भारत

छत्तीसगढ़: बस्तर में कथित नक्सलियों के ‘आत्मसमर्पण’ के बाद क्या होता है?

दंतेवाड़ा में ‘लोन वर्राटू’ के तहत पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने वाले कथित पूर्व नक्सलियों के लिए बनाए गए डिटेंशन कैंप ‘शांति कुंज’ का अस्तित्व क़ानूनी दायरों से परे है.

अपने बच्चे के साथ पाली मुचाकी. (फोटो: सुकन्या शांता)

(यह लेख ‘बार्ड– द प्रिज़न्स प्रोजेक्ट’ श्रृंखला का हिस्सा है जो पुलित्जर सेंटर ऑन क्राइसिस रिपोर्टिंग के साथ साझेदारी के तहत लिखा गया है.)

दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़): एक पुलिस थाने के अंदर रोशनी से जगमगाते हुए एक कॉन्फ्रेंस रूम में नवविवाहित जोड़ों का एक समूह अलग-अलग जोड़ों में बैठा था. सभी की उम्र मुश्किल से 20 से 30 वर्ष के बीच रही होगी. इन्हें बैठाए जाने का तरीका पूर्व-निर्धारित था. पहले एक पुरुष बैठा, उसके दाहिनी ओर एक युवती बैठी थी. कुछ इंच की जानबूझकर छोड़ी गई दूरी के बाद अगला जोड़ा बैठा था.

कमरे में कम से कम 15 नवविवाहित जोड़े थे, सभी मास्क लगाए हुए थे और घात लगाए बैठे कैमरों को चकमा देने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे थे. प्रत्येक जोड़े के पीछे बड़े ही व्यवस्थित ढंग से शादी का सामान रखा हुआ था. दूल्हे के लिए एक सेहरा और फीका सुनहरा कुर्ता व पैंट, दुल्हन के लिए एक चमकदार साड़ी, चूड़ियां और कुछ आकर्षक आभूषण. कुछ जरूरी बर्तन, कंबल, तकिए और एक नया स्मार्टफोन भी पास में रखे थे.

यह कमरा अक्सर आयोजित किए जाने वाले राज्य-संचालित किसी भी अन्य सामूहिक विवाह कार्यक्रम जैसा लग रहा था. लेकिन एक बेहद महत्वपूर्ण अंतर था. दंतेवाड़ा पुलिस के अनुसार, ये सभी युवा जोड़े कुछ वक्त पहले तक ‘सशस्त्र विद्रोही’ थे. उनकी शादी में साथ देने के लिए कोई परिवार का सदस्य नहीं था, कोई दोस्त और रिश्तेदार उन्हें बधाई देने या उनके उत्साहवर्धन के लिए नहीं थे. इन जोड़ों की शादी पिछले साल जून में जिला पुलिस अधीक्षक अभिषेक पल्लव द्वारा शुरू की गई महत्वाकांक्षी ‘लोन वर्राटू’ योजना के एक हिस्से के रूप में करा दी गई थी.

‘लोन वर्राटू’ भारत में रहने वाले बड़े स्वदेशी समूहों में से एक के द्वारा बोली जाने वाली गोंडी भाषा का एक शब्द है, जिसका अर्थ है ‘घर वापस आना’ या फिर जैसा कि पल्लव गर्व से बताते हैं, ‘घर वापसी.’ पल्लव का कहा गया आखिरी शब्द, जो हिंदुत्व के एजेंडा का प्रतिनिधित्व करता है, कुछ ऐसा है जिससे ‘न्यू इंडिया’ भली-भांति वाकिफ है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

पल्लव ने जोर देकर कहा कि शादी करने का फैसला ‘उनकी [जोड़ों की] खुद की मर्जी से’ लिया गया था. उन्होंने बताया, ‘उनमें से कुछ उस समय से एक-दूसरे को पसंद करते थे जब वे (सशस्त्र) आंदोलन में थे. उन्होंने प्यार के लिए ही आंदोलन छोड़ने का फैसला लिया था.’ उन्होंने दावा किया कि बाकियों को तब फौरन ‘प्यार हो गया’ जब वे कुछ ही दिन पहले दंतेवाड़ा जिले के पुलिस शिविर में ‘शांति कुंज’ लाए गए थे.

एक अप्रैल को मैं जब एक मीडिया कार्यक्रम में इन जोड़ों से मिली, तब उन्हें पल्लव या ‘डॉक्टर एसपी’ द्वारा शुरू की गई इस ‘अनूठी’ पहल को कवर करने के लिए वहां उपस्थित लेखकों और फोटोग्राफरों के सामने लाया जा रहा था. चूंकि एसपी अभिषेक पल्लव एम्स (दिल्ली) से पोस्ट ग्रेजुएट रहे हैं और क्षेत्र में चिकित्सा सेवा भी करते रहते हैं, इसलिए उन्हें क्षेत्र में ‘डॉक्टर एसपी’ के नाम से भी जाना जाता है.

बहरहाल, उस कार्यक्रम में पुरुषों को सफेद टी-शर्ट पहनाई गई थी, जिस पर हिंदी में ‘लोन वर्राटू’ लिखा हुआ था, जबकि महिलाओं ने अपनी पहचान छिपाने के लिए अपने चेहरों को स्कार्फ से ढंक लिया था.

डर, दबाव और वेदना की जो कहानियां इन युवा जोड़ों ने द वायर  के साथ साझा कीं, उन्होंने पल्लव के उन लंबे-चौड़े दावों की कलई खोल दी जिनमें वे इन शादियों को युवा जोड़ों की मर्जी से होना बता रहे थे.

सोमुलु* नामक एक युवक उन चंद लोगों में से थे जो हिंदी में बातचीत कर सकते थे. कुछ झिझक के बाद उन्होंने खुलकर बात की. उन्होंने बताया, ‘इस डिटेंशन कैंप (हिरासत शिविर) से बचने के लिए शादी ही मुझे एकमात्र उपलब्ध विकल्प की तरह दिखाई पड़ रहा था.’

‘हिरासत शिविर’ से उनका आशय शांतिकुंज से था. शांति कुंज दंतेवाड़ा जिले के करली प्रखंड में पुलिस के एक परिसर के अंदर अलग से बनी हुई एकमंजिला इमारत है. उस समय इसमें 80 से अधिक पुरुष और महिलाएं थे. उनकी गतिविधियां सीमित कर दी गई थीं और पुलिसकर्मी उन पर कड़ी निगरानी रखते थे.

सोमुलु के अनुभव के उलट पल्लव इस बात पर कायम हैं कि शांति कुंज विशेष तौर पर उन लोगों के लिए एक ‘सुरक्षित घर (सेफ हाउस)’ के रूप में बनाया गया था जो आत्मसमर्पण कर चुके हैं लेकिन ‘खतरे’ में हैं और ‘उनके पास जाने के लिए कहीं ठिकाना नहीं है.’

पल्लव ने दावा किया कि उन्हें डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) फोर्स में शामिल होने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, जिसमें मुख्य रूप से ऐसे आदिवासी युवा शामिल होते हैं जो कभी युद्ध संबंधी नक्सल गतिविधियों में शामिल रहे थे.

लोन वर्राटू के तहत सरेंडर किए नवविवाहित जोड़ों को उपहार देते एसपी पल्लव. (फोटो: सुकन्या शांता)

सोमुलू की पत्नी कोसी*, जिन्होंने अपने 17 साल का होने का दावा किया और जो दिख भी बमुश्किल 17 साल की ही रही थीं, ने केवल गोंडी भाषा में बातचीत की. सोमुलू के कथनानुसार उनके माता-पिता उनकी शादी की जानकारी नहीं थी और न ही कोसी के परिवार को थी. उन्होंने विस्मित भाव से कहा, ‘मुझे संदेह है कि क्या वे यह भी जानते हैं कि हम अभी भी जिंदा हैं.’

सोमुलु ने बताया कि जनवरी 2021 के आखिरी हफ्ते में उन्हें नौकरी और पैसे के वादे पर कटेकल्याण क्षेत्र स्थित उनके गांव से 35 किलोमीटर दूर पुलिस लाइन लाया गया था. उसी दिन क्षेत्र से तीन और पुरुषों को उनके संबंधित गांवों से उठाया गया और बाद में लोन लोन वर्राटू योजना के तहत ‘आत्मसमर्पण किया नक्सली’ दिखाया गया था.

सोमुलू ने कहा कि अपने गृहनगर लौटने का अब विकल्प नहीं है. उन्होंने कहा, ‘पुलिस ने सार्वजनिक रूप से दावा किया है कि मैंने पैसे के बदले में आत्मसमर्पण किया है. मुझे यकीन है कि इसने मेरे गांव के आसपास के दलम (नक्सल गुट) के सदस्यों को पक्का नाराज कर दिया होगा. वे मेरी हत्या करने का इंतजार कर रहे होंगे. हर तरह से मैं बर्बाद हो गया हूं.’

सोमुलू के माता-पिता कटेकल्याण क्षेत्र में थोथा पारा के करीब रहते हैं, जो जिले के उन क्षेत्रों में से एक है जहां सशस्त्र विद्रोहियों और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) दोनों की भारी उपस्थिति है. कटेकल्याण क्षेत्र के कम से कम एक दर्जन और लोग हैं, जिन्होंने स्पष्ट तौर पर योजना के तहत आत्मसमर्पण किया है.

लोन वर्राटू योजना के तहत आत्मसमर्पण करने वालों को 10,000 रुपये का भुगतान किया जाता है. सोमुलू और उनकी पत्नी को भी 10-10 हजार रुपये मिले हैं. इसके अलावा शादी योग्य महिलाओं की शादी के लिए राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई मौजूदा मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना के तहत भी उनकी शादी पर 25,000 रुपये अतिरिक्त खर्च किए गए थे.

जब सोमुलु से पूछा कि पुलिस के इस दावे के बारे में उनका क्या कहना है कि वे और उनकी पत्नी कभी सशस्त्र आंदोलन का हिस्सा थे और राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही माफी योजना के तहत यहां पहुंचे थे,,तब उन्होंने दृढ़ता से इन्हें खारिज कर दिया. उन्होंने जोर देकर कहा, ‘मैं किसी भी प्रकार की नक्सल गतिविधि में कभी शामिल नहीं था. मुझे नहीं लगता कि मेरी पत्नी भी शामिल थी. लेकिन मैं उसे अभी इतनी अच्छी तरह से नहीं जानता कि उसकी ओर से कुछ बोल सकूं.’

वह अपनी पत्नी की ओर मुड़े और इसी सवाल को ही गोंडी में पूछा. पत्नी ने कोई जवाब नहीं दिया. बाद में सोमुलू ने बताया कि उनकी पत्नी चिंतित और परेशान थी, 26 फरवरी को शिविर में लाए जाने के बाद से उसने ज्यादा बातचीत नहीं की थी.

अपनी पत्नी की ओर लगातार देखते हुए सोमुलू ने बताया, ‘वह ज्यादा नहीं बोलती है. वह केवल इतना कहती है कि वह जल्द ही अपने माता-पिता के पास भाग जाएगी.’

कार्यक्रम में एकत्रित हुए युवा जोड़ों पर नजर रखने के लिए आम वेशभूषा में विशेष रूप से प्रतिनियुक्त एक पुलिसकर्मी द्वारा हमारी बातचीत को कई बार बाधित किया गया. सोमुलु ने बताया कि उस दिन मीडिया के सामने केवल दब्बू किस्म के ऐसे लोगों की परेड कराई गई थी जो उनकी हां में हां मिलाते थे.

उन्होंने आगे बताया था कि कि ऐसे लोगों को यहां नहीं लाया गया है जो समस्या पैदा कर सकते थे.

उन्होंने, इस ओर इशारा करते हुए कि अगर किसी ने उन्हें मुझसे बात करते हुए देखा तो उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ेगा, मुझे बताया, ‘हमें प्रेस से बात न करने के सख्त निर्देश दिए गए हैं.’

कोसी की चुप्पी स्वाभाविक थी. उन्हें यहां लाए जाने से तीन दिन पहले 23 फरवरी को एक 20 वर्षीय युवती पांडे कवासी की शांति कुंज में कथित तौर पर आत्महत्या ककर ली थी. प्रेस कॉन्फ्रेंस में नवविवाहितों में से ही एक युवती ने बताया था कि जब कोसी को लाया गया था, उन्होंने खाने या सोने से भी इनकार कर दिया था.

युवती ने बताया, ‘वह बहुत ज्यादा दुखी थी. वह बार-बार कहती रहती, मैं मर जाऊंगी. हम डरे हुए थे कि वह भी पांडे की तरह अपनी जिंदगी खत्म कर लेगी.’

दंतेवाड़ा पुलिस के अनुसार, कवासी कटेकल्याण क्षेत्र के गुडसे गांव की एक ‘आत्मसमर्पण करने वाली नक्सली’ थीं. बताया गया था कि कवासी ने 18 फरवरी को पांच अन्य लोगों के साथ आत्मसमर्पण किया था. उनके साथ आत्मसमर्पण करने वालों में पड़ोसी नारायणपुर जिले से पाइके कोवासी (22) और कमलू उर्फ संतोष पोडियाम (25), किरंदुल से भूमे उइके (28) और लिंगा उइके (36) और गुडसे गांव से जोगी कवासी (28) शामिल थे.

खबरों के अनुसार, आत्मसमर्पण किए इन छह लोगों को एक बड़ी सफलता के तौर पर मीडिया के सामने प्रस्तुत किया गया था.

19 फरवरी 2021 को एक प्रेस वार्ता में लोन वर्राटू के तहत सरेंडर करतीं पांडे कवासी. (फोटो:स्पेशल अरेंजमेंट)

पुलिस ने दावा किया है कि जोगी पर 5 लाख रुपये का इनाम था. पल्लव ने मुझे बताया था कि जोगी एक खतरनाक माओवादी थीं और उनके खिलाफ कई मामले दर्ज हैं. पुलिस ने दावा किया कि कवासी प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) समूह की सांस्कृतिक शाखा चेतना नाट्य मंडली की सदस्य थीं. हालांकि, वे किसी भी आपराधिक मामले में नामजद नहीं थीं.

18 से 23 फरवरी के बीच कवासी को जोगी के साथ 10×10 फीट के एक छोटे से कमरे में रखा गया था. यह कमरा पुलिस कार्यालय के बगल में था जिसे पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) अमरनाथ सिदर अपने मातहतों के साथ साझा करते हैं. जहां कवासी और जोगी को कैद किया गया था, उस कमरे को सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात एक डीआरजी गार्ड ने एक ‘सेफ हाउस’ बताया. पुलिस की भाषा में इसका अर्थ होता है, हाल में गिरफ्तार या आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों से पूछताछ के लिए विशेष रूप से बनाया गया स्थान.

पुलिस के मुताबिक, कवासी एक खिड़की की रेलिंग से लटकी हुई पाई गई थी जिसकी ऊंचाई पांच फीट से कुछ ज्यादा थी. उसके परिवार ने दावा किया कि वह करीब चार फीट 11 इंच लंबी थी. सिदर ने मुझे वह जगह दिखाते हुए दावा किया कि जब कवासी शौचालय में गई तो जोगी बाहर इंतजार कर रही थी. अजीब बात यह है कि बाथरूम की कुंडी टूटी हुई थी और दरवाजा आधा खुला हुआ था. फिर भी, पुलिस इस बात पर कायम है कि कमरे में मौजूद जोगी और डीआरजी का पहरेदार कवासी द्वारा ‘आत्महत्या के प्रयास’ से अनजान थे.

इस संबंध में सिदर ने सफाई देते हुए कहा, ‘पांडे ने अपने दांत भींच लिए थे और अपना मुंह कसकर बंद कर लिया था. चूंकि उसने कोई आवाज नहीं की, इसलिए बाहर कोई नहीं जानता था कि वह शौचालय के अंदर क्या करने में लगी थी. केवल जब वह काफी देर तक बाहर नहीं आई तो जोगी ने अंदर झांका. तब तक पांडे की मौत हो चुकी थी.’

कवासी और जोगी दोस्त थीं. वे कटेकल्याण के जंगल के बहुत भीतर स्थित गुडसे गांव के पड़ोसी पारों में रहते थे. जिला मुख्यालय से 30 किमी पूर्व में स्थित इस गांव में 12 पारे हैं, जहां प्रत्येक में करीब 40 घर हैं, जो सभी गोंडी जनजाति के हैं.

द वायर  ने उनके परिवार से मिलने के लिए मार्च के अंत में गुडसे गांव का दौरा किया था. पांचवी कक्षा तक पढ़ी पांडे गांव के उन चंद लोगों में से थी जो पढ़-लिख सकते थे. परिवार विभिन्न जानकारी के लिए उसकी ओर देखता था और उसके फैसलों पर भरोसा करता था. शारीरिक और मानसिक तौर पर टूट चुके उसके पिता सन्नू कवासी ने बताया, ‘वह कभी गलत नहीं होती थी. उसने कभी कोई गलती नहीं की.’

सन्नू ने बताया कि उनकी बेटी 17 फरवरी को सुबह करीब नौ बजे जोगी के पास गई थी. उन्होंने बताया, ‘यह फसल कटाई के मौसम का शुरुआती दिन था. अपनी हमउम्र किसी भी युवा लड़की की तरह ही मेरी बेटी भी जोगी के घर गई थी जहां उसका परिवार उस दिन जश्न मना रहा था. खाने-पीने, नाचने और मौज-मस्ती की योजना थी.’

लेकिन घंटे भर के भीतर ही अत्याधुनिक हथियारों से लैस करीब 25-30 डीआरजी के जवानों ने खरकापारा का घेराव कर लिया जहां जोगी रहती थीं. पांडे की मां सोमली कवासी ने गोंडी में कहा, ‘वे जोगी को लेने आए थे. लेकिन मेरी बेटी डीआरजी जवानों द्वारा जोगी को ले जाने से रोकने की कोशिश में उनसे भिड़ गई. फिर वे उन दोनों को एक साथ घसीटकर ले जाने लगे.’

सोमली ने बताया कि उनमें से एक बामन मंडावी था जो पास के दुवालिकारका गांव का एक पूर्व नक्सली है और अब डीआरजी में है. वह असाधारण रूप से अत्याधिक हिंसक था. उन्होंने बताया, ‘बामन ने उन दोनों को बेरहमी से घसीटा.’ उसी दिन ही गांव में सालाना खेल आयोजन था. लगभग सभी युवा घटनास्थल से दूर गांव से बाहर एक मैदान में खेल रहे थे. सन्नू कवासी को संदेह है कि डीआरजी, जिसमें ज्यादातर स्थानीय आदिवासी युवा होते हैं, को गांव के आयोजन के बारे में पता था.

सन्नू कहते हैं, ‘वे जानते थे कि गांव में केवल बूढ़े और विकलांग ही बचे होंगे. उन्होंने गांव में घुसने के समय का अच्छी तरह से हिसाब लगाया था जिससे बिना किसी खास विरोध के वे हमारी बेटियों को ले जाने में कामायाब हुए.’

इस डर से कि महिलाओं को फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाएगा, जो मध्य भारत में एक आम धारणा है, ग्रामीणों ने कुछ वाहन किराए पर लिए और 30 किमी दूर दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय स्थित अधीक्षक कार्यालय तक गए.

परिवार के साथ गए जनपद सदस्य (जिला परिषद सदस्य) श्यामा मरकाम ने द वायर  को बताया कि वहां हिरासत में ली गई महिलाओं से परिवार को मिलने नहीं दिया गया. मरकाम गांव के चुनिंदा साक्षर व्यक्तियों में गिने जाते हैं. वे परिवार को न्याय दिलाने में मदद करने में सबसे आगे रहे हैं.

बाद में, 20 फरवरी को जब परिवार और कुछ ग्रामीणों ने कवासी से मिलने का एक और प्रयास किया तो उन्हें थोड़ी देर के लिए मिलने की अनुमति दी गई.

पांडे कवासी के माता पिता. (फोटो: सुकन्या शांता)

सन्नू कवासी ने बताया कि उनकी बेटी दिल दहला देने वाली भयावह हालत में थी. उन्होंने बताया, ‘पांडे का शरीर चोटों से भरा हुआ था और उसने हमें बताया कि उसे और जोगी दोनों को हिरासत में बेरहमी से पीटा गया था. उसकी बाहों, जांघों और पीठ पर बड़े-बड़े नीले निशान थे.’

सन्नू ने आगे बताया कि दोनों महिलाओं ने परिवारों को यह भी बताया कि जिस दिन डीआरजी द्वारा उन्हें पकड़कर ले जाया गया था, उन्हें सबसे पहले पास के जंगल ले जाया गया था और कई घंटों तक एक पेड़ से बांध दिया गया था. उन्हें कथित तौर पर कहा गया था, ‘आत्मसमर्पण के लिए हामी भर दो या हम तुम्हें यहीं मार देंगे.’

23 फरवरी को ग्रामीण फिर से वापस वहां गए. मरकाम ने बताया, ‘हमने पुलिस लाइन तक जाने के लिए पैदल और बस से बहुत लंबी दूरी तय की थी. हमने शाम तक इंतजार किया और फिर भी कोई हमें यह बताने के लिए तैयार नहीं था कि हमारी लड़कियों के साथ क्या हो रहा है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘यह सोचना भी बेचैन कर देने वाला है कि जब हम बाहर किसी आधिकारिक सूचना का इंतजार कर रहे थे, पांडे पहले ही मारी जा चुकी थी.’

जिस हालात में कवासी का शव मिला था, उसे देखते हुए परिवार ने आरोप लगाया है कि उसका यौन उत्पीड़न किया गया और बाद में उसकी हत्या कर दी गई और पुलिस ने इसे आत्महत्या के तौर पर दिखाया.

कवासी और जोगी की हिरासत और बाद में कवासी की संदिग्ध मौत ने तुरंत ही दंतेवाड़ा में सामूहिक विरोध भड़का दिया था. हिरासत क्षेत्र के बाहर जोगी की जान खतरे में होने के डर से पांडे और जोगी दोनों के परिवार उन्हें अपने साथ ले जाने पर अड़ गए.

आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता और जानी-मानी सामाजिक व राजनीतिक नेता सोनी सोरी भी मौके पर मौजूद थीं. सोरी ने कहा कि जब कवासी के शव को फंदे से नीचे उतारा गया तो परिवार की महिलाओं ने उनके शव को चेक किया था. सोनी ने द वायर  को बताया, ‘उसकी छाती और गुप्तांगों पर खरोंचें थीं. ऐसा लगता था कि उसके साथ शारीरिक और यौन हिंसा की गई थी.’

कवासी की मां सोमली ने कहा कि शरीर पर क्रूरता और बेरहमी से हिंसा के स्पष्ट निशान थे. उन्होंने द वायर  को बताया, ‘उसे दफनाने से पहले हमने उसके शरीर को बारीकी से देखा था. उसके गुप्तांग पर सूजन थी और वो नीले पड़ गए थे.’

गोंड जनजाति आत्महत्या द्वारा मौत को एक गंभीर सामाजिक बुराई के रूप में देखती है. मरने वाले किसी व्यक्ति का पारंपरिक तरीके से जलाकर अंतिम संस्कार करने के विपरीत कवासी को दफनाया गया था. हालांकि गांव में कुछ लोगों ने कहा कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि भविष्य में किसी भी फॉरेंसिक जांच के लिए उनका शरीर संरक्षित रहे, जबकि अन्य लोगों ने कहा कि परिवार कमतर महसूस कर रहा था क्योंकि कवासी ने पुलिस के दबाव के आगे घुटने टेक दिए और अपना जीवन समाप्त कर लिया.

कवासी को गुजरे नौ महीने से अधिक समय हो चुका है. सबसे शुरुआती जांच रिपोर्ट के लिए भी परिवार को करीब 500 किमी दूर स्थित बिलासपुर में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का रुख करना पड़ा. परिवार के वकील किशोर नारायण ने द वायर  को बताया कि परिवार ने विशेष जांच दल (एसआईटी) के गठन और आर्थिक मुआवजे की भी मांग की है. नारायण ने कहा, ‘अब तक अदालत ने केवल दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक को पोस्टमार्टम रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं.’

पल्लव ने परिवार और नारायण के दावों को झूठा बताया. उन्होंने कहा, ‘वे झूठ बोल रहे हैं. उन्होंने हमसे कभी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट नहीं मांगी.’ बाद में उन्होंने आगे जोड़ते हुए कहा कि आदेश वाले दिन ही दोनों परिवारों और गुडसे गांव के सरपंच को पोस्टमार्टम रिपोर्ट सौंप दी गई थी.

स्पष्ट तौर पर कवासी को उसके गांव से उठाया गया था और पुलिस द्वारा कैद में रखा गया था. उसे किसी से भी मिलने नहीं दिया गया था और आखिरकार वह पांच दिन बाद मृत पाई गईं. चूंकि पुलिस ने दावा किया कि यह एक ‘स्वैच्छिक आत्मसमर्पण’ था और गिरफ्तारी नहीं थी, इसलिए उनकी मौत को हिरासत में मौत के रूप में दर्ज नहीं किया गया.

जब किसी की गिरफ्तारी की जाती है तो पुलिस को 24 घंटों के भीतर उस व्यक्ति को नजदीकी न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना चाहिए. ऐसा न करने पर हिरासत को अवैध माना जाता है. आत्मसमर्पण के मामले में पुलिस अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया का खुले तौर पर दुरुपयोग करने में सक्षम होती है, यहां तक कि व्यक्ति कारावास में रखा गया है तब भी.

सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने समय-समय पर, विशेषकर जब हिरासत के दौरान कोई मौत या कोई यौन उत्पीड़न का आरोप लगता है, इसके लिए दिशानिर्देशों की एक श्रृंखला निर्धारित की है. कवासी का मामला इन दोनों ही श्रेणियों के अंतर्गत आना चाहिए. फिर भी पुलिस ने महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया.

दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 176 (1ए) के तहत हिरासत में मौत की जांच न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की जानी चाहिए. लेकिन कवासी की मौत की फाइल एक उप-मंडलीय मजिस्ट्रेट (एसडीएम) से जांच कराकर बंद कर दी गई. पल्लव ने दावा किया कि यह आवश्यक नहीं था ‘लेकिन केवल यह सुनिश्चित करने के लिए जांच कराई ताकि पुलिस का पक्ष स्पष्ट रहे’.

द वायर  ने एसडीएम अविनाश मिश्रा, जिन्हें जांच करने के लिए कहा गया था, से 3 नवंबर को संपर्क किया. फोन पर बातचीत में मिश्रा ने दावा किया कि जांच पूरी हो चुकी है और रिपोर्ट जिला कलेक्टर को सौंप दी गई है. उन्होंने यह भी दावा किया कि पुलिस विभाग और कवासी के परिवार, दोनों पक्षों के हर गवाह ने पुलिस के दावे का समर्थन किया है.

उन्होंने आगे कहा कि पोस्टमार्टम करने वाले जिला चिकित्सा विभाग के प्रमुख ने भी पुलिस का पक्ष लिया है. आत्महत्या के संभावित कारण पर प्रतिक्रिया देते हुए मिश्रा ने कहा, ‘आम तौर पर कामरेडों को उस स्थिति में खुद को मारने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है जब जांच के दौरान पुलिस के साथ उनका सामना होता है.’

हालांकि, कुछ ही घंटों के भीतर उनका बयान बदल गया था. शाम तक मिश्रा ने दावा किया कि जो उन्होंने पहले बताया था, वह असत्य था और जांच अभी भी लंबित है. उन्होंने कहा कि कवासी के परिवार और चिकित्सा अधिकारियों को अब तक गवाही के लिए बुलाया नहीं गया है.

उन्होंने यह भी दावा किया कि चूंकि वह हिरासत में मौत के आठ अन्य मामलों के बारे में भी जांच कर रहे हैं, इसलिए उनसे अलग-अलग मामलों की जानकारी आपस में उलझ गई.

ऐसे हिरासत केंद्रों के आसपास जानबूझकर संदिग्ध माहौल बनाकर रखा जाता है जो राज्य को कानूनी प्रक्रियाओं की धज्जियां उड़ाने की अनुमति देता है, और इन हिरासतों का डेटा कभी सार्वजनिक नहीं किया जाता.

यहां तक कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के वार्षिक डेटा, जिसमें सभी जेलों और जो कैद में हैं, का डेटा संकलित होता है, में भी इन्हें शामिल नहीं करते.

राज्य सरकार से मिली छूट के चलते ही न्यायिक प्रक्रिया के परे जेल से मिलते-जुलते ऐसे गैर न्यायिक ढांचे मौजूद हैं.

§

सोरी ने कहा कि राज्य सरकार से मिली यही छूट विवादित क्षेत्र में सरकार के कामकाज के तौर-तरीकों की पहचान है. सोरी के अनुसार, ‘यह कानूनी और मनोवैज्ञानिक दोनों तरह का शोषण है. राज्य व्यवस्था आदमी को पूरी तरह तोड़ देती है. आदमी न्याय के लिए अदालतों तक पहुंचने में भी असमर्थ है. कोई प्राथमिकी नहीं होती, कोई चार्जशीट नहीं होती, कोई मुकदमा नहीं चलता… सिर्फ पुलिस का दावा होता है कि इतनी संख्या में लोगों ने हथियार छोड़ दिए हैं और अब उसके लिए काम कर रहे हैं. यह सब और कुछ नहीं बल्कि एक राज्य-स्वीकृत अपराध है.’

पटना उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश और अब सर्वोच्च न्यायालय में वकालत करने वालीं अंजना प्रकाश ने ऐसे हिरासत केंद्रों की अवैधता पर निशाना साधती हैं.

उन्होंने द वायर को बताया, ‘अपने स्वभाव से ही ये हिरासत केंद्र अवैध हैं और इनके अस्तित्व को चुनौती दी जानी चाहिए. जब तक कि अदालती आदेश द्वारा मंजूरी नहीं दी जाती है, तब तक किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध नियंत्रण में रखा जाना अवैध है.’

बंबई उच्च न्यायालय के जस्टिस (सेवानिवृत्त) अभय थिप्से ने भी इस बात पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि पुलिस चाहे जो भी दावा करे, न्यायिक हस्तक्षेप से किनारा नहीं किया जा सकता है.

वे कहते हैं, ‘यह मानते हुए कि पुलिस जो दावा कर रही है वह सच है और ये आत्मसमर्पण स्वैच्छिक प्रकृति के हैं, फिर भी पुलिस को उन्हें अदालत के समक्ष प्रस्तुत करना पड़ेगा. उचित न्यायिक हस्तक्षेप के बिना कोई भी अपराध धुल नहीं सकता है. अदालत की सहमति बेहद जरूरी है.’

उन्होंने आगे कहा कि भारत के संविधान और अन्य कानूनी प्रावधानों ने समझदारी से यह शक्ति को अदालत के हाथों में सौंपी है, न कि पुलिस के. वे कहते हैं, ‘और इसका कारण यह है कि पुलिस के हाथों में ताकत का दुरुपयोग होने का डर है.’

थिप्से ने कहा कि इस मामले में पुलिस और छत्तीसगढ़ सरकार एक गंभीर अपराध कर रहे हैं और बस्तर के आदिवासियों के मानवाधिकारों और अनिवार्य न्यायिक प्रक्रिया, दोनों का उल्लंघन कर रहे हैं.

इस प्रकार का एक हिरासत केंद्र स्थापित करके छत्तीसगढ़ सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मानकों के प्रति कोई सम्मान नहीं दिखाया है. इन मानकों को तय करने में कई संयुक्त राष्ट्र एजेंसियां शामिल रही हैं.

किसी भी रूप में हिरासत या कैद से सभी व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान करने संबंधी सैद्धांतिक तत्व के सिद्धांत क्रमांक 11 में दर्ज है, ‘एक व्यक्ति को तब तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है जब तक कि न्यायिक या अन्य प्राधिकरण में उसे तत्काल सुनवाई का प्रभावी अवसर न दिया जाए. हिरासत में लिए गए व्यक्ति को खुद अपना पक्ष रखने या क़ानून द्वारा नियत वकील से सहायता लेने का अधिकार होगा.’

दंतेवाड़ा के शांति कुंज में हिरासत में लिए गए लोगों को न तो न्यायिक प्राधिकरण के समक्ष पेश किया गया है और न ही उन्हें वकील द्वारा अपना प्रतिनिधित्व करवाने का मौका दिया गया है.

दंतेवाड़ा एसपी अभिनव पल्लव. (फोटो: सुकन्या शांता)

पल्लव ने दावा किया कि लोन वर्राटू योजना के तहत अब तक 447 से अधिक व्यक्ति आत्मसमर्पण कर चुके हैं. पल्लव के अनुसार, यह नतीजे इसे ‘सबसे सफल अभियान’ कहे जाने से भी कहीं अधिक बढ़कर हैं. उन्होंने दावा किया कि पुराना 80 का आंकड़ा अब बढ़कर 500 हो गया है.

उन्होंने कहा, ‘उनमें से 500 से ज्यादा पुलिस लाइन के अंदर रह रहे हैं और ‘बस्तर सेनानी’ के एक हिस्से के रूप में प्रशिक्षण ले रहे हैं. अन्य 3,000 हर रोज आते-जाते रहते हैं.’

चूंकि यह योजना गोपनीयता से घिरी हुई है, इसलिए इन संख्याओं को सत्यापित करना मुश्किल है.

बता दें कि ‘बस्तर सेनानी’ डीआरजी की तरह ही छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा विशेष तौर पर क्षेत्र में वामपंथी उग्रवादियों से लोहा लेने के लिए बनाया गया एक और लड़ाकू बल है.

पल्लव ने दावा किया कि जिन्हें भी आत्मसमर्पण किया बताया गया है, उनमें से कई मोटी पुरस्कार राशि लेकर गए हैं. पुरस्कार राशि एक व्यक्ति द्वारा कथित तौर पर किए गए अपराध, सशस्त्र आंदोलन में उसकी भूमिका और व्यक्ति के पद की वरिष्ठता के आधार पर निर्धारित की जाती है. आत्मसमर्पण के बाद हालांकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उस व्यक्ति पर हत्या का आरोप है या इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) के उपयोग और आगजनी के हमला का. सभी अपराधों को माफ कर दिया जाता है.

पल्लव ने स्वीकारा, ‘इस अपराध-क्षमा योजना के खिलाफ अदालत जाने वाला आपके पास कभी एक ग्रामीण नहीं होगा. हम जानते हैं कि नक्सली उन्हें तुरंत खत्म कर देंगे.’

पल्लव के अनुसार, शांति कुंज में रहने वाले सभी लोगों ने आत्मसमर्पण नहीं किया है, कुछ नक्सली हिंसा के डर से अपने गांव छोड़ दिए हैं. पल्लव ने दावा किया, ‘असल में तो पांडे कवासी का भाई भी बस्तर सेनानी में शामिल होने के लिए प्रशिक्षण लेना चाहता है.’

इस दावे की पुष्टि के लिए पांडे के परिवार से संपर्क नहीं हो सका.

जो लोग अपने गांव लौटना चाहते हैं उनकी सुरक्षा का क्या होगा? इस संबंध में पल्लव ने कहा, ‘यह हमारा सिरदर्द नहीं है.’ उन्होंने बेपरवाही से आगे कहा, ‘जब तक वे मेरे आदमियों द्वारा मारे नहीं जाते, मुझे दिक्कत नहीं है.’

पल्लव ने दावा किया कि शांति कुंज में लोगों का रहना स्वैच्छिक है. लेकिन पुलिसकर्मियों द्वारा रोके बिना या उनके साथ पहरे में जाए बिना सच में कोई भी उस जगह तक नहीं पहुंच सकता है.

शांति कुंज. (फोटो: सुकन्या शांता)

पुलिस कॉम्प्लेक्स कई एकड़ में फैला है. शांति कुंज पहुंचने से पहले किसी को खुली जमीन के लंबे रास्ते से पैदल गुजरना पड़ता है और बैरिकेड किए गए जिला पुलिस परिसरों और फिर डीआरजी से गुजरना पड़ता है. तब जाकर शांति कुंज पहुंचते हैं.

भले ही एक अप्रैल को शांति कुंज के लिए मेरा दौरा केवल पल्लव की मंजूरी पर ही संभव हुआ था, लेकिन वहां तक पहुंचने से पहले मुझे तीन बार रोका गया. मुख्य भवन के अंदर बीच-बीचों एक खुली जगह के साथ-साथ कई छोटे-छोटे भवन बनाए गए थे. एक तरफ विवाहित जोड़े रहते हैं और दूसरे छोर पर जो अविवाहित हैं, वे जोड़ों में रहते हैं.

यह छोटे कमरे होते हैं, जिनमें उचित वेंटीलेशन की कमी है. कुछ कमरों में गद्दे थे, जिससे पता चल रहा था कि विवाहित जोड़े उनमें रहते थे. बाकी, जिनमें एक या दो लोग रहते थे, बस खाली कमरे थे.

मैंने जोगी को आखिरी बार अप्रैल में देखा था, उस समय तक वह शांति कुंज में ही रह रही थीं. छोटी-सी जगह में जोगी को एक सशस्त्र महिला डीआरजी कमांडो की पहरेदारी में रखा गया था.

इस दौरान डीआरजी सरेंडर करने वाले अन्य युवाओं के साथ बातचीत के लिए खुला था, लेकिन जोगी पहुंच से बाहर थीं. जब मैंने उनसे बात करने की कोशिश की तो डीआरजी कमांडो उन्हें घसीटकर कमरे में ले गया. बाद में, मेरे अनुरोध का जवाब देते हुए डीआरजी कमांडो ने कहा कि जोगी ‘किसी से भी बात करने को तैयार नहीं थी.’

कमांडो ने दावा किया था, ‘वह डरी हुई है कि आप उसे प्रभावित करने और दबाव बनाने के लिए यहां आई हैं.’

कवासी के परिवार की तरह ही जोगी के परिवार ने भी दृढ़ता से कहा कि उनके साथ भी बर्बरता बरती गई थी और आत्मसमर्पण के लिए दबाव डाला गया था और कवासी की मौत के बाद से परिवार उससे नहीं मिल पा रहा है.

29 अक्टूबर को पल्लव ने फोन पर बताया कि जोगी भी बस्तर सेनानियों में शामिल होने के लिए प्रशिक्षण ले रही है. उन्होंने कहा, ‘अगर वह परीक्षा पास कर लेती है तो वह जल्द ही बल में शामिल हो जाएगी.’

जब तक कि जोगी और कई अन्य जो शांति कुंज के अंदर रह रहे हैं, उनसे स्वतंत्र रूप से नहीं मिलाया जाता है और उनकी गवाही दर्ज नहीं की जाती है, पल्लव के दावे की पुष्टि करने का अन्य कोई स्वतंत्र तरीका नहीं है.

जोगी के माता पिता. (फोटो: सुकन्या शांता)

आत्मसमर्पण कोई नई नीति नहीं है, खासकर कि मध्य भारत में जो कई दशकों से सशस्त्र संघर्ष से बुरी तरह प्रभावित रहा है. आत्मसमर्पण नीतियां विभिन्न राज्यों में अलग-अलग होती हैं. योजना के तहत मौद्रिक प्रस्ताव दिए जाते हैं, कुछ पुलिस या अन्य सहयोगी बलों में शामिल हो जाते हैं और कुछ का अंत शांति कुंज जैसी जगहों होता है.

आत्मसमर्पण, प्रभारी अधिकारी की छवि अच्छी बनाते हैं. उसके पास दिखाने के लिए संख्याएं होती हैं और हासिल करने के लिए मेडल एवं प्रमोशन के रूप में इनाम. इन लक्ष्यों तक पहुंचने के तरीके शायद ही कभी सार्वजनिक होते हैं, इसलिए ये इस तरह के अव्यवस्थित दुष्चक्र को बना रहता है.

कुछ व्यक्तिगत मामलों को छोड़दें, तो लोन वर्राटू दंतेवाड़ा में आत्मसमर्पण के नाम पर गांवों की बर्बादी की गवाही देता है. योजना के तहत हर कोई शांति कुंज नहीं पहुंचता है.

उदाहरण के लिए, कटेकल्याण तहसील के ही चिकपाल गांव में दो जत्थों (बैच) में आत्मसमर्पण हुआ. पहले, नवंबर 2019 में 27 पुरुष और महिलाएं आत्मसमर्पण करते हुए दिखाए गए थे. और बाद में 26 जनवरी 2021 को समर्पण का दूसरा चरण दिखाया गया था. आत्मसमर्पण के दूसरे चरण से कुछ दिन पहले पूरे गांव में नामों की सूची चिपका गई थी.

ग्रामीणों ने एक मत होकर दावा किया कि सूची में शामिल नामों में से कोई भी नक्सलियों के साथ नहीं रहा था या उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज नहीं था. फिर भी उन सबको आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर किया गया.

जिन लोगों का पहले चरण में आत्मसमर्पण करना दिखाया गया था, उन्हें कोई पैसा नहीं दिया गया था. दूसरे चरण का आत्मसमर्पण लोन वर्राटू योजना के तहत किया गया था.

21 वर्षीय राजूराम मरकाम भी आत्मसमर्पण करने वाले कई ग्रामीणों में से एक थे. उन्होंने बताया, ‘हमें कुल 10,000 रुपये देने का वादा किया गया था, लेकिन 1,000 रुपये दिए गए हैं.’

नकद पुरस्कार के साथ ही आत्मसमर्पण करने वालों को चप्पल, पानी के कंटेनर और छाते दिए गए थे. आत्मसमर्पण करने वाली महिलाओं को साड़ी मिलीं. आत्मसमर्पण के दावों तक मरकाम ने पड़ोसी आंध्र प्रदेश राज्य में एक मजदूर के रूप में काम किया. मरकाम ने आरोप लगाया कि उन्हें पहले डीआरजी ने जून या जुलाई 2020 के आसपास हिरासत में लिया था और बेरहमी से पीटा.

उन्होंने याद करते हुए बताया, ‘वह वो समय था जब लोन वर्राटू योजना शुरू की गई थी,’ वे आगे बताते हैं, ‘और फिर जनवरी में जब मैं मेरे परिवार के साथ समय बिताने के लिए कुछ दिनों के लिए अपने गांव आया था, तो डीआरजी ने मुझे फिर पकड़ लिया. उन्होंने मेरे बच्चे को भी हिरासत में ले लिया.’

मरकाम की तरह ही अन्य लोग भी कमजोर पड़ गए और अंतत: उन्होंने हार मान ली. जैसा कि दो छोटे बच्चों की 20 वर्षीय मां  पाली मुचाकी के मामले में हुआ.

मुचाकी ने बताया, ‘मेरा छोटा बेटा केवल छह महीने का है. जब मुझे (डीआरजी द्वारा) आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया, मेरे दिमाग में बस एक ही चीज थी मेरे बच्चों की सुरक्षा. मुझे या तो आत्मसमर्पण करने या जेल जाने के लिए कहा गया. मैंने सोचा कि आत्मसमर्पण ही बेहतर है.’

चिकपाल का प्रतिरोध का एक लंबा इतिहास रहा है. जब सीआरपीएफ ने गांव के बीचों बीच कैंप लगाने का फैसला किया तो ग्रामीणों ने इसका विरोध किया. ग्रामीणों का प्रतिनिधित्व कर रहे सरपंच जितेंद्र मरकाम ने सीआरपीएफ से संपर्क की कोशिश की थी पर उन्हें पीछे हटने को कहा गया.

मवेशियों को चराने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली वन भूमि को अंततः अधिग्रहित कर लिया गया और अब सीआरपीएफ का संचालन गांव के केंद्र यानी बीचों बीच से होता है. कैंप लगने के साथ ही अत्याचार के मामले भी बढ़ गए. कई ग्रामीण दावा करते हैं कि उन्हें कई मौकों पर रोका गया, धमकाया गया और यहां तक कि बर्बरता भी की गई.

पास में ही सीआरपीएफ कैंप की मौजूदगी से ग्रामीण और भी असुरक्षित हो जाते हैं. शिविर स्थापित किए जाने के साथ ही चिकपाल निवासियों को अब एक संवेदनशील रास्ते से होकर आना-जाना पड़ता है, सीआरपीएफ और नक्सलियों दोनों से खुद को बचाते हुए.

जैसा कि अपेक्षित था, नक्सलियों चिकपाल में सीआरपीएफ कैंप स्थापित किए जाने की खबर को सहजता से नहीं लिया. ऐसा माना गया कि ग्रामीणों ने ही सीआरपीएफ को गांव में आने के लिए कहा था. नक्सलियों से डरकर जितेंद्र मरकाम को अपने परिवार के साथ गांव से बाहर जाना पड़ा.

जितेंद्र मरकाम ने संघर्षग्रस्त बस्तर क्षेत्र में एक आम आदिवासी के जीवन के बारे में कहते हैं, ‘पुलिस हमसे झूठा आत्मसमर्पण करने की मांग करती है और नक्सली चाहते हैं कि हम पुलिस से वापस लड़ें. यह एक तरफ कुआं और एक तरफ खाई जैसा है.’

*परिवर्तित नाम

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)