राजनीति

बिहार सरकार ने 2018-19 में एससी/एसटी वज़ीफ़े की राशि से बनाए सड़क और तटबंध: कैग रिपोर्ट

अनुसूचित जाति उपयोजना के तहत 2.5 लाख रुपये से कम सालाना आय वाले एससी/एसटी छात्रों को पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप दी जाती है, जिसका मक़सद कक्षा 10 से स्नातकोत्तर तक के छात्रों की मदद करना है. 2018-19 की कैग रिपोर्ट के मुताबिक़, राज्य सरकार ने वज़ीफ़े के लिए निर्धारित राशि में से कई करोड़ रुपये विभिन्न प्रोजेक्ट में खर्च किए. लंबे समय से राज्य सरकार छात्रवृत्ति न देने की वजह फंड की कमी बता रही थी.

Patna: Bihar Chief Minister Nitish Kumar attends the foundation stone laying ceremony of 'Multipurpose Prakash Kendra and Udyan' at the campus of Guru Ka Bagh in Patna, Sunday, Sept 9, 2018. (PTI Photo)(PTI9_9_2018_000102B)

नीतीश कुमार. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: बिहार सरकार ने वित्त वर्ष 2018-19 में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति छात्रवृत्ति के लिए निर्धारित राशि को रोड, तटबंध, मेडिकल कॉलेज, सरकारी बिल्डिंग बनाने जैसे कार्यों में खर्च किया था.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की एक रिपोर्ट से ये जानकारी सामने आई है. इसमें राज्य सरकार के वित्त को खर्च करने में कई अनियमितताओं को उजागर किया गया है.

अनुसूचित जाति उप योजना (एससीएसपी) के तहत 2.5 लाख रुपये से कम वार्षिक पारिवारिक आय वाले एससी/एसटी छात्रों को पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप (पीएमएस) दी जाती है.

इसका 60 फीसदी पैसा केंद्र की सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा दिया जाता है, जिसका मकसद कक्षा 10 से स्नातकोत्तर तक पढ़ाई करने में बच्चों की मदद करना है.

हालांकि इसके फंड को किसी और जगह खर्च करने का ये गंभीर मामला सामने आया है. गौर करने योग्य बात यह है कि बिहार सरकार लंबे समय से इस छात्रवृत्ति को न देने की वजह फंड की कमी बता रही थी.

इंडियन एक्सप्रेस की एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार सरकार ने पिछले तीन सालों में एससी/एसटी स्कॉलरशिप न देने के पीछे की वजह ‘पोर्टल में तकनीकी समस्या’ होना बताया था.

आलम ये है कि पिछले छह सालों में अधिकतर एससी/एसटी छात्रों को ये स्कॉलरशिप नहीं मिली है और राज्य सरकार ने इस छात्रवृति को प्राप्त करने के लिए फीस की सीमा तय कर रखी है, जिसके चलते पात्र लोगों की संख्या में काफी गिरावट आई है.

बिहार में इस योजना के लगभग पांच लाख छात्र लाभार्थी होने चाहिए थे, लेकिन साल 2016 में फीस वाला नियम लागू करने से इसकी संख्या में लगातार गिरावट आ रही है.

बहरहाल, वर्ष 2018-19 की कैग रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य सरकार ने स्कॉलरशिप के लिए निर्धारित राशि में से 2,076.99 करोड़ रुपये बिजली विभाग को दिया और उसे 460.84 करोड़ रुपये का कर्ज भी दिया.

इसी तरह इसके 3,081.34 करोड़ रुपये बड़े रोड प्रोजेक्ट बनाने में खर्च किए गए. इसके अलावा तटबंध और बाढ़ नियंत्रण प्रोजेक्ट जैसे कामों में 1,202.23 करोड़ रुपये, मेडिकल कॉलेज के लिए 1,222.94 करोड़ रुपये और 776.06 करोड़ रुपये कृषि विभाग कार्यालय और अन्य भवन बनाने में खर्च किए गए हैं.

इसे लेकर कैग ने गहरी चिंता जाहिर की है और नीति आयोग को निर्देश दिया है कि वे ये सुनिश्चित करें कि एससी/एसटी के विकास के लिए चलाई जा रही योजनाओं का पैसा कहीं और न खर्च किया जाए.

हालांकि कैग को भेजे अपने जवाब में राज्य वित्त विभाग ने ये सहमति जताई है कि एससी/एसटी मद में आवंटित धनराशि को कहीं और खर्च करने पर पूर्णत: प्रतिबंध है.

इस मामले पर बिहार सरकार के वित्त विभाग ने कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया है. किसी भी फंड को एक जगह से दूसरे जगह पर लगाने का निर्णय यही विभाग करता है.

छात्रवृत्ति के मुद्दे पर पटना उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका के जवाब में सरकार ने कहा कि छात्रवृत्ति को रोके जाने के पीछे का कारण धन की कमी थी. हाईकोर्ट ने अब राज्य सरकार से याचिकाकर्ता के वकील द्वारा जवाबी हलफनामे का जवाब देने को कहा है, जिसमें पूछा गया है कि राज्य ने फंड की कमी का हवाला देते हुए एससी/एसटी फंड को कैसे डायवर्ट किया.