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जम्मू कश्मीर में अल्पसंख्यकों की हत्या; कश्मीरी पंडितों को 1990 के आतंकी दौर के दोहराव की आशंका

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के अध्यक्ष ने कहा कि क़रीब 500 या इससे अधिक लोगों ने बडगाम, अनंतनाग और पुलवामा जैसे इलाकों को छोड़कर जाना शुरू कर दिया है. कुछ ग़ैर कश्मीरी पंडित परिवार भी चले गए हैं. यह साल 1990 का दोहराव है. इस संबंध में हमने जून में उपराज्यपाल कार्यालय से मिलने का अनुरोध किया था, लेकिन अब तक वक़्त नहीं दिया गया. जम्मू कश्मीर में बीते छह दिनों में सात नागरिकों की हत्या हुई है.

श्रीनगर के ईदगाह इलाके में आतंकवादियों द्वारा एक सरकारी स्कूल की प्रिंसिपल और शिक्षक की हत्या के विरोध में शुक्रवार को जम्मू में शिक्षक संघ के सदस्यों ने कैंडल मार्च निकाला. (फोटो: पीटीआई)

श्रीनगर/अनंतनाग: निशाना बनाकर अल्पसंख्यकों की लगातार हत्याएं किए जाने से कश्मीर घाटी के दहल उठने के बीच कश्मीरी पंडितों के एक संगठन ने शुक्रवार को कहा कि सरकारी नौकरी कर रहे समुदाय के कुछ लोगों ने अपनी जान को खतरा होने को लेकर यहां से जम्मू जाना शुरू कर दिया है.

उन्होंने आरोप लगाया है कि प्रशासन एक सुरक्षित माहौल उपलब्ध करा पाने में अक्षम है. इन लोगों को 2010-11 में एक पुनर्वास पैकेज के तहत सरकारी नौकरी दी गई थी.

सूत्रों ने बताया कि इस बीच, प्रशासन ने अल्पसंख्यक समुदाय के कर्मचारियों को 10 दिनों की छुट्टी दी है.

उल्लेखनीय है कि सात अक्टूबर को शहर में एक सरकारी स्कूल के अंदर वहां की प्रिंसिपल सुपिंदर कौर और शिक्षक दीपक चंद और एक शिक्षक की करीब से गोली मार कर हत्या कर दी गई. इसके साथ ही छह दिनों में कश्मीर घाटी में सात नागरिकों की हत्या हो चुकी है. इन सात लोगों में चार अल्पसंख्यक समुदाय से हैं.

इन लक्षित हत्याओं के चलते कश्मीरी पंडित समुदाय के सदस्यों को आतंकी समूहों द्वारा उन्हें भी निशाना बनाए जाने का डर सता रहा है.

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति (केपीएसएस) के अध्यक्ष संजय टिकू ने कहा, ‘करीब 500 या इससे अधिक लोगों ने बडगाम, अनंतनाग और पुलवामा जैसे इलाकों को छोड़कर जाना शुरू कर दिया है. कुछ गैर कश्मीरी पंडित परिवार भी चले गए हैं. यह 1990 का दोहराव है.’

उन्होंने कहा, ‘हमने जून में उप-राज्यपाल कार्यालय से मिलने का अनुरोध किया था, लेकिन अब तक वक्त नहीं दिया गया.’

उन्होंने कहा कि इस तरह के घटनाक्रमों पर आजकल सोशल मीडिया के चलते ज्यादा गौर किया जा रहा है. उन्होंने कहा, ‘हम इस बात से अवगत हैं कि कौन-कौन लोग छोड़कर चले गए.’

संगठन ने कहा यह अब बिल्कुल स्पष्ट है कि कश्मीरी प्रवासियों को रोजगार मुहैया करने के विश्वास बहाली उपाय को अल्पसंख्यक विरोधी ताकतें स्वीकार नहीं कर रही हैं. समिति ने प्रशासन की आलोचना की.

दक्षिण कश्मीर के काजीगुंड इलाके में वेसु प्रवासी शिविर शुक्रवार सुबह प्रशासनिक कार्रवाई का केंद्रबिंदु बन गया, जब अनंतनाग उपायुक्त पीयूष सिंगला ने पुलिस अधिकारियों के साथ परिवारों से ट्रांजिट शिविर छोड़कर नहीं जाने का आग्रह किया. वहां करीब 380 परिवार रहते हैं.

वेसु शिविर पैकेज कर्मचारी एसोसिएशन के अध्यक्ष सन्नी रैना ने कहा, ‘उन्होंने हमें पूर्ण सुरक्षा का आवश्वासन दिया और हमसे जम्मू नहीं जाने का अनुरोध किया.’

संगठन में करीब 4,284 कर्मचारी हैं. इसने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर अपनी जान को खतरा होने की आशंका जताई है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, पत्र में कहा गया, ‘अत्यधिक भय और दहशत की इस स्थिति में हम आपके ध्यान में लाना चाहते हैं कि कश्मीर में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने वाले कश्मीरी पंडितों की पूरी अल्पसंख्यक आबादी यहां उभरती गंभीर और अल्पसंख्यक विरोधी हालात से डरी हुई है.’

उन्होंने लिखा, ‘हिंदू समुदाय के सदस्यों की हाल ही में क्रूर और भीषण चुनिंदा हत्याओं के कारण एक ही समुदाय के सभी कर्मचारी असुरक्षित और भयभीत महसूस कर रहे हैं.’

ज्ञापन में कहा गया है, ‘उभरती हुई स्थिति हमें 1990 के दशक की उसी तरह की स्थिति की याद दिलाती है, जिसके कारण कश्मीरी पंडितों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ था.’

वेसु शिविर पैकेज कर्मचारी एसोसिएशन के अध्यक्ष सन्नी रैना का तर्क है कि जहां वे शिविरों में रहते हैं, वे पूरी तरह से सुरक्षित हैं, इन शिविरों के बाहर कई 100 कर्मचारी रहते हैं और उन्हें दूरदराज के क्षेत्रों में अपने कर्तव्यों (ड्यूटी/नौकरी) का पालन करना पड़ता है.

उन्होंने कहा, ‘ऐसा लगता है कि प्रशासन सभी कर्मचारियों को सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम नहीं है और इसलिए हमने मुख्य सचिव से स्थिति सामान्य होने तक हमें ड्यूटी से मुक्त करने के लिए कहा है.’

रैना ने कहा कि 380 परिवारों में से 20 प्रतिशत गुरुवार को चले गए थे, वहीं कुछ परिवार उपायुक्त के शिविर में आने से पहले ही शुक्रवार को बाहर चले गए.

दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के मट्टन में पीएम पैकेज कर्मचारी संघ के अध्यक्ष विनोद रैना का कहना है कि कुछ दिन पहले अल्पसंख्यक समुदाय पर हमले शुरू होने के बाद से ट्रांजिट कैंपों के बाहर रहने वाले लगभग 250 लोग जम्मू के लिए रवाना हो गए हैं.

रैना ने कहा, ‘जब श्रीनगर में शिक्षकों की हत्या की खबर पहुंची, तो मुस्लिम समुदाय के हमारे साथी हमें अपनी निगरानी में शिविर में वापस ले गए. दोनों समुदायों के बीच संबंध मजबूत हैं और मुझे उम्मीद है कि यह ऐसा ही रहेगा.’

उन्होंने कहा कि ट्रांजिट कैंपों के बाहर रहने वाले कुछ प्रवासी कर्मचारी पहले ही अपना बेस जम्मू स्थानांतरित कर चुके हैं.

एक अन्य कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘यह दुखद है. जिस गति से सरकार पिछले कुछ वर्षों से काम कर रही है वह उत्साहजनक नहीं है.’

मालूम हो कि जम्मू कश्मीर में बीते छह दिनों में सात नागरिकों की हत्या हुई है, जिनमें से छह श्रीनगर में हुईं. मृतकों में से चार अल्पसंख्यक समुदाय से हैं.

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, आतंकवादियों ने 2021 में अब तक 28 नागरिकों की हत्या की है. अभी तक 97 आतंकवादी हमले हुए हैं, जिनमें 71 सुरक्षा बलों पर और 26 नागरिकों पर हुए हैं.

बीते सात अक्टूबर को श्रीनगर में प्रिंसिपल सुपिंदर कौर और शिक्षक दीपक चंद की हत्या कर दी गई.

इससे पहले बीते पांच अक्टूबर को आतंकियों ने कश्मीरी पंडित समुदाय के प्रसिद्ध केमिस्ट माखन लाल बिंद्रू, बिहार के निवासी विक्रेता वीरेंद्र पासवान और बांदीपोरा में एक टैक्सी स्टैंड एसोसिएशन के अध्यक्ष मोहम्मद शफी लोन की हत्या कर दी थी.

इनके अलावा बीते दो अक्टूबर को श्रीनगर में माजिद अहमद गोजरी और बटमालू में मोहम्मद शफी डार की भी हत्या आतंकियों द्वारा कर दी गई थी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)