग पर इकट्ठा होकर 520 मेगावाट तीस्ता स्टेज-4 परियोजना और 300 मेगावाट पनबिजली परियोजना के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया.

तीस्ता से प्रभावित नागरिकों ने तुरंत सभी जलविद्युत परियोजनाओं को रद्द करने की मांग की है ताकि पर्यावरण को बचाया जा सके.

अरुणाचल प्रदेशः चीन ने कहा- सैनिकों को हिरासत में लिए जाने की जानकारी नहीं

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का कहना है कि उन्हें भारतीय मीडिया में आ रही उन रिपोर्टों की कोई जानकारी नहीं है, जिनमें कहा जा रहा है कि बीते हफ्ते अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सैनिकों के साथ टकराव के बाद चीनी सैनिकों को हिरासत में लिया गया.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों ने भारतीय मीडिया को बताया कि दोनों देशों के गश्ती दल अरुणाचल प्रदेश के तवांग में आमने-सामने आ गए, जिससे मामूली टकराव की स्थिति खड़ी हो गई.

बताया जा रहा है कि यह घटना पिछले हफ्ते तवांग सेक्टर में यांगत्से के पास हुई. जब चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान से प्रेस वार्ता में इसके बारे में पूछा गया तब उन्होंने कहा कि ‘मुझे इसके बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं है.’

भारतीय अधिकारियों ने नई दिल्ली में बताया कि दोनों देशों की सैनिकों के बीच यह टकराव वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को लेकर हुआ.

बता दें कि एलएसी ही दोनों देशों को विभाजित करती है.

एक अधिकारी ने पहचान उजागर नहीं करने की शर्त पर बताया, ‘भारत-चीन सीमा का औपचारिक रूप से सीमांकन नहीं किया गया है और इसलिए दोनों देशों के बीच एलएसी को लेकर मतभेद होता है. दोनों देशों के बीच मौजूदा समझौतों और प्रोटोकॉल का पालन करने की वजह से ही इन इलाकों में शांति संभव हो पाई है.’

बता दें कि चीन, अरुणाचल प्रदेश के कुछ इलाकों को तिब्बत का हिस्सा बताकर इस पर अपना दावा करता आया है लेकिन भारत शुरू से ही इस बात पर अड़ा हुआ है कि जिस हिस्से को चीन अपना बताता है वो भारत के अरुणाचल प्रदेश में है और भारत का अभिन्न अंग है.

मालूम हो कि शुक्रवार को कुछ रिपोर्ट के हवाले से पता चला था कि भारतीय सैनिकों ने अरुणाचल प्रदेश के तवांग में चीन के कुछ सैनिकों को घुसपैठ करने के बाद अस्थायी तौर पर हिरासत में रखा था.

रिपोर्टों के मुताबिक, पिछले सप्ताह हुई इस घटना में चीन के लगभग 200 सैनिकों ने तिब्बत की ओर से भारतीय सीमा को पार किया था.

वहीं, अब कई मीडिया रिपोर्टों ने सरकारी अधिकारियों के हवाले से कहा है कि चीनी सैनिकों को हिरासत में नहीं लिया गया था और न ही इस दौरान किसी भी तरह के ढांचे को नुकसान पहुंचा.

मणिपुरः उखरुल जिले में गोमांस की बिक्री पर प्रतिबंध

मणिपुर के उखरुल जिले में कई गायों और भैंसों की मौत के बाद तंगखुल नगा लॉन्ग (टीएनएल) नाम के एक एनजीओ ने जिले में किसी भी तरह के गोमांस पर प्रतिबंध लगा दिया है.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, इस संबंध में टीएनएल ने अधिसूचना जारी कर कहा कि जिले में पशुवध की मंजूरी नहीं है.

अधिसूचना में कहा गया है कि जिले के उत्तरी हिस्से में रहस्यमय बीमारी की वजह से दर्जनभर गायों और भैंसों की मौत हो गई है.

कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जिला प्रशासन ने बीमारी का पता लगाने और अंदरूनी इलाकों में आदिवासियों को शिक्षित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए.

कार्यकर्ताओं का कहना है कि इसकी आशंका है कि कई लोग कुछ गंभीर बीमारियों की जद में आ सकते हैं. बता दें कि राज्य के अन्य हिस्सों में गोमांस की बिक्री पर कोई प्रतिबंध नहीं है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)