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स्वरूपानंद सरस्वती और वासुदेवानंद सरस्वती को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नहीं माना शंकराचार्य

उच्च न्यायालय ने ज्योतिषपीठ बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य का चुनाव तीन महीने के भीतर करने का निर्देश दिया.

Shankaracharya Saraswati and Vasudevanand Saraswati

वासुदेवानंद सरस्वती (बाएं) और स्वरूपानंद सरस्वती (दाएं). (फोटो साभार: यूट्यूब/फेसबुक)

इलाहाबाद: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को व्यवस्था दी कि ज्योतिषपीठ बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य का पद रिक्त माना जाए. अदालत ने अखिल भारत काशी विद्वत परिषद को पंडितों, विद्वानों और तीन अन्य पीठों के शंकराचार्यों की मदद से तीन महीने के भीतर ज्योतिषपीठ बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य का चयन करने निर्देश दिया.

न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति केजे ठाकर की पीठ ने अगला चयन होने तक शंकराचार्य कार्यालय के संबंध में यथास्थिति बरक़रार रखने का भी निर्देश दिया है. साथ ही पीठ ने निचली अदालत के फैसले के उस भाग को बरक़रार रखा है जिसमें स्वामी वासुदेवानंद को शंकराचार्य के चावर, छत्र और सिंहासन का इस्तेमाल करने से रोक दिया गया था.

अदालत ने कहा कि पट्टाभिषेक के समय स्वामी वासुदेवानंद दंडी संन्यासी नहीं थे, इसलिए उन्हें शंकराचार्य के पद के लिए अयोग्य क़रार दिया गया. अदालत ने यह भी कहा कि पट्टाभिषेक के समय शंकराचार्य का पद रिक्त नहीं था, इसलिए स्वामी स्वरूपानंद का भी पट्टाभिषेक गलत और अवैध था.

अदालत ने यह मानते हुए कि आदि शंकराचार्य द्वारा केवल चार पीठों की स्थापना की गई थी, वर्ष 1941 में अपनाई गई प्रक्रिया के मुताबिक ही शंकराचार्य का चयन करने का निर्देश दिया.

उल्लेखनीय है कि स्वामी वासुदेवानंद ने निचली अदालत के पांच मई के निर्णय के ख़िलाफ़ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी. निचली अदालत ने अपने फैसले में ज्योतिषपीठ बद्रिकाश्रम पीठ के शंकराचार्य पद पर उनका दावा अवैध क़रार दिया था.

अदालत ने यह आदेश द्वारका के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती द्वारा 1989 में दायर एक याचिका पर दिया था.

वर्ष 1973 से बद्रीनाथ धाम का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने आरोप लगाया था कि स्वामी वासुदेवानंद फ़र्ज़ी दस्तावेज़ों के आधार पर अपना दावा पेश करते रहे हैं और वह एक दंडी संन्यासी होने के पात्र नहीं हैं क्योंकि वह नौकरी में रहे हैं और 1989 से वेतन लेते रहे हैं.