भारत

उत्तर प्रदेश: क्या बड़ी रैलियां करके कांग्रेस अपनी खोई ज़मीन पाने में सफल होगी

गोरखपुर की रैली से कांग्रेस ने दिखाया है कि अब वह भी भाजपा, सपा, बसपा की तरह बड़ी रैली करने में सक्षम है. पार्टी पूर्वांचल में एक और रैली करने के बाद लखनऊ में बड़ी जनसभा करने की तैयारी में है. बड़ी रैलियां या जनसभाएं चुनावी सफलता की गारंटी नहीं हैं, लेकिन इनके ज़रिये कांग्रेस यह साबित करने की कोशिश करेगी कि लोग उससे जुड़ रहे हैं.

गोरखपुर में हुई रैली में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी. (फोटो साभार: फेसबुक/उत्तर प्रदेश कांग्रेस)

गोरखपुर: वाराणसी के बाद गोरखपुर में कांग्रेस महासचिव व उत्तर प्रदेश (यूपी) की प्रभारी प्रियंका गांधी की रैली ने नई चर्चाओं को जन्म दिया है. दो बड़ी रैली के साथ-साथ महिलाओं को 40 फीसदी टिकट देने की घोषणा, मुफ़्त बस यात्रा, साल में रसोई गैस के तीन सिलेंडर, लड़कियों को स्मार्ट फोन, स्कूटी, किसानों के लिए कर्ज माफी, 20 लाख रोजगार सहित कई लोकप्रिय घोषणा कर कांग्रेस ने संकेत देने की कोशिश की है कि उसे विधानसभा चुनाव के रण में कमजोर खिलाड़ी न समझा जाए.

देश के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल की जयंती और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बलिदान दिवस पर 31 अक्टूबर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर में एक बड़ी रैली कर कांग्रेस ने राजनीतिक समीक्षकों को हैरत में डाल दिया. इस बड़ी रैली से विपक्षी दल हैरत में नजर आए, तो खुद कांग्रेसी भी चकित थे कि क्या वाकई उन्होंने ऐसा कर दिखाया है.

प्रतिज्ञा रैली में आए व्यक्ति की टिप्पणी थी कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि इतनी भीड़ जुट जाएगी. एक और व्यक्ति की टिप्पणी थी कि जगह कम पड़ गई.

कहा जा रहा है कि यूपी में सत्ता से बाहर होने के तीन दशक बाद गोरखपुर में कांग्रेस ने इतनी बड़ी रैली की है. खुद प्रियंका गांधी ने कहा कि जो लोग कहते हैं कि ‘उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का संगठन का दुर्बल है, वे आज की भीड़ को देखें, यह कांग्रेस के संगठन की भीड़ है, संगठन की ताकत है. इसको बनाने के लिए दो वर्ष से हजारों-लाखों कार्यकर्ताओं ने कड़ी मेहनत की हैं.’

बड़ी रैलियां और जनसभाएं चुनाव में जीत की गारंटी नहीं होती लेकिन किसी भी राजनीतिक दल के लिए माहौल बनाने में, जनता की राय बनाने और बदलने में ये रैलियां महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाती हैं. यूपी में कांग्रेस ने सत्ता गंवाने के बाद बड़ी सभाएं करने की अपनी क्षमता भी खो दी थी. चुनाव के समय कुछ बड़ी जनसभाएं वहीं हो पाईं जहां कद्दावर कांग्रेस नेता थे.

यूपी में कांग्रेस लंबे समय तक नेताओं की पार्टी रही है. ये बड़े नेता ही संगठन थे. अपने जिले व इलाके के संगठन में उनके लोग होते थे जो पार्टी से अधिक उनके प्रति वफादार होते थे. इस कमजोरी के बारे सबको पता था लेकिन इसे ठीक करने की कभी कोशिश नहीं हुई. इसको करने के बजाय नियमित रूप से प्रदेश अध्यक्ष बदल जाते रहे.

जाहिर है, इसका कोई असर नहीं हुआ और पार्टी यूपी में सिमटती चली गई . विधानसभा में सीटें दहाई से भी कम हो गई और बतौर एक राजनीतिक दल कांग्रेस हाशिए पर चली गई.

रैली में आई महिलाएं. (फोटो: मनोज सिंह)

2019 के लोकसभा चुनाव के बाद संगठन को दुरुस्त करने की कवायद की गई. जिला कमेटियों का नए सिरे से गठन किया गया. गठन में जमीनी कार्यकर्ताओं को महत्व दिया गया और साथ ही साथ दलित, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, युवाओं और महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई. जिला कमेटियों के बाद ब्लॉक और न्याय पंचायत स्तर तक इस प्रक्रिया का ले जाया गया.

संगठन निर्माण के बाद कार्यकर्ताओं का विचारधारात्मक प्रशिक्षण भी दिया गया. इसके साथ-साथ जनता के मुद्दों पर आंदोलन, संघर्ष की रणनीति बनी. खुद प्रियंका गांधी प्रदेश की बड़ी घटनाओं में पीड़ितों के साथ दिखीं. उन्नाव से लेकर हाथरस तक, उभ्भा से लेकर आगरा और लखीमपुर खीरी में मौके पर जाने की वजह से प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ-साथ प्रदेश में विपक्ष की भूमिका से निराश लोगों को एक उम्मीद दिखने लगी.

इस सबके बावजूद कोई भी यह उम्मीद नहीं कर रहा है कि कांग्रेस यूपी में कोई बड़ी चुनावी सफलता अर्जित कर लेगी. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि अभी भी कांग्रेस से कोई बड़ा सामाजिक आधार नहीं जुड़ा है.

इसलिए यही कहा जा रहा था कि ज्यादा से ज्यादा कांग्रेस का वोट शेयर थोड़ा दुरुस्त हो सकता है, कुछ सीटें बढ़ सकती हैं. इससे ज्यादा कुछ नहीं होने वाला है. खुद कांग्रेस नेतृत्व की सारी तैयारी 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए है क्योंकि उसे भी पता है कि 2022 के चुनाव में उसे कोई चमत्कार नहीं होने वाला है.

लेकिन कांग्रेस ने 40 फीसदी टिकट महिलाओं को देने और प्रतिज्ञाओं के रूप में चुनाव घोषणा पत्र को काफी पहले जनता के बीच सामने लाने और प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के क्षेत्र में दो बड़ी रैली कर अपने बारे में बन रहे नैरेशन को तोड़ने-बदलने का काम किया है.

गोरखपुर की रैली से कांग्रेस ने दिखाया है कि अब वह भी भाजपा, सपा, बसपा की तरह बड़ी रैली करने में सक्षम हो चुकी है. वाराणसी, गोरखपुर के बाद पूर्वांचल में किसी एक जगह और रैली करने के बाद लखनऊ में बहुत बड़ी रैली करने की तैयारी है. इन रैलियों के जरिये कांग्रेस यह साबित करने की कोशिश करेगी कि लोग उससे जुड़ रहे हैं.

विधानसभा चुनाव में 40 फीसदी टिकट महिलाओं को देने की घोषणा कर कांग्रेस ने यूपी की राजनीति के केंद्र में महिलाओं को लाने की कोशिश की है. कांग्रेस इसके लिए काफी गंभीर दिख रही है. गोरखपुर की रैली में सभी नेता इसका बार-बार जिक्र करते रहे.

इस रैली में महिलाओं की अच्छी-खासी उपस्थिति ने नेताओं को उत्साह भी बढ़ाया. लड़कियों को स्मार्ट फोन, स्कूटी देने के साथ-साथ प्रियंका गांधी ने महिलाओं को सरकारी बस में मुफ़्त बस यात्रा, एक वर्ष में तीन रसोई गैस सिलेंडर देने की घोषणा कर महिला वोट बैंक को अपनी ओर मोड़ने की दिशा में एक और कदम बढ़ा दिया.

रैली में आया जनसमूह. (फोटो साभार: फेसबुक/उत्तर प्रदेश कांग्रेस)

दस लाख युवाओं को रोजगार, किसानों की कर्ज माफी, गन्ना का दाम 400 रुपये क्विंटल, गेहूं-धान की 2500-2500 रुपये क्विंटल पर खरीदारी, सभी संविदा कर्मचारियों को नियमित करने, आंगनबाड़ी -आशा का मानदेय दस हजार रुपये करने के लोकप्रिय वादे को रैली में उत्साहजनक समर्थन मिलने से कांग्रेस नेताओं को उम्मीद है कि ये वादे भी लोगों को कांग्रेस से जोड़ेंगे.

कांग्रेस ने प्रतिज्ञाओं के रूप में चुनावी घोषणा पत्र को बहुत पहले जनता के बीच लाकर अपनी पुरानी गलती से सबक लिया है. लोकसभा चुनाव में देश के 25 करोड़ लोगों के लिए ‘न्याय’ योजना का वादा ऐन चुनाव के वक्त किया गया था जिसके कारण इसको जनता में प्रचारित करने का मौका नहीं मिल पाया और लोग इसको समझ नहीं पाए. यदि इस वादे को पहले लाया गया होता तो यह अपना असर दिखा सकता था.

इस गलती से सबक लेते हुए जनता को लुभाने वाली घोषणाएं कांग्रेस ने चुनाव से चार-पांच महीने पहले कर अच्छी बढ़त हासिल कर ली है. इन घोषणाओं ने भाजपा के साथ-साथ सपा, बसपा के सामने कठिन चुनौती पेश कर दी है.

सपा-बसपा का अब इसी तरह के वादे करने पड़ेंगे. भाजपा की मुश्किल थोड़ी और बड़ी होगी क्योंकि यदि वह कांग्रेस से आगे निकलने के लिए और बड़े वादे करेगी तो स्वभाविक रूप से सवाल उठेगा कि सत्ता में रहते हुए उसने ऐसा क्यों नहीं किया जिसका जवाब देना आसान नहीं होगा.

इन सबके साथ-साथ कांग्रेस सामाजिक समीकरणों को साधने की भी कोशिश कर रही है. गोरखपुर की रैली में खुद प्रियंका गांधी ने निषादों और ब्राह्मणों के साथ अत्याचार होने की बात कही. उन्होंने मछली पालन का कृषि का दर्जा देने, मछली पालन और बालू खनन में निषादों को हक देने के साथ-साथ गोरखपुर में गुरू मत्स्येन्द्रनाथ के नाम से विश्वविद्यालय बनाने की बात कह निषादों को कांग्रेस से जुड़ने का माहौल बनाया.

कांग्रेस को पता है कि गोरखपुर निषाद राजनीति का एक बड़ा केंद्र है और यहीं बनी निषाद पार्टी अपने को निषादों का सबसे बड़ रहनुमा होने का दावा करती है. निषाद पार्टी फ़िलहाल भाजपा के साथ है.

उन्होंने अपने भाषण में दो बार ब्राह्मणों के उत्पीड़न की बात कही. कुर्मी जाति के अपने साथ लाने के लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बड़े-बड़े कटआउट लगाए गए थे जिस पर लिखा गया था कि ‘कुर्मी समाज के लोकप्रिय नेता भूपेश बघेल.’ इसके अलावा सरदार पटेल और इंदिरा गांधी की बीच में प्रियंका गांधी की तस्वीर वाले बड़े-बड़े कटआउट भी लगाए गए थे.

यूपी में कांग्रेस के लिए खोने के लिए कुछ नहीं है इसलिए वह खतरे उठाकर बड़े प्रयोग कर रही है. देखना होगा कि ये प्रयोग वाकई कांग्रेस की ताकत को बढ़ाने में कामयाब होते हैं या उनका हश्र पहले किए गए प्रयोगों की तरह ही होता है.

(लेखक गोरखपुर न्यूज़लाइन वेबसाइट के संपादक हैं.)