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अरुणाचल प्रदेश: छात्रसंघ ने चकमा-हाजोंग शरणार्थियों की गणना के लिए दो हफ्ते का अल्टीमेटम दिया

अखिल अरुणाचल प्रदेश छात्रसंघ ने कहा कि चकमा और हाजोंग की जनगणना स्वदेशी लोगों की सुरक्षा के लिए आवश्यक डेटा को बनाए रखने के लिए एक नियमित प्रशासनिक अभ्यास है. इस महीने की शुरुआत में प्रधानमंत्री कार्यालय से राज्य सरकार को एक पत्र मिलने के बाद यह प्रक्रिया ठप हो गई.

चकमा शरणार्थी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

ईटानगर: अखिल अरुणाचल प्रदेश छात्रसंघ (आपसू) ने 18 दिसंबर को राज्य सरकार को चकमा और हाजोंग शरणार्थियों की जनगणना के लिए 15 दिन का अल्टीमेटम दिया.

आपसू के महासचिव तबोम दाई ने यहां संवाददाताओं से कहा कि राज्य सरकार को सात दिसंबर को प्रधानमंत्री कार्यालय से एक पत्र मिलने के बाद गणना प्रक्रिया ठप हो गई.

दाई ने अरुणाचल प्रदेश सरकार से बाहरी ताकतों के हस्तक्षेप के आगे न झुकने का आग्रह करते हुए कहा, ‘शरणार्थियों की गणना प्रक्रिया हमेशा की तरह जारी रहनी चाहिए.’

उन्होंने कहा कि चकमा और हाजोंग की जनगणना स्वदेशी लोगों की सुरक्षा के लिए आवश्यक डेटा को बनाए रखने के लिए एक नियमित प्रशासनिक अभ्यास है.

इससे पहले, चकमा डेवलपमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया (सीडीएफआई) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को भेजी गई एक याचिका में अरुणाचल प्रदेश में 65,000 चकमा और हाजोंगों की नस्लीय प्रोफाइलिंग का आरोप लगाया था.

आपसू ने असम-अरुणाचल सीमा विवाद की स्थिति जानने की भी मांग की और शांति बनाए रखने के लिए संवेदनशील क्षेत्रों में पर्याप्त सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की मांग की.

मालूम हो कि मूल रूप से पूर्वी पाकिस्तान में चटगांव हिल ट्रैक्ट्स (सीएचटी) के निवासी चकमा बौद्ध हैं. उसी क्षेत्र, जो अब बांग्लादेश में हैं, से आने वाले हाजोंग हिंदू हैं.

चकमा-हाजोंग असम सहित कई पूर्वोत्तर राज्यों में फैले हुए हैं. 1962 में पूर्वी पाकिस्तान द्वारा कप्ताई बांध को शुरू करने, जिससे इन अल्पसंख्यक समुदायों का बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ, के बाद ये शरणार्थी खुली सीमाओं के रास्ते भारत पहुंचे थे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)