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पश्चिम बंगाल: लोकायुक्त ने कार्यकाल के पहले 26 महीनों मे एक जांच भी पूरी नहीं की

पश्चिम बंगाल लोकायुक्त अधिनियम, 2003 के अनुसार कोई भी जांच एक साल के भीतर पूरी की जानी चाहिए. आरटीआई के तहत मिली जानकारी दिखाती है कि 10 जनवरी को अपना तीन साल का कार्यकाल ख़त्म करने वाले लोकायुक्त अशीम कुमार रॉय ने शुरुआती 26 महीनों में कोई जांच पूर्ण नहीं की.

जस्टिस अशीम कुमार रॉय. (फोटो: https://www.calcuttahighcourt.gov.in/)

कोलकाता: सूचना के अधिकार (आरटीआई) से प्राप्त जानकारी से पता लगा है कि पश्चिम बंगाल के लोकायुक्त अशीम कुमार रॉय, जिन्होंने अपना तीन साल का कार्यकाल 10 जनवरी को खत्म किया है, ने अपने कार्यकाल के पहले 26 महीनों में एक जांच भी पूरी नहीं की थी.

जबकि पश्चिम बंगाल लोकायुक्त अधिनियम, 2003 के अनुसार कोई भी जांच एक साल के भीतर पूरी की जानी चाहिए.

11 जनवरी 2019 से 22 मार्च 2021 के बीच लोकायुक्त को 30 शिकायतें प्राप्त हुईं, जिनमें से 16 का निपटारा कर दिया गया.

लेकिन, लोकायुक्त कार्यालय ने यह स्पष्ट नहीं किया कि ‘शिकायत निपटाने से’ उसका क्या आशय है. क्योंकि मूल जवाब में कहा गया है कि अभी तक कोई जांच पूरी नहीं हुई.

बता दें कि राज्य के लोकायुक्त का पद केंद्र के लोकपाल के समान होता है. इसका चयन संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष वाली समिति करती है. यह नौकरशाहों के भ्रष्टाचार, सरकारी मुलाजिमों और जन प्रतिनिधियों के भ्रष्टाचार की जांच करता है.

आरटीआई विश्वनाथ गोस्वामी ने लगाई थी. बता दें कि बंगाल में 2009 से 2019 तक लोकायुक्त का पद खाली रहा था. 11 जनवरी 2019 को अशीम कुमार की नियुक्ति हुई थी. वे राज्य के दूसरे लोकायुक्त बने थे.

आरटीआई के जवाबों से पता चला है कि जब रॉय ने पदभार संभाला तब लोकायुक्त के पास 2007 से कुल 240 मामले लंबित थे. उनके कार्यकाल के पहले 26 महीनों में, 11 जनवरी, 2019 से 22 मार्च, 2021 के बीच, 30 और शिकायतें दर्ज की गईं.

इन कुल 270 शिकायतों में से, जनवरी 2019 से पहले की 143 और रॉय के कार्यकाल के दौरान दर्ज की गई 15 शिकायतों का निपटारा किया गया.

हालांकि, आरटीआई के जवाब में किसी भी शिकायत के बारे में कोई विवरण देने से इनकार कर दिया गया. इसके पक्ष में तर्क दिया गया कि कोई  भी मामला अभी उस स्थिति में नहीं पहुंचा है कि उसकी जानकारी दी जा सके या वह जांच प्रक्रिया में है.

पश्चिम बंगाल लोकायुक्त अधिनियम, 2003 की धारा 10(2) (ए) और 16 का हवाला देते हुए आरटीआई के जवाब में कहा गया है कि हर प्रारंभिक जांच में गोपनीयता बरती जाती है, जिसके चलते शिकायतकर्ता और संबंधित लोकसेवक की पहचान उजागर नहीं की जा सकती है.

जवाब में यह भी कहा गया है कि अभी तक कोई शिकायत निराधार नहीं पाई गई है या दुर्भावनापूर्ण इरादे से दर्ज कराई गई  है.

आरटीआई लगाने वाले गोस्वामी ने जवाबों को भ्रामक बताया है. वे सवाल उठाते हैं, ‘न तो कोई मामला उस स्तर पर पहुंचा कि उसमें कार्रवाई की सिफारिश की जा सके और न ही कोई शिकायत झूठी या निराधार पाई गई, लेकिन फिर भी ‘158 मामलों का निपटारा हो गया. यह कैसे संभव है?’ इसलिए, उन्होंने इस जवाब के खिलाफ अपील भी लगाई.

लोकायुक्त कार्यालय के एक अधिकारी गोपनीयता की शर्त पर द वायर  को बताया, ‘जब प्रारंभिक जांच में मामलों आगे बढ़ने की संभावना नजर नहीं आती है तो उन्हें भी निपटाए गए मामलों के तौर पर गिना जाता है. जांच पूरी करने में देरी काफी हद तक महामारी के चलते हुई.’

बहरहाल, अगर महाराष्ट्र ओडिशा और कर्नाटक जैसे राज्यों से तुलना करें तो वहां लोकायुक्त में दर्ज मामलों की संख्या हजारों में रही और ये सभी राज्यों ने शिकायतें निपटाने का विवरण भी देते हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)