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छत्तीसगढ़: राज्य स्थापना दिवस आयोजन में आदिवासियों की जीवंत प्रदर्शनी, सरकार की आलोचना

छत्तीसगढ़ के स्थापना दिवस मनाने के दौरान रायपुर में लगी एक प्रदर्शनी में आदिम जाति एवं अनुसूचित विकास विभाग द्वारा बैगा आदिवासियों को स्टॉल पर बैठाया गया जहां दर्शक उनके साथ फोटो आदि लेते दिखे. भूपेश बघेल सरकार के इस कदम को मानवाधिकार उल्लंघन बताते हुए कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शनी को ‘शहरी अवाम के मनोरंजन के लिए आदिवासियों की संस्कृति की हत्या’ बताया है.

राज्य उत्सव में एक स्टॉल पर बैठाए गए विभिन्न बैगा आदिवासी. (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

रायपुर: छत्तीसगढ़ में राज्य स्थापना दिवस मनाने के दौरान भूपेश बघेल सरकार ने अपनी योजनाओं और उपलब्धियों को बताने राजधानी रायपुर के साइंस कॉलेज मैदान में विभागीय प्रदर्शनी लगाई गई थी, जहां आदिम जाति एवं अनुसूचित विकास विभाग द्वारा विशेष पिछड़ी जनजाति- बैगा आदिवासियों की जीवन शैली का जीवंत प्रदर्शन किया गया था.

इस प्रदर्शन में विभाग ने बैगा आदिवासियों को प्रदर्शनी स्थल में लाकर बैठाया था. यहां बैगा जनजातियों के रहन सहन, खान-पान, नृत्य-त्योहार को प्रदर्शित किया गया था, जिसके लिए सरकार की आदिम जाति विभाग ने आदिवासियों के भावनाओं को आहत करते हुए बैगा आदिवासियों को प्रदर्शन स्थल में ही बैठा दिया गया, जहां राज्य उत्सव देखने आए लोग उनके साथ सेल्फी ले रहे थे और उन्हें मनोरंजन का साथन बनते देखा जा रहा था.

जानकारी के अनुसार, वहां बैठे बैगा आदिवासी समूह एक सांस्कृतिक समूह का हिस्सा थे.

इसकी आलोचना करते हुए विशेष पिछड़ी जनजाति समूह के समग्र विकास कार्य समूह के सदस्य नरेश बिश्वास ने कहा, ‘राज्य उत्सव में जो बैगा जनजाति के संस्कृति का जीवंत प्रदर्शनी लगाई गई,  वो पूरी तरह से गलत है. शहरी अवाम के मनोरंजन के लिए ही लगाई गई यह प्रदर्शनी आदिवासियों के संस्कृति की हत्या है.’

नरेश कहते हैं, ‘आदिवासी अपने लिए नाचते है वहां कोई दर्शक नही होता है. उत्सव, तीज-त्योहार में आदिवासी अपनी खुशी जाहिर करते है न कि किसी प्रदर्शनी या दर्शकों की खुशी के लिए.’

नरेश सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘बैगा जनजाति विशेष पिछड़ी जनजाति है. सरकार प्रदर्शनी लगाकर उनकी संस्कृति दिखा रही है लेकिन क्या बैगा चक गांवों में उनकी संस्कृति सभ्यता बची हुई है? नही! उनकी संस्कृति तो विलुप्ति की कगार पर है जिन्हें सरकार बचाना छोड़कर  इन आदिवासियों को राज्य उत्सव में शो बना कर रख रही है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘बैगा आदिवासी महिलाओं को जो लाल साड़ी पहनकर राज्य उत्सव के स्टॉल में प्रदर्शित किया जा रहा था उस लाल साड़ी को बनाने वाला पनका समुदाय आज अपना काम छोड़ चुका है, इसे बचाने तो राज्य सरकार सामने नही आई. लाल साड़ी पहने बैगा महिलाओं को प्रदर्शित कर सरकार क्या दिखाना चाहती है? आज बैगा चक गांवों में तो उनकी संस्कृति बची नही है.’

नरेसग ने यह भी जोड़ा कि विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा मिले बैगा आदिवासियों को इस तरह से प्रदर्शित करना उनके मानव अधिकार का सरकार ने हनन किया है.’

राज्य उत्सव में पहुंची शोधार्थी पुरातत्व बिनू ठाकुर कहती  हैं, ‘राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव एक ओर जहां हर्ष का विषय है, वहीं दूसरी ओर कुछ चीजें देखकर मन में उदासी भी है. सरकार ने आदिवासी जनजीवन के सभी पक्षों को शहर में रहने वालों के लिए एक जगह ला कर रख दिया. पर क्या हम आदिवासी जंगल के जानवरो के समान है, जिसे उन जगहों से उठाकर राजधानी के बीचों-बीच तीन दिन की प्रदर्शनी में बैठा दिया गया?’

उन्होंने कहा, ‘खासकर ये खयाल मन में बैगा आदिवासियों को देखकर लगा. ये आदिवासी नृत्य महोत्सव था न कि जंगल में रहने वाले उन आदिवासियों की प्रदर्शनी. तरह-तरह के लोग वहां आ रहे थे, उनके साथ फोटो खींचा रहे थे वीडियो बना रहे थे, किसी ने नहीं पूछा होगा आप लोगों को रहने और खाने की तो ठीकठाक सुविधा है या नहीं..’

बिनू ने आगे बताया, ‘एक बुजुर्ग से व्यक्ति पर मेरी नजर पड़ी, जो गुमसुम थे उदासी उनकी आंखों में झलक रही थी. कहां उनके गांव का सुकून और कहां ये लाखों लोग जो उन्हें देखने आए हैं कि बैगा आदिवासी दिखते कैसे हैं. अरे भई! वो भी इंसान है तुम्हारे तरह बस फर्क इतना है कि प्रदर्शनी में तुम नहीं ये मासूम अदिवासी है. जो आज संग्रहालयों में रखे जाने वाले सामान की तरह हो गए… फोटो और प्लास्टिक मॉडल काफी नहीं थे शायद जो जिंदा मॉडल को वहां से यहां लाया गया. जब सरकार के पास आदिवासी मुद्दे जाते है तब तो इतने खुशी के साथ मामले जल्दी से जल्दी निपटाते नहीं है. पर अपनी प्रशंसा करवाने के लिए आदिवासियों को मोहरा जरूर बनाते है. इतने करोड़ों रुपये का बजट सरकार फूंक सकती है पर जल, जंगल, जमीन की समस्या पर चुप्पी साध लेती है.’

सर्व आदिवासी समाज के युवा प्रभाग के अध्यक्ष योगेश नरेटी कहते हैं, ‘बैगा आदिवासी अपनी संस्कृति को लेकर पूरे विश्व में विख्यात हैं, लेकिन अभी के समय में आदिवासी समाज अस्तित्व की जो लड़ाई लड़ रहा है, उसमें ये आदिवासी भी शामिल हैं. सरकार ने अभी प्रदर्शनी के रूप में इन आदिवासियों की प्रदर्शनी लगाई, पर सच ये है कि आदिवासी अपना नृत्य, अपने गीत अपने त्योहार पर इस्तेमाल करते हैं किसी प्रदर्शनी में नहीं!’

नरेटी ने आगे जोड़ा, ‘बैगा आदिवासी हमेशा से विस्थापन का दर्द सहे,  चक में मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं, रोड, बिजली, पानी की सुविधाएं नहीं है और उन्हें सरकार प्रदर्शनी के रूप में रखकर क्या साबित करना चाहती है!  क्या यह कि हम आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखे गए हैं, वनोपज संग्रहण करते समय कई बार वन विभाग के द्वारा कार्यवाही के मारे हैं, हमारे कई लोगों को जेल में डाल दिया गया, यह सब शहरी लोगों को दिखाएं!’

डॉ. बॉबी लूथरा सिन्हा सामाजिक मानवविज्ञानी हैं और इंटरनेशनल यूनियन ऑफ एंथ्रोपोलॉजिकल एंड एथ्नोग्राफिक साइंसेज के साइंटिफिक कमीशन ऑफ माइग्रेशन में सह-अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभाती हैं.

डॉ. बॉबी ने इस मसले पर कहा, ‘ यह बिल्कुल भी स्वीकार नहीं है. यह बहुत गलत है. दूसरी बात इस तरह से दिखाने का एक बहुत बड़ा इतिहास है जो उपनिवेशवाद दुनिया में आया था. यूरोप के अमीर, गोरे लोग अपनी ताकत दिखाने के लिए भारत या अफ्रीका, एशिया जैसे जगहों से वहां के जानवर ले जाकर यूरोपियन लोगों को दिखाते थे, प्रदर्शनी लगाते थे, उन्हें चिड़ियाघर में रखते थे. यही नहीं, वहां की जो आदिवासी जनजाति लोग थे उनको भी ले जाकर पिंजरे में बंद करके रखा जाता था. इस बात का बहुत विरोध हुआ था. वहां के लोगो ने अपनी आजादी की लड़ाई लड़नी शुरू की थी, साथ ही यह मानवाधिकार के रूप में भी देखा जाए तो यह ठीक नहीं है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘हालांकि छत्तीसगढ़ सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं थी फिर भी उनको थोड़ा सतर्क रहना चाहिए था. आदिवासियों को इस तरह से डिस्प्ले करना एक सामाजिक मनोवैज्ञानिक के हिसाब से बिल्कुल ठीक बात नहीं है.’

इस संबंध में ट्राइबल कमिश्नर शम्मी आबदी से प्रतिक्रिया लेने के लिए संपर्क किया गया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. उनका पक्ष आने पर खबर में जोड़ा जाएगा.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)