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यूपी: बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी पर मथुरा में तनाव का माहौल, पुलिस बलों की कड़ी तैनाती

कुछ दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी समूहों ने तथाकथित कृष्ण जन्मभूमि पर ‘जलाभिषेक’ करने की धमकी दी थी. इसे लेकर सोशल मीडिया पर ‘मथुरा आएंगे, माखन चढ़ाएंगे’ ट्रेंड कर रहा था.

मथुरा में तैनात पुलिसकर्मी. (फोटो: याकूत अली/द वायर)

मथुरा: उत्तर प्रदेश के मथुरा में बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी पर तनावपूर्ण माहौल है. दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी समूहों ने तथाकथित कृष्ण जन्मभूमि पर ‘जलाभिषेक’ करने की धमकी दी हुई है.

इसे लेकर ट्विटर पर ‘मथुरा आएंगे, माखन चढ़ाएंगे’ ट्रेंड कर रहा था और दक्षिणपंथी समूहों से जुड़े लोग भड़काऊ सामग्री पोस्ट कर रहे थे.

चार दक्षिणपंथी समूहों– अखिल भारत हिंदू महासभा, श्रीकृष्ण जन्मभूमि निर्माण न्यास, नारायणी सेना और श्रीकृष्ण मुक्ति दल ने 16 नवंबर को कृष्ण के कथित ‘वास्तविक जन्मस्थान’ पर मूर्ति स्थापित करने की अनुमति मांगी थी.

उनका दावा है कि ये ‘स्थान’ शहर के एक प्रमुख मंदिर के पास की मस्जिद में स्थित है. बाद में इन समूहों ने अपना ये अभियान वापस ले लिया था.

हालांकि मथुरा में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है. वर्तमान में मंदिर और ईदगाह परिसर के आस-पास के क्षेत्र में 3,000 सुरक्षाकर्मियों को परिसर के नजदीक तैनात देखा जा सकता है और आधार कार्ड देखकर उस क्षेत्र में लोगों को घुसने की इजाजत दे रहे हैं.

द वायर  से बात करते हुए मथुरा के एडिशनल एसपी एमपी सिंह ने कहा, ‘हम हर समस्या से निपटने के लिए तैयार हैं. हालांकि, हमें अपने बलों पर भरोसा है.’

उन्होंने कहा, ‘सोशल मीडिया पर भड़काऊ सामग्री पोस्ट करने और भावनाओं को भड़काने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.’ शहर में धारा 144 लागू कर दी गई है.

एसएसपी ने पुलिस अधिकारियों के साथ गोविंदनगर इलाके में फ्लैग मार्च भी किया, जहां शाही ईदगाह स्थित है.

मथुरा में जिस जमीन पर ईदगाह और श्रीकृष्ण जन्मभूमि अगल-बगल स्थित है, उसे लेकर विवाद है. हिंदुत्ववादी संगठनों और व्यक्तियों द्वारा मथुरा की दीवानी अदालतों में विभिन्न मुकदमे दायर किए गए हैं, जिसमें आरोप लगाया गया है कि ईदगाह का निर्माण मुगल सम्राट औरंगजेब द्वारा कृष्ण के जन्म के स्थान पर एक मंदिर के विध्वंस के बाद किया गया था.

विश्व हिंदू परिषद के एक सदस्य विजय बहादुर ने द वायर  से कहा, ‘हम अपनी मांग पर कायम हैं. हम मानते हैं कि ईदगाह एक ऐसी जमीन पर है जो कानूनी रूप से उनकी नहीं है, यह पिछले शासकों की लूट और अत्याचार पर खड़ी है. हम यह मानते हैं कि भगवान कृष्ण के जन्मस्थान पर किसी भी तरह के अतिक्रमण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.’

जलाभिषेक के आह्वान के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ‘जिन हिंदू समूहों ने यह आह्वान किया है, उनका जमीनी स्तर पर कोई कैडर नहीं है, जबकि उनकी मांग जायज है, उनके पास इसे अंजाम देने के लिए शायद साधन नहीं हैं.’

मथुरा में आस-पास स्थित मंदिर और मस्जिद. (फोटो: द वायर)

तनाव के बीच ईदगाह ट्रस्ट के अध्यक्ष ने शांति की अपील की है. वहीं गोविंद नगर के दुकानदार अपनी दुकानें खोलने को लेकर चिंतन कर रहे हैं.

ज़ेद हसन ने कहा, ‘मथुरा प्रेम और सहिष्णुता की भावना का एक प्रमाण है. यही वह संदेश है जो उसने सदियों से दिया है. दो पूजा स्थल एक-दूसरे के बगल में ऊंचे और सुंदर खड़े हैं, मानो वे गले मिल रहे हों, जिसमें हिंदू आरती की आवाज, अजान की आवाज के साथ मिल जाती है. यही हमारा सामाजिक ताना-बाना है, यही हमारी विरासत है.’

मालूम हो कि छह दिसंबर से पहले उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने ट्वीट किया था कि ‘अयोध्या काशी भव्य मंदिर निर्माण जारी है, मथुरा की तैयारी है’.

इसे लेकर उन पर सांप्रदायिक आग भड़काने का आरोप लग रहे हैं. यहां तक कि महासभा ने भी उनके बयान को केवल चुनावी जुमला करार देते हुए खारिज कर दिया.

राज्य मंत्री रघुराम सिंह ने भी कहा, ‘केशव मौर्य ने जो कहा है, हम उससे बिल्कुल सहमत हैं. यह लंबे समय से हमारे एजेंडा में है और हमें इसमें कोई समस्या नहीं दिखती है.’

ईदगाह ट्रस्ट के कानूनी पहलू के बारे में वकील तनवीर अहमद ने द वायर  को बताया, ‘भाजपा और उसके सहयोगी मामले में कानूनी कार्यवाही को चुनावी मुद्दे के तौर पर देख रहे हैं और यह स्पष्ट है कि ऐसा चुनावी राजनीति के लिए किया जा रहा है. जहां तक ​​मामले का संबंध है, उनके पक्ष और उनकी मांगें अस्पष्ट हैं. ईदगाह के भीतर कृष्ण की वास्तविक जन्मभूमि होने के तर्क में कोई दम नहीं है.’

छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद से मथुरा मंदिर का मुद्दा भाजपा के हिंदुत्ववादी एजेंडा का एक प्रमुख केंद्र बिंदु रहा है. इसे लेकर हिंदुत्व कार्यकर्ताओं ने एक नया नारा अपनाया है: ‘अयोध्या तो सिर्फ झांकी है, काशी और मथुरा बाकी है’.

साल 2020 में मथुरा की एक अदालत में एक दीवानी मुकदमा दायर किया गया था, जिसमें ‘कृष्ण जन्मभूमि’ वापस दिलाने की मांग की गई थी. इस याचिका में उसी तरह के तर्कों का इस्तेमाल किया गया है, जैसा हिंदुत्ववादी समूहों द्वारा अयोध्या में बाबरी मस्जिद पर दावा करने के लिए किया जाता था.

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