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एल्गार परिषद: कोर्ट ने कहा- वरवरा राव को दो दिसंबर तक समर्पण करने की ज़रूरत नहीं

एल्गार परिषद मामले में आरोपी 83 वर्षीय कवि वरवरा राव को फरवरी में मेडिकल आधार पर मिली अंतरिम ज़मानत के बाद पांच सितंबर को आत्मसमर्पण कर न्यायिक हिरासत में लौटना था, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा इस अवधि को बढ़ाया गया. राव के वकील ने कोर्ट को बताया कि इस दौरान राव बीमार थे और उन्हें मुंबई के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

तेलुगू कवि वरवरा राव. (फोटो: पीटीआई)

मुंबई: बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एल्गार परिषद मामले में आरोपी कवि वरवर राव को महाराष्ट्र में तलोजा जेल अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करने के लिए दी गई अवधि दो दिसंबर तक के लिए बढ़ा दी. राव अभी स्वास्थ्य आधार पर जमानत पर हैं.

उच्च न्यायालय ने इसी साल 22 फरवरी को राव (83) को छह महीने के लिए अंतरिम जमानत दी थी और उन्हें पांच सितंबर को आत्मसमर्पण करना था.

कवि व कार्यकर्ता राव ने अपने वकीलों- आर. सत्यनारायणन तथा वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर के जरिए एक याचिका दायर कर मेडिकल जमानत की अवधि बढ़ाने का अनुरोध किया था.

उन्होंने जमानत के दौरान अपने गृहनगर हैदराबाद में रहने की अनुमति देने का भी अनुरोध किया था.

मालूम हो इससे पहले सितंबर महीने में भी बॉम्बे हाईकोर्ट ने राव की अंतरिम जमानत विस्तार की याचिका पर सुनवाई स्थगित करते कहा कि राव को 25 सितंबर तक तलोजा जेल अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण की जरूरत नहीं है.

इसके बाद इस अवधि को 28 अक्टूबर तक बढ़ा दिया था. अक्टूबर के आखिर में कहा था कि 18 नवंबर तक तलोजा जेल के अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करने की जरूरत नहीं है.

जस्टिस नितिन जामदार और जस्टिस एसवी कोतवाल की पीठ को गुरुवार को ग्रोवर ने बताया कि जमानत पर बाहर रहने के दौरान राव की तबीयत बिगड़ गई थी और उन्हें छह नवंबर से 16 नवंबर तक मुंबई के निजी संचालित नानावती अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

ग्रोवर ने पीठ से राव की जमानत की अवधि चार महीने के लिए बढ़ाने का अनुरोध किया.

राष्ट्रीय अन्वेषण अधिकरण (एनआईए) के वकील संदेश पाटिल ने कहा कि वर्तमान याचिका में राव को अपना अनुरोध मेडिकल जमानत बढ़ाने तक ही सीमित रखना चाहिए.

उन्होंने कहा कि आरोपी को अन्य राहत के लिए अलग से याचिका दायर करने का निर्देश दिया जाना चाहिए. अदालत ने राव की याचिका पर सुनवाई 29 नवंबर तक के लिए स्थगित कर दी.

इसके साथ ही पीठ ने नानावती अस्पताल को मामले में सुनवाई की अगली तारीख तक राव की ताजा मेडिकल रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया और कहा कि उन्हें दो दिसंबर तक आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं है.

गौरतलब है कि उच्च न्यायालय द्वारा अंतरिम जमानत पर लगाई गई कड़ी शर्तों के तहत राव अपनी पत्नी के साथ मुंबई में किराए के मकान में रह रहे हैं.

हालांकि, मामले में जांच कर रहे एनआईए ने चिकित्सा जमानत बढ़ाने और हैदराबाद जाने का आग्रह करने वाली राव की याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि आरोपी की मेडिकल रिपोर्ट से यह संकेत नहीं मिलता है कि वह किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है.

एनआईए ने उच्च न्यायालय में दायर अपने हलफनामे में कहा था कि राव की मेडिकल रिपोर्ट में किसी भी बड़ी बीमारी की बात सामने नहीं आई है जिससे कि आरोपी को हैदराबाद में इलाज करने की आवश्यकता हो और न ही यह जमानत के विस्तार के लिए कोई आधार है.

एनआईए का यह भी कहना था कि तलोजा जेल में पर्याप्त स्वास्थ्य देखरेख की सुविधाएं हैं और राव को यहां सर्वोत्तम मेडिकल सुविधाएं मुहैया कराई जा सकती हैं.

बता दें कि एनआईए के इन दावों के विपरीत द वायर  ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि राव के परिवार ने बार-बार याचिका दायर कर यह आरोप लगाया था कि वरवरा राव को जेल में बुनियादी मानवीय इलाज नहीं मिल रहा है. उनके परिवार ने पिछले साल अक्टूबर में बताया था कि जेल में रहते हुए राव का वजन लगभग 18 किलोग्राम तक कम हो गया है और वे बिस्तर से उठ नहीं पाते.

राव ने मेडिकल जमानत में विस्तार और जमानत शर्तों में बदलाव की मांग वाली याचिका में कहा था कि नानावती अस्पताल के डॉक्टरों के मुताबिक वे संभावित न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से पीड़ित हो सकते हैं, जिसे क्लस्टर हेडएक कहते हैं. राव की ओर से यह भी कहा गया है कि वे यूरिनरी ट्रैक्ट संक्रमण, हाइपोनैट्रेमिया, पार्किंसंस बीमारी का संदेह, मस्तिष्क के प्रमुख छह लोब में लैकुनर इन्फर्क्ट और आंख संबंधी समस्याओं से ग्रसित हो सकते हैं.

राव ने कहा था कि अगर वह तलोजा जेल प्रशासन में लौटते हैं तो वहां उनकी मेडिकल समस्याओं का निदान नहीं हो सकता, इसलिए उनका स्वास्थ्य और खराब हो सकती है और उनकी मृत्यु भी हो सकती है. राव ने इन आधारों पर अपनी जमानत अवधि में विस्तार की मांग की थी.

बता दें कि ज्ञात हो कि एल्गार परिषद मामला 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में आयोजित एक सम्मेलन में दिए गए भड़काऊ भाषणों से संबंधित है, जिसके बारे में पुणे पुलिस का दावा था कि इन भाषणों के कारण अगले दिन पुणे के बाहरी इलाके में स्थित कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा हुई.

पुणे पुलिस ने दावा किया था कि सम्मेलन को माओवादियों का समर्थन प्राप्त था. मामले में एक दर्जन से अधिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों को आरोपी बनाया गया है. इसकी जांच बाद में एनआईए को सौंप दी गई थी.

एनआईए ने भी आरोप लगाया है कि एल्गार परिषद का आयोजन राज्य भर में दलित और अन्य वर्गों की सांप्रदायिक भावना को भड़काने और उन्हें जाति के नाम पर उकसाकर भीमा-कोरेगांव सहित पुणे जिले के विभिन्न स्थानों और महाराष्ट्र राज्य में हिंसा, अस्थिरता और अराजकता पैदा करने के लिए आयोजित किया गया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)