दुनिया

बाल विवाह के चलते विश्व में रोज़ 60 व दक्षिण एशिया में 6 से अधिक लड़कियों की मौत: रिपोर्ट

सेव द चिल्ड्रन द्वारा ‘ग्लोबल गर्लहुड रिपोर्ट 2021: संकट में लड़कियों के अधिकार’ में कहा गया है कि बाल विवाह के कारण गर्भधारण और बच्चे को जन्म देने की वजह से हर साल तक़रीबन 22,000 लड़कियों की मौत हो रही है.

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: बाल विवाह से दुनियाभर में हर दिन 60 से अधिक लड़कियों और दक्षिण एशिया में एक दिन में छह लड़कियों की मौत होती है. अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर जारी एक नए विश्लेषण में दावा किया गया है कि बाल विवाह के कारण गर्भधारण और बच्चे को जन्म देने की वजह से हर साल तकरीबन 22,000 लड़कियों की मौत हो रही है.

‘सेव द चिल्ड्रन’ की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दक्षिण एशिया में हर साल बाल विवाह से संबंधित 2,000 मौत होती हैं. इसके बाद पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र में 650 और लैटिन अमेरिका तथा कैरेबियाई देशों में हर साल 560 मौत होती हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘हर साल अनुमानित रूप से गर्भावस्था के कारण 22,000 लड़कियों की मौत हो रही है और बाल विवाह से बच्चों का जन्म हो रहा है. बाल विवाह से हर दिन 60 से अधिक लड़कियों की मौत होती है और दक्षिण एशिया में हर दिन छह लड़कियों की मौत होती है.’

हालांकि, दुनियाभर में पश्चिम और मध्य एशिया में बाल विवाह की सबसे अधिक दर है और दुनियाभर में बाल विवाह से होने वाली मौतों में से करीब आधी (9,600) या हर दिन 26 मौत होती हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘हालांकि, पिछले 25 वर्षों में दुनियाभर में करीब आठ करोड़ बाल विवाहों को रोका गया लेकिन कोविड-19 महामारी से पहले ही इसमें प्रगति रुक गई और महामारी से असमानताएं और ज्यादा गहरी हुई है जिससे बाल विवाह बढ़ते हैं. स्कूलों के बंद होने, स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ने तथा और परिवारों के गरीबी की ओर बढ़ने के कारण महिलाओं और लड़कियों पर लॉकडाउन के दौरान हिंसा का खतरा बढ़ा. 2030 तक एक करोड़ और बालिकाओं की शादी होने की आशंका है यानी कि और लड़कियों की मौत का खतरा है.’

‘सेव द चिल्ड्रन इंटरनेशनल’ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी इंगर एशिंग ने कहा कि बाल विवाह लड़कियों के खिलाफ यौन और लैंगिक हिंसा का सबसे खराब और जानलेवा रूप है. हर साल लाखों लड़कियों को ऐसे पुरुषों से शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है जो उनसे उम्र में कहीं अधिक बड़े होते हैं जिससे उनके सीखने, बचपन जीने और कई मामलों में जीवित रहने का अवसर छिन जाता है.

उन्होंने कहा, ‘बच्चे को जन्म देना किशोरियों के लिए सबसे खतरनाक है क्योंकि उनकी कम उम्र बच्चे को जन्म देने के लिए तैयार नहीं होती. बच्चियों के बच्चे पैदा करने के स्वास्थ्य खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. सरकार को बालिकाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे बाल विवाह और समय से पूर्व बच्चे को जन्म देने से होने वाली मौतों से बची रहें. यह तभी हो सकता है जब लड़कियों को प्रभावित करने वाले फैसलों में उनकी भूमिका हो.’

सेव द चिल्ड्रन (इंडिया) के सीईओ सुदर्शन ने कहा, ‘हम बाल रक्षा भारत’ में बाल विवाह को संग्रहालयों और इतिहास तक ही सीमित देखना चाहते हैं. यह हमारी सामूहिक विफलता है कि इस सदी में भी मानवता के खिलाफ ऐसा अपराध अस्तित्व में है. वे सभी जो समाधान का हिस्सा नहीं हैं, उन्हें खुद को समस्या का हिस्सा समझना चाहिए.’

उन्होंने कहा, ‘बच्चों, और विशेष रूप से बालिकाओं को उनके सीखने के मूल अधिकार और एक खुशहाल और बेफिक्र बचपन का आनंद लेने से वंचित करना मानवाधिकारों का उल्लंघन है और इसकी निंदा करने की जरूरत है. इसे एक सांस्कृतिक तत्व के रूप में खारिज नहीं किया जाना चाहिए और इसके बजाय इसे जीवन और स्वतंत्रता के मूल अधिकार से इनकार के रूप में देखा जाना चाहिए.’

सेव द चिल्ड्रन द्वारा सोमवार को जारी एक वैश्विक रिपोर्ट ‘ग्लोबल गर्लहुड रिपोर्ट 2021: संकट में लड़कियों के अधिकार’ में संगठन ने सरकारों से सभी सार्वजनिक निर्णय लेने में सुरक्षित और सार्थक भागीदारी के उनके अधिकार का समर्थन करके लड़कियों की आवाज उठाने का आह्वान किया है.

संगठन ने यह भी मांग की कि सरकारों को समावेशी नीतियों और कार्यक्रमों को विकसित करके सभी लड़कियों के अधिकारों की गारंटी देनी चाहिए, जिसमें असमानता और भेदभाव के विभिन्न रूप (लिंग, जाति, विकलांगता, आर्थिक पृष्ठभूमि, आदि के आधार पर) शामिल हैं.

पॉक्सो के तहत दर्ज 99 प्रतिशत से अधिक अपराधों की पीड़ित लड़कियां: एनसीआरबी विश्लेषण

राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, 2020 में पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज 99 प्रतिशत से अधिक अपराध के मामलों में पीड़ित लड़कियां थीं, जो दर्शाता है कि लड़कियां अब भी समाज के सबसे संवेदनशील तबकों में से एक का हिस्सा हैं.

गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ‘चाइल्ड राइट्स एंड यू’ (क्राई) द्वारा किए गए एनसीआरबी के आंकड़ों के विश्लेषण में पाया गया कि पॉक्सो के तहत दर्ज 28,327 मामलों में से 28,058 में पीड़ित लड़कियां थी.

यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत दर्ज मामलों के गहन विश्लेषण में पता चला कि 16 से 18 आयु वर्ग की किशोरियों के खिलाफ सबसे अधिक 14,092 अपराधों को और उसके बाद 12 से 16 आयु वर्ग की लड़कियों के खिलाफ 10,949 अपराधों को अंजाम दिया गया.

लड़के और लड़कियां दोनों ही लगभग समान रूप से दुर्व्यवहार का शिकार हुए, हालांकि एनआरसीबी के आंकड़ों के अनुसार सभी आयु-वर्ग में लड़कों की तुलना में लड़कियां अधिक यौन अपराधों का शिकार हुईं.

‘अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस’ के मौके पर ‘क्राई’ ने कहा कि दुनियाभर में लड़कियों के अधिकारों की बात की जाती है, लेकिन फिर भी एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार वे अब भी समाज के सबसे संवेदनशील तबकों में से एक का हिस्सा हैं.

एनसीआरबी की ओर से पिछले महीने जारी किए गए अपडेटेड आंकड़ों के अनुसार, पॉक्सो अधिनियम के तहत 2020 में दर्ज किए गए 99 प्रतिशत से अधिक मामलों में पीड़ित लड़कियां थीं.

‘क्राई’ में ‘पॉलिसी रिसर्च एंड एडवोकेसी’ की निदेशक प्रीति महारा ने कहा, ‘यह समझना महत्वपूर्ण है कि सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के साथ-साथ शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, गरीबी आदि से जुड़े पहलू भी महत्वपूर्ण हैं. और लड़कियों के सशक्तिकरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इन पहलुओं पर कोविड-19 वैश्विक महामारी के प्रभाव का आकलन भी जरूरी है.’

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, महारा ने कहा, ‘संकट के दौरान लड़कियों को कई कमजोरियों का सामना करना पड़ता है – उनकी शिक्षा तक पहुंच और अधिक प्रतिबंधित हो जाती है और वे बाल विवाह के जोखिमों में फंस जाती हैं. उन्हें कई रूपों हिंसा और यौन शोषण का शिकार होने की अधिक संभावना है.’

एक मजबूत बाल संरक्षण तंत्र की उभरती जरूरत पर जोर देते हुए महारा ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में लड़कियों की शिक्षा और बाल संरक्षण प्रणालियों को मजबूत करने के मामले में वास्तव में कुछ प्रगति हुई है, लेकिन महामारी ने विकास को पटरी से उतार दिया है.

महारा ने कहा कि लड़कियों को, विशेष रूप से उनकी किशोरावस्था में किसी भी मानवीय संकट के दौरान और बाद में कई सुरक्षा जोखिमों का सामना करना पड़ता है.

उन्होंने कहा, ‘कोविड-19 महामारी से उत्पन्न होने वाले तात्कालिक और दीर्घकालिक जोखिमों को देखते हुए आवश्यकता है कि लैंगिक उत्तरदायी उपाय किए जाएं और यह सुनिश्चित हो कि इन्हें पूरी तरह से लागू किया जाए.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)