नॉर्थ ईस्ट

नॉर्थ ईस्ट डायरी: विदेशी घोषित होने का आदेश रद्द होने के बाद असम की महिला ने की मुआवज़े की मांग

इस हफ्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में असम, नगालैंड, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के समाचार.

असम में एक विदेशी न्यायाधिकरण का दफ्तर. (फोटो: हसन अहमद मदनी)

गुवाहाटी: भारत की नागरिकता साबित करने की लड़ाई ने 55 वर्षीय हसीना भानु और उनके बीमार पति को शारीरिक और मानसिक रूप से नुकसान पहुंचाया हो, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि गौहाटी उच्च न्यायालय सुनिश्चित करेगा कि उन्हें पर्याप्त मुआवजा दिया जाए.

उल्लेखनीय है कि बीते सप्ताह उच्च न्यायालय ने महिला को असम की तेजपुर सेंट्रल जेल से रिहा करने का आदेश दिया था.

अपनी रिहाई के एक दिन बाद दरांग जिले के श्यामपुर गांव में अपने घर पहुंची भानु ने शुक्रवार को कहा कि उनका जीवन तबाह हो गया है क्योंकि उनके पति को कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए अपनी खेती वाली जमीन बेचनी पड़ी ताकि यह साबित कर सकें कि वह विदेशी नहीं हैं, बल्कि वास्तविक भारतीय नागरिक हैं.

उन्होंने पीटीआई से कहा, ‘मेरे साथ घोर अन्याय हुआ… मेरा स्वाभिमान चकनाचूर हो गया, हमें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और हम आर्थिक रूप से मुश्किलों में फंस गए हैं. मेरी रिहाई सुनिश्चित करने के लिए मैं गौहाटी उच्च न्यायालय और अपने वकील जाकिर हुसैन का आभार जताती हूं. मुझे उम्मीद है कि अदालत अधिकारियों को हमें पर्याप्त मुआवजा देने का निर्देश देगी, नहीं तो हम बर्बाद हो जाएंगे.’

हसीना भानु उर्फ हसना भानु को 2016 में एक दरांग के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने ‘भारतीय’ और 2021 में ‘विदेशी’ घोषित किया गया था, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया और अक्टूबर 2021 में तेजपुर जेल में बने एक डिटेंशन केंद्र में रखा गया था.

हालांकि, गौहाटी उच्च न्यायालय ने एक न्यायाधिकरण के पूर्व के फैसले को इस सप्ताह पलट दिया.

दरांग विदेशी न्यायाधिकरण ने अगस्त 2016 में भानु की भारतीय नागरिकता को बरकरार रखा था, लेकिन उसी न्यायाधिकरण ने उन्हें तब विदेशी घोषित कर दिया, जब असम पुलिस ने कहा कि वह एक संदिग्ध बांग्लादेशी थीं.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, हसीना भानु ने यह भी आरोप लगाया कि राजनीतिक साजिश के तहत मुस्लिमों के खिलाफ विदेशी न्यायाधिकरण में कई मामले दर्ज किए गए हैं.

उन्होंने कहा, ‘हमें केवल इसलिए परेशान किया जा रहा है क्योंकि हम मुसलमान हैं. हम शतरंज के खेल में सिर्फ मोहरे हैं.’

एनडीटीवी के अनुसार, उन्होंने कहा, ‘जेल में डिटेंशन सेंटर के अंदर बहुत उत्पीड़न है. वहां कई हिंदू हैं, मुस्लिम भी… मुझे लगता है हमें मुस्लिम होने के कारण निशाना बनाया गया.’

उन्होंने आगे बताया, ‘मैंने न्यायाधिकरण में दूसरे मामले में पहहले (2016 के) मामले का आदेश जमा किया था लेकिन इस बार उसने अलग आदेश दिया. अब फिर मैं भारतीय साबित कर दी गई हूं. लेकिन सरकार से मेरा सवाल है कि मुझे इस तरह से प्रताड़ित क्यों किया गया?’

मालूम हो कि हाईकोर्ट ने सोमवार को फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के 2021 के फैसले को खारिज करते हुए कहा था कि दोनों फैसलों में याचिकाकर्ता की पहचान समान है और एक व्यक्ति के संबंध में दूसरी राय कायम नहीं रखी जा सकती.

जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह और जस्टिस मालाश्री नंदी की पीठ ने कहा, ‘हम यह समझने में असमर्थ हैं कि ट्रिब्यूनल ने मामले की जांच किस तरह की.’

भानु ने कहा कि वह इसलिए रिहा हो सकीं क्योंकि उनके परिवार के पास जमीन थी, लेकिन उसी जेल में कम से कम 15-16 अन्य मुस्लिम महिलाएं हैं जो कानूनी लड़ाई लड़ने में असमर्थ हैं क्योंकि वे बहुत गरीब हैं. उन्होंने कहा, ‘मैं उनके लिए दुखी हूं और प्रार्थना करती हूं कि वे भी जल्द बाहर आएं.’

उनके 60 वर्षीय पति अयान अली ने कहा कि अगर ग़रीब किसानों को झूठे आरोपों में उन पर थोपे गए मुक़दमे लड़ने के लिए अपनी ज़मीन बेचनी पड़ेगी तो वे कैसे बचेंगे.

इस दंपति के छह बच्चे हैं- चार विवाहित बेटियां और दो बेटे. उन्होंने कहा, ‘मेरे सबसे छोटे बेटे को पिछले साल अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी क्योंकि हम उसकी बोर्ड परीक्षाओं की फीस का भुगतान नहीं कर सके और वह काम की तलाश में बेंगलुरु चला गया. जब उसकी मां को जेल भेजा गया तो वह बहुत परेशान था. अक्सर जिंदगी ख़त्म करने की बात करता था. हमारे रिश्तेदारों ने हमारा साथ दिया और उसे इस तरह न सोचने को कहा.’

नगालैंड: सुरक्षा बलों की फायरिंग के पीड़ितों को इंसाफ दिलाने की मांग लेकर सड़कों पर उतरे हज़ारों लोग

कोहिमा में हुई पीपुल्स रैली. (फोटो साभार: नगा स्टूडेंट्स फेडरेशन)

कोहिमा: राजधानी कोहिमा में हाल में सुरक्षा बलों द्वारा कथित रूप से मार दिए गए 14 आम लोगों को इंसाफ दिलाने और पूर्वोत्तर क्षेत्र से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (आफस्पा ) हटाने की मांग को लेकर शुक्रवार को ‘पीपुल्स रैली’ निकाली गई. इस रैली में हज़ारों लोगों ने हिस्सा लिया.

ईस्ट मोजो के अनुसार, रैली में हिस्सा लेने वाले लोगों ने कोहिमा के मध्य में स्थित ओल्ड एमएलए हॉस्टल जंक्शन से राजभवन तक पैदल मार्च किया और करीब ढाई किलोमीटर का रास्ता तय किया और राज्यपाल सचिवालय को मांगों के संबंध में एक ज्ञापन सौंपा.

रैली का आयोजन करने वाले नगा स्टूडेंट्स फेडरेशन (एनएसएफ) के सदस्यों के अलावा, नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (एनईएसओ), ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) और कई आदिवासी संगठनों के शीर्ष निकायों के प्रतिनिधियों ने इसमें हिस्सा लिया.

प्रदर्शनकारियों ने नारेबाजी कर चार और पांच दिसंबर को नगालैंड के मोन जिले के उटिंग इलाके में सैना के पैरा कमांडो द्वारा 14 आम लोगों की कथित रूप से हत्या किए जाने की निंदा की.

प्रदर्शनकारी हाथों में तख्तियों और बैनर पकड़े हुए थे, जिनमें लिखा था, ‘नगा आतंकवादी नहीं हैं’, ‘आफस्पा को प्रतिबंधित करो, हमारी आवाज़ को नहीं’ और ‘उटिंग के पीड़ितों के लिए न्याय’.

एनएसएफ के अध्यक्ष केगवेहुन टेप, पीपुल्स रैली आयोजन समिति के संयोजक विपोपाल किंतसो, एनईएसओ के सलाहकार समुज्जल भट्टाचार्य और अन्य नेताओं ने राजभवन में राज्यपाल सचिवालय को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित एक ज्ञापन सौंपा. राज्यपाल प्रो. जगदीश मुखी राजभवन में मौजूद नहीं थे.

ज्ञापन में एनएसएफ ने उटिंग में मारे गए युवकों और नगालैंड में सैना की कथित ज्यादतियों के सभी पीड़ितों के लिए तत्काल न्याय, आफस्पा को निरस्त करने और नगा राजनीतिक समस्या का समाधान खोजने में तेजी लाने की मांग की.

बताया गया है कि यह ज्ञापन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो को भी भेजा जाएगा.

एनएसएफ के अध्यक्ष केगवेहुन टेप ने कहा कि मांगें पूरी होने तक संगठन लड़ाई जारी रखेगा. रैली को संबोधित करने वाले वक्ताओं ने यह भी मांग की कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह अपना वह बयान वापस लें जिसमें उन्होंने कहा है कि सेना के जवानों ने आत्मरक्षा में गोलीबारी की थी.

इससे पहले गुरुवार को पांच जिलों में इस घटना के विरोध में नागरिक संगठनों और आदिवासी समाज ने पूर्ण बंद आयोजित किया था.

पीड़ित परिवारों का मुआवजा लेने से इनकार

इससे पहले सेना की कथित गोलीबारी में मारे गए 14 लोगों के परिवारवालों ने घटना में शामिल सुरक्षाकर्मियों को ‘न्याय के कटघरे’ में लाने तक कोई भी सरकारी मुआवजा लेने से इनकार कर दिया था.

ओटिंग ग्राम परिषद ने एक बयान में कहा कि पांच दिसंबर को जब स्थानीय लोग गोलीबारी और उसके बाद हुई झड़प में मारे गए लोगों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था कर रहे थे, तब राज्य के मंत्री पी. पाइवांग कोन्याक और जिले के उपायुक्त ने 18 लाख 30 हजार रुपये दिए.

बयान में कहा गया कि पहले उन्हें लगा कि यह मंत्री ने सद्भावना के तौर पर दिए हैं, लेकिन बाद में पता चला कि यह मारे गए और घायलों के परिवारों के लिए राज्य सरकार की ओर से अनुग्रह राशि की एक किस्त थी.

बयान में कहा गया, ‘ओटिंग ग्राम परिषद और पीड़ित परिवार, भारतीय सशस्त्र बल के 21वें पैरा कमांडो के दोषियों को नागरिक संहिता के तहत न्याय के कटघरे में लाने और पूरे पूर्वात्तर क्षेत्र से सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (आफस्पा) को हटाने तक इसे स्वीकार नहीं करेंगे.’

ज्ञात हो कि नगालैंड के मोन ज़िले में चार से पांच दिसंबर के दौरान एक असफल उग्रवाद विरोधी अभियान के दौरान सेना की गोलीबारी में कम से कम 14 नागरिकों की जान चली गई थी.

यह घटना मोन जिले के ओटिंग और तिरु गांवों के बीच यह घटना हुई थी. गोलीबारी की पहली घटना तब हुई जब चार दिसंबर की शाम कोयला खदान के कुछ मजदूर एक पिकअप वैन में सवार होकर घर लौट रहे थे.

कोहिमा में हुई पीपुल्स रैली. (फोटो साभार: नगा स्टूडेंट्स फेडरेशन)

सेना की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि जवानों को प्रतिबंधित संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड-के (एनएससीएन-के) के युंग ओंग धड़े के उग्रवादियों की गतिविधि की सूचना मिली थी और इसी गलतफहमी में इलाके में अभियान चला रहे सैन्यकर्मियों ने वाहन पर कथित रूप से गोलीबारी की, जिसमें छह मजदूरों की जान चली गई.

अधिकारियों ने बताया कि जब मजदूर अपने घर नहीं पहुंचे तो स्थानीय युवक और ग्रामीण उनकी तलाश में निकले तथा इन लोगों ने सेना के वाहनों को घेर लिया. इस दौरान हुई धक्का-मुक्की व झड़प में एक सैनिक की मौत हो गई और सेना के वाहनों में आग लगा दी गई. इसके बाद सैनिकों द्वारा आत्मरक्षार्थ की गई गोलीबारी में सात और लोगों की जान चली गई.

इस घटना के खिलाफ उग्र विरोध और दंगों का दौर अगले दिन पांच दिसंबर को भी  जारी रहा और गुस्साई भीड़ ने कोन्याक यूनियन और असम राइफल्स कैंप के कार्यालयों में तोड़फोड़ की और उसके कुछ हिस्सों में आग लगा दी.

इसके बाद सुरक्षा बलों द्वारा हमलावरों पर की गई जवाबी गोलीबारी में कम से कम एक और नागरिक की मौत हो गई, जबकि दो अन्य घायल हो गए.

इस घटना के बाद विभिन्न छात्र संगठन और राजनीतिक दल सेना को विशेष अधिकार देने वाले आफस्पा हटाने की मांग कर रहे हैं.

नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) की सांसद अगाथा संगमा ने नगालैंड में यह मुद्दा बीते सात दिसंबर को लोकसभा में उठाया था और कहा था कि पूर्वोत्तर के राज्यों से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (आफस्पा) हटाया जाना चाहिए.

उससे पहले मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा ने भी आफस्पा को रद्द करने की मांग की थी. इसके अलावा मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह और नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो भी आफस्पा को निरस्त करने की मांग उठा चुके हैं.

मणिपुर: सरकारी विज्ञापनों के बकाये को लेकर मीडिया संस्थानों की कामबंदी

इम्फालः एडिटर्स गिल्ड मणिपुर (ईजीएम) और मणिपुर हिल्स जर्नलिस्ट्स यूनियन (एमएचजेयू) की बुधवार को हुई संयुक्त बठक में फैसला लिया गया कि सरकारी विज्ञापनों के बिलों का भुगतान करने में राज्य सरकार के असफल रहने पर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक सहित राज्य के सभी मीडिया संस्थान गुरुवार से कामबंदी करेंगे.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस संयुक्त बयान में कहा गया था कि बैठक की प्रस्तावना के अनुरूप 16 दिसंबर को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर कोई न्यूज बुलेटिन या बहस का कार्यक्रम नहीं होगा, जबकि 17 दिसंबर को प्रिंट मीडिया कोई प्रकाशन नहीं करेगा.

बयान में चेताया गया कि अगर सरकार या सत्तारूढ़ पार्टियों द्वारा उचित कार्रवाई नहीं की गई तो धीरे-धीरे मणिपुर के मीडिया संस्थान मंत्रियों से संबंधित खबरों को कवर करना बंद कर देंगे.

एडिटर्स गिल्ड मणिपुर और मणिपुर हिल्स जर्नलिस्ट्स यूनियन ने सरकार से आग्रह किया कि मणिपुर मीडिया को बचाने के लिए तुरंत इस मामले पर कार्रवाई करें.

एडिटर्स गिल्ड मणिपुर के मुताबिक, उन्होंने राज्य सरकार को कई अवसरों पर मीडिया संस्थानों के समक्ष दिक्कतों विशेष रूप से बीते दो सालों में आ रहीं समस्याओं का हवाला देते हुए लंबित बिलों का भुगतान करने को कहा है.

इससे पहले दोनों संगठनों ने इन लंबित बिलों के भुगतान के लिए सरकार को 15 दिसंबर तक का अल्टीमेटम दिया था.

एडिटर्स गिल्ड मणिपुर के सचिव रूपंद्र युमनाम ने कहा, ‘किसी अन्य सेक्टर की तरह मीडिया संस्थान भी कोविड-19 से बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं. इस डर के बावजूद मीडिया ने महामारी के दौरान भी वायरस से निपटने को लेकर जनता तक महत्वपूर्ण जानकारी पहुंचाकर अपना काम किया.’

उन्होंने कहा कि हालांकि उन्हें लगता है कि सरकार बीते दो साल में मीडिया संगठनों के समक्ष आईं मुश्किलों के प्रति उदासीन रहकर मीडिया के योगदान को पहचानने में असफल रही.

उन्होंने कहा, ‘कोविड-19 की वजह से हो रहीं मौतों के बीच हम लगातार अपने कर्तव्यों का पालन करते रहे.’

रिपोर्ट के मुताबिक, यह पता चला है कि बीते दो सालों में अधिकतर मीडिया संस्थानों को प्रकाशित विज्ञापनों के लिए उनकी बकाया राशि का सरकार की ओर से भुगतान नहीं की गई है.

अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल ने सैनिकों से कहा- आम नागरिकों के साथ मित्रवत संबंध बनाएं

ईटानगर: अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) डॉ. बीडी मिश्रा ने मद्रास रेजीमेंट की 18वीं बटालियन के सैनिकों से अनुशासन कायम रखने, कठिन अभ्यास करने और आम नागरिकों के साथ मित्रवत संबंध बनाने का अनुरोध किया.

राज्यपाल ने भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 के युद्ध की याद में नई दिल्ली स्थित बटालियन की इकाई में ‘सैनिक सम्मेलन’ को संबोधित करते हुए कहा कि सभी सैन्य अभियानों में सफलता की कुंजी दृढ़ विश्वास है.

एक आधिकारिक आदेश में कहा गया कि बटालियन को 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के सिंध प्रांत स्थित थार रेगिस्तान में मुश्किल अभियान के लिए सम्मानित किया गया. डॉ. मिश्रा ने उन दिनों को याद किया, जब 17 दिसंबर, 1961 को वह युवा अधिकारी के तौर पर बटालियन में शामिल हुए थे.

उन्होंने कहा, ‘भारतीय सेना की सबसे पुरानी रेजीमेंट मद्रास रेजीमेंट ने औपनिवेशक काल में और आजादी के बाद कई अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई है. ‘थंबियों’ को उनके पराक्रम, बलिदान और कर्तव्य के प्रति समर्पण के लिए जाना जाता है.’

इस रेजीमेंट के जवानों को आम तौर पर थंबी कहा जाता है. उन्होंने कहा कि बांग्लादेश की आजादी का युद्ध भारत के सैन्य इतिहास में स्वर्णिम अध्याय है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)