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बेअदबी के नाम पर मॉब लिंचिंग: धार्मिक कट्टरताएं बेकाबू हो जाएं, तो गिरावट की कोई सीमा नहीं रहती

सभ्य, लोकतांत्रिक और आधुनिक समाजों में मॉब लिंचिग जैसी बर्बरताओं की कोई जगह नहीं है- धर्मग्रंथों व प्रतीकों की बेअदबी के नाम पर भी नहीं.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़े पंजाब में अमृतसरकपूरथला में सिख धर्म के पवित्र ग्रंथों व प्रतीकों की कथित बेअदबी को लेकर 24 घंटों में ही दो युवकों को बर्बरतापूर्वक पीटकर मार डाले जाने से एक बार फिर सिद्ध हो गया है कि धार्मिक कट्टरताएं बेकाबू हो जाएं, तो गिरावट की कोई सीमा नहीं मानतीं.

ठीक है कि देश के इस सीमावर्ती राज्य में ऐसी बेअदबियों के बहाने सिखों के बीच इससे पहले भी अंतर्धार्मिक संघर्ष होते आए हैं और उनमें लाशें भी गिरती रही हैं, लेकिन इधर इन्हें लेकर बेलगाम भीड़ों द्वारा तुरत-फुरत हिसाब बराबर कर देने की बढ़ती घटनाओं के खतरों को ठीक से समझा व दूर नहीं किया गया, तो कहना मुश्किल है कि वे हमारे राष्ट्रीय जीवन को कितने समय के लिए कितने अंधेरों के हवाले कर देंगी.

हां, कहना होगा कि इस सिलसिले में भीड़ों से भी कहीं ज्यादा चिंताजनक रवैया राज्य की सरकार व प्रशासन, साथ ही उन्हें चला रही कांग्रेस पार्टी का है. ये सबके सब या तो किंकर्तव्यविमूढ़ दिखाई दे रहे हैं या कट्टरताओं की ओर झुके हुए.

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू यूं ही भीड़ों की करतूतों पर चुप्पी साधे रहकर नहीं कह रहे कि बेअदबी करने वालों को सार्वजनिक तौर पर फांसी होनी चाहिए. किसी को तो उनसे पूछना चाहिए कि क्या यह भारत की सर्वोच्च आचार संहिता संविधान की बेअदबी नहीं है?

जब भी ऐसी घटनाएं होती हैं, कहा जाने लगता है कि कोई भी धर्म किसी भी परिस्थिति में ‘भीड़ के न्याय’ अथवा मॉब लिंचिंग की वकालत नहीं करता. दुनिया में अब तक जितने भी देवता या पैगंबर आए हैं, उनमें से किसी ने भी कभी नहीं कहा कि उसका या उससे जुड़ी चीजों का अपमान करने वालों की जान ले ली जाए. उल्टे उन सबने ‘भूल जाओ और क्षमा कर दो’ की राह ही दिखाई है.

लेकिन अब वक्त आ गया है, जब ऐसा कहने वालों से यह भी पूछा जाना चाहिए कि दुनिया के किस धर्म में लोगों को धर्मग्रंथों व प्रतीकों की बेअदबी सिखाई जाती है और नहीं सिखाई जाती तो उनके अनुयायी उसे लेकर यूं हिंसक असुरक्षा के भाव से क्यों भरे होते हैं?

वह कौन-सा धर्म है, जिसने इनके नाम पर की जाने और मध्य युग की याद दिलाने वाली बर्बर मारकाट के विरुद्ध कभी खुलकर अभियान चलाया और जोर देकर कहा हो कि किसी व्यक्ति का अपराध कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसकी सजा तय करने का हक कानून को ही है, भीड़ को नहीं क्योंकि आमतौर पर भीड़ के पास विवेक नहीं होता?

चूंकि किसी भी धर्म के खाते में ऐसा कोई उल्लेखनीय अभियान नहीं है और धर्म व अधर्म की व्याख्या को लेकर भी कई गड़बड़झाले हैं, इसलिए इस सवाल का जवाब भी नहीं ही मिलता कि क्यों धर्म के नाम आगे आकर कानून हाथ में लेने वालों का, कई बार अदालतों से दंडित किए जा चुकने के बाद भी फूल-मालाओं से स्वागत व सम्मान किया जाता है और क्या यह अधर्म के समक्ष धर्म वालों के आत्मसमर्पण कर देने जैसा नहीं है?

यह कहा जाए कि ‘स्वागत-सम्मान’ की यह परंपरा धर्मों से नहीं उनके राजनीतिक इस्तेमाल से पैदा हुई है तो भी सवाल अपनी जगह रहता है कि धर्मों के भीतर से इस इस्तेमाल के खिलाफ कब व किसने आवाज उठाई और उसे अंजाम तक पहुंचाने के लिए क्या-क्या किया?

कुछ नहीं किया तो इस कुतर्क के खोल में मुंह छिपाने का हासिल क्या है कि क्या करें, हम तो बहुत भले हैं और भले ही रहना चाहते हैं, लेकिन राजनीति के लोग आकर हमको बुरा बनाए दे रहे हैं.

क्या यह सच नहीं है कि 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद गोरक्षा आदि के नाम पर तेज हुए मॉब लिंचिंग के सिलसिले की यह कहकर सम्यक भर्त्सना की गई होती कि यह धर्म नहीं अधर्म है, साथ ही खुद को धार्मिक कहने वाले लोगों ने साहसपूर्वक मॉबलिंचकों से खुद को अलगाया और उनका बहिष्कार किया होता तो यह रोग संक्रामक व लाइलाज होने से बच गया होता.

क्योंकि तब न खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता, न इस सामाजिक समझदारी का दायरा ही सीमित होता कि सभ्य, लोकतांत्रिक और आधुनिक समाजों में मॉब लिंचिग जैसी बर्बरताओं की कोई जगह नहीं है- धर्मग्रंथों व प्रतीकों की बेअदबी के नाम पर भी नहीं.

तब वैसा कुछ तो कतई नहीं होता जैसा कपूरथला में हुआ, जहां पगलाई भीड़ ने पुलिस के सामने ही युवक की लिंचिंग से गुरेज नहीं किया.  यह सफाई भी नहीं सुनी कि जिस बेअदबी को लेकर वह भड़की हुई है, वह तो हुई ही नहीं और जिस व्यक्ति को वह इसका कसूरवार मान रही है, उसका इरादा तो चोरी करने का था.

पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने मामले की एसआईटी जांच का आदेश देने के बाद कहा है कि उसके पीछे केंद्रीय एजेंसियों का हाथ है तो इसे उनका राजनीतिक आरोप भर कहकर खारिज नहीं किया जा सकता.

हम जानते हैं कि इससे पहले सितंबर, 2019 में राज्य के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने 2015 के फरीदकोट जिले के बरगाड़ी के बेअदबी के बहुचर्चित मामले की पूर्ववती अकाली सरकार द्वारा सीबीआई को सौंपी गई जांच यह कहते हुए वापस ले लेने की वकालत की थी कि उन्हें केंद्रीय एजेंसी जांच पर कतई भरोसा नहीं है और वह उसमें अकाली दल के नेताओं पिता-पुत्र प्रकाश सिंह बादल व सुखबीर सिंह बादल को क्लीन चिट देने के लिए जांच को भटका सकती है.

बेअदबी के मामलों पर जस्टिस रणजीत सिंह आयोग की रिपोर्ट आने पर सितंबर, 2018 में उन्होंने कहा था कि किसी भी मामले में दोषियों का बख्शा नहीं जाएगा और वे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, उनको कानून के मुताबिक सजा दिलाई जाएगी. फिर बेअदबी की राज्य में हुई तब तक की लगभग 200 घटनाओं की एक विशेष जांच टीम द्वारा विस्तृत पड़ताल की बात भी कही थी.

इससे थोड़ा पहले जाएं तो राज्य में 2017 के विधानसभा चुनाव के वक्त बेअदबी के मामलों ने तूल पकड़ा हुआ था, जिसका कहते हैं कि कांग्रेस व अमरिंदर को भरपूर चुनावी फायदा हुआ, जिससे उत्साहित होकर अमरिंदर ने अगले ही बरस पंजाब विधानसभा में भारतीय दंड संहिता में एक नई धारा जोड़ने के दो प्रस्ताव पारित कराए, जिनमें श्रीमद्भगवद्गीता, कुरान, बाइबिल और गुरुग्रंथ साहिब आदि के अपमान, नुकसान या नष्ट करने के आरोपी को उम्रकैद की सजा की व्यवस्था थी.

व्यापक विरोध के कारण वे इस व्यवस्था में सफल नहीं हुए और जानकारों ने प्रस्ताव को पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून जैसा बताकर आरोप लगाया कि वे भारत को पाकिस्तान के नक्शेकदम पर ले जाना चाहते हैं. बाद में राष्ट्रपति ने इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी. हालांकि दावा किया जाता हैं यह मंजूरी अभी भी उनके विचाराधीन है.

अब अमरिंदर ने पाला बदल लिया है और ये पंक्तियां लिखने तक साफ नहीं है कि बेअदबी को लेकर मॉब लिंचिंग की इन घटनाओं पर उनका दृष्टिकोण क्या है, लेकिन जाहिर है कि पंजाब में बेअदबी की घटनाओं पर भरपूर राजनीति भी होती रही है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि ताजा घटनाओं के पीछे भी राजनीति हो.

खासकर जब देश में वह जमात लगातार बड़ी होती जा रही है, जिसे धर्म की राजनीति की लत लगी हुई है और वह उसके लाभों को अपने नाम करने की कोई भी कवायद उठा नहीं रखती.

गत 15 अक्टूबर को सिंघू सीमा पर आंदोलनकारी किसानों के मंच के पास ही कुछ निहंगों ने तरनतारन के निवासी लखबीर सिंह नामक दलित युवक को बेअदबी के आरोप में क्रूरतापूर्वक मारकर लटका दिया था तो भी उसके परिजनों ने शक जाहिर किया था कि उसे खिलाने-पिलाने का, ज्यादा मजदूरी का अथवा कोई अन्य लालच देकर सिंघू ले जाया गया और बेअदबी के लिए उकसाया गया था.

तब यह कहने वालों की भी कमी नहीं थी कि इसके पीछे किसानों के आंदोलन को बदनाम व कमजोर करने का मंसूबा था, जो इसलिए सफल नहीं हो पाया क्योंकि कसूरवार निहंगों ने अपना अपराध कुबूल कर लिया था और किसान नेताओं ने पूरी ताकत लगाकर सिद्ध कर दिया था कि उनका उससे कोई वास्ता नहीं था.

अलबत्ता, हम अभी तक नहीं जान पाए हैं कि संबंधित जांच एजेसियों ने लखबीर के परिजनों के शक की दिशा में भी कोई जांच की या नहीं, की तो उसका नतीजा क्या निकला? हरियाणा पुलिस ने जैसी तत्परता से मारे गये लखबीर के खिलाफ मामला दर्ज किया था, वैसी ही तत्परता से इसकी जांच करती कि वे कौन लोग थे, जिन्होंने उसे लालच देकर बेअदबी के लिए उकसाया, तो अब तक यह रहस्य खुल गया होता.

लेकिन यहां तो अब पंजाब पलिस ने भी हरियाणा पुलिस के नक्शेकदम पर चलते हुए अमृतसर बेअदबी मामले में मारे जाने वाले पर ही मुकदमा दर्ज किया है! शायद उसे लगता है कि अभी भी उसे कुछ कम सजा मिली है!

बहरहाल, इस सबके पीछे धार्मिक कट्टरता हो या राजनीति अथवा दोनों का घालमेल, बेहतरी फौरन से पेशतर यह समझने में ही है कि मध्ययुगीन बर्बरता का यह रास्ता कहीं नहीं ले जाता. सिवाय उस दिशा के जिस पर चलकर पाकिस्तान स्थित सियालकोट में भीड़ द्वारा ऐसे ही मामले में श्रीलंकाई नागरिक की निर्मम हत्या कर उसके शव को जला दिया जाता है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)