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दिल्ली: हिरासत में यातना के मामले में कोर्ट ने पुलिस के ख़िलाफ़ मामला दर्ज करने का आदेश दिया

इस महीने की शुरुआत में लूट के एक आरोपी के शरीर पर चोटों के निशान देखने के बाद एक जज ने बेगमपुर पुलिस थाने के कर्मचारियों के ख़िलाफ़ जांच शुरू करने का आदेश दिए थे. अब अदालत ने आरोपी को हिरासत में प्रताड़ित करने, उनके परिवार की महिलाओं से छेड़छाड़ के लिए कई पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया है.

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने लूट के एक मामले में गिरफ्तार एक व्यक्ति को कथित रूप से हिरासत में प्रताड़ित करने, उनके परिवार के महिला सदस्यों से छेड़छाड़ करने के लिए कई पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश जारी किए हैं.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, इस महीने की शुरुआत में एक न्यायाधीश ने गिरफ्तारी के बाद अदालत में पेश किया गए लूट के एक आरोपी प्रिंस गिल के शरीर पर चोट के निशान और कई खरोंच पाने और उन्हें कांपते हुए देखने के बाद बेगमपुर पुलिस स्टेशन के कर्मचारियों के खिलाफ जांच शुरू करने का आदेश दिए थे.

एक हफ्ते बाद पुलिस उपायुक्त ने एक रिपोर्ट में कर्मचारियों को दोषमुक्त कर दिया था कहा था कि उनकी ओर से कोई ज्यादती नहीं हुई थी और गिल अपने भाई के साथ झगड़े के दौरान घायल हो गए थे.

हालांकि, आरोपी के वकील ने इस जांच को एक छलावा बताया और कहा कि गिल को हिरासत में क्रूर हिंसा का शिकार होना पड़ा.

पुलिस ने गिल को गिरफ्तार कर लिया था और लूट के दौरान इस्तेमाल की गई बाइक, हेलमेट और नकली नंबर प्लेट के साथ उनके घर से 92,000 रुपये की नकदी बरामद की थी.

लूट के आरोपी ने अपनी पत्नी गुरप्रीत कौर गिल के साथ आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों का एक समूह आठ दिसंबर की रात उनके घर में घुस आया और कुत्तों से मारपीट की. कुत्ते की लड़ाई के दौरान उनका पालतू कुत्ता गंभीर रूप से घायल हो गया और चोटों के कारण उसने दम तोड़ दिया. उनकी पत्नी और मां ने यह भी दावा किया कि कर्मियों ने उनके साथ छेड़छाड़ की.

अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट बबरू भान ने यह देखते हुए कि उनके आरोप पूरी तरह से निराधार नहीं हैं और इसमें कुछ विश्वसनीयता है, पुलिस अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की उनकी याचिका को स्वीकार कर लिया, .

अदालत ने आदेश में कहा, ‘अगर पुलिस आरोपी को पकड़ने के लिए हिंसा का सहारा लेती है और सबूत इकट्ठा करने के लिए हिरासत में अत्याचार करती है, तो यह मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार है क्योंकि कानून कहीं भी जांच के दौरान सबूत एकत्र करने के उद्देश्य से हिरासत में अत्याचार की अनुमति नहीं देता है.’

उन्होंने आगे कहा कि पुलिस अधिकारी आरोपियों की गिरफ्तारी के समय अपने बयान बदलते रहे. गिरफ्तारी ज्ञापन में कहा गया है कि उन्हें 9 दिसंबर की शाम 6:30 बजे गिरफ्तार किया गया था.

हालांकि, जब एक सब इंस्पेक्टर से समय के बारे में पूछा गया, तो उसने पहले 3:30 बजे कहा और बाद में इसे बदलकर 6:30 बजे कर दिया. एक अन्य अधिकारी, एक निरीक्षक ने कहा कि गिरफ्तारी का समय 3:30 बजे था और बाद में कहा कि उसे 8 दिसंबर को रात 11:00 बजे पकड़ा गया था.

न्यायाधीश ने कहा, ‘यह संभव है कि आरोपी को 8 दिसंबर को रात 11 बजे पकड़ा गया हो, लेकिन उसे 9 दिसंबर की सुबह तक पुलिस थाने में हिरासत में रखा गया हो.’ जज ने यह भी जोड़ा कि यह गलत तरीके से हिरासत में लेने और आधिकारिक रिकॉर्ड में हेरफेर करने का अपराध है।

न्यायाधीश ने कहा, ‘यह स्पष्ट है कि आरोपी को न तो उस समय और न ही पुलिस के बताए तरीके से गिरफ्तार किया गया था. आरोपी को आई चोटें स्पष्ट रूप से आरोपी पर हावी होने के बाद किए गए सुनियोजित हमले का परिणाम हैं.’

इसके अलावा न्यायाधीश ने पुलिस की इस दलील को खारिज कर दिया कि गिल को अपने भाई के साथ हाथापाई के दौरान चोटें आईं थीं और कहा कि उनके नितंबों पर चोट के निशान गंभीर थे और यह तभी संभव था जब कोई पूरी तरह से हावी हो और किसी कुंद वस्तु से बार-बार वार किया गया हो, जैसा आमने-सामने की लड़ाई में संभव नहीं है.

उसके बाद शिकायतकर्ता गुरप्रीत कौर गिल और आरोपियों के आरोपों में सच्चाई का पता लगाने के लिए, डीसीपी, रोहिणी जिला, एसएचओ इंस्पेक्टर अरविंद कुमार, एसआई निमेश, एएसआई नीरज राणा, सीटी सनी, सीटी अरुण और सीटी विनीत और अन्य दोषी अधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश दिया.

अदालत ने आईपीसी की धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), (गलत तरीके से कारावास), 506 (आपराधिक धमकी), 509 (किसी महिला की गरिमा भंग करना), 354 (किसी भी महिला पर हमला), 429 (शरारत) के 166ए (कानून की अवहेलना करने वाला लोक सेवक) तहत प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया.

न्यायाधीश ने कहा कि चूंकि एसएचओ के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया गया है, इसलिए संयुक्त पुलिस आयुक्त को यह सुनिश्चित करना है कि जांच ऐसे अधिकारी द्वारा की जाए जिससे निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके.