नॉर्थ ईस्ट

भाजपा ने त्रिपुरा हिंसा को कम करके दिखाया, ‘स्वाभाविक’ प्रतिक्रिया कहकर सही ठहराया: रिपोर्ट

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया द्वारा गठित फैक्ट फाइंडिंग टीम ने त्रिपुरा पुलिस और प्रशासन पर हिंसा से निपटने में ‘ईमानदारी की कमी’ प्रदर्शित करने का आरोप लगाया है. टीम की रिपोर्ट में कहा गया कि यह दिखाने के लिए बड़ी कॉन्सपिरेसी थ्योरी तैयार की गई कि सांप्रदायिक हिंसा को उजागर करने वाली स्वतंत्र पत्रकारिता एक चुनी गई सरकार को ‘राज्य के दुश्मनों द्वारा कमज़ोर करने’ का एक प्रयास है.

त्रिपुरा में हुई हिंसा और फैक्ट-फाइंडिंग टीम के सदस्यों पर दर्ज यूएपीए के मामले के विरोध में दिल्ली के त्रिपुरा भवन पर हुआ प्रदर्शन. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया (ईजीआई) द्वारा नियुक्त फैक्ट-फाइंडिंग टीम की रिपोर्ट में कहा गया कि कि भाजपा के नेतृत्व वाली त्रिपुरा सरकार ने अक्टूबर में राज्य में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं का इस्तेमाल हिंदू बंगाली आबादी के बीच अपने वोट को मजबूत करने के लिए किया, इसे बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले की ‘स्वाभाविक प्रतिक्रिया’ के रूप में सही ठहराया.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि त्रिपुरा पुलिस और राज्य प्रशासन ने सांप्रदायिक संघर्ष से निपटने और इस मुद्दे पर रिपोर्टिंग करने वालों से व्यवहार में ‘पेशेवरता और सत्यनिष्ठा की कमी’ प्रदर्शित की.

ईजीआई ने एक डिजिटल संवाददाता सम्मेलन के दौरान ‘त्रिपुरा में मीडिया स्वतंत्रता पर हमलों पर तथ्यान्वेषी मिशन’ की एक रिपोर्ट जारी की.

इसमें कहा गया है कि ‘यह दिखाने के लिए बड़ी कॉन्सपिरेसी थ्योरी तैयार की गईं कि सांप्रदायिक हिंसा और हिंदू बहुसंख्यकवाद के बढ़ावे को उजागर करने वाली स्वतंत्र पत्रकारिता कैसे लोकतांत्रिक रूप से चुनी सरकार को राज्य के दुश्मनों द्वारा कमजोर करने का एक प्रयास है.’

पड़ोसी बांग्लादेश में सांप्रदायिक हिंसा के विरोध में अक्टूबर में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) द्वारा आहूत रैली के दौरान त्रिपुरा के चामटिला में एक मस्जिद में कथित तौर पर तोड़फोड़ की गई थी और दो दुकानों में आग लगा दी गई थी.

राज्य पुलिस के अनुसार, पास के रोवा बाजार में कथित तौर पर मुसलमानों के स्वामित्व वाले मकानों और कुछ दुकानों में भी तोड़फोड़ की गई. इसके चलते त्रिपुरा पुलिस ने 102 सोशल मीडिया अकाउंट धारकों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया जिनमें पत्रकारों के अकाउंट भी शामिल थे.

पत्रकारों और नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं को राज्य में सांप्रदायिक हिंसा पर रिपोर्टिंग करने से रोकने के लिए त्रिपुरा सरकार द्वारा कठोर कानूनों का उपयोग करने की खबरें सामने आने के बाद ईजीआई ने राज्य में तीन-सदस्यीय तथ्यान्वेषी दल भेजने का फैसला किया.

टीम के सदस्यों में स्वतंत्र पत्रकार भारत भूषण, गिल्ड के महासचिव संजय कपूर और ‘इम्फाल रिव्यू ऑफ आर्ट्स एंड पॉलिटिक्स’ के संपादक प्रदीप फंजौबाम शामिल थे.

टीम ने 28 नवंबर से 1 दिसंबर तक त्रिपुरा का दौरा किया और मीडिया की स्वतंत्रता की स्थिति का आकलन करने के लिए पत्रकारों तथा मुख्यमंत्री, मंत्रियों और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) सहित राज्य सरकार के प्रतिनिधियों के साथ-साथ नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं से भी मुलाकात की.

Report of the Fact-finding … by The Wire

चिंता के तात्कालिक कारण पर टिप्पणी करते हुए – सरकार पत्रकारों और नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं के खिलाफ कठोर कानूनों का उपयोग कर रही थी, जो हिंसा पर रिपोर्ट कर रहे थे – ईजीआई रिपोर्ट में राज्य के व्यापक सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ और स्थानीय मीडिया की स्थिति को भी शामिल किया गया है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि पुलिस ने कहा कि किसी भी ‘इस्तेमाल’ की जा रही मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुंचा या उस पर हमला नहीं किया गया, लेकिन स्थानीय पत्रकारों ने इस टीम को  राज्य भर में कम से कम दस मस्जिदों पर हमला या तोड़फोड़ हुई थी. एक ने तो यहां तक कहा कि कुछ पुलिस अधिकारी भी सरकार के बयान को लेकर संतुष्ट नहीं हैं.

अगरतला के एक पत्रकार ने इस टीम को बताया कि उन्होंने तीन मस्जिदें देखी थीं, जहां अलग-अलग स्तर का नुकसान हुआ था, जबकि उन्हें स्थानीय पत्रकारों  कि उन्होने भी ऐसा ही मंजर कई अन्य मस्जिदों में भी देखा.

रिपोर्ट के अनुसार, ‘पुलिस  नैरेटिव झड़प को कमतर दिखाने लिए बाद में सोचा गया हुआ लगता है. जब भी पुलिस को किसी विशेष घटना को लेकर कोई वैकल्पिक और सुरक्षित स्पष्टीकरण मिलता है, तब हर जगह हुई घटना के लिए इसका सामान्यीकरण कर दिया जाता है.’

रिपोर्ट बताती है कि गोमती जिले के काकराबन इलाके में भीड़ को जब एक चर्चित मस्जिद पर हमला करने से रोका गया तो उसने मस्जिद से कुछ दूरी पर नमाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एक इमारत को आग के हवाले कर दिया गया.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘इस घटना का इस्तेमाल इस नैरेटिव को बनाने के लिए किया गया था कि केवल एक इबादत करने के हॉल को जलाया गया था, न कि एक मस्जिद को. फिर यह इस तर्क को आगे बढ़ाने के लिए सामान्य स्पष्टीकरण बन गया कि किसी भी मस्जिद को निशाना नहीं बनाया गया था.’

इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हिंसा को नवंबर के अंत में हुए नगर निकाय चुनावों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. रिपोर्ट में कहा गया है कि त्रिपुरा ट्राइबल एरिया टेरिटोरियल काउंसिल के चुनावों में हारने के बाद से भाजपा सतर्क थी.

रिपोर्ट में कहा गया है कि बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के दौरान सांप्रदायिक दंगे ऐसे समय में हुए जब मुख्यमंत्री बिप्लब देब और उनकी पार्टी भाजपा आगामी निकाय चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की चुनौती का मुकाबला करने की तैयारी कर रही थी.

इसमें कहा गया है, ‘बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक के खिलाफ हिंसा की प्रतिक्रिया में सांप्रदायिक लामबंदी ने भाजपा से जुड़े संगठनों – विहिप, हिंदू जागरण मंच, बजरंग दल और अन्य – को हिंदू बंगालियों के बीच अपने वोट को मजबूत करने के लिए सांप्रदायिक क्रोध उत्पन्न करने का अवसर प्रदान किया.’

इसने दावा किया कि स्थानीय प्रेस या तो ‘राज्य सरकार के सामने दब गया और जमीनी हकीकत से बहुत डर गया, राष्ट्रीय मीडिया या राज्य के बाहर स्थित मीडिया के लिए लिखने वाले पत्रकारों ने सांप्रदायिक हिंसा के बारे में यह रिपोर्ट करने की कोशिश की कि यह क्या थी.’

रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के प्रवेश ने भी मुख्यमंत्री देब को परेशान कर दिया था. ममता बनर्जी के उनकी पार्टी को पश्चिम बंगाल में भारी जीत दिलाने के बाद भाजपा नहीं चाहती थी कि वह पूर्वोत्तर राज्य में प्रवेश करे, जहां अधिकांश आबादी बांग्लाभाषी है.

इसमें कहा गया, ‘जिन सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों से हम मिले, उन्होंने बार-बार सांप्रदायिक हिंसा को कम करके दिखाया. उनका सामान्य विरोध यह था कि ‘बाहरी तत्वों’  ने स्थिति पैदा की थी क्योंकि ‘कुछ निहित स्वार्थ’ (पढ़ें टीएमसी) निकाय चुनाव में सेंध लगाना चाहते थे.’

एक मंत्री ने टीम से कहा, ‘बांग्लादेश में उकसावे की घटना हुई और यहां उसकी प्रतिक्रिया हुई. विहिप ने यहां हिंदू भावना को एकजुट करने की कोशिश की. हमने इसे जल्दी से निपटा लिया लेकिन आपको यह समझना चाहिए कि विहिप एक स्वतंत्र इकाई है. कुछ लोग गलत मकसद से मस्जिदों में दाखिल हुए लेकिन उन्हें कुछ भी करने से रोक दिया गया.’

टीम ने बताया, ‘दुर्गा पूजा के दौरान बांग्लादेश में सांप्रदायिक दंगे उस समय हुए जब मुख्यमंत्री बिप्लब देब और उनकी पार्टी भाजपा आगामी निकाय चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की चुनौती का सामना करने की तैयारी में थे. बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की प्रतिक्रिया में हुई सांप्रदायिक लामबंदी ने भाजपा के भ्रातृ संगठनों- विहिप, हिंदू जागरण मंच, बजरंग दल और अन्य को राज्य की हिंदू बंगाली आबादी के बीच अपने वोट को मजबूत करने के लिए सांप्रदायिक गुस्सा भड़काने का एक मौका दिया.’

रिपोर्ट में कहा गया है कि राजनीतिक हिंसा के संदर्भ में न्यूटन के तीसरे नियम का भी उल्लेख हुआ हुआ जहां सांप्रदायिकता को ‘त्रिपुरा के हिंदुओं की ‘स्वाभाविक प्रतिक्रिया’ के रूप में उचित ठहराया गया क्योंकि सीमा पार बांग्लादेश में रहने वाली हिंदू आबादी के साथ उनके पारिवारिक संबंध थे.’

मीडिया और सिविल सोसाइटी पर हमला

ईजीआई ने रिपोर्ट में कहा, ‘त्रिपुरा पुलिस और प्रशासन ने सांप्रदायिक संघर्ष से निपटने और इस मुद्दे पर रिपोर्टिंग करने वालों के साथ व्यवहार में पेशेवर और सत्यनिष्ठा की कमी प्रदर्शित की. यह बाहुबल बाले बहुसंख्यकवाद के बढ़ावे में उनकी मिलीभगत को दिखाता है.’

इसने कहा कि इस ‘संस्थाओं का दमन’ हर जगह दिखायी देता है.

गिल्ड ने यह भी कहा कि यही कारण है कि पुलिस और सत्तारूढ़ दल ट्वीट में एक षड्यंत्र देखते हैं और त्रिपुरा में सामाजिक अस्थिरता के जोखिम में पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराते हुए घसीटते हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि जब से यह मामला सामने आया है, ‘पुलिस और एक असुरक्षित राजनीतिक नेतृत्व ने यूएपीए जैसे कठोर कानूनों और पुलिस की ताकत और एक सशक्त न्यायपालिका का इस्तेमाल नागरिक समाज को कुचलने के लिए किया, जिसमें मीडिया भी शामिल है.

इसने उल्लेखित किया कि उच्चतम न्यायालय के वकीलों को अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा पर अपने निष्कर्षों को संवाददाता सम्मेलन में साझा करने के लिए के यूएपीए के तहत नोटिस दिया गया है. उसने कहा कि साथ ही महिला पत्रकारों पर उकसाने का आरोप लगाया गया जब वे मस्जिदों में कथित तोड़फोड़ और दुकानों में आग लगाने की कथित घटना के गवाहों से सवाल पूछने के अपने पत्रकारीय कर्तव्य का पालन कर रही थीं.

ईजीआई रिपोर्ट कहती है, ‘जहां स्थानीय प्रेस या तो राज्य सरकार के सामने झुक गया और जमीनी हकीकत से बहुत डर गया, वहीं राष्ट्रीय मीडिया या राज्य के बाहर स्थित मीडिया के पत्रकारों ने सांप्रदायिक हिंसा की रिपोर्ट करने की कोशिश की. यह बिप्लब देब सरकार द्वारा प्रोजेक्ट किए जाने वाले ‘सुशासन के नैरेटिव के हिसाब से नहीं था और जिसने भी सरकार की आलोचना की, उसे तुरंत ‘टीएमसी की साजिश’ करार दे दिया गया.’

रिपोर्ट में आगे कहा गया, ‘स्वतंत्र पत्रकारों को ‘राज्य के दुश्मनों’ के मोहरे, जो लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को कमजोर करना चाहते हैं, के रूप में पेश करने के लिए ‘बड़ी-बड़ी कॉन्सपिरेसी थ्योरी तैयार की गईं. जबसे यह मामला बढ़ा है, पुलिस और एक असुरक्षित राजनीतिक नेतृत्व ने नागरिक समाज को कुचलने के लिए… यूएपीए जैसे कठोर कानूनों, पुलिस की ताकत और एक सशक्त न्यायपालिका का इस्तेमाल किया है.’

गिल्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा, ‘पुलिस ने केवल यह ट्वीट करने वालों के खिलाफ यूएपीए का इस्तेमाल किया कि ‘त्रिपुरा जल रहा है’, इसका कारण यह था कि वे दूसरों को इस सीमावर्ती राज्य में होने वाली घटनाओं के बारे में ट्वीट करने से रोकना चाहते थे, साथ ही इसका कारण राज्य के कथन का प्रभुत्व बलपूर्वक स्थापित करना भी था.’

उसने कहा, ‘यह इस कारण था कि बांग्लादेश में हिंसक घटनाओं के खिलाफ विहिप और उसके कट्टरपंथी हिंदू संगठनों द्वारा आयोजित दो सौ से अधिक रैलियों और मस्जिदों में तोड़फोड़ एवं मुसलमानों के स्वामित्व वाली दुकानों को आग लगाने के विभिन्न कृत्यों के बावजूद उन लोगों की तब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई, जब तक अदालतों ने कदम नहीं उठाया.’

इसने कहा कि दंड से मुक्ति की यह संस्कृति राज्य सरकार के आचरण का प्रतीक है. इसमें कहा गया है, ‘मीडिया के प्रति त्रिपुरा की मौजूदा सरकार का रवैया विशेष रूप से गंभीर प्रतीत होता है.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)