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दामोदर मौउजो को मिले ज्ञानपीठ पुरस्कार के बहाने क्या दक्षिणपंथी अतिवाद पर चर्चा शुरू होगी

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कोंकणी लेखक दामोदर मौउजो के पास वह क्षमता है जो उन्हें तात्कालिक बात से आगे देखने का मौक़ा देती है, जिसने उन्हें इस बात के लिए भी प्रेरित किया है कि वह ताउम्र महज़ कलम और कागज़ तक अपने को सीमित न रखें बल्कि सामाजिक-राजनीतिक तौर पर अहम मुद्दों पर भी बोलें, यहां तक कि समाज में पनप रहे दक्षिणपंथी विचारों, उनकी डरावनी हरकत के बारे में भी मौन न रहें.

दामोदर मौउजो. (फोटो साभार: फेसबुक/@damodar.mauzo)

नोबेल पुरस्कार विजेता महान पोर्तुगीज लेखक जोसे सारामागो (1922-2010) का एक बेहद चर्चित उपन्यास है ‘ब्लाइंडनेस’ (दृष्टिहीनता). उपन्यास किसी अजनबी शहर में एक संक्रमण की तरह फैली अंधत्व की बीमारी और उसके बाद हुए सामाजिक विघटन आदि पर बात करता है. अपने वामपंथी विचारों के लिए जाने जाते सारामागो का उपन्यास महामारी के दिनों में हमारे अनुभवों की याद दिला सकते हैं.

एक बड़ा रचनाकार दरअसल एक भविष्यवेत्ता भी कहा जा सकता है, जो अपने कलाम में, अपनी रचनाओं में हमारे भविष्य को पढ़ रहा होता है, भले ही हम गौर करना चाहें या ना करना चाहें.

इस साल ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कोंकणी लेखक दामोदर मौउजो के उपन्यासों, कहानियों में अक्सर हम उस आसन्न भविष्य से रूबरू होते हैं और अपने आप से पूछ बैठते हैं कि दक्षिणी गोवा के अपने गांव माजोरडा के अपने दुकान में बैठे हुए अपनी साहित्य रचना शुरू किए इस लेखक ने आखिर कहां उस भविष्य का स्पंदन महसूस किया होगा.

प्रश्न उठता है कि आज जब साहित्य के क्षेत्र में ‘अभूतपूर्व योगदान’ के लिए वह सम्मानित हो रहे हैं, तो क्या इस बहाने उठी चर्चा महज साहित्य की सीमाएं तक ही महदूद रहेगी या शेष समाज को अपने आगोश में ले लेगी. क्या हमारे जिस भविष्य को वह अपनी कहानियों, उपन्यासों में चित्रित कर रहे हैं, या सार्वजनिक तौर पर ऐसे मसलों पर भी बोलते रहे हैं, हम उस पर भी इसी बहाने बात करेंगे?

कोंकणी के जानकार उनके सबसे चर्चित उपन्यास ‘कारमेलिन’ (1980) की बात करते हैं- जो अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में भी अनूदित हुआ है- जिसमें उन्होंने मध्य पूर्व के देशों में आया बनकर या घरेलू कामगार बनकर जाने वाली महिलाओं द्वारा झेली जाती यौनिक तथा अन्य प्रताड़नाओं के बारे में लिखा था, जबकि उस परिघटना की कोई चर्चा नहीं थी या उनकी बहुचर्चित कहानी ‘बर्गर’ को देखें, जिसमें दो स्कूली बच्चियां इरेन और शर्मिला, जो गहरी दोस्त भी हैं, उनके बहाने बीफ को लेकर हमारे समाज में बाद में उठाए गए विवाद की झलक दिख जाती है.

दरअसल स्कूल में अपना खाना एक दूसरे से शेयर करने के बाद खुशी-खुशी घर लौटी इरेन को उसकी मां बताती है कि तुमने शर्मिला को बीफ रखा बर्गर दिया और उसका ‘धर्म भ्रष्ट किया’. पापबोध से ग्रस्त छोटी इरेन बाद में चर्च पहुंचती है और ईसा की मूर्ति के सामने माफी मांगती है/कन्फेशन देती है.

या आप उनकी एक अन्य कहानी में अपने दुधारू पशुओं को बेचने के लिए गोवा पहुंचे किसी दलित युवक की आपबीती बताता है, जब उसका गौ आतंकियों से सामना होता है, जो उस पर तरह तरह के आरोप लगाते हैं और उसको प्रताड़ित करते है.

शायद उनकी ‘तीसरी आंख’ की यही वह क्षमता है जो उन्हें तात्कालिक और स्वतः स्पष्ट से आगे देखने का मौका देती है, जिसने उन्हें इस बात के लिए भी प्रेरित किया है कि वह ताउम्र महज कलम और कागज का समीकरण बनाए रखने तक अपने आप को सीमित न रखें बल्कि ऐसे मुद्दों पर- जो सामाजिक-राजनीतिक तौर पर अहम हैं – उन पर भी अपनी जुबां खोले, और यहां तक कि समाज में पनप रहे दक्षिणपंथी विचारों, तंजीमों के बारे में, उनकी डरावनी हरकत के बारे में भी मौन न रहें.

बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि प्रोफेसर कलबुर्गी की हत्या के बाद (2015) में उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता की हिमायत में जोरदार बात कही थी और ‘एकल संस्कृतिवाद के हिमायतियों द्वारा की जाने वाली नैतिक पहरेदारी’ को जमकर लताड़ा था; जनवरी 2016 का दांडी, गुजरात का व्याख्यान तो कई मायनों में बाद की हिंसक घटनाओं के बारे में आगाह कर हा था.

मौउजो ने अपने इस भाषण में बताया था कि जहां उन्हें फख्र है कि वह आपसी सद्भाव में रहने वाले लोगों से बने गोवा के रहने वाले हैं, वहीं वह इस बात से शर्मिंदा भी है, यहीं पर ‘सनातन संस्था’ जैसे संगठन सक्रिय रहे हैं. उनकी यही वह सन्नद्वता रही है जिसने उन्हें प्रेरित किया कि 2019 के चुनावों के पहले वह नागरिकों के नाम अपील जारी करें कि ‘इस फासीवादी निज़ाम को शिकस्त दो.’

निश्चित ही गोवा के राजनीतिक सामाजिक घटनाक्रम पर निगाह रखने वाला बता सकते हैं या दक्षिणपंथ का कोई अध्येता भी बता सकता है कि ‘सनातन संस्था’ और ‘हिंदू जनजागृति समिति’ होने के क्या मायने हैं?

विगत डेढ़ दशक से अधिक समय से किस तरह यह संगठन और उनके कार्यकर्ता कानून और व्यवस्था की रखवाली जांच एजेंसियों के निशाने पर आते रहे हैं और वजह रही है दक्षिणपंथी अतिवाद की घटनाओं में इनकी या इनके कारिंदों की कथित सहभागिता तथा विभिन्न स्तरों पर उन्हें मिलता राजनीतिक संरक्षण.

बमुश्किल तीन साल पहले यह बात भी उजागर हुई कि दक्षिणपंथी अतिवाद के अपने समझौताहीन विरोध के चलते दामोदर मौउजो का नाम भी उस ‘हिट लिस्ट’ में मिला, जो आतंकी घटनाओं में गिरफ्तार कुछ कार्यकर्ताओं- जो कथित तौर पर इन संगठनों से जुड़े थे- से बरामद हुई थी.

याद कर सकते हैं कि चर्चित पत्रकार, संपादक और सांप्रदायिकता के खिलाफ एक बुलंद आवाज़ रही गौरी लंकेश की हत्या के बाद जब कर्नाटक सरकार द्वारा गठित एटीएस ने अपनी जांच शुरू की तथा इन संगठनों से कथित तौर पर संबंद्ध रहे 14 लोगों को पकड़ा तब उस हिट लिस्ट का पता चला जिसमें विद्वानों, लेखकों, कार्यकर्ताओं आदि के नाम थे- जिसमें गिरीश कर्नाड भी थे, तर्कशील लेखक अनुवादक केएस भगवान भी थे, कर्नाटक के ही योगेश मास्टर, पत्रकार निखिल वागले भी थे, दामोदर मौउजो भी थे.

इसमें कोई दोराय नहीं कि कर्नाटक की पुलिस ने जिस पेशेवर तरीके से इस जांच को अंजाम दिया, जिसने यह समूचा आतंकी नेटवर्क उजागर हो सका. उसने महाराष्ट्र के आतंकवाद विरोधी दस्ते को जो जानकारियां प्रदान की, उसके बाद उसे इस मसले पर आगे बढ़ने का मौका मिला और एक तरह से कार्रवाई करने के लिए मजबूर भी होना पड़ा.

जान से मारे जाने की इन विधिवत योजना के उजागर होने के बाद भी न दामोदर मौउजो के स्वर धीमे हुए, न बाकी किसी ने अपनी आवाज़ मद्धिम की. इस हिट लिस्ट में शामिल जाने-माने पत्रकार निखिल वागले ने उन्हीं दिनों अपने एक लेख में उठाया गया प्रश्न अधिक गौरतलब है.

उन्होंने पूछा था, ‘अगर भारत सरकार ‘सिमी’ या जाकिर नायक के संगठन पर पाबंदी लगा सकती है तो आखिर क्या बात उसे हिंदुत्व अतिवादी समूहों पर पाबंदी लगाने से रोक रही है? क्या इस संगठन को दंडमुक्ति इसी वजह से मिली है क्योंकि वह हिंदू समूह हैं?’

याद कर सकते हैं कि जिन दिनों इस हिट लिस्ट का खुलासा हो रहा था कि उन्हीं दिनों मुंबई के पास स्थित नालासोपारा में महाराष्ट्र पुलिस ने छापा डालकर किसी वैभव राउत के घर से ढेर सारे बम, जिलेटिन स्टिक्स, तीस से अधिक विस्फोटक, अख़बार में लपेटकर रखी गई 150 ग्राम सफेद पावडर आदि को बरामद किया.

उसके साथ उसके चार अन्य साथियों को भी जगह जगह से गिरफ्तार किया. पता चला कि इस आतंकी समूह ने मुंबई, पुणे, सातारा और नालासोपारा के इलाकों में विस्फोटों की योजना बनाई थी ताकि सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ा जा सके, दंगें हों आदि. उनकी यह खास कोशिश थी कि गणेशोत्सव, ईद के इस आसन्न मौसम में इन बमों को इस तरह रखा जाए ताकि अधिक से अधिक जीवित हानि हो सके.

यहां इसको भी जानना जरूरी है आखिर सनातन संस्था का नाम पहली बार कब सुर्ख़ियों में आया?

ध्यान रहे कि सनातन संस्था का नाम देश के पैमाने पर मालेगांव बम विस्फोट (सितंबर 2008) के चंद माह पहले पहली बार तब सुर्खियां बना था, जब वाशी, ठाणे आदि स्थानों पर हुए बम विस्फोटोें को लेकर महाराष्ट्र एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड के प्रमुख हेमंत करकरे ने इस संगठन के कथित तौर पर संबद्ध कार्यकर्ताओं को पकड़ा था, जिनमें से दो को बाद में बंबई सत्र न्यायालय ने (रमेश हनुमंत गडकरी उम्र 53 और विक्रम विनय भावे उम्र 29) को विस्फोटक पदार्थ रखने एवं उसके इस्तेमाल का दोषी पाया तथा दस साल की सज़ा भी सुनाई थी.

जांच में पुलिस के सामने यह तथ्य भी आए थे कि उपरोक्त संस्था एक तरफ जहां ‘आध्यात्मिक मुक्ति’ की बात करती है ‘सदाचार/धार्मिकता की जागृति’ की बात करती है, एक ऐसी दुनिया जो ‘साधकों और जिज्ञासा रखने वालों के सामने धार्मिक रहस्यों को वैज्ञानिक भाषा में पेश करने का मकसद रखती है’ और ‘जो साप्ताहिक आध्यात्मिक बैठकों, प्रवचनों, बाल दिशानिर्देशन वर्गों, आध्यात्मिकता पर कार्यशालाओं’ आदि का संचालन करती है, मगर दूसरी तरफ वहां ‘शैतानी कृत्यों में लगे लोगों के विनाश’ को ‘आध्यात्मिक व्यवहार’ का अविभाज्य हिस्सा समझा जाता है. (देखें, ‘साइंस ऑफ स्पिरिच्युआलिटी’ जयंत आठवले, वाल्यूम 3, एच – सेल्फ डिफेंस ट्रेनिंग, चैप्टर 6, पेज 108-109) और यह विनाश ‘शारीरिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर’ करना है.

गौरतलब है कि इस ‘धर्मक्रांति’ को सुगम बनाने के लिए साधकों को हथियारों- राइफल, त्रिशूल, लाठी और अन्य हथियारों का प्रशिक्षण भी दिया जाता रहता है.

अक्तूबर 2009 में इस संगठन से कथित तौर पर संबद्ध दो आतंकी- मालगोंडा पाटिल और योगेश नायक- मडगांव बम विस्फोट में तब मारे गए थे जब वे दोनों नरकासुर दहन नाम से समूचे गोवा में लोकप्रिय कार्यक्रम के पास विस्फोटकों से लदे स्कूटर पर जा रहे थे और रास्ते में ही विस्फोट हो जाने से न केवल उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ा बल्कि उनकी समूची साजिश का भी खुलासा हुआ.

मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि वे पुलिस को भी गुमराह करना चाह रहे थे ताकि सारा दोष मुसलमानों के माथे जाए. इस हमले के लिए उनके स्कूटर से बरामद हुई दिल्ली के खान मार्केट से खरीदा गया बैग, अल्पसंख्यको में प्रयोग में आने वाला पारंपरिक किस्म का इत्र और बासमती चावल का एक खाली झोला जिसमें सब उर्दू में लिखा था, इन सामानों से वे अपना यह लक्ष्य हासिल करना चाह रहे थे. (देखें, ‘इंडियन एक्स्प्रेस, 8 नवंबर 2009 ‘गोवा बॉम्बर्स ट्राइड टू लीव मुस्लिम इंप्रिंट’, प्रशांत रांगणेकर)

बाद में यह बात भी पता चली कि सनातन संस्था एवं उसके सहयोगी संगठन हिंदू जनजागृति समिति के कार्यकर्ता दिवाली के वक्त नरकासुर बनाने और उसके दहन की लम्बी परंपरा के खिलाफ लंबे समय से अभियान चलाते रहे हैं. उनका कहना रहा है कि इस तरह एक राक्षस की झांकी तैयार करना शैतान का महिमामंडन करना है और यह हिंदू संस्कृति का अपमान है.

बाद में जब मारे गए इन साधकों- मालगोंडा पाटिल और योगेश नायक- जैसों के साथ अपने संबंध से ‘सनातन संस्था’ ने इनकार किया, उस वक्त़ डॉ. नरेंद्र दाभोलकर ने पणजी में आयोजित एक जनसभा में यह प्रश्न उठाया था (Vidyadhar Gadgil “Going soft on Terrorism”, Herald, Panjim, Goa, 30 Novemeber 2009)

… आखिर ऐसा क्यों होता है कि संस्था के कार्यकर्ता अक्सर उसी किस्म का ‘गलत रास्ता’ अपनाते हैं और अधिक विचारणीय यह है कि आखिर इस तर्क को किस तरह स्वीकार किया जाता है और एक संस्था के तौर पर कोई कार्रवाई हुए बिना ही संस्था बेदाग छूटती है?

यह बात भी अविश्वसनीय लगती है कि सनातन संस्था से संबद्ध कुछ स्वेच्छाचारी कार्यकर्ता, एक बेहद अनुशासित एवं गोपनीय संगठन से स्वतंत्रा होकर विस्फोटों को अंजाम दें तथा इस पूरे प्रसंग की संगठन के किसी वरिष्ठ नेता को कोई जानकारी तक न हो.’

ठाणे, वाशी, मडगांव, सन्कोले इन संगठनों की विवादास्पद गतिविधियों को लेकर अन्य ढेर सारी बातें की जा सकती हैं. कोई भी न्यायप्रिय व्यक्ति यही उम्मीद करेगा कि मुल्क का कानून- जो आस्था, धर्म, जाति, नस्ल आदि किसी भी आधार पर भेदभाव का विरोध करता है- उसे इस मामले में भी काम करने दिया जाएगा और उस पर कोई अतिरिक्त दबाव नहीं आएगा.

वैसे अब तक का सरकारी रिकॉर्ड- जो भले ही केंद्र में सत्तासीन हुकूमत का हो या राज्य में सत्तासीन सरकारों का हो- कम से कम सनातन संस्था एवं उसके सहोदर संगठनों के बारे में रुख तय करने के मामले में, उत्साहित करने वाला नहीं है.

अगर हम पीछे मुड़कर देखें तो ढेर सारे मासूमों का खून बहने से बचा जा सकता था, अगर महाराष्ट्र सरकार ने- जब वहां कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की साझा सरकार थ – और केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्ववाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार थी, तत्कालीन एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे के प्रस्ताव पर गौर किया होता (26 नवंबर 2008 के आतंकी हमले में जिनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हुई थी) जिन्होंने खुद पनवेल थाने बम विस्फोटों की जांच की थी और इसमें कथित तौर पर मुब्तिला सनातन संस्था पर पाबंदी लगाने की मांग की थी.

मुमकिन है कुछ अंतराल बीतने की वजह से हिट लिस्ट का खुलासा होने पर जो एक चिंताजनक स्थिति बनी थी, उससे हम उबरे हों लेकिन अपने आप में यह विचार कितना विचलित करने वाला है कि लेखक, बुद्धिजीवी, कार्यकर्ता- वे सभी जो संविधान के दायरे में ही रहकर काम करते हैं- वे किसी मिलिटेंट संगठन की हिट लिस्ट पर हैं.

यह संभावना भी है कि बहुसंख्यकवाद के हमारे व्यापक समाज में अधिकाधिक सामान्य होते जाने के साथ इस पूरे मसले की गंभीरता का एहसास कम हो जाए, लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि ऐसा करके हम अपना ही नुकसान कर रहे हैं.

आज यह सब हमारे सामने ही है कि आक्रामक बहुसंख्यकवाद के आगमन के बाद लगातार यह कोशिश जोरों पर है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों को आज़ाद भारत में अपनी ‘हैसियत’ बताई जाए, गुड़गांव में खाली जगहों पर- सरकार द्वारा तयशुदा जगहों पर- मुसलमानों को नमाज़ न पढ़ने देना या धर्मांतरण के नाम पर ईसाई चर्च /संस्थाओं पर हमले करना उसी बहुसंख्यकवादी परियोजना का अंग है. और ऐसे हमलों को कानून व्यवस्था के रखवाले भी कहीं-कहीं सहमति देते दिखते हैं.

छह माह पहले फेसबुक सुर्ख़ियोंमें था, जिसने ऐसे कुछ खातों को बैन किया था, क्योंकि वह नफरत फैला रहे थे, जिनमें सनातन संस्था का भी नाम था, क्योंकि फेसबुक ने पाया था कि वह उसके दिशानिर्देशों को मान नहीं रहा है. लेकिन बाद में पता चला कि यह महज दिखावटी कार्रवाई थी. सनातन संस्था से जुड़े अधिकतर पेज सक्रिय थे.

यह देखना बाकी है कि अब आगे क्या होगा? क्या समाज में विघटन, विभाजन, नफरत फैलाने वाले संगठनों के बारे में हम अपना मुंह नहीं खोलेंगे.

हम मौउजो के एक और भाषण को याद कर सकते हैं, जिसमें उन्होंने ऐसे मसलों पर मौन को सुविधाजनक मौन कहा था और आह्वान किया था कि हमारा मौन ऐसे ताकतों को नई वैधता देता है, नई ताकत प्रदान करता है.

(सुभाष गाताडे वामपंथी एक्टिविस्ट, लेखक और अनुवादक हैं.)