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राजद्रोह मामलाः इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शरजील इमाम को ज़मानत दी

जेएनयू छात्र शरजील इमाम को सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों में जामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में कथित भड़काऊ भाषण देने के आरोप में यूएपीए के तहत गिरफ़्तार किया था. इससे पहले अक्टूबर में दिल्ली की अदालत ने इमाम को उनके इसी भाषण के लिए ज़मानत देने से इनकार कर दिया था.

शरजील इमाम. (फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्लीः इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राजद्रोह मामले में शनिवार को छात्र कार्यकर्ता शरजील इमाम को जमानत दे दी.

दरअसल 2019 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान कथित रूप से भड़काऊ भाषण देने के आरोप में उन पर राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया था.

रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला अलीगढ़ में आईपीसी की धारा 124ए (राजद्रोह), 153ए (धर्म, नस्ल के आधार पर दुश्मनी बढ़ाना), 153बी (शांति भंग करने के इरादे से बयान देना) और 505(2) (सौहार्द बिगाड़ने की मंशा से बयान देना) के तहत दर्ज किया गया.

शरजील के खिलाफ दिल्ली, मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश में भी एफआईआर दर्ज की गई थी. उन्हें असम और अरुणाचल प्रदेश में दर्ज मामलों में पहले ही जमानत मिल गई थी.

बता दें कि अक्टूबर में दिल्ली की अदालत ने इमाम को उनके इसी भाषण के लिए जमानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि भड़काऊ भाषण का लहजा और विषयवस्तु का प्रभाव सार्वजनिक शांति और सामाजिक सद्भाव को कम करने वाला है.

दिल्ली के जेएनयू के सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज के पीएचडी छात्र शरजील इमाम को 28 जनवरी 2020 को गिरफ्तार किया गया था.

इस मामले के अलावा इमाम पर फरवरी 2020 में उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों का ‘मास्टरमाइंड’ होने का भी आरोप है और इस मामले में गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत नामजद हैं.

दो नवंबर को एक अदालत ने इस मामले में इमाम की जमानत याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था.

इमाम ने अपने वकील अहमद इब्राहिम के जरिये अदालत में कहा था कि वह शांतिप्रिय नागरिक हैं और उन्होंने विरोध के दौरान कभी हिंसा में हिस्सा नहीं लिया.

उन्होंने तर्क दिया था कि 13 दिसंबर 2019 को उनके किसी भी भाषण का उद्देश्य सरकार के खिलाफ किसी तरह के असंतोष को फैलाना, हिंसा के लिए उकसाना और किसी समुदाय के खिलाफ द्वेष भड़काना नहीं था.

कई अधिकार समूहों ने यह बताया कि फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े दिल्ली पुलिस के मामलों में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाया गया, जो दरअसल कई महीनों से शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे थे जबकि दिल्ली पुलिस ने खुलेआम भड़काऊ और धमकी भरे भाषण दे रहे दक्षिणपंथी नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की.