कैंपस

जेएनयू शिक्षक संघ ने सेवानिवृत्त फैकल्टी सदस्यों की पेंशन तत्काल जारी करने की मांग की

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय शिक्षक संघ ने उन सभी सेवानिवृत्त शिक्षकों की पेंशन और अन्य लाभों को तत्काल जारी करने की मांग की, जिनका बकाया वाइस चांसलर के आदेश पर प्रशासन ने रोक दिया था. शिक्षक संघ का कहना है कि प्रशासन मामले पर अदालत के आदेशों का पालन नहीं कर रहा है.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय. (फोटो: शोम बसु)नई दिल्लीः जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (जेएनयूटीए) ने विश्वविद्यालय द्वारा रोके गए सेवानिवृत्त फैकल्टी सदस्यों की पेंशन और अन्य लाभों को तत्काल जारी करने की मांग की.

बयान में कहा, विश्वविद्यालय प्रशासन मामले पर अदालत के आदेशों का पालन नहीं कर रहा है.

जेएनयूटीए ने कहा, ‘न्याय की लड़ाई में सेवानिवृत्त फैकल्टी सदस्यों के साथ खड़े होकर जेएनयूटीए उन सभी सेवानिवृत्त शिक्षकों की पेंशन और अन्य लाभों को तत्काल जारी करने की मांग करता है, जिनका बकाया वाइस चांसलर के आदेश पर प्रशासन ने रोक दिया.’

2019 में एकदिवसीय विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए 48 यूनिवर्सिटी सदस्यों के खिलाफ केंद्रीय सिविल सेवा (सीसीएस) नियमों के तहत चार्जशीट दायर की गई थी.

अगस्त 2019 में दिल्ली हाईकोर्ट ने चार्जशीट और फैकल्टी के खिलाफ सीसीएस नियमों को लागू करने वाली प्रमुख दंड जांच कार्यवाही पर रोक लगा दी थी.

बयान में कहा गया, ‘इसके बावजूद वाइस चांसलर ने शिक्षकों के सेवानिवृत्त होने पर उनकी पेंशन और अन्य लाभों को रोकने का आदेश दिया. इसके बाद फैकल्टी सदस्यों ने इसका समाधान निकालने के लिए अदालत का रुख किया.’

दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 नवंबर 2020 को कहा कि पेंशन न कोई इनाम है और न ही यह नियोक्ता की इच्छा पर निर्भर करता है. यह कर्मचारियों की सेवाओं के लिए उनके लिए अनुग्रह राशि भी नहीं है.

शिक्षक निकाय का कहना है कि हाईकोर्ट के इस आदेश को लगभग एक साल हो गया है लेकिन अदालत के निर्देश के अनुरूप जेएनयू ने फैकल्टी सदस्यों के लिए लाभों को जारी नहीं किया.

जेएनयूटीए ने कहा, ‘यूनिवर्सिटी ने ग्रैच्युटी और अदालत का रुख करने वाले चार अन्य फैकल्टी सदस्यों के लिए नकदी सहित पेंश लाभों को रोक दिया है.

दिल्ली हाईकोर्ट ने 29 अक्टूबर को आदेश दिया था कि वह छह हफ्ते के भीतर नौ फीसदी ब्याज के साथ सदस्यों को तुरंत धनराशि जारी करे.’

शिक्षक संघ ने कहा, ‘वास्तव में ये फैसले कोरोना महामारी के दौरान लिए गए. यह दरअसल वाइस चांसलर और उनकी टीम की असंवेदनशीलता को दर्शाता है. पेंशन बकाए का इंतजार करते हुए प्रोफेसर रजत दत्ता का पिछले महीने कैंसर से दम तोड़ना उस सड़ांध को दिखाता है, जिसे किसी और ने नहीं बल्कि प्रोफेसर जगदीश कुमार ने संस्थान के प्रमुख के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान बढ़ावा दिया था.’

(समाचार एजेंसी पीटीआई से इनपुट के साथ)