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भारत समेत वैश्विक स्तर पर अकादमिक स्वतंत्रता पर हमला हो रहा है: रिपोर्ट

‘फ्री टू थिंक 2021’ रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारतीय अधिकारियों ने आतंकवाद विरोधी क़ानूनों के तहत शिक्षाविदों और छात्रों को ग़लत तरीके से हिरासत में लिया और उन पर मुक़दमा चलाया गया.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय. (फोटो: शोम बसु)

नई दिल्ली: स्कॉलर्स ऐट रिस्क (एसएआर) द्वारा गुरुवार (9 दिसंबर) को जारी की गई वार्षिक रिपोर्ट ‘फ्री टू थिंक 2021’ में शिक्षाविदों, सरकारों और नागरिक समाज से शैक्षणिक स्वतंत्रता की रक्षा करने का आग्रह किया गया है, ताकि हाल के दिनों में इसके दमन की वैश्विक प्रवृत्ति से बचा जा सके.

इसमें एक सितंबर, 2020 से 31 अगस्त, 2021 के बीच 65 देशों (भारत सहित) में स्कॉलर्स, छात्रों और विश्वविद्यालयों पर हुए 332 हमलों की जांच की गई है.

यह रिपोर्ट एसएआर की अकादमिक स्वतंत्रता निगरानी परियोजना द्वारा एकत्रित जानकारी पर आधारित है, जो अपराधियों को जवाबदेह ठहराने के लिए उच्च शिक्षा पर हमलों की जानकारी इकट्ठा करता है.

एसएआर 40 से अधिक देशों में 550 से अधिक उच्च शिक्षा संस्थानों का एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क है, जो अकादमिक स्वतंत्रता को बचाने के लिए प्रतिबद्ध है.

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वर्ष वैश्विक स्तर पर हत्या, शैक्षणिक परिसरों पर पुलिस की छापेमारी, विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों और फैकल्टी सदस्यों पर जबरदस्ती (कभी-कभी घातक भी), गलत तरीके से कारावास और स्कॉलर्स के खिलाफ मुकदमा चलाने और ऐसी अन्य घटनाओं सहित गंभीर हिंसक हमले हुए हैं.

एसएआर के संस्थापक कार्यकारी निदेशक रॉबर्ट क्विन ने कहा, ‘उच्च शिक्षा पर हमले से दुनिया भर में शिक्षाविदों, छात्रों और संस्थानों पर बहुत बुरा परिणाम देखने को मिल रहा है, इसके कारण कई लोगों का करिअर भी खत्म हो जा रहा है. हम तालिबान के कारण शरण लेने वाले अफगान छात्रों की वृद्धि के कारण संकट में हैं, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) जैसे देशों में भी पढ़ाने को लेकर विभिन्न प्रतिबंध लगाने की कोशिश की जा रही है.’

इस रिपोर्ट का उद्देश्य विभिन्न देशों में इन हमलों की बारीकियों और ट्रेंड को उजागर करना है और अकादमिक स्वतंत्रता, गुणवत्ता उच्च शिक्षा और लोकतंत्र की रक्षा की मांग करना है.

रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अधिकारियों ने वर्तमान सत्तारूढ़ दल के विपरीत विचार व्यक्त करने के लिए गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) जैसे कानूनों के तहत स्कॉलर्स और छात्रों को गलत तरीके से हिरासत में लिया है और उन पर मुकदमा चलाया है.

इसी तरह, हांगकांग में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का इस्तेमाल अभिव्यक्ति को दबाने के लिए किया गया है. विभिन्न विश्वविद्यालयों से छात्र संघों को खत्म किया जा रहा है और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के प्रचार के अनुरूप पाठ्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा रहा है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि फैकल्टी सदस्यों, शिक्षाविदों और विश्वविद्यालय के अधिकारियों को उनके शैक्षणिक कार्यों या आलोचनात्मक विचारों या कार्यों के लिए निलंबित या अन्यथा दंडित किया जा रहा है.

ब्राजील में अटॉर्नी जनरल और सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश ने एक स्कॉलर के खिलाफ उनके काम के बारे में आलोचनात्मक सार्वजनिक भाषण देने के लिए शिकायत दर्ज की है. इस बीच, बेलारूस में ऑलेक्जेंडर लुकाशेंको ने ऐसे शिक्षाविदों और छात्रों को निलंबित कर दिया है, जिन्होंने साल 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में विवादित तरीके से जीतने का विरोध किया था.

रिपोर्ट के अनुसार, विभिन्न देशों की सरकारों ने अपनी नीतियों के माध्यम से स्कॉलर्स, शिक्षाविदों और विचारों की स्वतंत्रता में कटौती की है. उदाहरण के लिए, चीनी सरकार ने विशिष्ट अंतरराष्ट्रीय स्कॉलर्स, शोधकर्ताओं और संस्थानों के खिलाफ यात्रा प्रतिबंध लगा दिया है. इस बीच, इज़राइल ने फिलिस्तीनी विद्वानों और छात्रों के आंदोलन पर गंभीर प्रतिबंध लगाए हैं.

भारतीय जलवायु कार्यकर्ता दिशा रवि, जिन पर कृषि आंदोलन का समर्थन करने के लिए राजद्रोह का आरोप लगा था, ने केंद्र सरकार पर उनके पासपोर्ट को जानबूझकर समय पर जारी न करने का आरोप लगाया है, जिसके कारण वह इस साल ग्लासगो में आयोजित सीओपी26 जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन में हिस्सा नहीं ले पाई थीं.

इसी तरह भारत में हाल के वर्षों में विभिन्न विश्वविद्यालयों में कुलपति, प्रोफेसरों के पाठ्यक्रम, नियुक्तियों और इस्तीफे से संबंधित विश्वविद्यालय के मामलों पर राजनीतिक दबाव होने के आरोप लगे हैं.

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के इतिहास के नए पाठ्यक्रम को भी इतिहासकारों द्वारा भगवाकरण करने के आरोप लगे हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)