कैंपस

दिल्ली: साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के अफ़ग़ानी छात्रों ने उठाई स्टाइपेंड जारी करने की मांग

दिल्ली की साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले अफ़ग़ानी छात्र, जो इस समय शहर में हैं, उनका कहना है कि प्रशासन द्वारा उन्हें निशाना बनाया जा रहा है और कैंपस में नहीं रहने दिया जा रहा है, जबकि उनके पास रहने की कोई और जगह नहीं है.

दिल्ली स्थित साउथ एशियन यूनिवर्सिटी. (फोटो साभार: MEA website)

मुंबई: इस साल आठ सितंबर को जब दर्जनों महिलाओं ने तालिबान के कब्जे के खिलाफ काबुल में प्रदर्शन किया, तो इसमें कई युवा पुरुष कार्यकर्ता, छात्र और शोधकर्ताओं ने उनका साथ दिया था. यह विरोध तालिबान के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन था.

साउथ एशियन यूनिवर्सिटी (एसएयू) में पीएचडी छात्र और मूल रूप से काबुल के रहने वाले 32 वर्षीय हबीब फरजाद भी इस विरोध प्रदर्शन में शामिल थे. उन्हें कुछ अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ हिरासत में लिया गया और पीटा गया. इस कार्रवाई में फरजाद का हाथ टूट गया था.

दो महीने बाद जैसे-जैसे फरजाद स्वस्थ हो रहे हैं, उन्हें उम्मीद है कि नई दिल्ली स्थित उनका विश्वविद्यालय उनके स्टाइपेंड (वेतन या मानदेय) जारी करेगा. कुल 25,000 रुपये प्रति माह की मामूली रकम से न केवल उन्हें समय पर इलाज कराने में मदद मिलती, बल्कि उनके परिवार की भी देखभाल हो जाती, जिनकी आय का स्रोत अफगानिस्तान में सरकार के पतन के साथ खत्म हो गया है.

फरजाद तब से एसएयू में याचिका दायर कर फंड जारी करने की मांग कर रहे हैं.

काबुल से द वायर  से बात करते हुए फरजाद ने कहा, ‘विश्वविद्यालय चाहता है कि मैं भारत में रहकर अपने वेतन का दावा करूं. यह मांग ऐसे समय पर रखी गई है जब भारत जाने के लिए कोई फ्लाइट नहीं है और मेरे पास देश छोड़ने का कोई रास्ता नहीं है.’

फरजाद ने अगस्त में भारत लौटने की योजना बनाई थी. उन्होंने वीजा के लिए आवेदन भी किया था. लेकिन तालिबान के कब्जे के कारण काबुल में भारतीय दूतावास बंद हो गया और फरजाद का पासपोर्ट, सैकड़ों अन्य अफगानी नागरिकों की तरह खो गया.

फरजाद ने नए पासपोर्ट के लिए आवेदन किया है, लेकिन तालिबान शासन में इसकी उम्मीद नहीं है.

अफगानिस्तान के कम से कम 40 अन्य परास्नातकऔर पीएचडी छात्र एसएयू में एनरोल हैं, जिन्हें विश्वविद्यालय को हस्तक्षेप करने के लिए समझाने में मुश्किल हुई है. उनमें से प्रत्येक ने कहा है कि विश्वविद्यालय ने उनके कई ईमेल, कॉल और याचिकाओं को नजरअंदाज कर दिया है.

द वायर ने भी एसएयू प्रशासन से संपर्क करना चाहा, लेकिन वहां से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. सबसे पहले, द वायर ने प्रतिक्रिया के लिए छात्र मामलों की डीन दीपा सिन्हा से संपर्क किया. जब उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया तो कार्यवाहक अध्यक्ष रंजन कुमन मोहंती से जनसंपर्क अधिकारी अहीबाम प्रह्लाद के माध्यम से संपर्क किया गया. अपनी प्रतिक्रिया में प्रह्लाद ने कहा कि मोहंती यात्रा कर रहे हैं और 13 दिसंबर को भारत वापस आएंगे.

वैसे तो दिल्ली के अधिकांश कॉलेज और विश्वविद्यालय अब ऑफलाइन कक्षाएं चला रहे हैं, लेकिन एसएयू में कक्षाएं अभी भी ऑनलाइन चल रही हैं. एक फैकल्टी सदस्य ने कहा, ‘यह मुख्य रूप से इसलिए है क्योंकि अन्य दक्षिण एशियाई देशों में कोविड-19 प्रतिबंधों के कारण छात्र भारत लौटने में असमर्थ हैं.’

लेकिन उन छात्रों का क्या जो पहले से ही भारत में हैं? कई लोगों ने विश्वविद्यालय के कर्मचारियों पर उन्हें धमकी देने और परिसर में रहने की अनुमति देने से इनकार करने का आरोप लगाया है.

एक 21 वर्षीय अफगान छात्र ऐमल नसरत, जिसने हाल ही में मास्टर्स कोर्स में एडमिशन मिला है, ने कहा कि उन्हें कैंपस में घुसने से मना कर दिया गया था, जबकि उन्होंने विश्वविद्यालय के कर्मचारियों से कहा था कि उनके पास रहने के लिए कोई जगह नहीं है.

चार-पांच अन्य छात्रों की तरह वह बैंगलोर विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे. उन्होंने कहा, ‘मैंने सिल्वर जुबली स्कॉलरशिप प्राप्त किया और एसएयू एडमिशन हासिल किया. मुझे लगा कि मुझे कैंपस में रहने दिया जाएगा क्योंकि मैं पहले से ही देश में हूं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.’

बैंगलोर को छोड़कर कैंपस में रहने की उम्मीद लिए आए छात्र को अब दिल्ली के एक होटल में रहना पड़ रहा है. इतना ही नहीं, विश्वविद्यालय ने अभी तक उनके स्टाइपेंड की राशि जारी नहीं की है.

नसरत ने कहा, ‘इसका मतलब ये है कि मुझे वार्षिक फीस तो देनी ही है, इसके साथ अपने रहने का भी इंतजाम करना पड़ेगा. मेरे माता-पिता, जो उत्तरी प्रांत के एक गांव में बंद हैं, रिश्तेदारों से उधार ले रहे हैं और मेरे भारत में रहने के लिए पैसे दे रहे हैं.’

विश्वविद्यालय में अफगानिस्तान से बहुत कम महिला छात्र हैं. उनकी परेशानी और भी ज्यादा है. एक महिला छात्रा, जो एक प्रसिद्ध अधिकार कार्यकर्ता भी हैं, को तालिबान के कब्जे के कुछ दिनों बाद निकाल लिया गया था और वह संयुक्त अरब अमीरात में रह रही हैं.

उन्होंने द वायर  को बताया कि उन्हें विश्वविद्यालय से कुछ समर्थन की उम्मीद थी. अफगानी छात्रा ने कहा, ‘मैं और मेरे बच्चे बहुत कम पैसे पर अकेले रह रहे हैं. विश्वविद्यालय ने करीब एक साल से मेरे 25,000 रुपये प्रति माह के वेतन को जारी नहीं किया है.’

एक अन्य छात्रा का कहना है कि उन्हें लगता है कि एसएयू में उनका सारा समय ‘बर्बाद’ था, क्योंकि विश्वविद्यालय में सहानुभूति की कमी है, जबकि छात्रों को इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)