भारत

‘नए भारत’ के नए वादे पर आर्थिक संकट का काला बादल

2019 के चुनावों से 18 महीने पहले, भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पूरी तरह से लड़खड़ाई हुई दिखाई दे रही है, लेकिन नरेंद्र मोदी द्वारा लगातार 2022 तक पूरे किए जाने वाले नामुमकिन वादों की झड़ी लगाने का सिलसिला जारी है.

The Prime Minister, Shri Narendra Modi delivering his address at the Chartered Accountants’ Day celebrations, at IGI stadium, in Delhi on July 01, 2017.

फोटो: पीआईबी

चारों तरफ से आ रही आर्थिक संकट की ख़बरों ने अचानक भाजपा की जान को सांसत में डाल दिया है. बेहद खराब तरीके लागू किए गए नोटबंदी के फैसले के बाद कुछ वैसी ही बदइंतजामी जीएसटी को लागू करने के मामले में भी दिखाई दे रही है. इसने छोटे कारोबारियों की कमर तोड़ दी है, जिसका नतीजा नोटबंदी के बाद के महीनों में उत्पादन और बेरोजगारी में आई गिरावट की स्थिति के और भयावह होने के तौर पर सामने आया है.

कारोबारी कंपनियां जीएसटी के लागू होने से पहले अपना स्टॉक खाली करने में लगी हुई थीं. उन्हें उम्मीद थी कि वे नई कर-प्रणाली में नया स्टॉक जमा करेंगी. लेकिन, विशेषज्ञों का कहना है कि जीएसटी को खराब तरीके से लागू किए जाने के कारण नया स्टॉक जमा करने रफ्तार काफी सुस्त है और कंपनियां फिलहाल जीएसटी व्यवस्था के स्थिर होने का इंतजार कर रही हैं. इसके बाद ही वे रफ्तार पकड़ेंगी.

इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि यह सब त्योहारों के मौसम के ठीक पहले हो रहा है. 2017 की दूसरी छमाही में इसका असर आर्थिक विकास पर पड़ना तय है. जैसा कि कई लोगों ने आशंका जताई थी, जीएसटी को लागू करने के बाद मुद्रास्फीति में भी थोड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. पिछले कई दशकों में घरेलू पेट्रोल और डीजल की सर्वाधिक कीमत ने भी स्थिति को और बिगाड़ने का काम किया है.

इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि तेल पर लगाए गए रिकॉर्ड टैक्स स्थिर राजस्व का एकमात्र स्रोत हैं, क्योंकि इसे जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है. फिलहाल जीएसटी नहीं, तेल पर लगा कर ही केंद्र सरकार की जान बचाए हुए है.

वित्त मंत्री अरुण जेटली की मुश्किलों को और बढ़ाते हुए जीएसटी नेटवर्क के उम्मीदों से कमतर प्रदर्शन (ऐसा कहना शायद स्थिति की गंभीरता को कम करके बताना है) ने 2017-18 में राजस्व में कमी का गंभीर खतरा पैदा कर दिया है. इससे केंद्र के राजकोषीय हिसाब-किताब के गड़बड़ाने की आशंका पैदा हो गई है. वित्त मंत्रालय को पहला झटका तब लगा जब जुलाई के महीने के लिए जीएसटी के तहत जमा हुए 95,000 करोड़ रुपये में से कुल 65,000 करोड़ रुपये के रिफंड का दावा उसके सिर पर आ गया.

अगर इन सारे रिफंड दावों को स्वीकार कर लिया जाता है, तो केंद्र के पास महज 30,000 करोड़ रुपये ही बचेंगे, जबकि बजट में प्रति माह वास्तविक कर संग्रह 90,000 करोड़ से ज्यादा होने का अनुमान लगाया गया है. पुराने स्टॉक पर रिफंड के प्रावधान के कारण पहले महीने में रिफंड के ज्यादा दावों के आने का अंदाजा पहले से ही था. अनुमान है कि आनेवाले महीनों में जीएसटी से ज्यादा राजस्व प्राप्त होगा. लेकिन, जीएसटीएन के सॉफ्टवेयर में आ रही दिक्कतों को देखते हुए इस वित्तीय वर्ष में इस पूरी कवायद का भविष्य अधर में लटका हुआ नजर आता है.

जीएसटीएन में आ रही विभिन्न परेशानियों को दूर करने के लिए राज्यों के मंत्रियों की नवनिर्मित समिति की अगुआई कर रहे बिहार के उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने पिछले सप्ताह एक दिलचस्प बयान दिया: ‘हम नाव को खेते हुए नाव का निर्माण कर रहे हैं.’ साफ तौर पर यह बयान केंद्र को कठघरे में खड़ा करता है, जिसने बगैर पर्याप्त तैयारी के जीएसटी को लागू कर दिया.

इस नई समिति के सदस्य कर्नाटक के कृषि मंत्री कृष्ण बायरे गौड़ा ने द वायर  को बताया कि जीएसटीएन के सॉफ्टवेयर के साथ कई दिक्कतें हैं, जिन्हें ठीक करने में कम से कम छह महीने का वक्त लग जाएगा.

उन्होंने कहा, ‘फिलहाल बहुत बुनियादी परेशानियां सामने आ रही हैं. मसलन, व्यापारी यह शिकायत कर रहे हैं कि उन्होंने रजिस्ट्रेशन करा लिया है और जीएसटी रिर्टन भी अपलोड कर दिया है, लेकिन इसे सिस्टम द्वारा नहीं दिखाया जा रहा है. सिस्टम की कछुआ चाल ने टैक्स भरनेवालों को दिन में तारे दिखा दिए हैं. जीएसटी सिस्टम इनवॉयस और विभिन्न चरणों, मसलन, जीएसटीआर-2 और जीएसटीआर-3, पर भरे गए रिटर्नों को अपलोड करने में भी परेशानी पैदा कर रहा है. इससे भी खराब बात ये है कि राज्य सरकारें जीएसटी अदायगी की निगरानी करने के लिए कंपनियों से संबंधित आंकड़ों को निकालने में असमर्थ साबित हो रही हैं.’

गौड़ा का कहना है कि समिति के सदस्यों से सॉफ्टवेयर प्रोवाइडर से बात की है और ‘उनका कहना है कि उन्हें जुलाई में जीएसटी के लागू होने से पहले आखिरी मौके पर प्रक्रियागत नियमावली (प्रोटोकॉल) सौंपी गई. ट्रायल रन करने के लिए पर्याप्त समय नहीं था.’ इसलिए अब हम यह समझ सकते हैं कि आखिर सुशील मोदी के यह कहने का क्या अर्थ है कि नाव का निर्माण, बहती हुई नाव पर बैठे-बैठे किया जा रहा है!

संघ परिवार के शीर्ष विचारकों ने देर से इस बात को स्वीकार किया है कि अर्थव्यवस्था की अस्थिर नाव पहले से ही नोटबंदी के कारण आए तूफान से पछाड़ खाते हुए हुए समुद्र में बह रही है. संघ परिवार के एक महत्वपूर्ण आर्थिक विचारक एस. गुरुमूर्ति ने कहा है कि एक साथ नोटबंदी, जीएसटी, बैंकों की गैर-निष्पादन परिसंपत्तियां (एनपीए), सेटलमेंट प्रोसेस और काले धन पर कई स्तरों पर किए जा रहे हमले ने व्यापार को बड़ा झटका दिया है.

गुरुमूर्ति की यह आत्मस्वीकृति काफी दिलचस्प है, क्योंकि वे नोटबंदी, जीएसटी और निजी उद्यमियों तथा छोटे कारोबारियों पर कर-अधिकारियों की मनमानी कार्रवाई के सबसे बड़े समर्थकों में से एक थे. टैक्स डिपार्टमेंट बड़े कारोबारियों पर हाथ नहीं डाल रहा है. इसका कारण शायद ये है कि उनके साथ इनके संबंध मुद्दतों से अच्छे रहे हैं. आपको अगर इस बात का अर्थ समझना है, तो आपको बस नौकरी छोड़कर भारत की शीर्ष 500 कंपनियों से जुड़नेवाले वरिष्ठ टैक्स अधिकारियों की संख्या देखनी पड़ेगी.

यानी संघ परिवार के विचारक अब ये खुलकर मान रहे हैं कि मोदी और जेटली ने दरअसल नवजात शिशु को सीधे पानी में तैरने के लिए फेंक दिया है. जीएसटी का वर्तमान चरण इसकी सबसे बड़ी मिसाल है. जुलाई महीने के लिए जीएसटी रिटर्न दाखिल करने और वाजिब रिफंड का दावा करनेवाले कारोबारियों को इस तरह परेशान किया जा रहा है, मानो वे कोई अपराधी हों.

GST Protest photo Reuters

फोटो: रॉयटर्स

पहले निर्यातकों को हमेशा एक्साइज ड्यूटी से मुक्त रखा जाता था, क्योंकि वे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करते थे. जीएसटी के तहत, चूंकि सभी कारोबारियों को प्रक्रिया के तहत अप्रत्यक्ष कर भरना पड़ रहा है, इसलिए निर्यातकों से 18 प्रतिशत जीएसटी भरने के लिए कहा गया था, जिसे उनके माल को विदेश भेजने से पहले वापस लौटाने की बात कही गई थी.

लेकिन अब निर्यातकों की यह शिकायत है कि उनका टैक्स रिफंड समय पर नहीं आ रहा है. निर्यातक इसके लिए इंतजार नहीं कर सकते, क्योंकि वे मौसम के हिसाब से काम करते हैं. मसलन, क्रिसमस के लिए बाहर माल भेजना. 18 प्रतिशत जीएसटी चुका देने के बाद उनकी कामकाजी पूंजी फंस जाती है. यह एक बड़ी रकम है. उन्हें छोटी अवधि में कामचलाऊ पूंजी की जरूरत को पूरा करने के लिए कर्ज लेने के लिए अतिरिक्त पैसा चुकाना पड़ रहा है. इससे उनका मुनाफा और सिकुड़ रहा है.

भारत करीब 300 अरब अमेरिकी डॉलर का सालाना निर्यात करता है जिससे जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा आता है. कल्पना कीजिए कि जीएसटी अधिकारी निर्यात मूल्य का 18 प्रतिशत अपने पास रख लेते हैं और उसे समय पर वापस नहीं लौटाते हैं. यह निर्यातकों के लिए किसी खराब सपने से कम नहीं कहा जा सकता है. निर्यातकों को त्वरित रिफंड के इस समीकरण को समझ पाने में वित्त मंत्रालय नाकाम रहा. जाहिर है इसका खामियाजा किसी न किसी को तो उठाना ही पड़ेगा.

जीएसटी के पहाड़ जैसे कुप्रबंधन के मद्देनजर, अगर 2017 की दूसरी छमाही में जीडीपी विकास दर अप्रैल-जून में दर्ज किए गए 5.7 प्रतिशत से भी नीचे लुढक जाती है, तो मुझे कोई हैरत नहीं होगी. निश्चित तौर पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के इस साहस भरे बयान के बावजूद कि लोगों को ‘आधिकारिक आंकड़ों को नजरअंदाज करना चाहिए’ सरकार के अंदर अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहे काले बादलों को लेकर बदहवासी की स्थिति है.

भारत के अनौपचारिक क्षेत्र, खासकर कृषि और छोटे उद्योगों को हुए नुकसान का काफी विस्तार से दस्तावेजीकरण किया गया है. पिछले कुछ महीनों से सोशल मीडिया पर इस मसले पर लगातार आंकड़ों के सहारे बात की जा रही है. छोटी कंपनियों (जिनका कुल कारोबार 25 करोड़ से कम है) को लेकर किए गए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के एक सर्वेक्षण के मुताबिक जनवरी-मार्च, 2017 में उनकी बिक्री में 58 फीसदी की गिरावट देखी गई. जुलाई के बाद जीएसटी ने उनकी बदहाली को और बढ़ाया ही होगा.

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा समूह, क्रेडिट सुइस की मुंबई स्थित रिसर्च इकाई ने हाल ही में कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था बेहद खराब दौर से गुजर रही है और नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े नीतिगत उपायों ने अर्थव्यवस्था में बड़ी रुकावटें पैदा की हैं.

क्रेडिट सुइस का कहना है कि इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात ये है कि इन रुकावटों के साथ-साथ कुल सरकारी खर्च में भी भारी कमी आई है. यह याद रखना होगा कि निजी निवेश की गैरहाजिरी में संभवतः सार्वजनिक निवेश ही वह इकलौता इंजन बचा था, जो विकास की गाड़ी को थोड़ा-बहुत आगे खींच रहा था.

2019 के चुनावों से 18 महीने पहले, भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पूरी तरह से लड़खड़ाई हुई दिखाई दे रही है. मोदी द्वारा लगातार 2022 तक पूरे किए जाने वाले नामुमकिन वादों की झड़ी लगाने का सिलसिला जारी है. इन नए वादों के पीछे छिपा संदेश यह है कि 2019 में उनकी सत्ता में वापसी पहले से ही तय है.

इतिहास हमें बताता है कि राजनीति अक्सर चकमा देती है. किसी निजाम के आत्मविश्वास और लोकप्रियता के अपने चरम पर पहुंचने के ठीक बाद पैरों के नीचे की ज़मीन खिसकना शुरू कर देती है. मतदाता 2018 के बाद इस बारे में गंभीरता के साथ आकलन करना शुरू करेगा कि ‘नए भारत’ का वादा सच्चा है या फिर यह एक और बुलबुला है, जिसकी नियति ‘स्वच्छ भारत’ के कूड़ेदान में पड़ा पाया जाना है.

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