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पंजाब: मॉब लिंचिंग की क्रूर घटनाओं को जायज़ क्यों ठहराया जा रहा है

सिख धार्मिक प्रतीकों के कथित अपमान को लेकर पंजाब में बीते दिनों दो लोगों की भीड़ द्वारा हत्या कर दी गई. जनभावनाएं लिंचिंग की इन घटनाओं के समर्थन में खड़ी नज़र आती हैं और मुख्यधारा के राजनीतिक दल व सिख स्कॉलर्स उन भावनाओं को आहत करना नहीं चाहते.

पंजाब के अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में पीट-पीटकर की गई हत्या की घटना के बाद मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और उपमुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा (बाएं) ने 19 दिसंबर 2021 को वहां पहुंचकर हालात का जायजा लिया. (फोटो: पीटीआई)

चंडीगढ़: पंजाब की धार्मिक-सामाजिक राजनीति में गहराई तक पैठ जमाए बैठीं खामियां अब खुलकर सामने आ गई हैं, क्योंकि अमृतसर और कपूरथला में धार्मिक प्रतीकों की कथित बेअदबी के आरोप में भीड़ द्वारा की गई एक के बाद एक दो लोगों की हत्याओं (लिंचिंग) ने सारे देश को हिलाकर रख दिया है.

इन घटनाओं ने इस साल अक्टूबर में क्रूर, अमानवीय और नृशंस तरीके से हुई एक और लिंचिंग (भीड़ द्वारा पीट-पीट कर हत्या) के प्रकरण की यादें ताजा कर दी हैं. तब सिंघू बॉर्डर पर जारी किसान आंदोलन के बीच इसी तरह के बेअदबी के आरोपों के चलते एक व्यक्ति की हत्या कर दी गई थी.

सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि कैसे इन जघन्य हत्याओं की स्वीकार्यता बढ़ती जा रही है, राज्य केवल मूकदर्शक के रूप में काम कर रहा है और यहां तक कि मामले दर्ज करने में भी विफल रहा है.

कई सिख बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्यों से भी जब द वायर  ने बात की तो या तो उन्होंने मामले पर चुप्पी साध ली या फिर इन हत्याओं (लिंचिंग) को पुराने बेअदबी के मामलों में त्वरित न्याय प्रदान करने में राज्य की निष्क्रियता से जोड़ दिया.

उन्होंने दावा किया कि इसी निष्क्रियता ने लोगों को क़ानून अपने हाथों में लेने के लिए मजबूर किया.

2015 में पंजाब की गलियों में गुरु ग्रंथ साहिब के फटे हुए पन्ने मिले थे. तब से इस पवित्र किताब का अपमान करने संबंधी कई घटनाएं हुई हैं. लेकिन संबंधित सरकारें, चाहे वह शिरोमणि अकाली दल-भाजपा सरकार (2012-2017) हो या वर्तमान कांग्रेस सरकार, इन मामलों को तार्किक निष्कर्ष तक न ले जा पाने की दोषी रही हैं.

अमरिंदर सिंह को हाल ही में नवजोत सिंह सिद्धू के नेतृत्व में उनकी ही पार्टी के सहयोगियों द्वारा गद्दी से हटाना भी बेअदबी के मामले सुलझाने को लेकर समय पर कार्रवाई में अमरिंदर सिंह की विफलता से जुड़ा हुआ है.

इस इतिहास को देखते हुए इन हत्याओं को सही ठहराने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है.

अकाल तख्त (एक शक्तिशाली सिख धार्मिक प्राधिकरण) के कार्यवाहक जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह के हालिया बयान में भी समान मनोभाव व्यक्त किए गए.

कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने ट्वीट करके बेअदबी और लिंचिंग, दोनों ही घटनाओं की समान रूप से निंदा की थी. इस ट्वीट का जवाब देते हुए ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने पूछा कि हालात उस सीमा तक क्यों पहुंचे जहां संगत को हत्या करनी पड़ी.

उन्होंने आगे कहा, ‘जब क़ानून पहले भी हुई बेअदबी की घटनाओं में गुनाहगारों को सजा देकर न्याय करने में विफल रहा हो, तो अपनी आहत भावनाओं/ज़ख्मी दिलों (Wounded Hearts) के साथ सिखों को क्या करना चाहिए?’

अकाल तख्त के जत्थेदार ने अपनी बात आगे जारी रखते हुए सवाल किया, ‘न्याय के लिए इंतजार करते हुए अपनी आखिरी सांसें गिन रहे 1984 नरसंहार के पीड़ितों को क्या करना चाहिए? डॉ. मनु सिंघवी को यह बताना चाहिए.’

वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह ने द वायर  को बताया कि स्वर्ण मंदिर में बेअदबी की घटना कोई एक अकेला मामला नहीं था.

उन्होंने कहा कि पिछले कई वर्षों में इस तरह के अनेक मामले सामने आए, लेकिन दुख की बात है कि संबंधित राज्य सरकारें उन्हें सुलझाने में विफल रहीं. उन्होंने कहा, ‘इसीलिए लोग अब इन हत्याओं को सही ठहरा रहे हैं.’

यहां तक कि सिख गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी (एसजीपीसी) के अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने भी कहा कि यह बेअदबी के मामलों में सरकार की नाकामी का नतीजा है, जिसके चलते स्वर्ण मंदिर में लिंचिंग हुई.

सभी मुख्यधारा के राजनीतिक दलों ने हिंसा की इस हालिया घटना पर चुप्पी साध रखी है. हालांकि, पिछले हफ्ते मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने कपूरथला में बेअदबी होने की घटना से इनकार करते हुए इसे हत्या करार दिया और मामले में निजामपुर मोड़ गुरुद्वारे के केयरटेकर को गिरफ्तार भी कर लिया गया है, लेकिन सत्तारूढ़ कांग्रेस के अन्य सदस्यों समेत बाकी सभी की चुप्पी कायम है.

एक पत्रकार ने द वायर  को बताया, ‘इन घटनाओं ने पंजाब में अभी एक तरह का माहौल बना दिया है कि हत्याओं की निंदा करने वाला कोई भी बयान बेअदबी के मुद्दे पर जन भावनाओं के अनादर के रूप में देखा जाएगा. आगामी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले यह मुख्य मुद्दा बन गया है.’

2011 की जनगणना के अनुसार, पंजाब की आबादी के 57.69 प्रतिशत लोगों द्वारा सिख धर्म का पालन किया जाता है, जिनकी संख्या 1.6 करोड़ से अधिक है.

सिद्धू का ताजा रुख चौंकाने वाला नहीं 

बेअदबी के मुद्दे पर मुखर लोग भी चुनावी मौसम में राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहने के लिए जन भावनाओं के खिलाफ नहीं जा रहे हैं.

पंजाब कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने बेअदबी के मुद्दे का इस्तेमाल पहले अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए किया और अब इसका इस्तेमाल अपने दोस्त से दुश्मन बने नए मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी पर दबाव बनाने के लिए कर रहे हैं.

पंजाब के मलेरकोटला में अपने सार्वजनिक संबोधन के दौरान उन्होंने बेअदबी के पीछे शामिल लोगों को ‘सार्वजनिक तौर पर फांसी’ दिए जाने की मांग करके खलबली मचा दी.

कई लोग उनके बयान को लिंचिंग के खुले समर्थन के तौर पर देखते हैं.

बाद में बेअदबी के मामलों में अपनी ही सरकार की निष्क्रियता की तीखी आलोचना करते हुए सिद्धू फरीदकोट में 2015 के बेअदबी विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हुई पुलिस फायरिंग में मारे गए पीड़ितों के परिवारों से मिले.

इस दौरान उन्होंने कहा कि अगर लोगों ने बेअदबी के हालिया दोनों मामलों में खुद ही त्वरित न्याय कर दिया, तो ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उन्हें व्यवस्था में विश्वास नहीं है.

पंजाब में कई एसआईटी बेअदबी के मामलों की जांच कर रही हैं. जहां पुलिस जांच का एक हिस्सा सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों की भूमिका की ओर इशारा कर रहा है, जिसके प्रमुख गुरमीत राम रहीम पहले से ही विभिन्न अपराधों में दोषी ठहराए जा चुके हैं और जेल में हैं.

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), जिसने शुरूआत में मामले की जांच की थी, पहले ही बेअदबी के मामले में डेरा के अनुयायियों की भूमिका खारिज कर चुकी है.

एक तरफ जहां अभी तक यह स्पष्ट तौर पर सामने आना बाकी है कि पंजाब में 2015 के बेअदबी के मामलों के लिए कौन जिम्मेदार था, तो इसी समय बेअदबी की हालिया घटनाओं ने पंजाब पुलिस के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं.

इन चुनौतियों के तहत उसे यह पता लगाना है कि क्या ये हालिया घटनाएं चुनावों से ठीक पहले किसी बड़ी साजिश का तो हिस्सा नहीं हैं, जिसका उद्देश्य चुनावों से ठीक पहले धार्मिक तर्ज पर पंजाबी समाज का ध्रुवीकरण करना हो, जैसा कि कईयों को इस बात का डर भी है.

पंजाब के पूर्व आईएएस अधिकारी केबीएस सिद्धू ने ट्वीट किया, ‘मैं मान रहा हूं कि इस माफ न करने योग्य बेअदबी के प्रयास के पीछे कोई षड्यंत्र था. इस षड्यंत्र का उद्देश्य दुनिया भर के सिखों को क्रोधित व आहत करना कम और पंजाबी हिंदुओं को डराना व आतंकित करना अधिक होगा.’

संख्या के लिहाज से बात करें तो सिखों और दलितों के बाद राज्य में हिंदू एक महत्वपूर्ण राजनीतिक ताकत हैं, जिनका समर्थन पाना पंजाब में सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी के लिए निर्णायक होता है.

कम होता जुड़ाव

कई लोग मानते हैं कि पंजाब में लिंचिंग समर्थक दलीलों का पहला असर यह हुआ है कि तार्किक आवाजों के लिए जगह कम होती जा रही है.

सीपीआई (एम) की पंजाब इकाई के सचिव सुखविंदर सिंह सेखोन ने द वायर  को बताया कि मॉब लिंचिंग चाहे पंजाब में हो या कहीं और, यह निंदनीय है और किसी भी कीमत पर इसे रोका जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि किसी को भी समानांतर सरकार चलाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, चाहे हालात कितने भी उकसाने वाले क्यों न हों.

सेखोन ने कहा, ‘हम भी मानते हैं कि बेअदबी संबंधित मामलों की जांच और निपटारे में लंबी देरी नहीं होनी चाहिए. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि लोगों को क़ानून अपने हाथों में लेने और क़ानून व्यवस्था को अशक्त बनाने की अनुमति दे दी जाए.’

नवजोत सिंह सिद्धू के ‘सार्वजनिक फांसी’ वाले बयान की आलोचना करते हुए सेखोन ने कहा कि सत्तारूढ़ दल के प्रदेशाध्यक्ष को ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए.

सेखोन पूछते हैं, ‘मैं सिद्धू से पूछना चाहता हूं कि क्या हमारे संविधान में सार्वजनिक फांसी का कोई प्रावधान है. अगर नहीं है तो वह लोगों को संयम बरतने की सीख देने के बजाय जन भावनाओं को क्यों भड़का रहे हैं.’

उऩ्होंने कहा, ‘हमारे देश की बुनियाद धर्म के आधार पर नहीं रखी गई है. भारत क़ानून और संविधान से चलने वाला एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है. कैसे कोई सरकार संविधान के दायरे से बाहर जा सकती है और क़ानून तोड़ने वालों के साथ खड़े होकर गलत उदाहरण पेश कर सकती है?’

उन्होंने कहा, ‘अपराध कितना भी भयानक क्यों न हो, अपराधी को राज्य की एजेंसी (पुलिस) को सौंप दिया जाना चाहिए और उसे कानून के अनुसार दंडित किया जाना चाहिए.’

सेखोन के अनुसार, ऐसी संभावना है कि इन हालिया बेअदबी के प्रयासों का मकसद पंजाब में कड़ी मशक्कत के बाद स्थापित हुई शांति को भंग करना है. इसलिए यह बेहद जरूरी है कि उन ताकतों, चाहे वे आंतरिक हों या बाहरी, को बेनकाब किया जाए और उनकी साजिश का भांडाफोड़ किया जाए.

सीपीआई के राज्य सचिव बंत सिंह बरार ने द वायर को बताया कि बेअदबी के आरोपियों को मारकर भीड़ ने पुलिस की जांच में भी व्यवधान डाला है. उन्होंने कहा, ‘अगर इन बेअदबी के प्रयासों के जरिये समाज को बांटने की गहरी साजिश थी, तो अब इसका खुलासा कैसे होगा जब इसे अंजाम देने के लिए भेजे गए लोग ही जीवित नहीं बचे?’

वे पूछते हैं कि पुलिस इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचेगी कि इस तरह के जघन्य अपराध का प्रयास करने वाला व्यक्ति मानसिक तौर पर अस्थिर था या वास्तव में वह एक बड़ी योजना या साजिश का हिस्सा था.

बरार ने कहा, ‘सिंघू बॉर्डर पर बेअदबी के प्रयास के संबंध में और भी परतें खुलकर सामने आतीं अगर आरोपी आज जीवित होता तो. इसी तरह, स्वर्ण मंदिर में बेअदबी के प्रयास के लिए भेजा गया व्यक्ति अगर आज जीवित होता तो पुलिस को उसकी जांच-पड़ताल करके कई अहम सुराग मिल सकते थे.’

बरार ने आगे कहा कि स्वर्ण मंदिर में बेअदबी एक साफ और स्पष्ट मामला था, लेकिन कपूरथला में कथित बेअदबी के प्रयास पर अभी भी सवालिया निशान हैं जहां भीड़ ने आरोपी को मार डाला था.

उन्हों कहा, ‘यह वो समय है कि राज्य का राजनीतिक वर्ग आगे आए और लोगों को बताए कि बेअदबी के मामलों में संदिग्ध पाए जाने वाले व्यक्तियों को मारना नहीं है, क्योंकि इससे जांच के बाद मामले की जड़ तक पहुंचने में मदद मिलेगी.’

हालांकि, बरार ने कहा कि पंजाब के मुख्यधारा के राजनीतिक दलों द्वारा किए जा रहे इस तरह के व्यवहार के पीछे एक अहम कारण है.

वे बताते हैं, ‘पंजाब में चुनाव दूर नहीं हैं और वोट बैंक की राजनीति राजनीतिक दलों को मजबूर कर रही है कि वे भीड़ द्वारा की जा रही इन हत्याओं पर कड़ा रुख न अपनाएं.

बरार ने कहा, ‘ये घटनाएं राज्य को गहरे संकट में डाल सकती हैं. अगर कल किसी को सिर्फ शक के आधार पर मार दिया जाता है तो हम स्थिति को कैसे संभालेंगे?’

उन्होंने कहा कि किसी भी सूरत में मॉब लिंचिंग गलत है, फिर चाहे वह किसी धर्म में हो या फिर किसी समुदाय द्वारा चलन में लाई जाए.

जब सिंघू बॉर्डर पर लिंचिंग की घटना हुई तो संयुक्त किसान मोर्चा ने तुरंत इसकी निंदा की थी और क़ानून व्यवस्था को बनाए रखने की बात कही थी. लेकिन, इस बार पंजाब में हुई समान तरीके की नृशंस हत्याओं पर कई दिन बाद भी एसकेएम या व्यक्तिगत तौर पर किसान नेताओं की ओर से कोई बयान नहीं आया है.

संपर्क किए जाने पर पंजाब के प्रमुख फार्म यूनियनों में से एक भाकियू-एकता उगराहां के अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उगराहां ने द वायर  को बताया, ‘हालांकि बेअदबी की घटनाएं बेहद निंदनीय हैं, लेकिन मैं अभी लिंचिंग पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता हूं.’

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)