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40 महीने सरकार में रहने के बाद पिछली सरकार को दोष नहीं दे सकते: यशवंत सिन्हा

पूर्व वित्त मंत्री ने कहा, हमें उम्मीद थी कि जब हमारी सरकार बनेगी तो अर्थव्यवस्था में सुधार की दिशा में आगे बढ़ेंगे लेकिन जिस गति से योजनाओं पर काम होना था वो नहीं हुआ.

Yashwant Sinha PTI

पूर्व वित्त मंत्री व भाजपा नेता यशवंत सिन्हा. (फोटो: पीटीआई)

हम सब लोग जानते हैं कि बहुत दिनों से भारत की अर्थव्यवस्था में गिरावट आ रही थी. हर तिमाही जो आंकड़े आते थे उसमें गिरावट दर्ज की जा रही थी. और ये सिलसिला लगभग डेढ़ साल से चल रहा है.

इसको लेकर चिंता होती थी कि ऐसा क्यों हो रहा है. सरकार को इस बारे में कुछ करना चाहिए. लेकिन फिर भी हमने ज़ज़्ब किया, खामोश रहे. इस पर नहीं बोला.

लेकिन इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही के आंकड़े आए, उसमें दिखाया गया कि ग्रोथ रेट 6 प्रतिशत से भी कम हो गई है. पता चला यह 5.7 प्रतिशत हो गई है तो चिंता ज़्यादा गहराई. इसलिए हमने सोचा कि सरकार इस बारे में कुछ करेगी.

कुछ ख़बरें भी आईं कि सरकार कुछ पैकेज वगैरह के बारे में सोच रही है. एक हफ्ते से ज़्यादा का समय गुज़र गया, तब मुझे लगा कि मुझे इन बातों को सबके सामने रखना चाहिए, इसलिए मैंने अपनी बात रखने का काम किया.

2014 के चुनाव के पहले, आप लोगों को याद होगा कि आर्थिक मामलों में पार्टी का प्रवक्ता मैं ही हुआ करता था. जब भी कोई महत्वपूर्ण विषय आता था, तो पार्टी की तरफ से मुझे ही आदेश होता था कि मैं मीडिया से मिलूं.

उस समय मैंने कई प्रश्नों का जवाब दिया. उस समय हम लोग पॉलिसी पैरालिसिस की बात करते थे कि यूपीए सरकार में ऐसा लगता है कि जैसे फैसले लेने की जो क्षमता होती है उसको लकवा मार गया है. इसलिए वो फैसले नहीं करते हैं. फिर भ्रष्टाचार की और भी बातें थीं.

लाखों-करोड़ रुपये की जो परियोजनाएं थीं, वे कहीं न कहीं रुक गई थी. लाखों-करोड़, मतलब कुछ लोगों का अनुमान है कि 25 लाख करोड़ का था, कुछ का अनुमान था कि उससे भी ज़्यादा उन योजनाओं में पैसा लगा था.

और उसका नतीजा यह हुआ कि इन योजनाओं के लिए निजी क्षेत्र की कंपनियों को लोन दिया गया था. वे योजनाएं लटक गईं तो बैंक का पैसा भी लटक गया. वो एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग ऐसेट) हो गया.

लाखों-करोड़, कुछ लोग एक फीगर का ज़िक्र करते हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का लगभग आठ लाख करोड़ रुपये बुरे क़र्ज़ में फंसा हुआ है.

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आठ लाख करोड़ रुपये कोई मामूली रकम नहीं है और साल दर साल यह बढ़ती जा रही है. तो उस समय हम लोग ये कहते थे कि पॉलिसी पैरालिसिस खत्म करके इन योजनाओं को आगे बढ़ाकर बैंकों की हालत सुधार कर हमें अर्थव्यवस्था को सुधारना पड़ेगा.

उस समय हम लोग ये कहा करते थे. तो हम उम्मीद करते थे कि जब हम लोगों की सरकार बनेगी तो इस दिशा में हम आगे बढ़ेंगे. कुछ आगे बढ़े, लेकिन जिस गति के साथ इन योजनाओं पर काम होना था वो नहीं हुआ और 40 महीने सरकार में रहने के बाद हम इसके पहले की सरकार को दोष नहीं दे सकते.

क्योंकि हमको पूरा मौका मिला इन सब चीज़ों को ठीक करने का. और बैंक जो बुरे क़र्ज़ में फंसे हुए हैं उसका एक नतीजा यह हुआ कि उन्होंने ऋण देना बंद कर दिया.

बैंक के ऋण पर ही आगे जाकर निजी निवेश होता है, तो निजी निवेश बंद हो गया. इस तरह अर्थव्यवस्था की गति बहुत धीमी हो गई.

अर्थव्यवस्था की गति बहुत धीमी हो गई तो उससे बेरोज़गारी पैदा हुई. फिर उसके बाद नोटबंदी हो गई. उसके बाद जीएसटी लागू हो गया.

अब जीएसटी के बारे में मैं आपको बताऊं कि बीजेपी में कोई सबसे बड़ा पक्षधर था जीएसटी का तो मैं था. पिछली लोकसभा में मैं वित्तीय मामले की कमेटी का अध्यक्ष था और गुजरात सरकार के विरोध के बावजूद हम लोगों ने कहा कि जीएसटी लागू होना चाहिए और संसद को रिपोर्ट दी कि कैसे लागू होनी चाहिए?

जीएसटी लागू होने के लिए संसद भवन में जो समारोह हुआ, उसमें वित्त मंत्री जी ने स्वीकार भी किया कि यशवंत जी ने बहुत अच्छे-अच्छे सुझाव दिए कमेटी की तरफ से. उस समय किसी को चिंता नहीं थी. आज जो लोग जीएसटी को आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा रिफॉर्म बता रहे हैं, वो लोग उस समय कहीं नहीं थे.

मैं जीएसटी को भारतीय जनता पार्टी में अकेले आगे बढ़ा रहा था. तो जीएसटी लागू हुआ, लेकिन जीएसटी लागू जिस तरह किया गया, उससे समस्याएं और गहराईं. एक बार जब हम नोटबंदी का झटका दे चुके थे तो उसके तुरंत बाद जीएसटी का झटका दिया. बार-बार आप किसी को झटका देंगे तो उसका असर पड़ेगा न अर्थव्यवस्था पर.

जीएसटी को जुलाई से लागू करना आवश्यक नहीं था. एक जुलाई को वो महत्व नहीं है जो वित्तीय वर्ष में एक अप्रैल का है. हमने भी उस वक्त सुझाव दिया कि एक जुलाई से करने की जगह एक अक्टूबर से शुरू करो.

तब छह महीना बीत चुका होगा और थोड़ा टाइम मिल जाएगा. लेकिन सरकार बहुत जल्दबाजी में थी. उसने कहा नहीं, हम एक जुलाई से लागू करेंगे.

अब उसके चलते बहुत सारी समस्याएं खड़ी हो गईं. वो जीएसटीएन जो पूरा आईटी नेटवर्क है, रीढ़ की हड्डी है, वो फेल हो रहा है. तो परेशानियां बढ़ रही हैं. इसलिए मैंने सोचा कि ध्यान आकर्षित किया जाए और इनसे उबरने के जो उपाय हो सकते हैं, उन उपायों पर सरकार काम करे.

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हम ऐसा नहीं कहेंगे कि सरकार को लकवा मार गया है. फैसले हो रहे हैं, कई महत्वपूर्ण फैसले हुए भी हैं. लेकिन जब हम सरकार का नीति निर्धारण करते हैं तो एक बात याद रखिए कि उसका एक बड़ा पार्ट होता है लोगों के कल्याण की योजनाएं और एक बड़ा पार्ट होता है अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कदम.

हमको लगता है कि इस सरकार में कुछ इस तरह का कन्फ्यूजन हो गया है कि जो कल्याण की योजनाएं हैं, हम समझते हैं कि अकेले उसी से अर्थव्यवस्था गति में जाएगी. ऐसा नहीं होगा.

अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए अलग से उपाय करने होंगे और सबसे पहला उपाय करना पड़ेगा कि बैंक के एनपीए को नीचे लाया जाए. ये अचानक नहीं नीचे आएगा. 40 महीने में नीचे आना चाहिए था, नहीं आया है.

अभी भी कोई कदम ऐसा हमें नज़र नहीं आ रहा है जिससे कहा जाए कि बैंक के एनपीए हम कम कर लेंगे. सरकार ने एक बैंकरप्टसी एक्ट बनाया.

अख़बारों की रिपोर्ट के मुताबिक, 40 बड़ी-बड़ी कंपनियों के ख़िलाफ़ आज दिवालिया होने की प्रकिया चल रही है. वो दिवालिया हो गई तो बैंक का क़र्ज़ तो वापस नहीं करेगी. उसके लिए कोई दूसरा उपाय करना होगा.

इस सरकार के सामने सबसे पहला जो टास्क था वो था कि बैंकों की हालत में सुधार करो, जिसका अभी तक हम लोग इंतज़ार ही कर रहे हैं.

अगर डेढ़ साल से अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी हो रही है तो नोटबंदी तो उसके मध्य में आई. लेकिन इतना मैं ज़रूर कहूंगा कि नोटबंदी के परिणामों के बारे में पूरी छानबीन करनी चाहिए थी.

ये सोचना चाहिए था कि इसका अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा. रोज़गार पर क्या असर पड़ेगा. और ऐसे समय पर उसको नहीं लाना चाहिए था जब अर्थव्यवस्था चरमराई हुई थी.

अगर हम बहुत तेज़ और स्वस्थ अर्थव्यवस्था होते तब आप उस समय लाते. आप उसे लाए नवंबर में और उसका परिणाम या दुष्परिणाम समाप्त भी नहीं हुआ था, तब तक आपने जीएसटी ला दी. ये दूसरा बड़ा झटका पड़ा.

अब लोग कह रहे हैं कि आगे चलकर बहुत अच्छा होगा, हो सकता है अच्छा हो जाए. मैं उससे इनकार नहीं कर रहा हूं.

लेकिन अभी तुरंत उसका जो असर है वो ठीक नहीं है. तुरंत का मतलब क्या है? कींस बहुत बड़े अर्थशास्त्री हुए हैं जिन्होंने अंग्रेजी में कहा था कि ‘इन द लॉन्ग रन, वी आर आॅल डेड.’ किसी ने उनसे कहा कि लॉन्ग रन में बहुत अच्छा होगा तो उन्होंने कहा, ‘इन द लॉन्ग रन, वी आर आॅल डेड.’ आज देश की जनता चाहती है कि हमें आज रोज़गार मिले.

हमारे जैसे लोगों के पास सैकड़ों लोग आते हैं कि हमारा रोज़गार लगवा दीजिए, बेटे का रोज़गार लगवा दीजिए, भाई का रोज़गार लगवा दीजिए. कहां लगवा दें? जिसको भी आप कहें कि रोज़गार के लिए इंटरव्यू करो तो कहता है कि रोज़गार है ही नहीं तो कहां से लाएं!

अब हो सकता है कि मैं उतना अर्थशास्त्र नहीं जानता होऊं जितना कि सरकार के जो दो मंत्री बोले हैं, राजनाथ जी और पीयूष गोयल जी, वो हमसे ज्यादा अर्थशास्त्र समझते हैं. उनको लगता है कि हम न केवल भारत की अर्थव्यवस्था को, बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था के मेरुदंड हम बने हुए हैं. मैं हाथ जोड़कर बहुत नम्रता के साथ निवेदन करूंगा कि मैं उस विचार के साथ नहीं हूं.

कैशलेस अच्छी चीज़ है, कैशलेस होना चाहिए, लेकिन हम जानते हैं कि दुनिया के जो सबसे विकसित देश हैं, वहां भी एक अनुपात है कैशलेस और कैश के बीच में. अगर 40 प्रतिशत कैशलेस है तो 60 प्रतिशत कैश के साथ है. कहीं 50 है, कहीं कुछ है.

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कैशलेस की तरफ हम निश्चित रूप से बढ़ें, बढ़ भी रहे हैं, लेकिन अचानक हम कहेंगे कि सब कुछ कैशलेस हो जाए तो भारत जैसी अर्थव्यवस्था में, जिसका एक बड़ा हिस्सा हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था है, जहां पर सुविधाएं नहीं हैं कैशलेस की, वहां पर दिक्कत आएगी. इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था कैश आधारित अर्थव्यवस्था है.

मैंने जब 1998 में किसान क्रेडिट कार्ड लागू किया था तो वो कदम था कि भाई कैशलेस करो. किसान क्रेडिट कार्ड लेकर जाएगा और जैसे शहरों में होता है, क्रेडिट कार्ड से बात होगी, कैश से नहीं होगी.

उस दिशा में हमको आगे बढ़ना चाहिए लेकिन ज़ोर-जबरदस्ती करने और नोटबंदी करने से वो नहीं होगा. उसके लिए दूसरे उपाय करने होंगे.

मीडिया के लिए यह बहुत फेवरेट सवाल होगा कि आप होते तो क्या करते? मैं था. मैं आपको बता दूं कि इस देश में कांग्रेस पार्टी के वित्त मंत्रियों को छोड़ दिया जाए तो मैं अकेला वित्त मंत्री हूं जिसने सात बजट पेश किया है.

कांग्रेस के विपक्ष में ऐसा कोई शख़्स नहीं है जिसने सात बजट पेश किया हो. मैं अटल जी की सरकार में वित्त मंत्री था. तो बहुत कुछ करके दिखाया है.

मैंने शुरू में ही कहा कि जब हम सरकार में आए तो समस्याएं सबकी जानकारी में थीं. उन समस्याओं से निपटने के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए थे. कुछ कदम उठाए भी गए. अगर वो सफल नहीं हो रहे थे तो और कदम उठाने चाहिए थे.

उसमें सबसे पहला सवाल जो हम लोगों के सामने था वो था बैंकों की हालत में सुधार. बुरे फंसे हुए जो क़र्ज़ थे, उसका निपटारा करना और बैंकों को इस बात के लिए प्रेरित करना कि वे आगे बढ़ें.

अर्थव्यवस्था में जब गति नहीं आएगी तो रोज़गार के अवसर पैदा नहीं होंगे. अर्थव्यवस्था में गति लाने पर ही रोज़गार के अवसर पैदा होंगे.

गिरती हुई अर्थव्यव्स्था में दुनिया के किसी देश में कभी रोज़गार बढ़ा नहीं है. इसलिए सबसे पहली जो ज़िम्मेदारी हम लोगों की है वो ये है कि हम अर्थव्यवस्था को गति दें.

मैं आशा करता हूं कि सरकार जागेगी, चेतेगी और इसके लिए जो आवश्यक कदम हैं वो उठाने का प्रयास करेगी. बहुत सारे अर्थशास्त्री हैं जो इस बारे में उनको राय दे सकते हैं.

प्रधानमंत्री ने इकोनॉमिक एडवायज़री काउंसिल गठित की है, उनकी सलाह लें. और लोगों की राय लें, पहले जो कुछ किया गया है, उसका अध्ययन करें और फिर आगे बढ़ाने का काम करें.

मैं इस भाषा में नहीं कहना चाहूंगा कि अर्थव्यवस्था पूरी तरह फेल हो गई है. मैं ये कहना चाहूंगा कि अर्थव्यवस्था गिरावट के दौर में है. अर्थव्यवस्था में कुछ गंभीर समस्याएं हैं और अर्थव्यवस्था कोई ऐसी चीज नहीं है जिसको कि चुटकी बजाते ही ठीक कर देंगे.

जैसा कि हमने अपने लेख में कहा है कि हम 1998 में आए थे तो हमको एक गिरती हुई अर्थव्यवस्था मिली थी और हमें चार साल लगे थे उसे ठीक करने में. किसी के पास ऐसी जादू की छड़ी नहीं है कि घुमाया और अर्थव्यवस्था सुधर गई. भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्था के लिए बहुत परिश्रम करने की ज़रूरत है.

हम एक तिमाही के रिजल्ट पर नहीं कह रहे हैं. हमने तो कहा कि छह तिमाही से लगातार अर्थव्यवस्था तिमाही दर तिमाही कम ग्रोथ रेट रिकॉर्ड कर रही है और तीन साल के सबसे निचले स्तर 5.7 प्रतिशत पर है.

अगर यह कहा जाए कि ढांचागत परिवर्तन से ऐसा हो रहा है तो यह सही नहीं है. ढांचागत परिवर्तन से चीज़ों में सुधार होता है, चीज़ें नीचे नहीं जाती हैं.

(समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत पर आधारित)