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सुप्रीम कोर्ट ने यौन उत्पीड़न मामले पर हाईकोर्ट का विवादित ‘स्किन टू स्किन टच’ फ़ैसला ख़ारिज किया

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक बच्ची के यौन उत्पीड़न को लेकर पॉक्सो के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्ति को इससे बरी करते हुए कहा था कि ‘त्वचा से त्वचा के संपर्क’ के बिना यौन हमला नहीं माना जा सकता है. शीर्ष अदालत ने इसे रद्द करते हुए कहा कि यौन हमले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यौन मंशा है, त्वचा से त्वचा का संपर्क नहीं.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण संबंधी पॉक्सो अधिनियम के तहत एक मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट के ‘त्वचा से त्वचा के संपर्क’ या ‘स्किन टू स्किन टच’ (Skin to Skin Contact) संबंधी विवादित फैसले को गुरुवार को खारिज कर दिया.

शीर्ष अदालत ने कहा कि यौन हमले का सबसे महत्वपूर्ण घटक यौन मंशा है, बच्चों की त्वचा से त्वचा का संपर्क नहीं.

मालूम हो कि इस साल जनवरी में बॉम्बे हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि यदि आरोपी और पीड़िता के बीच ‘त्वचा से त्वचा का सीधा संपर्क नहीं हुआ’ है, तो पॉक्सो कानून के तहत यौन उत्पीड़न का कोई अपराध नहीं बनता है.

जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस रवींद्र भट और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी की तीन सदस्यीय पीठ ने उच्च न्यायालय का आदेश निरस्त करते हुए कहा कि शरीर के यौन अंग को छूना या यौन इरादे से किया गया शारीरिक संपर्क का कोई भी अन्य कृत्य पॉक्सो कानून की धारा सात के अर्थ के तहत यौन उत्पीड़न होगा.

न्यायालय ने कहा कि कानून का मकसद अपराधी को कानून के चंगुल से बचने की अनुमति देना नहीं हो सकता है.

पीठ ने कहा, ‘हमने कहा है कि जब विधायिका ने स्पष्ट इरादा व्यक्त किया है, तो अदालतें प्रावधान में अस्पष्टता पैदा नहीं कर सकतीं. यह सही है कि अदालतें अस्पष्टता पैदा करने में अति उत्साही नहीं हो सकतीं.’

जस्टिस भट ने इससे सहमति रखते हुए अपना एक पृथक फैसला सुनाया है.

पीठ ने कहा, ‘यौन उत्पीड़न के अपराध का सबसे महत्वपूर्ण घटक यौन मंशा है, बच्चे की त्वचा से त्वचा का संपर्क नहीं. किसी नियम को बनाने से वह नियम प्रभावी होना चाहिए, न कि नष्ट होना चाहिए. प्रावधान के उद्देश्य को नष्ट करने वाली उसकी कोई भी संकीर्ण व्याख्या स्वीकार्य नहीं हो सकती. कानून के मकसद को तब तक प्रभावी नहीं बनाया जा सकता, जब तक उसकी व्यापक व्याख्या नहीं हो.’

न्यायालय ने कहा कि यह पहली बार है, जब अटॉर्नी जनरल ने आपराधिक पक्ष पर कोई याचिका दाखिल की है.

मामले में न्यायमित्र के रूप में अपराधी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा पेश हुए, जबकि उनकी बहन वरिष्ठ अधिवक्ता गीता लूथरा राष्ट्रीय महिला आयोग की ओर से पेश हुईं.

शीर्ष अदालत ने कहा कि इस बार एक भाई और एक बहन भी एक दूसरे के खिलाफ खड़े हैं.

इससे पहले अक्टूबर महीने में इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा था कि पॉक्सो में ‘यौन उत्पीड़न’ की परिभाषा को पीड़ित के नज़रिये से भी देखा जाना चाहिए.

जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पीठ ने ‘यौन अपराध करने के इरादे’ पर जोर देते हुए कहा था कि अगर प्रावधान में ‘शारीरिक संपर्क’ शब्द की व्याख्या इस तरह से की जाती है, जहां अपराध तय करने के लिए त्वचा से त्वचा का संपर्क आवश्यक हो, तो इसके नतीजे बेहद खतरनाक होंगे.

पीठ का कहना था कि यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत बच्चों के खिलाफ यौन हमले के अपराध को परिभाषित करने वाले प्रावधान को पीड़ित के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए और यदि कोई सेक्सुअल इरादा मौजूद है तो अपराध को ‘त्वचा से त्वचा’ का संपर्क हुए बिना भी अपराध माना जाना चाहिए.

इससे पहले, अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ याचिका दायर करते हुए शीर्ष अदालत से कहा था कि यह विवादास्पद फैसला एक ‘खतरनाक और अपमानजनक मिसाल’ स्थापित करेगा और इसे तत्काल पलटने की जरूरत है.

उन्होंने कहा था कि हाईकोर्ट के रुख के हिसाब से कोई भी सर्जिकल दस्ताने पहनकर यौन उत्पीड़न जैसे अपराध से बच सकता है.

इसके बाद अटॉर्नी जनरल और राष्ट्रीय महिला आयोग की अलग-अलग याचिकाओं की सुनवाई कर रहे न्यायालय ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश पर 27 जनवरी को रोक लगा दी थी.

उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में पॉक्सो कानून के तहत एक व्यक्ति को बरी करते हुए कहा था कि ‘त्वचा से त्वचा के संपर्क’ के बिना ‘नाबालिग के वक्ष (छाती) को पकड़ने को यौन हमला नहीं कहा जा सकता है.’

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ की न्यायाधीश पुष्पा गनेडीवाला ने दो फैसले सुनाए थे. फैसले में कहा गया था कि त्वचा से त्वचा के संपर्क के बिना नाबालिग के वक्ष को छूना पॉक्सो अधिनियम के तहत यौन अपराध नहीं कहा जा सकता है.

उन्होंने कहा था कि व्यक्ति ने कपड़े हटाए बिना बच्ची को पकड़ा, इसलिए इसे यौन उत्पीड़न नहीं कहा जा सकता है, लेकिन यह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 354 के तहत एक महिला का शील (Modesty) भंग करने का अपराध है.

उच्च न्यायालय ने एक सत्र अदालत के आदेश में संशोधन किया था, जिसने 12 साल की एक बच्ची का यौन उत्पीड़न करने के अपराध में 39 वर्षीय एक व्यक्ति सतीश बंधु रगड़े को तीन साल की कैद की सजा सुनाई थी.

अभियोजन के मुताबिक बच्ची के साथ यह घटना नागपुर में दिसंबर 2016 को हुई थी, जब आरोपी सतीश उसे कुछ खिलाने के बहाने अपने घर ले गया था.

सत्र अदालत ने पॉक्सो कानून और आईपीसी की धारा 354 के तहत उसे तीन वर्ष कैद की सजा सुनाई थी. दोनों सजाएं साथ-साथ चलनी थीं. लेकिन उच्च न्यायालय ने उसे पॉक्सो कानून के तहत अपराध से बरी कर दिया और आईपीसी की धारा 354 के तहत उसकी सजा बरकरार रखी थी.

जज ने कहा, ‘यहां कोई सीधा शारीरिक संपर्क यानी किसी सेक्सुअल इरादे से बिना पेनेट्रेशन का कोई स्किन टू स्किन कॉन्टैक्ट नहीं हुआ है.’

न्यायाधीश ने कहा, ‘इस बहस के आलोक में अदालत आवेदक को पॉक्सो एक्ट की धारा 8 से बरी करती है, लेकिन आईपीसी की धारा 354 के तहत उन्हें दोषी मानती है और उन्हें जेल भेजती है.’

धारा 354 के तहत अधिकतम पांच साल और न्यूनतम एक साल की सजा का प्रावधान है. वहीं पॉक्सो कानून के तहत यौन हमले की न्यूनतम सजा तीन वर्ष कारावास है.

अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि यौन हमले की परिभाषा में ‘शारीरिक संपर्क’ ‘प्रत्यक्ष होना चाहिए’ या सीधा शारीरिक संपर्क होना चाहिए. इस निर्णय की चौतरफा आलोचना हुई थी, जिसमें सिविल सोसायटी, बाल अधिकार कार्यकर्ताओं से लेकर सरकार तक ने इस आदेश को तत्काल रद्द करने की मांग की थी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)