नॉर्थ ईस्ट

नॉर्थ ईस्ट डायरीः त्रिपुरा निकाय चुनाव में हिंसा के बाद विपक्ष का भाजपा पर धांधली का आरोप

इस हफ्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में त्रिपुरा, असम, नगालैंड, मेघालय, मिज़ोरम और अरुणाचल प्रदेश के प्रमुख समाचार.

(फोटोः पीटीआई)

अगरतला/गुवाहाटी/ईटानगर/शिलॉन्ग/कोहिमा: त्रिपुरा के 14 नगर निकाय चुनाव के लिए 25 नवंबर को 81 फीसदी से अधिक मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था. हालांकि विपक्षी दलों- माकपा और तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाते हुए इसे रद्द करने की मांग की है.

अधिकारियों ने कहा कि 4.93 लाख से अधिक मतदाताओं में से लगभग 81.54 फीसदी लोगों ने मतदान किया है. त्रिपुरा की सभी निकाय सीटों पर भाजपा ने उम्मीदवार उतारे थे और पार्टी ने अगरतला नगर निगम में 334 सीटों में से 112 पर और 19 नगर निकायों में पहले ही निर्विरोध जीत दर्ज कर ली है.

मतदान के दौरान विपक्षी दलों ने धांधली का आरोप लगाया लेकिन अधिकारियों ने बताया कि मतदान से संबंधित क्षेत्रों में झड़प या वोटिंग मशीन की समस्या से संबंधित कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई.

दोनों विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि भाजपा के गुंडों ने लोगों पर हमला किया और उन्हें मतदान करने से रोका.

तृणमूल नेता सुबल भौमिक ने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ यहां धरना प्रदर्शन किया और राज्य निर्वाचन आयोग पर सत्तारूढ़ भाजपा का पक्ष लेने का आरोप लगाया.

उन्होंने कहा, ‘पूरे चुनाव को रद्द कर देना चाहिए क्योंकि मतदाताओं को मतदान करने से रोकने के लिए बूथ जाम करना और अन्य गलत तरीके अपनाए गए.’

उन्होंने संवाददाताओं से कहा, ‘नतीजे आने पर जनता का मत सामने नहीं आएगा. मतदान की प्रक्रिया में गलत तरीकों का इस्तेमाल किया गया है. पुलिस और निर्वाचन आयोग के अधिकारियों ने सत्तारूढ़ दल की तरफदारी की है.’

तृणमूल कांग्रेस की संचालन समिति के राज्य समन्वयक भौमिक ने कहा, ‘तृणमूल के कई उम्मीदवारों के आवासों पर बुधवार हमला किया गया और उनके घर जलाने का प्रयास किया गया. पार्टी के कम से कम पांच कार्यकर्ताओं पर हमला हुआ और कई समर्थकों को मतदान करने से रोका गया. पुलिस केवल मूकदर्शक बन कर खड़ी रही.’

माकपा की ओर से भी कहा गया कि भाजपा समर्थित गुंडों ने चुनाव में धांधली की. माकपा के प्रदेश सचिव जितेंद्र चौधरी ने आरोप लगाया कि मतदान की प्रक्रिया तमाशा बनकर रह गई.

चौधरी ने संवाददाताओं से कहा, ‘मैंने नगर निकाय के चुनावों में ऐसी अशांति पहले नहीं देखी थी. एसईसी से बार-बार शिकायत करने के बावजूद मुक्त और निष्पक्ष तरीके से चुनाव नहीं कराये गए.’

हालांकि, सत्तारूढ़ भाजपा ने इन आरोपों का खंडन किया है. भाजपा प्रवक्ता नबेंदु भट्टाचार्य ने कहा, ‘तृणमूल और माकपा निराधार आरोप लगा रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि चुनाव में उनकी पराजय होगी. चुनाव अच्छे माहौल में संपन्न हुए हैं.’

तृणमूल कांग्रेस ने अदालत के आदेशों की अवहेलना का आरोप लगा सुप्रीम कोर्ट का रुख किया

तृणमूल कांग्रेस ने त्रिपुरा में नगर निकाय चुनाव के दौरान कथित तौर पर बड़े पैमाने पर हुई हिंसा की अदालत की निगरानी वाली समिति से जांच कराने का अनुरोध करते हुए शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, त्रिपुरा चुनाव में हिंसा को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि नगर निकाय चुनाव के दौरान राज्य में पूरी तबाही मची हुई थी.

उन्होंने कहा, ‘सीएपीएफ की कोई बटालियन वहां मौजूद नहीं थी. मीडिया को कहीं भी जाने की छूट थी. वहां तबाही मची हुई थी.’

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं किया गया है और इसे साबित करने के लिए उनके पास इलेक्ट्रॉनिक सबूत हैं.

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ को वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने बताया कि चुनाव प्रक्रिया में मीडिया को निर्बाध पहुंच प्रदान करने के अदालत के गुरुवार के आदेश के बावजूद इस संबंध में कुछ भी नहीं किया गया.

सिब्बल ने तृणमूल द्वारा दायर दो आवेदनों को तत्काल सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया था. उन्होंने कहा, ‘वहां बिल्कुल अशांत माहौल था. उम्मीदवारों को भी मतदान नहीं करने दिया गया. हिंसक घटनाएं हुईं. यहां तक ​​कि मीडिया में आई खबरों में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन हुआ है.’

पीठ ने कहा कि अदालत ने इस मुद्दे से निपटने के लिए गुरुवार को एक विशिष्ट और विस्तृत आदेश पारित किया था.

सिब्बल ने कहा, ‘मुझे पता है लेकिन केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) की दो बटालियन को मुहैया नहीं कराया गया. चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को दो कांस्टेबल भी उपलब्ध नहीं कराए गए. हमारे पास इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सबूत हैं. कृपया इन अर्जियों को अविलंब सूचीबद्ध करें.’

पीठ ने कहा कि शुक्रवार को अलग-अलग न्यायाधीशों की पीठ थी. एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड रजत सहगल ने कहा कि तृणमूल ने दो आवेदन दायर कर मतगणना स्थगित करने और हिंसक घटनाओं की अदालत की निगरानी वाली समिति से जांच कराने का अनुरोध किया है.

उन्होंने कहा कि एक अन्य आवेदन में पार्टी ने इस मामले में राज्य चुनाव आयुक्त को जिम्मेदार ठहराने का अनुरोध किया है.

सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के आरोपों के बाद गुरुवार को केंद्रीय गृह मंत्रालय को त्रिपुरा नगर निकाय चुनावों के दौरान मतदान केंद्रों की सुरक्षा के लिए सीएपीएफ की दो अतिरिक्त कंपनियां मुहैया कराने का निर्देश दिया था.

दोनों पार्टियों ने आरोप लगाया है कि उनके समर्थकों को मतदान करने की अनुमति नहीं दी गई और कानून व्यवस्था का गंभीर उल्लंघन हुआ है.

असम: सिविल सेवा परीक्षा में केवल राज्य के लोग ही दे सकेंगे परीक्षाः हिमंता बिस्वा शर्मा

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा. (फोटो: पीटीआई)

असम की भाजपा सरकार ने 24 नवंबर को फैसला किया कि केवल राज्य के स्थानीय लोगों को ही असम लोक सेवा आयोग (एपीएससी) और असम सिविल सेवा (एसीएस) की परीक्षाओं में बैठने की अनुमति दी जाएगी.

आईएएनएस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह फैसला मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा की अध्यक्षता में असम कैबिनेट की बैठक में लिया गया.

कैबिनेट बैठक के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए शर्मा ने कहा, ‘पहले एपीएससी और एसीएस परीक्षा में शामिल होने के लिए असमिया भाषा जानना अनिवार्य था, लेकिन ऐसा लगता है कि असम के छात्रों के लिए कुछ भ्रम पैदा हो रहा है, जिन्होंने अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई की है इसलिए राज्य मंत्रिमंडल ने एपीएससी और एसीएस के लिए आयोजित परीक्षा के लिए भाषा के पेपर को वापस लेने का निर्णय लिया है.’

मुख्यमंत्री ने कहा, ‘हालांकि एपीएससी और एसीएस परीक्षाओं से भाषा के पेपर को हटा दिया गया है, लेकिन उम्मीदवारों के पास असमिया या बोडो भाषा सहित राज्य की किसी अन्य मान्यता प्राप्त भाषा को बोलने की क्षमता होनी चाहिए.’

उन्होंने कहा कि युवाओं को उच्च शिक्षा प्राप्त करने और रोजगार के अवसर तलाशने के लिए प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए एक युवा आयोग का गठन किया जाएगा.

सिविल सेवा परीक्षा से भाषा का पेपर हटाने के विरोध में रायजोर दल और असम जातीय परिषद

असम में विपक्षी दलों रायजोर दल (आरडी) और असम जातीय परिषद (एजीपी) ने गुरुवार को कहा कि राज्य की सिविल सेवा परीक्षाओं में से अनिवार्य भाषा के पेपर को हटाने का सरकार का फैसला प्रशासन में आरएसएस मानसिकता के बाहरी लोगों को प्रशासन में घुसाने के लिए किया गया है.

आउटलुक की रिपोर्ट के मुताबिक, विपक्षी दलों ने सरकार के इस कदम को खतरनाक बताया. दोनों दलों ने अलग-अलग प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि वे असम कैबिनेट के फैसले को स्वीकार नहीं करेंगे और उन्होंने इसे तत्काल वापस लेने की मांग की.

आरडी के अध्यक्ष अखिल गोगोई ने कहा, ‘कैबिनेट का फैसला असम के लिए दुखद है. यह खतरनाक कदम है. इससे आरएसएस के हिंदी बोलने वाले लोग और उत्तर भारतीय असम सिविल सेवा परीक्षा के लिए योग्य हो जाएंगे. भाजपा सरकार का उद्देश्य इस तरह के लोगों को राज्य प्रशासन में शामिल करना है.’

उन्होंने दावा किया कि असम में पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने माजुली के एक स्कूल में शिक्षक के रूप में बिहार से एक शख्स को नियुक्त किया था लेकिन वह असमिया भाषा बिल्कुल नहीं समझता था.

गोगोई ने कहा, ‘हम एपीएससी परीक्षाओं के लिए राज्य से बाहर के लोगों को स्वीकार नहीं करेंगे. हम कैबिनेट के इस फैसले का पुरजोर विरोध करते हैं.

इसी तरह के विचार व्यक्त करते हुए एपीजे के अध्यक्ष लुरिनज्योति गोगोई ने कहा कि सरकार ने असम लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के जरिये राज्य के बाहर से हिंदी और बांग्ला भाषी बोलने वाले लोगों का स्वागत करने का फैसला किया.’

उन्होंने कहा, ‘यह सरकार द्वारा लिया गया विनाशकारी कदम है. इस सरकार ने एक बार कहा था कि असमिया भाषा को अनिवार्य किया जाएगा.’

नगालैंड: राज्य के कई शिक्षक अप्रशिक्षितः शिक्षा सलाहकार

नगालैंड के सरकारी क्षेत्र में लगभग 10,000 सरप्लस शिक्षक हैं, हालांकि राज्य के स्कूली शिक्षा सलाहकार केटी सुखालू ने कहा कि इनमें से बड़ी संख्या में शिक्षक प्रशिक्षत नहीं हैं.

ईस्टमोजो की रिपोर्ट के मुताबिक, सुखालू ने विधायक यिताचु द्वारा उठाए गए एक पूरक सवाल के जवाब में कहा, ‘हमने भारत सरकार के समक्ष एक प्रस्ताव भेजा है, जिसमें कहा गया है कि क्या वे राज्य की सहायता कर सकते हैं और उन शिक्षकों को क्षतिपूर्ति दे सकते हैं जिन्हें प्रशिक्षित नहीं किया जा सकता या जो मौजूदा विषयों और नए पाठ्यक्रमों को नहीं पढ़ा सकते.’

सुखालू ने बताया कि यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफोर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यूडीआईएसई) के मुताबिक, नगालैंड में 1,953 स्कूल हैं जिनमें सभी श्रेणियों में 19,600 शिक्षक हैं और शिक्षकों की 850 रिक्तियां हैं.

उन्होंने कहा कि अगर शिक्षक-छात्र अनुपात का विश्लेषण किया जाए तो शिक्षकों की अधिकता है. हालांकि, ऐसे भी क्षेत्र है जहां शिक्षकों (गणित और विज्ञान के शिक्षकों की कमी सहित) की जरूरत है.

अब तक अकेले गणित और विज्ञान के लिए ही 188 शिक्षकों के पद खाली हैं जिनमें से विज्ञान के 112 शिक्षक और गणित के 76 पद हैं.

उन्होंने कहा कि अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) के नियमों के मुताबिक शिक्षकों के लिए कुछ मानदंडों को पूरा करने की जरूरत है.

यह पूछे जाने पर कि क्या नगा युवाओं को बिना किसी मानदंड (बीएड डिग्री) के भर्ती करने की छूट है तो इस पर उन्होंने कहा कि यह बहुत मुश्किल है लेकिन सरकार कुछ छूट के लिए केंद्र के हस्तक्षेप की मांग कर सकती है.

मेघालय: 12 कांग्रेस विधायकों के साथ टीएमसी में शामिल हुए मुकुल संगमा विधायक दल के नेता चुने गए

मेघालय के पूर्व मुख्यमंत्री मुकुल संगमा. (फोटो: पीटीआई)

मेघालय के पूर्व मुख्यमंत्री मुकुल संगमा को शुक्रवार को राज्य में नवगठित अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (एआईटीसी) के विधायक दल का नेता चुना गया।

मेघालय में तृणमूल कांग्रेस विधायक दल का एक प्रतिनिधिमंडल पार्टी की अध्यक्ष ममता बनर्जी के साथ ‘इनर लाइन परमिट’ (आईएलपी) को लागू करने सहित राज्य से संबंधित ‘‘ज्वलंत मुद्दों’’ पर चर्चा करने के लिए अगले सप्ताह कोलकाता जाएगा।

संगमा की प्रत्याशित पदोन्नति को यहां कांग्रेस के पूर्व नेता के आवास पर आयोजित एआईटीसी के विधायक दल की पहली बैठक के दौरान औपचारिक रूप दिया गया था। गुरुवार को हुई बैठक में कांग्रेस से तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने वाले सभी 12 विधायकों ने भाग लिया था।

बैठक में उमरोई से विधायक जॉर्ज बी. लिंगदोह को विपक्षी मुख्य सचेतक और मौसिनराम को सचिव चुना गया।

तृणमूल कांग्रेस के एक अधिकारी ने बताया कि बैठक में मुकुल ने नए राजनीतिक दल के नेता के रूप में उन पर विश्वास जताने के लिए सभी विधायकों को धन्यवाद दिया।

इससे पहले टीएमसी ने 24 नवंबर को कहा था कि विधानसभा में विपक्ष के नेता संगमा कथित तौर पर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से नाखुश चल रहे थे.

टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता ने दावा किया कि नए विधायकों के साथ आने से तृणमूल कांग्रेस राज्य में प्रमुख विपक्षी दल बन गई है.

सूत्रों ने बताया कि 2023 में मेघालय में होने वाले चुनावों को देखते हुए राज्य में टीएमसी के विकल्पों का पता लगाने के लिए चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की टीम के सदस्य शिलांग में हैं.

मेघालय प्रदेश तृणमूल कांग्रेस की औपचारिक शुरुआत 2012 में राज्य की 60 में से 35 सीटों पर चुनाव लड़ने के इरादे से की गई थी.
2018 के चुनावों में कांग्रेस 60 सदस्यीय राज्य विधानसभा में 21 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी.

कॉनराड संगमा के नेतृत्व वाली नेशनल पीपुल्स पार्टी एनपीपी को 19 और भाजपा को दो सीटें मिली थीं. हालांकि एनपीपी ने भाजपा समर्थित नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस के हिस्से के रूप में सत्तारूढ़ गठबंधन को एक साथ जोड़ने में कामयाबी हासिल की थी.

मेघालय में 2023 में विधानसभा चुनाव होने हैं.

बहरहाल तृणमूल कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर अपना विस्तार करने के लिए आक्रामक प्रयास कर रही है. पार्टी प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बीते 23 नवंबर को कांग्रेस नेता कीर्ति आजाद, जदयू से निष्कासित नेता पवन वर्मा और हरियाणा कांग्रेस के पूर्व नेता अशोक तंवर को अपनी पार्टी में शामिल किया था.

कांग्रेस की पृष्ठभूमि वाले कई अन्य नेता पिछले कुछ महीनों में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए हैं. इनमें सुष्मिता देव, लुईजिन्हो फालेरियो और अभिजीत मुखर्जी प्रमुख हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, 2014 के बाद संगमा कांग्रेस छोड़ने वाले सातवें पूर्व मुख्यमंत्री हैं. हाल ही में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने पार्टी छोड़ दी थी. इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा (उत्तराखंड), दिवंगत अजीत जोगी (छत्तीसगढ़), एसएम कृष्णा (कर्नाटक), नारायण राणे (महाराष्ट्र) और गिरिधर गमांग (ओडिशा) ने पार्टी छोड़ दी थी.

असम-मिज़ोरम सीमा विवाद सुलझाने के लिए समितियां गठित की जाएंगी

असम और मिजोरम ने शुक्रवार को अपनी अंतरराज्यीय सीमा पर शांति बनाए रखने का संकल्प लिया और जुलाई में असम पुलिस के पांच जवानों तथा एक आम नागरिक की जान लेने वाले सीमा विवाद को सुलझाने के लिए समितियां गठित करने का फैसला किया.

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की मौजूदगी में असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा और मिजोरम के उनके समकक्ष जोरमथांगा की बैठक में यह निर्णय लिया.

मुख्यमंत्रियों के बीच दो दिनों में यह लगातार दूसरी बैठक थी. वे गुरुवार रात को रात्रिभोज पर भी मिले थे. इसके बाद शर्मा ने सिलसिलेवार ट्वीट कर कहा कि समय-समय पर मुख्यमंत्री स्तर की बातचीत होगी.

उन्होंने कहा, ‘यह बताते हुए खुशी हो रही है कि मैंने मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरमथांगा से माननीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की. हमने अपनी सीमाओं पर शांति बनाए रखने के अपने संकल्प की पुष्टि की. यह निर्णय लिया गया है कि दोनों राज्य चर्चा के माध्यम से सीमा विवाद को हल करने के लिए समितियों का गठन करेंगे. इसके लिए समय-समय पर मुख्यमंत्रियों के स्तर की वार्ता भी होगी. हम केंद्रीय गृह मंत्री के मार्गदर्शन और समर्थन के लिए उनके आभारी हैं.’

असम और मिजोरम के बीच 164 किलोमीटर लंबी अंतरराज्यीय सीमा है. जोरमथांगा ने गुरुवार को कहा था कि दोनों राज्य सरकारें सीमा पर बाड़बंदी के विस्तार की ‘कोशिश’ करेंगी.

अधिकारियों ने कहा कि राष्ट्रीय राजधानी में दोनों मुख्यमंत्रियों के बीच बैठकें केंद्रीय गृह मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद हुई हुई हैं जो सीमा विवाद को सुलझाने की कोशिश कर रहा है.

इस संबंध में एक अधिकारी ने कहा कि केंद्र सरकार असम और मिजोरम के बीच सीमा विवाद का शांतिपूर्ण समाधान चाहती है तथा माना जाता है कि केंद्रीय गृह मंत्री दोनों मुख्यमंत्रियों के साथ नियमित रूप से संपर्क में हैं.

बता दें कि 26 जुलाई की हिंसा के बाद असम और मिजोरम पुलिस दोनों ने एक-दूसरे के राजनीतिक नेताओं और अधिकारियों के खिलाफ अलग-अलग मामले दर्ज किए थे. हालांकि इनमें से कुछ मामलों को एक समझौते के बाद वापस ले लिया गया था.

दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों ने 28 जुलाई को केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला की अध्यक्षता में एक बैठक में भाग लिया था जिसमें संघर्ष स्थल पर एक तटस्थ केंद्रीय बल के रूप में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) को तैनात करने का निर्णय लिया गया था.

मिजोरम पुलिस ने 26 जुलाई को असम के अधिकारियों की एक टीम पर संघर्ष के बाद गोलीबारी कर दी थी जिसमें असम के पांच पुलिसकर्मियों और एक आम नागरिक की मौत हो गई थी तथा एक पुलिस अधीक्षक सहित 50 से अधिक लोग घायल हो गए थे.

अरुणाचल प्रदेश: असम से लगी सीमा पर गोलीबारी के बाद जांच के आदेश

अरुणाचल प्रदेश सरकार ने 23 नवंबर को अंतरराज्यीय सीमा पर असम के वन अधिकारियों और पेड़ों की अवैध कटाई करने वालों के बीच हुई गोलीबारी की जांच के आदेश दिए हैं.

असम के अधिकारियों के अनुसार, राज्य के लखीमपुर जिले में पेड़ों की अवैध कटाई करने वाले अपराधियों और अधिकारियों के बीच गोलीबारी हुई. पेड़ों की अवैध कटाई करने वाले लोग अरुणाचल प्रदेश के थे.

उल्लेखनीय है कि असम का लखीमपुर जिला अरुणाचल प्रदेश की सीमा से लगा है.

अधिकारियों ने कहा कि रंगा संरक्षित वन में अंतरराज्यीय सीमा के पास बेलबस्ती में हुई इस घटना में कोई घायल नहीं हुआ है.

पुलिस महानिरीक्षक (कानून व्यवस्था) चुकू आपा ने कहा कि उन्होंने पापुम पारे के पुलिस अधीक्षक (एसपी) को घटना की जांच करने का निर्देश दिया है.

आपा ने कहा, हम आश्वस्त नहीं हैं कि हमारी ओर से किसने गोली चलाई. संभवत: अपराधियों ने दो पड़ोसी राज्यों के बीच गलतफहमी पैदा करने के लिए ऐसा किया.

इस घटना से एक दिन पहले ही सोमवार को लखीमपुर और पापुम पारे जिलों के वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक हुयी थी जिसमें अंतरराज्यीय सीमा मुद्दों पर चर्चा की गई थी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)