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क्या दलों के आपसी विवादों की छाया में विपक्षी एकता दूर की कौड़ी होती जा रही है

भाजपा धर्म व आस्था के नाम पर बनी समाज की जिन दरारों को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने में कामयाब हुई है, उसके ख़िलाफ़ मजबूत चुनौती पेश करना, एक लंबे संघर्ष की मांग करता है. क्या विपक्ष के सभी बड़े-छोटे दल उस ख़तरे के बारे में पूरी तरह सचेत हैं? क्या वे समझते हैं कि यह महज़ चुनावी मामला नहीं है?

RPTwith caption correction::: Bengaluru: Newly sworn-in Karnataka Chief Minister H D Kumaraswamy, Andhra Pradesh CM N Chandrababu Naidu, AICC President Rahul Gandhi, West Bengal CM Mamata Banerjee, Bahujan Samaj Party (BSP) leader Mayawati and Congress leader Sonia Gandhi wave during the swearing-in ceremony of JD(S)-Congress coalition government in Bengaluru on Wednesday. (PTI Photo/Shailendra Bhojak) (PTI5_23_2018_000145B)

साल 2018 में एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समरोह में विपक्ष के नेता. (फोटो: पीटीआई)

सियासत में अदद तस्वीर कभी कभी नए बनते बिगड़ते समीकरणों का संकेत देती है.

यूं तो वह तस्वीर किसी को भी सामान्य लग सकती है, जिसमें एक चुने हुए प्रतिनिधि से- दरअसल एक राज्य की मुख्यमंत्री से एक पूंजीपति हाथ मिला रहा है, लेकिन अगर मुख्यमंत्री का नाम ममता बनर्जी हो- जिन्होंने छह माह पहले ही भाजपा को जबरदस्त शिकस्त दी हो और पूंजीपति का नाम अडानी हो, जिसके सत्ताधारी खेमे से करीबी रिश्ते के बारे में दुनिया जानती है, तो बिल्कुल अलग मायने निकल सकते हैं.

क्या इस मुलाकात को महज शिष्टाचार मुलाकात कहा जा सकता है?

वैसे ऐसी कोई मुलाक़ात संभव है इसके बारे में अपने गृहनगर कोलकाता पहुंचने से पहले मुंबई के अपने संक्षिप्त प्रवास के दौरान ही- जब वह अपने मिशन इंडिया प्रोजेक्ट के लिए वहां पहुंची थीं और कांग्रेस से इतर विपक्षी पार्टियों के नेताओं से मिल रही थीं तभी ममता बनर्जी ने इस मुलाकात का संकेत दिया था, जब उन्होंने कहा था कि उन्हें ‘किसान भी चाहिए और अडानी भी चाहिए.’

ध्यान रहेे आज की तारीख में जबकि हम ऐतिहासिक किसान आंदोलन की जीत पर गौर फरमा रहे हैं, जिसके चलते मोदी सरकार तीन ‘काले कृषि कानूनों’ को वापस लेने के लिए मजबूर हुई थी, तब इस बात को भुला नहीं जा सकता है कि आंदोलन के दौरान इस बात के चर्चे आम थे कि अगर यह ‘काले बिल’ लागू होते तो उसके सबसे बड़े लाभार्थी वही होते.

मुंबई की उनकी यात्रा भाजपा के खिलाफ एक ऐसे गठबंधन को ढालने की दिशा में थी जिसमें कांग्रेस न रहे. उनका कहना था कि अब कोई यूपीए ( संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ) नहीं है और कांग्रेस अब किसी विपक्षी गठबंधन का स्वाभाविक नेता होने का दावा नहीं कर सकता है.

चाहे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी हो या शिवसेना हो, इन दोनों की तरफ से जो आधिकारिक बयान आए हैं, उसमें स्पष्ट है कि उनके इस प्रस्ताव को उन्होंने नकारा है.

वैसे आप मानें या न मानें भारतीय राजनीति इन दिनों कैलिडोस्कोप की तरह रंग बदलती दिख रही है.

अगर हम याद करें तो अपनी पार्टी की ऐतिहासिक जीत- जब उन्होंने मोदी-शाह एवं उनकी पूरी मशीनरी को जबरदस्त शिकस्त दी थी- के महज दो माह बाद दिल्ली की उनकी यात्रा (जुलाई 2021) बिल्कुल अलग अंदाज़ में संपन्न हुई थी.

इस दौरान न केवल उन्होंने विपक्ष के तमाम नेताओं से मुलाकात की थी बल्कि वह निजी तौर पर कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी मिलने गईं थी, जहां राहुल गांधी भी मौजूद थे. आपसी बातचीत में उनका जोर ‘विपक्ष की एकता को कैसे मजबूत किया जाए’ इसी पर था.

ध्यान रहे चंद महीनों के अंदर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब आदि में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं और 2014 में सत्तारोहण के बाद भाजपा के लिए यह पहला अवसर है कि वह किसानों के व्यापक जनांदोलन एवं बढ़ते असंतोष के चलते बचावात्मक पैंतरा अख्तियार करने के लिए मजबूर हुई है. उसे यह भी मालूम है कि इतने कम समय में वह अपने चिरपरिचित ध्रुवीकरण के एजेंडा को वह आगे नहीं बढ़ा सकती है और इसलिए वह काफी मुश्किल में भी है.

बकौल अमित शाह 2022 के चुनावों में योगी की हार जीत 2024 में मोदी सरकार की हार जीत का भविष्य तय करने वाली है.

इस पृष्ठभूमि ममता बनर्जी की तीसरा मोर्चा बनाने की अचानक चल पड़ी कोशिश जिसमें वह कांग्रेस को दूर रखना चाहती है, और आए दिन कांग्रेस पर हो रहे हमले निश्चित ही भाजपा के लिए मुंहमांगी मुराद मिली है.

जनतंत्र- जिसे अब्राहम लिंकन नेे ‘लोगों की, लोगों द्वारा, लोगों के लिए चलाई जाने वाली सरकार’ के तौर पर परिभाषित किया- की खासियत यही समझी जाती है कि आप न केवल पार्टी बना सकते हैं बल्कि आप निजी तौर पर हुकूमत के सबसे बड़े ओहदे पर पहुंचने का न केवल ख्वाब देख सकते हैं बल्कि इसे मुमकिन बनाने के लिए कोशिशें भी कर सकते हैं.

जाहिर है फायरब्रांड कही जाने वाली ममता बनर्जी भी अगर वजीरे-आज़म बनने का संकल्प लें या अपनी पार्टी के विस्तार में जुट जाएं तो इसमें बुरा क्या है? कुछ भी तो नहीं!

चिंता की बात इतनी ही है कि वह बेहद जल्दी में दिखती हैं और ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इस जल्दबाजी में दोस्त और दुश्मन की उनकी पहचान भी गोया धुंधली हो गई है.

त्रिपुरा में कांग्रेस समर्थकों, कार्यकर्ताओं के एक हिस्से को अपने पक्ष में करने के बाद उत्तर पूर्व पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए तृणमूल के विस्तार का प्रोजेक्ट कांग्रेस के चंद युवा एवं वरिष्ठ नेताओं- भले ही उनकी अधिक संख्या न हो- को अपने पक्ष में करने में कामयाब हो रहा था.

कहा जा सकता है कि असम की रहने वाली सुष्मिता देव, जो खुद महिला कांग्रेस की अध्यक्ष थीं तथा राहुल गांधी के करीबियों में से थीं-जिनके पिता खुद कांग्रेस के बड़े नेता थे एवं केद्र में मंत्री भी थे- का तृणमूल से जुड़ना निश्चित ही कांग्रेस के लिए एक झटके की तरह था.

उसके बाद गोवा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता- जो पहले मुख्यमंत्राी रह चुके हैं- तथा जो लगभग चालीस साल से कांग्रेस के साथ उन्होंने तृणमूल के पक्ष में अपना पारा बदला. अभी भी यह सिलसिला जारी है, अशोक तंवर (हरियाणा), कीर्ति आजाद (बिहार) के तृणमूल से जुड़ने के बाद उत्तरी पूर्व के मेघालय में 18 कांग्रेस विधायकों में से 13 का पार्टी छोड़कर तृणमूल से जुड़ना कम झटका नहीं है.

ममता की दिल्ली की हालिया यात्रा की खासियत थी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी मुलाकात- जो कथित तौर पर राज्य से जुड़ी चंद मांगों  के लिए थी, जिसमें उन्होंने सीमा सुरक्षा बलों की राज्य में तैनाती के मसले को उठाया तथा केंद्र के पास राज्य के आपदा राहत को लेकर कुछ हजार करोड़ रुपये पड़े हैं के मसले पर भी बात हुई. बंगाल की राजधानी में अगले साल आयोजित ग्लोबल बिजनेस समिट के खास मेहमान वजीरे आज़म नरेंद्र मोदी होंगे, जिन्हें यह न्योता देने खुद ममता बनर्जी भी पहुंची थीं.

रेखांकित करने वाली बात थी कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से उनकी प्रस्तावित मुलाकात हो नहीं पाई जिसके बारे में न केवल मीडिया में ख़बरें छपी थीं बल्कि उनके चंद पार्टी नेताओं ने भी संकेत दिया था.

इस बदले परिदृश्य को लेकर कि विगत चार माह में क्या हुआ- इसके बारे में महज अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है. विपक्षी एकता को मजबूत करने से लेकर कांग्रेस के बगैर तीसरा मोर्चा खड़े करने के उनके दावे के पीछे का सत्य टटोलना मुश्किल काम नहीं है

औपचारिक तौर पर तृणमूल की तरफ से यही दावा किया जा रहा है कि ‘कांग्रेस भाजपा से लड़ने को लेकर गंभीर नहीं है’ या ‘किस तरह दो चुनावों में (2014 एवं 2019) वह भाजपा को शिकस्त देने में असफल हुई है’ और इसके बरअक्स ‘बंगाल का अनुभव’ है, जिसमें भाजपा को शिकस्त मिली थी. टीएमसी के मुखपत्र ‘जागो बांग्ला’ में अपने आलेख ‘देल्लीर डाक (दिल्ली बुला रही है) में खुद ममता बनर्जी ने इसी स्थिति की चर्चा की थी. (अक्टूबर 2021)

वैसे आप कह सकते हैं कि यह तमाम कोशिशें अपना जनाधार बढ़ाकर खुद राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा विरोधी मोर्चे की अगुआई करना हो, भले ही इसके लिए कांग्रेस को ही निशाना बनाना पड़े.

इस पूरे घटनाक्रम में एक बात तो बिल्कुल साफ है कि पार्टी के इस मिशन इंडिया प्रोजेक्ट में या उसकी बदली प्राथमिकताओं के पीछे चुनाव रणनीतिज्ञ प्रशांत किशोर का पार्टी के अंदर बढ़ता प्रभाव साफ दिखता है, जिनके बारे में कहा जाता है कि तृणमूल की इस जीत के एक तरह से रणनीतिकार वही थे.

चाहे कांग्रेस से जुड़े रहे लुईजिनो फालेरो रहे हों या वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मुकुल संगमा, सभी ने यही दावा किया है कि वह ‘सत्ताधारी भाजपा का विकल्प खड़ा करने की किशोर के विजन से प्रभावित हुए.’

यह बात दूर की कौड़ी लग सकती है, लेकिन कुछ आलोचकों का यह भी कहना है कि तृणमूल की इन बदली प्राथमिकताओं एवं ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी एवं उनकी पत्नी की बढ़ती मुश्किलों के अंतर्संबंध पर भी सोचने की जरूरत है.

याद रहे कि बंगाल चुनावों के पहले सीबीआई ने अभिषेक एवं उनकी पत्नी को पश्चिम बरद्वान जिले में ‘कोयला चोरी’ के मामले में जांच के सिलसिले में समन भेजा था, जिस मामले में कुछ अभियुक्त जेल में है. इसे लेकर अभिषेक एवं उनकी पत्नी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया.

चुनावों के बाद इसी मामले को लेकर ईडी ने उन्हें समन भेजा. मामले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सितंबर माह की शुरुआत में अभिेषेक ईडी के सामने हाजिर भी हुए थे.

आप इसे महज संयोग भी कह सकते हैं कि विगत दो माह से इस मामले में आगे की कार्रवाई नहीं हुई है, जबसे तृणमूल द्वारा राष्ट्रीय राजनीति में पैर पसारने की कोशिशें तेज हुई हैं.

भाजपा के खिलाफ आज निर्णायक लड़ाई की बात करने वाली ममता बनर्जी का दावा इस मामले में भी उत्साह नहीं जगाता कि वाजपेयी की अगुआई में जब भाजपा तत्कालीन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार संभाल रही थी, उन दिनों ममता बनर्जी उस गठबंधन में शामिल थीं और उन्होंने तृणमूल एवं भाजपा को ‘नेचरल एली’ अर्थात स्वाभाविक साथी’ घोषित किया था.

इस समूचे मामले में अर्थात विपक्ष के बीच आई दरार का मामला कैसे सुलटेगा यह कहना मुश्किल है. मुमकिन है कि आपसी विवादों को भूल कर विपक्ष की पार्टियां साझा रणनीति बनाने के बारे में सोचें और इस बारे में रास्ता तय करें.

याद रहे कि मशहूर श्रीलंकाई विद्वान स्टेनले तमबैया ने अपने मुल्क में सिंहली अंधराष्ट्रवाद तथा उसकी प्रतिक्रिया को लेकर एक दिलचस्प बात कही थी.  उन्होंने कहा था कि सिंहली लोग ‘एक ऐसी बहुसंख्या है जो अल्पसंख्यक मनोग्रंथि’’ से ग्रस्त हैं. क्या यह समझदारी भारत के अनुभवों पर भी सटीक बैठती है, जहां हम पाते हैं कि बहुसंख्यक समुदाय का प्रभुत्व चौतरफा है, इसके बावजूद वह यही सोचता है कि वह ‘उत्पीड़न’ का शिकार है.

इसमे कोई दोराय नहीं कि असमावेशी हिंदुत्व वर्चस्ववादी राजनीति का उभार इस मनोग्रंथि को और मजबूत करता है.

बड़ा सवाल यह है कि क्या विपक्ष की बड़ी-छोटी सभी पार्टियां, भाजपा जिस बहुसंख्यकवादी जनतंत्र की राह मजबूत कर रही हैं, उस खतरे के बारे में पूरी तरह सचेत हैं या नहीं?

क्या वह यह समझती हैं कि यह महज चुनावी मामला नहीं है, भाजपा धर्म एवं आस्था के नाम पर बनी अपने समाज की विभिन्न दरारों को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने तथा बहुसंख्यक समुदाय के बड़े या मुखर हिस्से को अपने पक्ष में करने में कामयाब हुई है और उसके खिलाफ एक मजबूत चुनौती पेश करना, एक लंबे संघर्ष की मांग करता है.

हम चाहें न चाहें लेकिन संविधान के मूल्य और सिद्धांतों को बचाने का संघर्ष- जो एक तरह से बहुसंख्यकवाद के प्रोजेक्ट की काट हो सकता है- आज हमारे सामने है, जिसके लिए एक लंबे संघर्ष की आवश्यकता है. और वे सभी जो संविधान में यकीन रखते हैं और भारत को हिंदू राष्ट्र बनने नहीं देना चाहते हैं, उनका साथ जुड़ना समय की मांग है.

(सुभाष गाताडे वामपंथी एक्टिविस्ट, लेखक और अनुवादक हैं.)