समाज

वो जो था ख़्वाब-सा…

गए बरस इरफ़ान के जनाज़े में शामिल न होने का मलाल लिए जब साल भर बाद मैं उनकी क़ब्र पर पहुंचा तो ज़िंदगी-मौत, सच और झूठ के अलावा मोहब्बत पर भी बात निकली. और जो निकली तो फिर दूर तलक गई.

इरफ़ान. (फोटो: कुणाल वर्मा, साभार: फेसबुक/@irrfanofficial)

मुंबई: पश्चिम का सूरज अपनी आख़िरी किरणों को साथ डूबा जा रहा था. समंदर के पार जाता वह तट पर अपने होने के निशान छोड़े जा रहा था. तट, जिसे शमशान के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था, वहां बुझी लकड़ियों के अलावा कोई अलाव या चिता नहीं जल रही थी.

वह शाम ख़ुद भी बुझी-बुझी सी थी. उस शमशान के ठीक सामने है-  वर्सोवा क़ब्रिस्तान. मैं क़ब्रिस्तान में दाख़िल हुआ. दरवाज़े पर गार्ड ने रोका. इससे पहले कि वह मुझे पूछते कि मैं कौन हूं, कहां से आया हूं वग़ैरह-वग़ैरह, मैंने ही उनसे पूछ लिया- आपका नाम क्या है?

‘संतोष.’

‘संतोष जी, क्या आप बता सकते हैं कि इरफ़ान कहां रहते हैं?’

मेरे लहजे में घुली तीव्रता को भांपते हुए उन्होंने बताया, ‘जी, ग़ुसलख़ाने [स्नानघर] के पीछे, ब्लॉक-1 के 54 नम्बर क़ब्र में.’

आगे बढ़ने से पहले मैंने उनसे से एक सादा काग़ज़ मांग लिया. मैं गाम-दर-गाम को महसूस करते हुए, धीरे-धीरे चलकर इरफ़ान की क़ब्र तक पहुंचा. उनके सिरहाने अंग्रेज़ी में लिखा था- लेट साहबज़ादे इरफ़ान अली ख़ान. उसी पत्थर पर उनके मौत की तारीख़ लिखी थी – 29 अप्रैल 2020.

उस मनहूस दिन का सोचते हुए मुझे याद आया कि मैं उन्हें अलविदा नहीं कह सका था, क्योंकि मैं भी उनके लाखों चाहने वालों की तरह इस बात से मुत्तफ़िक नहीं था कि वह अब नहीं रहे.

चार दरख़्तों के साये में उनकी क़ब्र बेहद शांत थी. उसी काले पत्थर पर अरबी में इस्लामी कलिमा- ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूल अल्लाह – जो अल्लाह के एक होने और मोहम्मद को उसके रसूल होने की बात करता है, और 786 लिखा है. यह तमाम इबारत एक पीले रंग की लाइन से घिरी है जो ख़ुद एक मेहराब (गुंबद) की शक़्ल इख़्तियार किए हुए है. मैं उनके पैरों की तरफ़ से चलकर सिर की ओर आकर पास पड़े पत्थर पर बैठ गया. बैठते ही मीर तक़ी ‘मीर’ का एक शे’र याद आया –

सिरहाने ‘मीर’ के कोई न बोलो
अभी ‘टुक’ रोते-रोते सो गया है.

सूरज डूब गया था. मैंने इरफ़ान से पूछा- ‘इतने अंधेरे में कैसे रहते हो?,’ उनका जवाब आया: ‘मैं कहां रहता हूं! यहां तो इंतज़ार रहता है.’ इतना सुनते ही मेरी उत्सुकता बढ़ गई थी. फिर बातों का सिलसिला चल निकला…

कभी मैं उनसे पूछता और वह जवाब देते. कभी वो मुझसे पूछते और मैं जवाब देता. इस तहरीर के कुछ अंश उसी सादे काग़ज़ पर लिखे गए थे.

किसका इंतज़ार?

‘जाने दो.’ इरफ़ान ने दुख भरे लहजे में कहा. ‘हां, कोई-कोई चाहने वाले मिलने आते रहते हैं,’ उन्होंने आगे कहा.

तुम्हारे चाहने वाले भी तो बहुत हैं. ‘हां, इस बात का मुझे अफ़सोस भी नहीं है.’ इतना कहकर वह होंठों के बीच आने वाली अपनी मुस्कान से फ़िज़ा में रोशनी भरने लगे.

दुख से मुस्कान तक का फ़ासला कितना कम और कितना तवील है?

‘उतना ही जितना ज़िंदगी और मौत का है,’ इरफ़ान ने किसी मुफ़क्किर (फ़िलॉसफ़र) की तरह कुछ सोचकर जवाब दिया.

लोगों का अथाह सागर, मेरी ही तरह, एक आख़िरी बार तुम्हारा चेहरा देख न सकने के मलाल में अपनी पुरनम आंखें और बिलखते हुए दिलों को थाम नहीं सका होगा… इससे पहले कि मैं अपनी बात मुकम्मल करता उन्होंने पूछा- ‘यह क्या कम है कि मेरे जीते हुए न सिर्फ़ उन्होंने मेरा चेहरा देखा बल्कि मेरे काम को सराहा और अपनी दुनिया का नीला आसमान मेरे नाम कर दिया.’

वह किसी फलदार पेड़ की तरह हमेशा ज़मीन से जुड़े रहे. मैं मन ही मन उनके बड़प्पन के बारे में सोचने लगा. एक यह आर्टिस्ट अपनी क़ब्र में भी अपने चाहने वालों को याद कर रहा है. दूसरे, हम हैं कि अपनी ज़िंदगियों में न जाने कितने अज़ीज़ को भुला बैठे हैं. मैंने भी इरफ़ान के क़ब्र पर आने में ज़रा देर कर दी थी.

मैंने इरफ़ान से माफ़ी मांगी – माफ़ करना, मैं तुम्हारी मौत पर पर तुम्हें कंधा देने नहीं पहुंच सका. इतना सुनना था कि उन्होंने किसी बुज़ुर्ग की तरह मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा – ‘यह क्या कम है कि तुम अपनी ज़िंदगी को कंधा दे रहे हो!’

मैं एक पल के लिए उनसे नाराज़ हुआ और कहने लगा – हुह! ‘ज़िंदगी को कंधा.’ यह भी ख़ूब कहा तुमने इरफ़ान. क्या तुम्हारा यह कहना ज़िंदगी और मौत को तराज़ू के दोनों पलड़ों में बराबर नहीं ला देता है? मैंने फिर उत्सुकता से पूछा.

‘अब ज़िंदा हैं कौन? कोई है तो बताओ मुझे. अपने-अपने कंधों पर अपनी-अपनी ज़िंदगियां ढोते सब अपनी-अपनी मौत की ओर क़दम बढ़ा रहे हैं. हर सांझ सूरज भी अपनी किरणें समेट लेता है. रात रोशनी को बेरहमी से निगल लेती है. तुम पूछ रहे थे कि किसका इंतज़ार रहता है! शायद मुझे उसी रोशनी का इंतज़ार है जिसे रात बेरहमी से निगल लेती है. काश! हर शाम मौत को सलामी न देनी होती.’

‘दिनभर के बाद यह जो शाम आती है वह कड़वी लगती है.’ वो अब ख़ुद को समझाने लिए एक उदाहरण देते हैं. ‘जैसे किसी बड़े हो रहे बच्चे को दूध छुड़वाने के लिए मां अपने स्तन पर नीम के पत्ते का रस लगाने के बाद उसे दूध पिलाती है, वैसे ही अंधेरा कड़वा लगता है.’

मैं समझ गया वह क्या कहना चाह रहे थे. यह कि ज़िंदगी तब तलक ही होती है जब तक एक नवजात अपनी माँ के दूध के सहारे है. मौत का सफ़र उसके तुरंत बाद शुरू हो जाता है.

‘मुझे मालूम है तुम्हारा अगला सवाल क्या होगा?’ इरफ़ान ने हंसते हुए कहा. मैं भी मुस्कुराया. मुझे भी मालूम था कि इरफ़ान मेरा अगला सवाल जानते हैं. ‘तुम यह जानना चाहते हो कि मैंने मां के दूध और नीम के रस का एक ही वाक्य में प्रयोग कैसे कर दिया, है न?’

मैंने कहा – ज़रूर. ‘इस अंधेरे ठिकाने में दुनिया के चकाचौंध गलियारों पर फ़िक्र करने के लिए क़यामत तक वक्त मुक़र्रर है. अगर फिर कभी हमख़्याल हुए तो इसपर बात आगे बढ़ाएंगे. तबतक यह समझ लो कि मौत का अपना एक रंग है, आमिर.’

मैंने पूछा – अभी तुम्हारे ज़हन में कोई रंग है? ‘तुम भी समझ जाते हो कि मेरे मन में क्या चल रहा होता है,’ इरफ़ान ने कहा. मैंने कहा – बात क्यों बदल देते हो! वह बताओ जो मैं जानना चाहता हूं.

वह कहने लगे, ‘मैं तो अपनी मौत के बाद अपनी क़ब्र में उतारा गया. मैं अक्सर उनके बारे में सोचा करता हूं जो ज़िंदा हैं और ज़मीन के नीचे बदबूदार गटर में उतरने को मजबूर कर दिए जाते हैं. बदला कुछ भी नहीं. गटर की ज़हरीली बदबू आज भी उनकी आख़िरी सांस बनती है.’

‘तुम पूछ रहे थे कि किसका इंतज़ार है! इस वक़्त के बदलने का इंतज़ार है.’ मैंने उन्हें याद दिलाया कि उन्होंने ओम प्रकाश वाल्मीकि की कविता -ठाकुर का कुआं को कितने लगाव से पढ़ा था.

‘हां, मुझे याद है,’ यह कहकर वह पूरी कविता कई बार मेरे कान में हौले-हौले पढ़ते गए. वह आख़िर में उठ बैठे कविता के आख़िरी छह शब्दों को चीखकर तेज़ आवाज़ में पढ़ा –

‘…फिर अपना क्‍या?
गांव?
शहर?
देश…?’

उनकी चीख सुनकर पूरा देश तो नहीं मगर वर्सोवा क़ब्रिस्तान ज़रूर ग़म में मुब्तिला हो गया था. मैंने पूछ ही लिया- क्या चकाचौंध गलियारों में जीने वालों को इन बातों से कोई मतलब नहीं है? या है? इरफ़ान ने शालीनतापूर्वक बताया, ‘बात दूसरी है. हमें उनसे क्या मतलब जिन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता. जिनका ज़मीर उन्हें छलनी न कर रहा हो. हम तो उस कारवां में शामिल हैं, जिनका दिल दुखता हो. भले ही वह पार्लियामेंट में क्यों न हों.’

बात सच थी मगर आख़िरी वाक्य सुनकर हम दोनों ही हंसने लगे.

मैंने ज़िद्द कर दी- इरफ़ान, एक बार और वह सुनाओ. तुम्हारी फ़िल्म ‘पान सिंह तोमर’ का वह मशहूर डायलॉग. थोड़ी ख़ामोशी के बाद उन्होंने शर्त रख दी. ‘मैं ज़रूर सुनाऊंगा लेकिन फिर तुम्हें उस लाइन की सच्चाई का ऐतराफ़ करना होगा.’

मैंने कहा- कब इनकार किया इरफ़ान, मगर भले ही पार्लियामेंट में डकैत मौजूद हों, यह कहना मेरे लिए मुश्क़िल है कि तुम्हारे बाद बीहड़ में बाग़ी रहे या नहीं. यह सुनकर इरफ़ान हंसने लगे. अब वह ख़ुद सच्चाई का ऐतराफ़ कर रहे थे.

मैंने उनसे अर्ज़ किया- कितना अच्छा हम ज़िंदगी और मौत के दर्शन पर सुकरात बन बैठे थे, कहां तुम मुझे सच के गांधी से रूबरू करवा रहे हो. इरफ़ान कहने लगे – ‘सच का ज़हर झूठ के अमृत से मीठा होता है.’

‘सुकरात के गले से नीचे उतरता ज़हर और गांधी के सीने को भेदती गोलियां सच का बाल बांका नहीं कर सकीं,’ इरफ़ान ने सच्चाई से अपने मोहब्बत का इज़हार करते हुए कहा.

वह कहना चाह रहे थे कि सच्चाई के लिए जान क़ुर्बान करने वाले अपने हत्यारों से अधिक ज़िंदा रहते हैं. मुझे फ़िल्म ‘लायन ऑफ़ द डेज़र्ट’ के ओमर मुख़्तार का वो लाइन याद आ गया- ‘आइ विल लिव लॉन्गर दैन माई हैंगमैन.’ [मैं, मुझे फांसी देने वाले जल्लाद से, कहीं ज़्यादा ज़िंदा रहूंगा.]

यह नाइंसाफ़ी होती अगर मैं उनसे न पूछता कि उन्हें अपने चाहने वालों से कोई शिकायत है? मैंने पूछा और उनका जवाब था, ‘हां, सिर्फ़ एक. मेरी मौत के बाद जब मेरे चाहने वाले मेरी फ़िल्मों के डायलॉग शेयर कर रहे थे तब एक डायलॉग को बेहद ग़लत तरीक़े से पेश गिया. उसमें मोहब्बत में अपने अज़ीज़ को जाने देने की अहमियत पर ज़ोर था. यह था कि मोहब्बत में दुश्वारियां न पैदा को जाएं, एक दूसरे की आज़ादी को तलाश करने की राह आसान बनाई जाएं. पर हुआ बिलकुल उल्टा. लोगों ने उस डायलॉग में ‘ज़िद्द’ के बाद की लाइन पर तवज्जो दी. उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था.’

मैंने इरफ़ान की पसंदीदा ग़ज़ल के बारे में पूछा. उन्होंने बिना रुके जवाब दिया, ‘गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले, चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले.’ अब फ़िल्म ‘हैदर’ को याद करना लाज़मी था. फ़िल्म में वह अपने दोस्त के साथ जेल में बंद हैं. कोठरियों में दहकते बल्ब के बीच रात के ज़ख्मों पर मलहम लगाती फ़ैज़ की इस ग़ज़ल को उनके दोस्त गुनगुना रहे हैं.

यह सोचना भर हमारी पलकों को गीला कर गया. मैंने आंखों-आंखों में उनसे एक आख़िरी सवाल पूछा- उस क़ैदख़ाने और इस आरामगाह में क्या फ़र्क़ है, इरफ़ान? उन्होंने कहा, ‘यहां बदन पर जुएं और अंदर अजगर नहीं रेंगते.’

चिड़ियों का एक समूह पिंजड़ों में रात गुज़ारने चला जा रहा था. टहनियों ने अपने पत्ते संजो लिए थे. हवाओं ने नमी का लबादा ओढ़ लिया था. मुझे भी लौटना था.

मैंने ग़ुसलख़ाने के पीछे, ब्लॉक-1 के 54 नम्बर क़ब्र पर हाथों से पानी डाला. क़ब्र में लेटे साहिबज़ादे इरफ़ान अली ख़ान को अलविदा कहा और अपनी नम आंखें लिए लौट आया. मेरे होने का कुछ हिस्सा वहीं उनके साथ, उनकी क़ब्र में रह गया…

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)