भारत

मोदी और उनका हिंदुत्व ब्रिटिश राज और उसकी नीतियों के साक्षात वंशज हैं…

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनेक नीतियां अंग्रेजों के साम्राज्यवादी शासन से निकली हैं और उनसे असंतोष ज़ाहिर करने वालों को एक ख़तरे के तौर पर देखती हैं, ठीक वैसे ही जैसे अंग्रेज़ देखा करते थे.

(फोटो: Sautrik144/CC BY-SA 3.0, इलस्ट्रेशन: द वायर)

कई टिप्पणीकारों की तरह ही मैं यह जानने के लिए उत्सुक रहा हूं कि जो भारत में हो रहा है, उसे कैसे समझा जाए. औपनिवेशिक गुलामी से मिली आजादी के बाद काफी हद तक मजबूत रहे लोकतंत्र के निरंकुश और भ्रष्ट तानाशाही, जहां उग्र हिंदुत्व और ज़ेनोफोबिया यानी बाहरियों के प्रति द्वेष लगातार बना हुआ है, के पतन को लेकर मैं हैरान हूं.

हमेशा की तरह हमारे पास कई व्याख्याएं मौजूद हैं, जिनकी क्रोनोलॉजी 2014 में भारत में नरेंद्र मोदी के सबसे ताकतवर बनने से लेकर, 2019 में भारतीय मतदाताओं द्वारा उन्हें फिर से शासन सौंपने तक फैली है. इसी क्रोनोलॉजी में और पीछे जाएं तो जब 2002 में गुजरात में मोदी ने दिखाया कि कैसे मुसलमानों का सफाया करना है और इस तरह उन्होंने अपने दिल्ली कूच करने की भूमिका तैयार की, वहां से लेकर 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाने तक यह क्रोनोलॉजी फैली है.

अन्य क्रोनोलॉजी और पीछे जाती हैं. विभाजन के घावों और 1975-77 के आपातकाल तक जाती हैं, जब भले ही अस्थायी तौर पर ही सही लेकिन इंदिरा गांधी ने दिखाया कि भारतीय लोकतंत्र का गला घोंटना कितना आसान था. अन्य घटनाएं क्रोनोलॉजिकल नहीं हैं लेकिन ज़मीन पर उनका असर रहा है और वे दक्षिणपंथी तानाशाही के प्रति वैश्विक झुकाव की ओर इशारा करती हैं.

इन सभी क्रोनोलॉजी के पास उन्हें आकर्षक और स्वीकार्य बनाने के लिए कुछ न कुछ है. बहरहाल, मेरे पास पेश करने के लिए एक और क्रोनोलॉजी है जो हिंदुत्व के सतही स्वभाव के विपरीत चलती है और इसकी सार्वजनिक छवि को लेकर बनी सामान्य समझ के विपरीत है.

यह क्रोनोलॉजी वर्तमान भाजपा शासन का 19वीं सदी के मध्य के उस महत्वपूर्ण कालखंड से जुड़ाव स्थापित करती है जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी ने क्वीन की 1858 की घोषणा के जरिये ब्रिटिश साम्राज्य के लिए रास्ता बनाया, जिसने भारत को अंग्रेजी हुकूमत के ताज में सबसे अनमोल रतन बना दिया.

इस क्रोनोलॉजी में मैं मोदी शासन और इसके सभी क्षेत्रीय क्षत्रपों को भारत में अंग्रेजी हुकूमत के चरमोत्कर्ष काल के प्रत्यक्ष वंशजों के रूप में देखता हूं. अंग्रेजी हुकूमत का चरमोत्कर्ष 1860 के दशक और इसके बाद के दशकों में रखा जा सकता है. वर्तमान भाजपा शासन ब्रिटिश साम्राज्य 2.0 है.

वह क्या है जो इस तुलना या समानता को सही साबित करता है? पहला, अंग्रेजों ने भारत में मुगल शासन को बदनाम करने और कुख्यात बनाने में बहुत मेहनत की. वे आमतौर पर भारत के मुस्लिम शासकों को निर्दयी, निरंकुश, अत्याचारी, दमनकारी, हिंसक, भ्रष्ट और कुटिल-कपटी के रूप में देखते थे. उन्होंने अठाहरवीं सदी को अराजक ठहराया और खुद को इस अराजकता के बीच शांति व अनुशासन लाने वाले रहनुमा के रूप में देखा.

विभाजन के बाद और भारत में कांग्रेस शासन को लेकर यही नजरिया भाजपा का है. अंग्रेजों के मुस्लिम विरोधी विचार आरएसएस और इसकी वंशज भाजपा को सीधे विरासत में मिले थे. बेशक, अंग्रेजों को हिंदुओं, खासकर कि ब्राह्मणों, से भी घृणा थी और उन्हें तिरस्कार की भावना से देखते थे. उन्होंने हिंदू धर्म को अंधविश्वास, मूर्तिपूजा और चापलूसी की पराकाष्ठा के तौर पर देखा.

यहां यह याद करने की जरूरत है कि अंग्रेजों ने हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों, सती प्रथा, विधवा पुनर्विवाह और अन्य, के खिलाफ क़ानूनी कदम उठाकर खुद को हिंदू धर्म के सच्चे सुधारक के रूप में देखा. मोदी भी वैसे ही एक हिंदू सुधारक हैं जो हिंदू धर्म के स्त्रैण, तकनीकी विरोधी और सहिष्णु तत्वों के स्थान पर हिंदुत्व के पितृसत्तात्मक, विकासवादी और मर्दाना संस्करण को स्थापित करके धर्म का शुद्धिकरण के लिए प्रतिबद्ध हैं. उनके शासन को नरम, स्त्रैण और अति-सहिष्णु नेहरूवादी हिंदू धर्म के लचीले मानस के भीतर रूढ़िवादी इस्लामिक डीएनए रचाने- बसाने के रूप में देखा जा सकता है.

इस रचना के दोनों हिस्से 19वीं सदी में शुरू होने वाले हिंदू धर्म और इस्लाम के ब्रिटिश विचारों का प्रत्यक्ष दर्पण हैं. जैसे ही हम 21वीं सदी में आते हैं, ठीक अंग्रेजों की तरह ही मोदी और उनके करीबी सहयोगी भी कांग्रेस के नेहरूवादी और गांधीवादी दोनों स्वरूपों के प्रति घृणा दिखाते हैं.

स्वराज के लिए भारतीयों को लामबंद करके एक आंदोलन खड़ा करने वाले गांधी को अंग्रेजों ने नंगा फकीर बताकर उनका तिरस्कार किया और वे नेहरू के लिए भी कोई खास सम्मान नहीं रखते थे. इंग्लैंड के हैरो स्कूल से पढ़े नेहरू को उन्होंने ‘विश्वासघाती हैरोवियन’ की उपाधि दी थी, जिसने गांधी का उत्तराधिकारी बनने के लिए अपने अंग्रेजी आकाओं को भी बेच डाला. मोदी ने गांधी और नेहरू के लिए अपनी घृणा अंग्रेजों से ही सीखी है.

लेकिन दूसरे मायनों में मोदी भी साम्राज्यवादी ब्रिटेन के वंशज हैं. वह राजद्रोह, स्वतंत्र अभिव्यक्ति और जुटकर विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार के संबंध में औपनिवेशिक क़ानूनों के सबसे कठोर प्रावधानों का इस्तेमाल (अपने दाहिने हाथ अमित शाह के सहयोग से) करना पसंद करते हैं. वह ऐसा क़ानूनी ढांचा पसंद करते हैं जिसमें सैन्य और पुलिस शक्तियां दिल्ली के ही नियंत्रण में रहें.

वह कार्यकारी शक्तियों का लुत्फ उठाना पसंद करते हैं, चाहे वह ऐसा अधिकारियों से खुफिया जानकारी निकलवाने के जरिये करें या आयकर और प्रवर्तन प्राधिकरणों, सीमा शुल्क विभाग के जरिये या फिर भारतीय रिजर्व बैंक के माध्यम से. ये सभी उनके आदेश पर उन्हें उनकी शाही सनक के अनुरूप नीति प्रणाली को तोड़ने-मरोड़ने की अनुमति देते हैं.

यही उनकी अजीबोगरीब आर्थिक नीतियों पर भी लागू होता है, खासकर कि नोटबंदी, जीएसटी या हाल ही में वापस लिए गए कृषि क़ानूनों के संबंध में उन्होंने वास्तविकता से परे जो फैसले लिए. ये सभी वे नीतियां हैं जो राष्ट्रहित और आर्थिक विकास के अधिकांश मापदंडों के संदर्भ में कोई मायने नहीं रखतीं.

कई विश्लेषक इस बात से सहमत हैं कि पिछले पांच वर्षों में भारत अधिकांश वैश्विक आर्थिक सूचकांकों में बुरी तरह पिछड़ गया है. और सत्ता परवाह करती नहीं दिख रही है. अगर वे ब्रिटिश साम्राज्य के प्रत्यक्ष वंशज हैं तो यह पूरी तरह से समझ आता है.

जो मोदीनॉमिक्स या मोदी अर्थशास्त्र है, उसका मकसद है राष्ट्रीय संपदा को अडाणी-अंबानी और उनके असंख्य क्षेत्रीय व स्थानीय प्रतिरूपों को स्थानांतरित करना. ये सभी स्थानीय मिलिशिया और भ्रष्ट स्थानीय अधिकारियों के समर्थन से भारतीय नदियों, मिट्टी, जंगलों और खेतों का खून चूस रहे हैं. ये स्थानीय कुलीन और संभ्रांत वर्ग औपनिवेशिक काल के उस वर्ग की प्रतिकृति है जो देश को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा था, जिसने शहरी और देश के संभ्रांत वर्ग के हित साधते हुए स्थानीय संसाधनों को निगल लिया.

भारत की ब्रिटिश साम्राज्यिक व्यवस्था शाही राजकोष और लंदन के ब्रिटिश राज्य के खजाने के इशारों पर चलती थी, आज यही काम अर्थव्यवस्था के शीर्ष पर बैठे कुछ कुलीन और अभिजात वर्ग के भारतीयों की वैश्विक तिजोरियों और गिने-चुने खातों से होता है, जिन्हें खुशी से अपना कुछ काला धन भाजपा की चुनावी मशीन में खपा देने से कोई गुरेज नहीं है. दोनों ही मामलों में राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था एक गुल्लक दिखाई देती है जिसे शासक की मांग पर भरा और खाली किया जाता है. विकास से इसका कुछ लेना-देना नहीं है.

अंतिम दो तत्व मोदित्व के लिए मेरे इस वंशावली अध्ययन को सही ठहराते हैं. गौर करिए अजीत डोभाल के हालिया भाषण पर जिसमें उन्होंने इस बारे में अपने विचार रखे थे कि आज का रणनीतिक युद्ध सिविल सोसाइटी (नागरिक समाज) के मंच से लड़ा जा रहा है. वास्तव में यह किसी, यहां तक कि अस्थिर लोकतांत्रिक समाज, के किसी प्रमुख प्रवक्ता द्वारा दिया गया एक असाधारण बयान है.

डोभाल का उद्देश्य ‘लोगों’ के बीच एक गहरे वैचारिक अवरोध पैदा करना है. ‘लोगों’ से आशय उन मतदाताओं से है जिन्होंने कार्यपालिका को पूर्ण अधिकार प्रदान किया है. और ‘सिविल सोसाइटी’ से उनका मतलब कलाकारों, विद्वानों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सरकार के आलोचकों से है. अब इन्हें ‘अर्बन नक्सली’ या खान मार्केट की भीड़ या टुकड़े-टुकड़े गैंग के रूप में बदनाम नहीं किया जाता है, बल्कि बिना किसी नाम या उदाहरण के ‘सिविल सोसाइटी’ के रूप में और अधिक समग्र रूप से उन पर अप्रत्यक्ष निशाना साधा जाता है.

लोकतांत्रिक असंतोष का यह समग्र रूप केवल ब्रिटिश साम्राज्य 2.0 से ही बाहर निकल सकता है, जो अहमदाबाद, बड़ौदा और सूरत की अपने मूल स्थान से दिल्ली पर राज करने आई एक प्रकार की औपनिवेशिक व्यवस्था है. चूंकि ब्रिटिश युग में अंग्रेजों ने पूरे ‘नागरिक समाज’ को राज्य की स्थिरता, अखंडता और वैधता के लिए खतरे के रूप में नहीं दर्शाया था, यह ज़ेनोफोबिया का स्वदेशी तरीका नहीं है. बल्कि स्वदेशी आबादी के प्रति वह औपेनिवेशिक घृणा है जो समय के साथ अपना नया ठिकाना ढूंढ़ लेती है.

सवाल उठता है कि मैं भाजपा शासन का एक उपनिवेशवादी शासन व्यवस्था के रूप में कैसे उल्लेख कर सकता हूं? वह इसलिए कर सकता हूं क्योंकि उनकी स्वयं की छवि और नजरिया हाल ही में अस्तित्व में आए उस प्रभुत्ववादी वर्ग से मेल खाता है, जिसे उसके उग्र हिंदुत्व से पहचाना जाता है. जो समाज के बहिष्कृत, अन्य धर्मों के विधर्मी और हाशिए पर पड़े लोगों को अपने प्रभुत्व के अधीन करने का पूर्ण अधिकार अपने पास रखता है.

यह उपनिवेशी वर्ग पर्वत-पहाड़ों या समुद्र पार से नहीं आया होगा, बल्कि भारत के नस्लीय, धार्मिक, पारिस्थितिक और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों से उनका संबंध एक तरह की श्रेष्ठता, जैव-सांस्कृतिक भिन्नता और साम्राज्यवादी अंहकार का है.

इस प्रकार यह विचार कि भारत पर एक प्रकार के हिंदू बहुसंख्यकवाद द्वारा कब्जा कर लिया गया है, गलत है. जिसके द्वारा भारत पर कब्जा कर लिया गया है, वह उपनिवेशियों का एक छोटा-सा वर्ग है जो लाखों अन्य अल्पसंख्यकों से बने भारत के वास्तविक बहुमत को व्यवस्था से बाहर करना और उस पर हावी होना चाहता है.

इस अर्थ में बाहर से आकर बस गए ये सभी उपनिवेशवादी अल्पसंख्यकों के बीच एकमात्र बहुसंख्यक होने का दावा करते हैं और मौजूदा जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को पूरी तरह नष्ट, विकृत और उलट देते हैं. जबकि सच्चाई यह है कि तथाकथित हिंदू बहुसंख्यक एक कृत्रिम श्रेणी है, जिसे राजनीतिक हित साधने के लिए जानबूझकर खड़ा किया गया है और 19वीं सदी से पहले जिसका कोई वास्तविक इतिहास नहीं है.

इस परिप्रेक्ष्य में हिंदुत्व उस ब्रिटिश उपनिवेशवाद की कल्पना को साकार करता है जिसे कुछ श्वेत शासकों द्वारा थोपा गया था और अब भारतीय उपनिवेशवादियों द्वारा काल्पनिक हिंदू बहुमत के नाम पर क़ानूनी तौर पर इसे लागू किया जा सकता है.

यहां प्रस्तुत की गई समानता में यदि कोई सच्चाई है तो यह अतिविशाल, अभूतपूर्व और अहंकारी परियोजना सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर भी प्रकाश डालती है, जिसका उद्देश्य ‘न्यू इंडिया’ के पूर्णतया दक्षिण-ब्लॉक निर्मित विजन के भार तले लुटियंस दिल्ली को दफना देना है. यह विजन गांधी और नेहरू का उतना ही कम ऋणी है जितना कि उन लोगों का जिन्होंने एक राष्ट्रीय राजधानी की कल्पना करने की कोशिश की, जिसकी जड़ें बेहद पुराने साम्राज्यवादी अतीत में है.

दिल्ली का यह मूल स्वरूप बना रहना चाहिए, इसका स्थान कुछ काल्पनिक नव-हिंदू प्रतीकों-प्रतिमाओं द्वारा नहीं लिया जाना चाहिए बल्कि बिमल पटेल और उनके संरक्षकों के स्मारकीय बारोक (यूरोप में 17वीं सदी की स्मारक निर्माण शैली) विजन द्वारा लिया जाना चाहिए. यह कानून, इतिहास, पर्यावरण, सौंदर्यशास्त्र की अनदेखी है या लोकप्रिय राजकीय सत्ता का नशा भी हो सकता है.

उच्चतम साम्राज्यवाद ही इसके मूल में है. और इसकी जड़ें लुटियन से भी बहुत पहले के दशकों में निहित हैं, उस ‘स्थायित्व के भ्रम’ में निहित हैं जिसने करीब 1920 तक ब्रिटिश राज को परिभाषित किया था.

फिर भी हर राज, सत्ता या दौर का एक दिन पतन होता ही है और पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने इस मोदीराज के पतन का संकेत दे दिया है.

गुजरात से आने वाले वायसराय द्वारा विस्थापित होने से इनकार करते हुए सिख नेतृत्व में किसानों ने उन पचास करोड़ भारतीयों (दलित, मुस्लिम और आदिवासी) को एक मजबूत प्रतिनिधित्व प्रदान किया है जो मोदीराज के उपनिवेशवाद तले अपमानित किए गए हैं.

अधिकांश दक्षिण भारत अपनी ही धुन पर नाच रहा है, उत्तर-पूर्व भारत को अपने अधीन बनाए रखने के लिए भारी सैन्य बल की जरूरत है, राजस्थान, महाराष्ट्र और पंजाब भाजपा के नियंत्रण से बाहर हैं और ममता बनर्जी विपक्ष को एक छाते के नीचे लाने में जुटी हैं, इन हालात में वर्तमान हुकूमत सुरक्षा व्यवस्था के बीच केवल लुटियंस पर शासन करती दिखती है.

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट उनके लिए उपलब्धियों का स्मारक है, लेकिन यह उनका मकबरा भी साबित हो सकता है, भले ही कल न सही लेकिन जल्द ही. यह बिना जवाबदेही के 25,000 करोड़ रुपये का खर्च है.

हां, हम 2021 में हैं. हां, पहला भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1857 में हुआ था. हां, हम उस दौर में हैं जहां सब-कुछ मोदीमय है, मोदी के रंग में रंगा हुआ है. लेकिन हम पर शासन करने वाली व्यवस्था पूरी तरह से उतनी ही विदेशी है जितने कि अंग्रेज थे, और केवल दूसरा स्वतंत्रता संग्राम ही इसे इसके घुटनों पर लाएगा. इस लड़ाई में दिल्ली की सीमा पर डटे रहने वाले किसान हमारे अंग्रिम पंक्ति के जवान हैं.

(अर्जुन अप्पादुराई न्यूयॉर्क और बर्लिन में पढ़ाते हैं.)

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