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मालिकों के हित में श्रम कानून बदलना चाहती है केंद्र सरकार: मज़दूर संगठन

संगठनों का कहना है कि प्रस्तावित इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड के ज़रिये सरकार मज़दूरों के हड़ताल और विरोध करने के बुनियादी अधिकारों को छीनना चाहती है.

इलस्ट्रेशन: एलिज़ा बख़्त

इलस्ट्रेशन: एलिज़ा बख़्त

नई दिल्ली: सरकार देश में कारोबारी वातावरण को सुगम बनाने एवं रोज़गार के नए अवसरों के सृजन के लिए प्रस्तावित इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड (आईआर कोड) को बेहद अहम मान रही है, लेकिन देश के बहुत से श्रमिक संगठनों ने एक सुर में सरकार के इस प्रस्तावित मसौदे का विरोध किया है.

संगठनों का कहना है कि प्रस्तावित आईआर कोड के ज़रिये सरकार मज़दूरों के हड़ताल अथवा विरोध करने के बुनियादी अधिकारों को छीनना चाहती है.

केंद्रीय मान्यता प्राप्त, आॅल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) के केंद्रीय सचिव विद्यासागर गिरि ने कहा, ‘सरकार कर्मचारियों और मज़दूरों के कल्याण की बात तो करती रहती है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि श्रम सुधार के नाम पर सरकार मालिकों के हित में कर्मचारियों के हड़ताल अथवा विरोध करने के बुनियादी अधिकार को भी समाप्त करना चाहती है.’

उन्होंने कहा कि श्रम सुधारों का प्रस्तावित मसौदा आईआर कोड अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के प्रावधानों का पूरी तरह से उल्लंघन करता है.

उल्लेखनीय है कि श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने साल 2015 में एक विधेयक का मसौदा तैयार किया था, जिसके तहत ट्रेड यूनियन अधिनियम, औद्योगिक विवाद अधिनियम और औद्योगिक रोजगार स्थाई आदेश अधिनियम को एक करके औद्योगिक संबंधों के लिए एकल आईआर कोड   औद्योगिक संबंध संहिता बनाने का प्रस्ताव किया गया है.

सरकार ने 14 सितंबर को केंद्रीय मान्यता प्राप्त सभी ट्रेड यूनियनों को इस प्रस्तावित मसौदे पर चर्चा करने के लिए आमंत्रित किया था. इन मान्यता प्राप्त 11 यूनियनों में से 10 प्रमुख यूनियनों ने सरकार के इस प्रस्तावित मसौदे को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया.

10 प्रमुख यूनियनों ने सम्मिलित रूप से सरकार के मसौदे को ख़ारिज करने वाला ज्ञापन सौंपा है हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंद्ध ट्रेड यूनियन भारतीय मज़दूर संघ (बीएमएस) ने ख़ुद को इस ज्ञापन से अलग रखा है.

इस समय देश में सार्वजनिक एवं निजी उपक्रम के कर्मचारियों का नेतृत्व करने वाली केंद्रीय मान्यता प्राप्त कुल 11 ट्रेड यूनियन हैं. जिसमें से पांच ट्रेड यूनियन, आॅल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक), इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक), सेंटर फॉर इंडियन ट्रेड यूनियन (सीटू), हिंद मज़दूर सभा (एचएमएस) और भारतीय मज़दूर संघ (बीएमएस) प्रमुख हैं.

इन यूनियनों से संबद्ध यूनियनें लगभग सभी उपक्रम में कर्मचारियों का नेतृत्व कर रही हैं, जबकि शेष छह यूनियनों का दायरा कम है. गौरतलब है कि राजनीतिक विचारधारा के आधार पर लगभग सभी श्रमिक संगठनों का ध्रुवीकरण हो चुका है.

वाम दलों से संबंद्ध ट्रेड यूनियन एटक के सचिव ने कहा, ‘आईआर कोड लागू होने के बाद श्रमिक संगठनों के लिए हड़ताल करना, हड़ताल का नेतृत्व करना अथवा हड़तालियों की मदद करना ग़ैर-क़ानूनी बन जाएगा. इसके अलावा ऐसे सभी व्यक्तियों पर, जो हड़ताल या प्रदर्शन के आयोजन में मदद करेंगे, उन पर 25 से 50 हजार रुपये का जुर्माना करने एवं एक माह की सज़ा का भी प्रावधान है.’

उन्होंने कहा, ‘इस विधेयक का मसौदा 2015 में तैयार किया गया था और उस समय सभी ट्रेड यूनियनों से सुझाव मांगे गए थे. सभी यूनियनों ने सरकार को अपने-अपने सुझाव सौंपे थे लेकिन उस पर सरकर ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. शायद मंत्री बदल जाने के कारण उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.’

उन्होंने कहा कि इसके बाद सभी ट्रेड यूनियनों को अचानक आईआर कोड-2017 पर अपने सुझाव देने के लिए कहा गया, लेकिन हमें इस मसौदे का कोई ड्राफ्ट नहीं दिया गया. जब हम लोगों ने सरकार से मसौदा का ड्राफ्ट मांगा, तो हमें पांच बिंदु बता दिए गए, जिस पर बातचीत के लिए 14 सितंबर को आमंत्रित किया गया.

कांग्रेस से संबद्ध इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक) के सचिव पीजे राजू ने कहा, ‘प्रस्तावित आईआर कोड के लिए त्रिपक्षीय वार्ता की पेशकश की गई थी, लेकिन हमें उसके मसौदे का प्रारूप ही नहीं दिया गया. हम सभी दस ट्रेड यूनियनों ने सम्मिलित रूप से सरकार के आई आर कोड का पुरजोर विरोध किया है.’

आई आर कोड के प्रस्तावित मसौदे में श्रमिकों के लिए ट्रेड यूनियन बनाना या हड़ताल पर जाना मुश्किल बनाया गया है. संगठित क्षेत्र में सिर्फ कर्मचारियों को यूनियन बनाने की मंज़ूरी होगी और किसी बाहरी व्यक्ति को श्रम संगठन का अधिकारी नहीं बनाया जा सकेगा. ग़ैर-संगठित क्षेत्र में दो बाहरी प्रतिनिधि ट्रेड यूनियन के सदस्य हो सकते हैं. प्रस्तावित कानून के तहत समझौता प्रक्रिया जारी रहने के दौरान श्रमिक हड़ताल पर नहीं जा सकते हैं.

गिरि ने कहा, ‘संस्था के कर्मचारी संगठन हड़ताल पर जाने के लिए कंपनी को नोटिस देते हैं, लेकिन नए प्रावधान में नोटिस देने के समय से ही समझौता वार्ता शुरू मान ली जाएगी और इस तरह समझौता वार्ता जारी रहने के साथ यूनियनों को हड़ताल पर जाने का अधिकार नहीं होगा.’

वे आगे कहते हैं, ‘इसके अलावा सामूहिक आकस्मिक अवकाश को भी हड़ताल माना जाएगा, जबकि इसमें श्रम अदालत समेत विभिन्न तरह के मध्यस्थता मंचों को ख़ारिज करने का प्रस्ताव भी शामिल है. इसके अलावा ग़ैर कर्मचारियों को यूनियन से बाहर रखने का प्रस्ताव भी व्यावहारिक नहीं है क्योंकि नए कर्मचारियों को नियमों का पता नहीं होता और इसके कारण उनका शोषण भी बढ़ेगा.’

मसौदे में ऐसी कंपनियों को बिना आधिकारिक मंज़ूरी के छंटनी का अधिकार दिया गया है जिनके पास 300 तक कामगार हों. फिलहाल 100 कामगारों वाली कंपनियों को बिना आधिकारिक मंज़ूरी के छंटनी करने का अधिकार है.

गिरि ने इस प्रस्ताव पर कहा कि बिना मंज़ूरी के छंटनी नियुक्ति की स्वीकृति देने से उद्योगों में   हायर एंड फायर एक स्थायी तस्वीर बन जाएगी, जो भविष्य में ज़्यादा परेशानियां खड़ी कर सकती है. हम पूरी तरह से इस प्रस्ताव का विरोध करते हैं.

भारतीय मज़दूर संघ के महासचिव विरजेश उपाध्याय ने कहा, ‘भारतीय मज़दूर संघ इस कोड को पूरी तरह ख़ारिज नहीं कर रहा है क्योंकि इसमें कुछ सार्थक तत्व भी हैं, जैसे श्रम कानूनों का उल्लंघन करने पर नियोक्ता को अब अधिक जुर्माना भरना पड़ सकता है.’ हालांकि भारतीय मज़दूर से जुड़े नेता इस बात पर सहमत हैं कि बाहरी व्यक्तियों को यूनियन से बेदख़ल किया जाना गलत है.

गिरि ने बताया कि श्रम एवं रोजगार मंत्री संतोष गंगवार ने धैर्यपूर्वक हमारी बातें सुनीं और सबको साथ लेकर आगे बढ़ने की बात कही है. हालांकि अभी तक हमारे ज्ञापन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है.