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इंडसइंड बैंक ने मई में 84,000 ग्राहकों को सहमति के बिना ऋण देने की बात स्वीकार की

एक रिपोर्ट में बताया गया था कि अज्ञात ह्विसिलब्लोअरों ने भारतीय रिज़र्व बैंक और इंडसइंड बैंक प्रबंधन को इसकी सहायक इकाई बीएफआईएल द्वारा दिए गए इस तरह के ऋण के बारे में एक पत्र लिखा है, जिसमें कुछ शर्तों के साथ ऋण के नवीनीकरण का आरोप लगाया गया है. इस तरह जहां मौजूदा ग्राहक अपना क़र्ज़ नहीं चुका पा रहे थे, वहां उन्हें नया ऋण दिया गया.

(फोटो साभार: फेसबुक)

मुंबई: इंडसइंड बैंक ने ‘लोन एवरग्रीनिंग’ पर ह्विसिलब्लोअर के दावों को पूरी तरह से ‘गलत और निराधार’ बताते हुए हुए बीते शनिवार (छह नवंबर) को स्वीकार किया कि उसने मई में तकनीकी गड़बड़ी के कारण 84,000 हजार ग्राहकों को बिना उनकी सहमति के ऋण दे दिया था.

‘लोन एवरग्रीनिंग’ का अर्थ डिफॉल्ट की कगार पर पहुंच चुके ऋण का नवीनीकरण करने के लिए उस फर्म को ताजा ऋण देना है.

निजी क्षेत्र के बैंक ने सफाई देते हुए कहा कि फील्ड कमचारियों ने दो दिन के भीतर ही बिना सहमति के ग्राहकों को ऋण देने की सूचना दी थी, जिसके बाद इस गड़बड़ी को तेजी से ठीक कर लिया गया.

बीते पांच नवंबर को प्रकाशित एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अज्ञात ह्विसिलब्लोअरों ने बैंक प्रबंधन और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को इंडसइंड बैंक की सहायक इकाई बीएफआईएल (Bharat Financial Inclusion Ltd) द्वारा दिए गए इस तरह के ऋण के बारे में एक पत्र लिखा है, जिसमें कुछ शर्तों के साथ ऋण के नवीनीकरण (लोन एवरग्रीनिंग) का आरोप लगाया गया है. इस तरह जहां मौजूदा ग्राहक अपना कर्ज नहीं चुका पा रहे थे, वहां उन्हें नया ऋण दिया गया, ताकि बही-खातों को साफ रखा जा सके.

भारत फाइनेंशियल इंक्लूज़न को पहले एसकेएस माइक्रोफाइनेंस के नाम से जाना जाता था. इंडसइंड बैंक ने 2019 में भारत फाइनेंशियल इंक्लूज़न का अधिग्रहण किया था.

प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, छोटे कर्ज देने वाली फर्म भारत फाइनेंशियल इंक्लूज़न के वरिष्ठ अधिकारियों (ह्विसिलब्लोअर) के एक समूह ने भारतीय रिजर्व बैंक और उसके बोर्ड को कोविड-19 महामारी के प्रकोप के बाद से ‘लोन एवरग्रीनिंग’ के लिए लेखांकन मानदंडों के कुशासन और चूक के प्रति सचेत किया है.

इकोनॉमिक टाइम्स ने बीते पांच नवंबर को प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि ह्विसिलब्लोअर के रूप में कार्य करते हुए अधिकारियों ने चेतावनी दी थी कि अगर पहले के ऋणों से अतिदेय के साथ नए ऋण के पैसे को समायोजित करने के चलन को तुरंत नहीं रोका गया तो सहायक इकाई (बीएफआईएल) में गलती पैरेंट बैंक (इंडसइंड बैंक) के वित्त को खत्म कर देगी.

बैंक ने इन आरोपों पर कहा, ‘हम लोन एवरग्रीनिंग के आरोपों का पूरी तरह से खंडन करते है. बीएफआईएल द्वारा जारी और प्रबंधित ऋण नियामक द्वारा जारी दिशानिर्देशों का पूरी तरह से पालन करने के बाद ही दिए गए. इसमें कोविड-19 की पहली और दूसरी लहर के प्रकोप के दौरान दिए गए ऋण भी शामिल है.’

बैंक ने कहा कि मई 2021 में तकनीकी गड़बड़ी के कारण करीब 84,000 ग्राहकों को बिना अनुमति के ऋण दिए गए थे.

बीते पांच नवंबर को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, ह्विसिलब्लोअर ने बैंक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुमंत कथपालिया, स्वतंत्र निदेशकों और आरबीआई के अधिकारियों से 17 अक्टूबर से 24 अक्टूबर के बीच इस संबंध में ईमेल भेजकर संपर्क साधा था. इसके अतिरिक्त एक बाहरी व्यक्ति (Outsider) भी था, जिसने 14 अक्टूबर को आरबीआई को लिखा था.

रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया था कि 14 अक्टूबर की शिकायत से एक महीने पहले बीएफआईएल के गैर-कार्यकारी अध्यक्ष एमआर राव ने पद छोड़ दिया था और अपने त्याग-पत्र में ग्राहकों की सहमति के बिना दिए गए ऋणों पर आरबीआई की चिंताओं को भी चिह्नित किया था. अपने त्याग-पत्र में उन्होंने इसे पुनर्भुगतान दरों को कम करने के लिए जान-बूझकर किया गया एक कार्य बताया था.

मिंट की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर के अंत में इन 84,000 ग्राहकों में से 26,073 सक्रिय थे और इन पर 34 करोड़ रुपये का ऋण बकाया था, जो सितंबर अंत पोर्टफोलियो का 0.12 प्रतिशत है. इंडसइंड बैंक ने कहा, यह ऋण के खिलाफ आवश्यक प्रावधान करता है.

बैंक की ओर से ये भी कहा गया है कि बायोमेट्रिक अथोराइजेशन को अनिवार्य बनाने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया को संशोधित किया गया है और अक्टूबर 2021 में लगभग 100 प्रतिशत ऋण ग्राहकों के बैंक खातों में था, जैसा कि कोविड-19 के पूर्व ​​समय में था.

बैंक के बयान में कहा गया है कि महामारी के दौरान ग्राहकों को परिचालन संबंधी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और इनमें कुछ ने रुक-रुक (अनिरंतर) भुगतान किया, हालांकि उनमें से एक बड़े हिस्से ने (ऋण) चुकाने के लिए एक मजबूत इरादे का प्रदर्शन किया.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)