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असमः हाईकोर्ट ने कछार के परिवार को ‘विदेशी’ घोषित करने का फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द किया

असम के एक विदेशी न्यायाधिकरण ने कछार ज़िले के एक परिवार के पांच सदस्यों को अप्रैल 2018 में दिए एकतरफा आदेश में विदेशी घोषित कर दिया था. गौहाटी हाईकोर्ट ने इसे रद्द करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं को यह सिद्ध करने के लिए अवसर दिया जाना चाहिए कि वे भारतीय हैं न कि विदेशी.

(फोटो: पीटीआई)

आइजॉलः गौहाटी हाईकोर्ट ने कछार जिले के स्थानीय लोगों और उनके परिवार के सदस्यों को ‘विदेशी’ घोषित करने वाले विदेशी न्यायाधिकरण के एकतरफा आदेश को पिछले हफ्ते रद्द कर दिया.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को यह सिद्ध करने के लिए एक अन्य अवसर दिया जाना चाहिए कि वे भारतीय हैं.

2018 में न्यायाधिकरण ने राजेंद्र दास और उनके परिवार के चार सदस्यों को विदेशी घोषित कर दिया था क्योंकि वे 2017 में बार-बार तलब किए जाने के बाद न्यायाधिकरण के समक्ष पेश नहीं हुए थे.

जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह और जस्टिस मालाश्री नंदी की पीठ ने रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं को यह सिद्ध करने के लिए एक अन्य अवसर दिया जाना चाहिए कि वे भारतीय हैं न कि विदेशी.

न्यायाधीशों ने कहा कि अगर याचिकाकर्ता अदालत के समक्ष पेश किए गए दस्तावेजों की प्रामाणिकता को सिद्ध करने में सक्षम हैं तो वे दावा कर सकते हैं कि वे विदेशी नहीं बल्कि भारतीय हैं.

याचिकाकर्ता ने 1965 और 1970 की मतदाता सूची अदालत के समक्ष पेश की है, जिसमें दास के माता-पिता के नाम का उल्लेख है. इसके साथ ही कछार के महादेवपुर ग्राम पंचायत द्वारा जारी किया गया दास और उनकी पत्नी का विवाह प्रमाणपत्र भी पेश किया.

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से 24 दिसंबर या इससे पहले विदेशी न्यायाधिकरण के समक्ष दोबारा पेश होने को कहा है.

दास, उनकी पत्नी रेनूबाला और तीन छोटे बच्चों को विदेशी न्यायाधिकरण ने अप्रैल 2018 में एकतरफा आदेश में विदेशी घोषित कर दिया था.

उसी समय न्यायाधिकरण ने कहा था कि दास कार्रवाई के लिए पेश नहीं हुए थे और न ही उन्होंने लिखित बयान दिया था. दास के वकील ने पहले कहा था कि उनके मुवक्किल खराब तबियत की वजह से सुनवाई के दौरान पेश नहीं हो सके थे.

हाईकोर्ट ने 24 नवंबर के अपने फैसले में कहा था कि एकतरफा आदेश नियमित तरीके में हस्तक्षेप नहीं कर सकता लेकिन यह मामला किसी शख्स के सबसे महत्वपूर्ण अधिकार नागरिकता से जुड़ा हुआ है.

अदालत ने कहा, ‘अगर कोई शख्स विदेशी है तो नागरिकता से संबंधित मामले में यह उस शख्स के भाग्य पर लगभग मुहर लगा देता है. इस कारण से विदेशी न्यायाधिकरण को साक्ष्यों का विश्लेषण करने के बाद ही कोई राय रखनी चाहिए न कि डिफॉल्ट तरीके से जैसा कि दास के मामले में कहा गया.’

गौहाटी हाईकोर्ट के इस फैसले का कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया है. मानवाधिकार वकील अमन वदूद ने कहा कि यह फैसला ठीक उसी तरह का है जिस तरह किसी संवैधानिक अदालत को नागरिक के सबसे महत्वपूर्ण अधिकार की सुरक्षा करना चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘असम लोगों के स्टेटलेस (राज्य विहीन) होने के संकट के मुहाने पर खड़ा है. मुझे खुशी है कि हाईकोर्ट ने इस मामले में याचिकाकर्ताओं के राज्य विहीनता हो जाने के जोखिम पर गौर किया है.’

वदूद ने कहा कि यह आदेश महत्वपूर्ण है क्योंकि असम में कई लोगों को उन तक नोटिस नहीं पहुंचने, जिस वजह से उनके न्यायाधिकरण के समक्ष पेश नहीं होने या खराब स्वास्थ्य या फिर वित्तीय समस्याओं की वजह से एकतरफा आदेश में विदेशी घोषित कर दिया गया है. उन्होंने कहा, ‘न्याय में यह सबसे बड़ी बाधा है.’

बता दें कि 2019 में केंद्रीय गृहराज्य मंत्री जीके रेड्डी ने अदालत को बताया था कि 1985 और 28 फरवरी 2019 के बीच असम में विदेशी न्यायाधिकरण ने एकतरफा कार्रवाई में 63,959 लोगों को विदेशी घोषित किया है.