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गोधरा और सिख विरोधी दंगों की जांच करने वाले रिटायर्ड जस्टिस नानावटी का निधन

न्यायाधीश नानावटी ने 2002 के गोधरा दंगों पर अपनी अंतिम रिपोर्ट 2014 में गुजरात की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को सौंपी थी. गोधरा दंगों में 1,000 से अधिक लोग मारे गए थे, जिसमें से ज़्यादातर लोग मुस्लिम समुदाय के थे. जस्टिस नानावटी ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी मंत्रिपरिषद को दंगों से संबंधित आरोपों में क्लीनचिट दी थी.

जस्टिस नानावटी. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश गिरीश ठाकुरलाल नानावटी का शनिवार को निधन हो गया. वह 86 वर्ष के थे. उन्होंने 1984 के सिख विरोधी और 2002 के गोधरा दंगों की जांच की थी.

उनके परिवार के सदस्यों ने बताया कि उनका गुजरात के अहमदाबाद स्थित अपने घर में शनिवार दोपहर एक बजकर 15 मिनट पर हृदय गति रुकने से निधन हो गया.

गुजराज हाईकोर्ट में वकील उनके छोटे बेटे मौलिक नानावटी ने बताया, ‘वह लंग फाइब्रोसिस नाम की बीमारी से पीड़ित थे और दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई. उम्र और बीमारी के कारण वह कमजोर होते जा रहे थे.’

मौलिक के अलावा उनके परिवार में उनकी पत्नी और एक अन्य अधिवक्ता बेटे धवल हैं.

न्यायाधीश नानावटी का जन्म 17 फरवरी 1935 को हुआ था. जस्टिस नानावटी के पिता भरूच के जंबूसर में एक वकील थे. उन्होंने स्नातक और फिर कानून की पढ़ाई के लिए बॉम्बे जाने से पहले अपनी स्कूली शिक्षा गुजरात में की थी.

न्यायाधीश नानावटी 11 फरवरी 1958 को बॉम्बे उच्च न्यायालय के वकील के तौर पर पंजीकृत हुए थे.

उन्हें 19 जुलाई 1979 को गुजरात उच्च न्यायालय का स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया और फिर 14 दिसंबर 1993 को उनका ओडिशा उच्च न्यायालय में तबादला कर दिया गया. नानावटी को 31 जनवरी 1994 को ओडिशा उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया.

इसके बाद उन्हें 28 सितंबर 1994 को कर्नाटक उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया. वह छह मार्च 1995 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बने और 16 फरवरी 2000 को सेवानिवृत्त हुए.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात में 2002 के गोधरा दंगों पर अपनी जांच रिपोर्ट को उन्होंने दो भागों में प्रस्तुत किया था. पहली रिपोर्ट 2008 में साबरमती एक्सप्रेस में लगाई गई आग पर केंद्रित थी, जिसमें 59 लोग मारे गए थे.  इनमें से ज्यादातर कारसेवक थे, जो अयोध्या से लौट रहे थे. दूसरी रिपोर्ट 2014 में उस घटना के बाद हुए दंगों पर केंद्रित थी, जिसे 2019 में सार्वजनिक किया गया था.

जस्टिस नानावटी ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी मंत्रिपरिषद को दंगों से संबंधित आरोपों को लेकर क्लीनचिट दी थी.

न्यायाधीश नानावटी और न्यायाधीश अक्षय मेहता ने 2002 दंगों पर अपनी अंतिम रिपोर्ट 2014 में गुजरात की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को सौंपी थी. गोधरा दंगों में 1,000 से अधिक लोग मारे गए थे, जिसमें से ज्यादातर लोग अल्पसंख्यक समुदाय के थे.

गुजरात में 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने दंगों की जांच के लिए आयोग गठित किया था.

रिपोर्ट के अनुसार, जब 2002 के गोधरा दंगों की जांच का नेतृत्व करने के लिए जस्टिस नानावटी को नियुक्त किया गया तो वह पहले से ही 1984 के सिख विरोधी दंगों में एक सदस्यीय आयोग का नेतृत्व कर रहे थे.

प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली तत्कालीन एनडीए सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त होने के तीन महीने बाद उन्हें साल 2000 में सिख विरोधी दंगों की जांच के लिए चुना गया था. साल 2005 में उन्होंने इन दंगों पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी.

इन दोनों दंगों की जांचों के बीच तुलना की गई. विशेष रूप से तथ्य यह है कि 1984 की जांच में जस्टिस नानावटी ने कई पूर्व कांग्रेस मंत्रियों के अलावा दो पूर्व प्रधानमंत्रियों- नरसिम्हा राव और आईके गुजराल की जांच की थी, लेकिन उन्होंने 2002 दंगों की जांच में मोदी को नहीं बुलाया था.

नानावटी आयोग को 2004 में मुख्यमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद की (गोधरा दंगों) भूमिका की जांच को शामिल करने के लिए विस्तार दिया गया था.

यह पूछे जाने पर कि आयोग ने मोदी से पूछताछ क्यों नहीं की, नानावटी ने साल 2014 में द इंडियन एक्सप्रेस को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने के बाद बताया था कि उन्हें किसी को भी बुलाने के लिए पर्याप्त ‘कारण’ (Justification) नहीं मिला था.

रिपोर्ट के अनुसार, नानावटी आयोग ने निष्कर्ष निकाला था कि गोधरा के बाद के दंगों में कोई साजिश नहीं थी.

आयोग के अनुसार, ‘मुसलमानों के प्रति घृणा और आक्रोश के साथ क्रोध, पिछली घटनाओं के परिणामस्वरूप विकसित हुआ, जिसने हिंदुओं के उन वर्गों को मुसलमानों और उनकी संपत्तियों पर हमला करने के लिए प्रेरित किया.’

इसके अनुसार, ‘ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि उन्होंने दूसरों द्वारा किसी प्रलोभन या उकसावे के कारण या इस विश्वास के किसी आश्वासन के कारण कि पुलिस या सरकार उनके हिंसक कृत्यों के लिए उन पर कोई कार्रवाई नहीं करेगी, इस तरह से कार्य नहीं किया है. भीड़ उग्र थी और वे कानून तथा पुलिसकर्मियों की अवहेलना करने के लिए तैयार थे. पिछले दिन गोधरा में हिंदुओं के साथ जो हुआ, उसके लिए वे मुसलमानों को दंडित करने के लिए निकले थे.’

सिख विरोधी दंगा जांच मामले में जस्टिस नानावटी ने स्पष्ट रूप से सिखों पर हमलों को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से जोड़ा था. हालांकि, उन्होंने उनके उत्तराधिकारी और बेटे राजीव गांधी को यह कहते हुए बरी कर दिया, ‘इस बात का कोई सबूत नहीं है कि राजीव गांधी या किसी अन्य उच्च रैंक के कांग्रेस (आई) नेता ने सिखों पर हमले का सुझाव दिया था या संगठित किया था.’

आयोग के अनुसार, ‘जो कुछ भी किया गया था, स्थानीय कांग्रेस (आई) नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया था और ऐसा लगता है कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत राजनीतिक कारणों से ऐसा किया है. ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि उन्होंने विशुद्ध रूप से व्यक्तिगत कारणों से ऐसा किया है.’

1984 और 2002 के दंगों की जांच के अलावा जस्टिस नानावटी ने 2005 में दिल्ली में अनधिकृत कॉलोनियों/निर्माणों के नियमितीकरण के लिए एक जांच आयोग का नेतृत्व किया था. उन्हें केंद्र द्वारा स्थायी मध्यस्थता न्यायालय के लिए नामित किया गया था और सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने पूरे भारत से मध्यस्थता के मामलों पर उनके साथ काम करना जारी रखा था.

इस साल अगस्त में उन्होंने आर्सेलर मित्तल निप्पॉन स्टील और एस्सार बल्क टर्मिनल से संबंधित एक मध्यस्थता मामले में स्वास्थ्य के आधार पर तीन सदस्यीय न्यायाधिकरण से इस्तीफा दे दिया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)