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हृषिकेश मुखर्जी: जिसने सिनेमा के साथ दर्शकों की भी नब्ज़ पढ़ ली थी

जन्मदिन विशेष: हृषिकेश मुखर्जी सिनेमा के रास्ते पर आम परिवारों की कहानी की उंगली थामे निकले थे. ये समझाने कि जीवन जीने का अलग-अलग स्तर हो सकता है लेकिन हंसी या आंसुओं को अमीर-गरीब के खांचे में नहीं बांटा जा सकता.

Hrishikesh Mukherji

हृषिकेश मुखर्जी (30 सितंबर 1922-27 अगस्त 2006) (फोटो साभार: gaana.com/twitter)

रॉय सर साइकिल से घर जा रहे हैं, हैंडल पर उनका बैग टंगा है..

ब्रेक पर हथेलियां कसी हैं

रॉय सर की रीढ़ आगे की ओर झुकी है, शायद कशेरुकाओं के बीच की दूरी कम हो गयी है

फ़ीमर कमज़ोर है, पैडल मारने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाना पड़ता है

फेंफडों की कोष्ठिकाओं में ऑक्सीजन बार बार भरनी पड़ती है

देखकर लगता है

रॉय सर कांच के चौड़े की मुंह की बोतल में फॉर्मेल्डीहाइड में डूबे हैं, साइकिल भी है साथ

बायोलॉजी की लैब में जैसे कोई स्पेसीमेन रखा हो, मृत… फिर भी जीवित सा लगता…

रॉय सर एक आम आदमी हैं. एक दिन बोतल फूट जाती है… रॉय सर मर जाते हैं साइकिल ज़िन्दा रहती है. उनकी ये साइकिल रोम के पास एक शहर वेल मेलेना में रहने वाले अंतोनियो को मिलती है. वो नौकरी के पहले दिन अपने घर से उम्मीद को साइकिल के कैरियर पर लगाए निकलता है. उसकी साइकिल को पैडल नहीं पर लगे हैं. वो उड़ पड़ती है. उस रोज़ ही दोपहर को उसकी नज़रों के सामने चोर उसकी साइकिल चुरा ले जाते हैं. रात तक वो अपने भूखे-प्यासे, क्लांत बच्चे के साथ साइकिल की तलाश करता है. अंत में बाइसिकल भी नहीं पाता है.

लेकिन ये इटालियन फिल्म बाइसिकल थीव्स की कहानी नहीं है. ये कहानी साइकिल की भी नहीं हैं.

ये अंतोनियो की है, ये रॉय सर की है. ये काम पर जाते हर आम आदमी की है. अंतोनियो और रॉय सर हर मध्यम वर्गीय आदमी के चेहरे हैं. जो भी इन्हें देखता है अपने समूचे अस्तित्व पर इन दोनों को उगने देता है.

इस बीच दो बंगाली बाबू इन्हीं मध्यम वर्गीय आम चेहरों को लेकर संवेदनशील हो उठते हैं… इतने मुतास्सिर हैं कि कुछ करना चाहते हैं इन्हें लेकर, सिनेमा की चकाचौंध भरी दुनिया में इन आम चेहरों को लेकर आना चाहते हैं. एक हैं सत्यजित रे, एक हैं हृषिकेश मुखर्जी.

हृषिकेश मुखर्जी यानी हृषि दा ने हिंदी सिनेमा की राह पकड़ी और उस राहगुज़र पर मध्यमवर्गीय परिवारों की कहानियों की अंगुली थामे निकल पड़े. ये समझाने को कि जीवन जीने का स्तर हो सकता है लेकिन हंसी और आंसुओं को वर्गीकृत नहीं किया जा सकता. उन्होंने अपनी फ़िल्मों से ये साबित कर दिया कि किसी मिडिल क्लास आंख से निकला आंसू हाई प्रोफाइल आंख में डबडबा सकता है. मध्यमवर्गीय हंसी एलीट होंठों पर भी खिल सकती है.

ऐसे फ़िल्मकार थे हृषिकेश मुखर्जी. लो बजट में भी जैसे बॉक्स का टिकट थमा देते थे. उनकी फ़िल्में इतनी अपनी-सी लगती हैं, ऐसे गुदगुदाती हैं जैसे हम बाईस्कोप का खेल देख रहे हैं, जहां नीना की नानी की नाव निकलने को है लंबे सफ़र पर… सामान घर से निकाले गए हैं और नानी की नाव में डाले गये हैं

एक छड़ी, एक घड़ी, एक झाड़ू, एक लाडू एक संदूक, एक बंदूक

एक तलवार, एक सलवार, एक ढोलक, एक बीन

एक लहसुन, एक आलू ,एक डोरा, एक डोरी ,एक केला, एक आम

एक पक्का, एक कच्चा..

यही सब कच्चा माल तो होता है हृषिकेश मुखर्जी की फिल्मों में, घर में पाया जाने वाला सामान या पूरा का पूरा एक घर ही होता है उनकी फिल्मों में.

उनके द्वारा निर्देशित पहली फ़िल्म मुसाफ़िर हो या आख़िरी फिल्म झूठ बोले कौआ काटे, वो घर की ही अंतहीन यात्रा पर रहे.  ख़ूबसूरत, अनुपमा, मेम दीदी, बावर्ची, अभिमान, चुपके-चुपके या मिली… कोई भी फ़िल्म घर के बिना पूरी नहीं होती. सच ही लगता है कि हर घर कुछ तो कहता है.

इसकी वजह यही रही कि हृषिकेश मुखर्जी का जन्म 30 सितंबर 1922 को कलकत्ता यानी आज ही के दिन कोलकाता में एक मिडिल क्लास ब्राह्मण परिवार में हुआ. मिडिल क्लास सुख दुःख से उनका वास्ता शुरू से ही रहा.

पढ़ने-लिखने में अव्वल थे. विज्ञान पसंदीदा विषय था और होता भी क्यों नहीं. उनके पिता से जो जीन्स मिले उनमें से एक पर केमिस्ट्री लिखा था. पिता रसायन शास्त्र के छात्र रहे थे. हृषिकेश मुखर्जी ने भी जीन के प्रभाव से केमिस्ट्री की पढ़ाई शुरू की, लेकिन जाने कैसा केमिकल लोचा हुआ कि बायोकेमिस्ट बनने की चाह रखने वाले हृषिकेश मुखर्जी केमिस्ट्री की लैब से सीधे फ़िल्मी स्टूडियो की लेबोरेटरी में पहुंच गए.

फ़िल्मों की कटाई-छंटाई करने लगे यानी फ़िल्म एडिटिंग के काम से जुड़ गए. दरअसल, कॉलेज दिनों के दौरान ही ‘ऐल्फा-बीटा-थीटा’ की जगह ‘लाईट-साऊंड-कैमरा-एक्शन’ जैसे शब्द उनको ज़्यादा अपीलिंग लगने लगे.

On set of Anupama Twitter Jaiarjun

फिल्म अनुपमा के सेट पर अभिनेता डेविड और धर्मेन्द्र के साथ (फोटो साभार: jaiarjun/twitter )

एक ही एक ख़्वाब, आंखों में दिन दुपहरी रात गुज़ारने लगा था. सिनेमेटोग्राफर बनने का ख्व़ाब. बॉम्बे चले आये. अपने एक दोस्त के पास जो एडिटर था. उसके साथ स्टूडियो चले जाया करते. ख़ाली वक़्त में कभी-कभी एडिटिंग किया करते थे, तो कभी स्टूडियो में मौजूद फ़िल्म निर्देशकों को कोई शूट से जुड़े टिप्स दे देते.

ऐसा करते हुए एक दिन बिमल रॉय ने उन्हें देख लिया. वे काफ़ी प्रभावित हुए. उन्हें अपनी फिल्मों का संपादन करने को कहा. हृषिकेश मुखर्जी ने जवाब में कह दिया कि वो अभी नौसिखिये हैं, दो-तीन महीने का ही काम का अनुभव है.

बिमल रॉय मुस्करा दिए और कहा कि वो उनकी प्रतिभा पहचान चुके हैं. हृषिकेश मुखर्जी ने कलकत्ता वापस जाकर पढ़ाई पूरी करने की बात कही तो बिमल रॉय ने उनको कलकत्ता के एक स्टूडियो न्यू थिएटर में काम करने की सलाह दी.

न्यू थिएटर भारत के बहुत शुरूआती स्टूडियोज़ में से एक था. इसे बीएन सरकार ने बनाया था. ये पहला स्टूडियो था जहां पहले गाने रिकॉर्ड कर के, शूटिंग के बाद एडिटिंग के दौरान लिप सिंक करने की तकनीक का इस्तेमाल किया गया.

हृषिकेश यहां काम करने लगे. एडिटिंग के इस महीन, गंभीर और टेक्निकल काम के दौरान कोई विचार आता तो उसे लिख डालते. उन्हें तकनीकी रचनाकार कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा.

सबसे पहली फिल्म जो उन्होंने संपादित की, वो थी तथापिये फिल्म बड़ी हिट साबित हुई. परन्तु अपनी पढ़ाई के चलते उन्होंने न्यू थिएटर में काम छोड़ दिया पर बिमल रॉय ने उन्हें नहीं छोड़ा. वो उनको बॉम्बे ले आये.

हृषिकेश मुखर्जी ने फिल्म दो बीघा ज़मीन का संपादन किया ही, इसका कथानक भी लिखा. बिमल रॉय के साथ उन्होंने फिल्म मधुमती तक काम किया.

वो स्टूडियो में काम तो कर रहे थे पर उनके मन में कुछ घर कर रहा था. एक घर की कहानी… एक ऐसा घर जहां मुसाफिर आकर ठहरते हैं और चले जाते हैं जो कि हूबहू सब की ज़िंदगी की कहानी है.

वो इस कहानी को फ़िल्म में तब्दील करना चाहते थे. कागजों से रील में ढालना चाहते थे. ये बात उन्होंने फिल्म मधुमती की शूटिंग के दौरान दिलीप कुमार को कही. वो भयभीत थे कि फिल्म नहीं चली तो?

ऐसे में दिलीप कुमार ने मुख्य भूमिका निभाने का वादा किया. वे उस समय बड़े अभिनेता थे. फिल्म उनके नाम से ही कामयाब हो जाया करती थी. मुसाफिर नाम से ही ये फिल्म बनी. दिलीप कुमार ने अभिनय कर अपने वादे को निभाया भी.

फिल्म के संगीत थे सलिल चौधरी, पटकथा ऋत्विक घटक और राजेंद्र सिंह बेदी ने मिलकर लिखा. इस पहली ही फिल्म को मिला नेशनल अवॉर्ड थर्ड बेस्ट फीचर फिल्म अवॉर्ड.

तब ये एक नयी ही श्रेणी थी पुरस्कारों की. हुआ कुछ यूं था कि साल 1954 में नेशनल अवॉर्ड मिलने शुरू हुए थे और अगले ही साल राष्ट्रीय पुरस्कार की दो और कैटेगरी शुरू की गयीं..यानी अब तीन पुरस्कार मिलने लगे थे फीचर फिल्म को.

‘President’s Silver Medal for Best Feature Film, Certificate of Merit for the Second Best Feature Film और Certificate of Merit for the Third Best Feature Film.’ लेकिन 15वें नेशनल अवॉर्ड के बाद एक ही पुरस्कार दिया जाने लगा.

बहरहाल, उनके काम से राज कपूर खूब खुश हुए और फिल्म अनाड़ी में डायरेक्शन का मौका दिया. ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ज़बरदस्त सुपरहिट हुई. ये हृषि दा के जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ.

वे अब समय की धारा के साथ बहते गए. अनाड़ी के बाद उन्होंने बनायी अनुराधा. इसे भी नेशनल अवॉर्ड मिला.

लगता था कि हृषिकेश मुखर्जी कोई नब्ज़ पकड़ लेने वाला पीर-फ़कीर है, जो सिनेमा और आर्ट ही नहीं वरन दर्शकों की नाड़ी भी पढ़ लेता है और उन्हीं के अनुसार सिनेमा रचता है. दर्शकों के बहुत नज़दीक आने लगा.

Hrishikesh Films

यही नहीं घर-घर की कहानी कहते हुए हृषिकेश मुखर्जी के सिने संसार में बहुत सारे रिश्ते जुड़ते गए मसलन अमिताभ बच्चन ने उनके साथ क़रीब 9 फिल्में की हैं. उन्होंने फिल्म मुसाफ़िर से लेकर ख़ूबसूरत तक चरित्र अभिनेता डेविड को सूत्रधार के रूप पेश किया. सलिल चौधरी अक्सर उनकी फिल्मों में संगीत देते, राजेंद्र सिंह बेदी संवाद.

इनके इतर भी एक और कलाकार था जो उनसे बहुत गहरे से जुड़ गया. असरानी, ये जुड़ाव इतना गहरा था कि हृषिकेश मुखर्जी उन्हें कहते कि कुछ समय बाद तुम्हारा नाम असरानी मुखर्जी हो जाएगा. असरानी उनकी हर फिल्म में नज़र आये.

असरानी से हृषिकेश मुखर्जी की मुलाक़ात का बेहद दिलचस्प किस्सा है. असरानी फिल्म इंस्टिट्यूट पुणे से एक्टिंग डिप्लोमा करने के बाद वहीं पढ़ा रहे थे. फिल्मों में ब्रेक की तलाश में थे. हृषिकेश मुखर्जी अक्सर वहां एक्टिंग के गुर सिखाने आया करते थे. असरानी उनसे अनुरोध करते थे हर बार. वो कहते हम कुछ करता है. पर कुछ हुआ नहीं.

एक रोज़ असरानी ने देखा कि हृषिकेश मुखर्जी जीप में बैठ कर आ रहे हैं. तीन-चार लोग उनके साथ हैं. असरानी को देखते ही उन्होंने पुकारा, ‘असरानी, इधर आओ.’ असरानी को लगा आज तो उन्हें काम मिलकर ही रहेगा. उन्होंने उम्मीद को दांतों से कसकर पकड़ लिया.

हृषिकेश मुखर्जी के साथ बंगाल के अभिनेता काली बनर्जी, दो लेखक डीएन मुखर्जी तथा बिमल दत्त थे. गुलज़ार भी थे जो उन दिनों हृषिकेश मुखर्जी को असिस्ट कर रहे थे. असरानी ने सबके पैर छू लिए. हृषिकेश मुखर्जी बोले, ‘अरे! असरानी हम तुमको देगा, देगा काम पर पहले ये बताओ, इधर कोई लड़की है?

हताश असरानी बोले, ‘बहुत हैं.’

हृषिकेश मुखर्जी बोले, ‘नहीं कोई जया भादुड़ी नाम का है?’ असरानी बोले, ‘हां, हैं न.’

‘तो बुलाओ उसको. उसको मिलने को आया है हम लोग.’

हृषिकेश मुखर्जी गुड्डी फिल्म बनाने जा रहे थे. जया भादुड़ी को मुख्य भूमिका में लेना चाहते थे. बहरहाल इस फिल्म से असरानी को भी रजत पटल पर आने का मौक़ा मिला.

फिल्म 'मिली' के सेट पर जया भादुड़ी और अशोक कुमार के साथ

फिल्म ‘मिली’ के सेट पर जया भादुड़ी और अशोक कुमार के साथ

हृषिकेश मुखर्जी यूं तो बहुत ही नरम जान शख्सियत थे लेकिन निर्देशक के तौर पर उनकी छवि सख्त निर्देशक की है. शूटिंग पर उनका निर्णय अंतिम निर्णय होता था, वो किसी तरह का बदलाव नहीं करते जब तक कि उन्हें उसकी ज़रुरत नहीं लगती.

प्रश्न पूछना मना था. शूटिंग के समय बहुत गंभीर रहते. उन्होंने फिल्मी दुनिया में आने से पहले कुछ वक़्त तक बच्चों को गणित और विज्ञान पढ़ाते थे. लगता है बाकी सब तो पीछे छूट गया पर मास्टर जी वाली छड़ी उनके साथ रही.

साधारण कपड़े तथा पैरों में सैंडिल पहने, साथ में हमेशा शतरंज का डिब्बा लिए सेट पर नज़र आया करते थे. सितार बजाने का शौक फ़रमाते थे. जितने सादा थे उतनी सादा, छोटे बजट की फिल्में बनाते. समाज के सोग, जोग, भोग पर फिल्में बनाते.

आनंद में मृत्यु को जीतना है, सत्यकाम में बेरोज़गारी और भूख से हारना है. अभिमान में अभिमान ही है, तो नरम गरम एक क्लासिक है, फिर गोलमाल डबल क्लासिक. वहां मंझली दीदी हैं, तो मेम दीदी भी है. वफादार, ख़ुशदिल बावर्ची है, नमक हराम भी है.

सांझ और सवेरे में डूबते गुरुदत्त हैं, आशीर्वाद में फिर से उभरते हुए अशोक कुमार. गरम कोट में जाने कितनी संवेदनाएं हैं ठिठुरती हुई, पर 43 फ़िल्में जो हृषिकेश मुखर्जी के निर्देशन वाले अकाउंट में दर्ज हैं, उस हर फिल्म में एक घर की चारदीवारी है, जहां छत, दीवार और फ़र्श से तक कहानी निकलती है जो सामने बैठे दर्शक को धीमे-धीमे अपने आगोश में ले लेती हैं.

(माधुरी आकाशवाणी जयपुर में न्यूज़ रीडर हैं)