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हां, हम आंदोलनजीवी हैं, आपने हमने मज़बूर किया है: मेधा पाटकर

एक कार्यक्रम में जनांदोलनों की ज़रूरत रेखांकित करते हुए मानवाधिकार कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने कहा कि आज केंद्र की नीतियों की वजह से वंचित समुदाय हाशिए पर धकेल दिए गए हैं, ग़रीबों के सभी विकल्प उनसे छीन लिए गए हैं, इस वजह से उन्हें सड़कों पर निकलना पड़ रहा है.

मेधा पाटकर. (फोटो साभार: फेसबुक/@MedhaPatkarNBA)

नई दिल्लीः मानवाधिकार कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आंदोलनजीवी तंज पर जवाब देते हुए कहा कि हां, हम आंदोलनजीवी हैं क्योंकि आपने हमनें आंदोलनजीवी बनने के लिए विवश किया है.

पाटकर ने कहा, ‘आज केंद्रीकृत नीतियों की वजह से समाज के वंचित समुदाय के लोग हाशिए पर धकेल दिए गए हैं, गरीबों के सभी विकल्पों को उनसे छीन लिया गया है इस वजह से उन्हें सड़कों पर निकलना पड़ रहा है.’

देश में बड़े बांधों के खिलाफ 36 सालों तक सतत आंदोलन कर चुकीं पाटकर ने रविवार को कई शहरों की ओर बांध के पानी के एकतरफा वितरण का उल्लेख किया जबकि सौराष्ट्र और कच्छ जैसे कई इलाके अभी भी जल संकट का सामना कर रहे हैं.

पाटकर 19 दिसंबर को दिवंगत भूमि अधिकार कार्यकर्ता की पुण्यतिथि पर चुन्नीभाई वैद्य स्मृति व्याख्यान दे रही थीं.

चुन्नीभाई को चुनीकाका के नाम से भी जाना जाता है. उन्हें अपने अहिंसक संघर्षों की वजह से गुजरात का नया गांधी भी कहा जाता था.

गुजरात लोक समिति के जरिए उनके जन आंदोलनों ने कई बड़े कॉरपोरेट घरानों को अपनी योजनाओं से पीछ हटने या उनमें सुधार करने के लिए मजबूर किया.

पाटकर ने किसान आंदोलन का हवाला देकर कहा कि ऐसा जन आंदोलन के बिना संभव नहीं होता.

बता दें कि किसानों के लगभग सालभर आंदोलन की वजह से भाजपा सरकार को विवादित तीन कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा.

उन्होंने कहा, ‘हमने अच्छे जजों को भी देखा है, जिन्होंने झुकने से पहले और बीच का रास्ता खोजने से पहले एक स्तर तक राजनीतिक दबाव का सामना किया. हमने ऐसे जजों को अयोध्या से लेकर कश्मीर तक देखा है और फिर उन्हें राज्यसभा की सदस्यता लेते भी देखा है.’

जन आंदोलनों की जरूरत पर जोर देते हुए पाटकर ने कहा, ‘हम कानूनी लड़ाई लड़ सकते हैं और हमें नौकरशाहों एवं जजों के बीच समर्थक भी मिल सकते हैं लेकिन इस क्षेत्र में जन आंदोलनों के बिना बहुत कम ही बदलाव देखने को मिलेंगे.’

उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय फंडिंग एजेंसियों के स्तर पर भी लड़ने का समय आ गया है, जो आदिवासियों और दलितों की चिंताओं को समझते तो हैं लेकिन उनके खिलाफ ही नीतियों को लागू करने के लिए सरकारी एजेंसियों को फंड भी देते हैं.

पाटकर ने कहा, ‘उनका (सरकार) आरोप है कि हमें आपने आंदोलनों के लिए विदेश से फंड मिलता है जबकि मैंने अपनी पुरस्कार राशि तक लौटा दी थी लेकिन इस तथाकथित पीपीपी मॉडल नीतियों को लागू करने के लिए बड़ी धनराशि देश में आ रही है.’

उन्होंने कहा, ‘पीएम केयर्स फंड और आपदा प्रबंधन के लिए कितना विदेशी फंड आया? वहां पैसा कहा हैं?’

उन्होंने कहा कि सरकार का दावा है कि उनके पास आदिवासियों, भूमिहीनों, गरीबों और किसानों के लिए पैसा नहीं है लेकिन सेंट्रल विस्टा, सरदार पटेल की प्रतिमा के लिए उनके पास पैसा हैं. उनके पास बड़े कॉरपोरेट का एनपीए माफ करने के लिए 68,000 करोड़ रुपये हैं.

पाटकर ने अपने आंदोलन को याद करते हुए कहा कि किस तरह नर्मदा बचाओ आंदोलन ने विश्व बैंक को सरदार सरोवर परियोजना के लिए दी गई फंडिंग को वापस लेने के लिए मजबूर किया था.

पाटकर ने कहा, ‘नर्मदा पर विश्व बैंक के आंतरिक दस्तावेज में कहा गया है कि उन्हें आदिवासी क्षेत्रों में प्रवेश मिलेगा.’

पाटकर ने कहा, ‘छोटे स्तर के सभी संघर्ष बड़े स्तर पर आंदोलनों का निर्माण करने के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो सभी स्तरों पर विकास के प्रतिमान पर सवाल उठाते हैं. चुन्नीकाका ने कहा था कि गांव की जमीन, गांव की है लेकिन क्या अब ऐसा है? क्या जल, जंगल, जमीन पर ग्रामीणों का नियंत्रण है, जिन्हें कॉरपोरेट सेक्टर, खनन माफियाओं को दिया जा रहा है. तीन स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था कहां है?’

उन्होंने कहा कि जन आंदोलनों का कोई विकल्प नहीं है.

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