राजनीति

गुजरात दंगे में माया कोडनानी की भूमिका और अमित शाह की गवाही के मायने

विशेष साक्षात्कार: ‘फिक्शन आॅफ फैक्ट फाइंडिंग: मोदी एंड गोधरा’ किताब के लेखक मनोज मिट्टा से चर्चा कर रहे हैं द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन.

Gujrat Riots Amit Shah Maya Kodnani

अमित शाह (फोटो: रॉयटर्स) गुजरात दंगा (फाइल फोटो: पीटीआई) माया कोडनानी (फोटो: पीटीआई)

18 सितंबर को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह नरोदा गाम मामले में भाजपा नेता माया कोडनानी के डिफेंस विटनेस के तौर पर गुजरात के ट्रायल कोर्ट के सामने पेश हुए. माया कोडनानी पर 28 फरवरी, 2002 को अहमदाबाद के नरोदा गाम में 11 लोगों, जिनमें सभी मुसलमान थे, की हत्या की साजिश रचने का आरोप है. गुजरात हिंसा पर किताब लिखने वाले पत्रकार मनोज मिट्टा ने ‘द वायर’ के साथ इंटरव्यू में शाह की गवाही के मायने और नरोदा गांव मामले की अहमियत के बारे में विस्तार से बातचीत की.

सिद्धार्थ वरदराजन: मनोज मिट्टा की किताब ‘फिक्शन आॅफ फैक्ट फाइंडिंग: मोदी एंड गोधरा’ 2002 के गुजरात दंगों पर सबसे तफसील के साथ लिखी गई किताबों में से एक है. तहकीकात और अभियोजन की प्रक्रिया के आखिर में आने के कारण यह किताब और भी खास हो जाती है. यह किताब गुजरात हिंसा की एसआईटी जांच को आलोचनात्मक नजरिए से देखती है. 2002 के दंगों में कथित संलिप्तता के आरोपों को लेकर नरेंद्र मोदी समेत 60 से ज्यादा राजनीतिज्ञों और अफसरों पर कोई मामला बनता है या नहीं, यह तय करने की जिम्मेदारी एसआईटी ने किस तरह से निभाई, इसकी गंभीर पड़ताल भी इस किताब में की गई है.

हमारी इस बातचीत का तात्कालिक संदर्भ 18 सितंबर को नरोदा गाम नरसंहार मामले में ट्रायल कोर्ट के सामने अमित शाह की गवाही है. शाह को माया कोडनानी के डिफेंस विटनेस के तौर पर गवाही देने के लिए समन किया गया था.

कोडनानी 2002 के गुजरात नरसंहार के वक्त एक साधारण भाजपा सदस्य थीं. मोदी ने उन्हें तरक्की देते हुए 2007 में अपने कैबिनेट में शामिल कर लिया. उन्होंने ऐसा इस इस तथ्य के बावजूद किया कि इन पांच सालों में कोडनानी नरोदा पाटिया नरसंहार- जिस मामले में उन्हें दोषी करार दिया जा चुका है, और नरोदा गाम में हुई हिंसा में शामिल होने के आरोपों के घेरे में थीं.

कोडनानी ने इस्तीफा तब जाकर दिया जब उन्हें नरोदा पाटिया मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दंगाई भीड़ का नेतृत्व करने और 90 से ज्यादा लोगों के कत्लेआम की साजिश में मुख्य भूमिका निभाने का दोषी करार दे दिया गया. उन्हें जेल की सजा हुई. वे फिलहाल जमानत पर बाहर हैं. अभी हमारे सामने नरोदा गाम मामले में कोडनानी की कथित संलिप्तता का मामला है.

इससे पहले उन्होंने कोर्ट से शिकायत की थी कि उनका अमित शाह से संपर्क नहीं हो पा रहा है. आखिर में शाह को समन भेजा गया, जिसके बाद वे कोर्ट में पेश हुए. शाह ने कोडनानी के इन दावों को ही दोहराते हुए कहा कि उस दिन (नरोदा गाम नरसंहार के दिन) उन्होंने कोडनानी को दो बार देखा था.

पहली बार वे विधानसभा में थीं और दूसरी बार उनके साथ अस्पताल में थीं. कुछ चश्मदीद गवाहों का कहना है कि इन दो समयों के आसपास वे नरोदा गाम में थीं. मनोज अपनी बात शुरू करते हुए सबसे पहले हमें नरोदा गाम मामले में कोडनानी के दावों के लिहाज से शाह की गवाही के महत्व के बारे में अपना आकलन बताइए.

मनोज मिट्टा: जैसा कि आपने कहा, यह काफी देर से हुई चीज है और चूंकि गुजरात विधानसभा का चुनाव सिर पर है, इसलिए इसने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है. इसने इन कयासों को जन्म दिया है कि क्या इसका कोई बड़ा सियासी असर पड़ सकता है?

मैं इन बातों में नहीं जाऊंगा. लेकिन यह समझना गलत होगा कि इससे माया कोडनानी का घटनास्थल पर न होने का दावे को बल मिल जाएगा. जैसा कि आपने कहा, अमित शाह ने सिर्फ कोडनानी के इन दावों को दोहराया कि वे 28 फरवरी की सुबह इन दो जगहों पर मौजूद थीं. लेकिन, सच्चाई ये है कि उनके बारे में यही बात अभियोजन पक्ष भी कह रहा है.

यह बात रिकाॅर्ड में दर्ज है. यह बात मोदी और दूसरों के खिलाफ ज़किया ज़ाफ़री की शिकायत पर एसआईटी रिपोर्ट में भी है, जिसमें गोधरा कांड के बाद की घटनाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा दिया गया है.

शवों को गोधरा से लाया गया था. सुबह-सुबह शव अहमदाबाद पहुंचे, जिसके बाद उन्हें सोला सिविल अस्पताल ले जाया गया. 54 शवों को ही अहमदाबाद लाया गया था, क्योंकि चार शवों को उनके संबंधियों ने गोधरा में ही ले लिया था.

गौर करने वाली बात ये है कि 54 शवों को अहमदाबाद लाने का काम पुलिस ने नहीं किया. कम से कम आधिकारिक तौर पर तो नहीं ही. रिकाॅर्ड के मुताबिक इन शवों की कस्टडी विश्व हिंदू परिषद को दी गई थी.

जयदीप पटेल नाम के नेता को इन शवो की कस्टडी सौंपी गई थी. इस बाबत गोधरा जिला प्रशासन द्वारा एक चिट्ठी जारी जारी की गई थी जिसमें शवों को इस आदमी को सुपुर्द किया गया था. और यह तब किया गया, जब विहिप ने आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए पहले ही बंद की घोषणा कर दी थी.

साफ-साफ कहा जाए, तो यह बंद कानूनी नहीं था. साफ नजर आता है (इसे रिकाॅर्डों से प्रमाणित किया जा सकता है) कि सरकार ने बंद का ऐलान करने वालों की मदद करने के लिए नियमों को ताक पर रख दिया.

विहिप को संतुष्ट करने के लिए इन शवों को उसके हवाले कर दिया गया. अब, अगर कानून के हिसाब से देखा जाए, तो शवों को ऐसे किसी के हवाले नहीं किया जा सकता था..इन्हें किसी नजदीकी रिश्तेदार कि ही हवाले किया जाना चाहिए था. लेकिन उन्होंने इस नियम को ताक पर रख दिया और यह एक चिट्ठी के सहारे किया गया.

यह चिट्ठी एक जिला स्तरीय कर्मचारी, गोधरा के मामलातदार महेंद्र नालवाया द्वारा जयदीप पटेल को दी गई थी. इस चिट्ठी के आधार पर ही सोला सिविल अस्पताल ने इन शवों को स्वीकार किया, क्योंकि ऐसा करने के लिए कागजात जरूरी होते हैं.

अमित शाह ने कहा कि वे कुछ देर के लिए अस्पताल गए थे, क्योंकि वहां बाकी चीजों के अलावा पोस्टमार्टम भी किया जा रहा था- उनका यह कहना पूरी तरह से सही नहीं है. पोस्टमार्टम तो गोधरा में ही, गोधरा रेलवे स्टेशन के प्लेटफाॅर्म पर ही कर लिया गया था.

सोला सिविल हाॅस्पिटल में शवों को कुछ देर के लिए रखना पड़ा क्योंकि वहां शवों की शिनाख्त की जा रही थी. कई शवों की शिनाख्त आखिर तक नहीं की जा सकी. 54 शवों में से कम से कम 19 की पहचान नहीं की जा सकी और उनकी अंत्येष्टि गुमनाम व्यक्तियों के तौर पर ही करनी पड़ी.

सिद्धार्थ: क्या बिल्कुल पहचान नहीं की जा सकी?

मनोज: बिल्कुल भी नहीं. इसलिए उनका अंतिम संस्कार गुमनाम शवों के तौर पर किया गया. इसलिए यह कहना कि गोधरा में मारे गए सभी लोग विहिप के सदस्य थे, अपने आप गलत होगा, क्योंकि जिन लोगों की पहचान की जा सकी है, उनमें से भी सारे विहिप के सदस्य नहीं थे.

जैसा कि हम जानते हैं, जिन लोगों की पहचान नहीं की जा सकी, उनमें से कइयों का हिंदू होना भी पक्का नहीं है. मेरे कहने का मतलब है कि यह अनुमान का ही विषय है. चूंकि उनकी शिनाख्त नहीं की जा सकी, इस कारण इस बात की गुंजाइश से इनकार नहीं किया जा सकता.

खैर कुछ भी हो, शिनाख्त करने की प्रक्रिया ने शवों को सौंपने के काम में देरी की. इसी बीच वहां एक बड़ी भीड़ जमा हो गई थी. अमित शाह इसी के बारे में बात कर रहे थे और यह सब रिकॉर्ड में है. एसआईटी के सामने दी गई गवाहियों, चाहे वह माया कोडनानी की हो या अमित शाह की, में ये बात पहले ही कही जा चुकी है.

और वास्तव में इससे इस मामले में कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे 11 या 11:30 बजे के आसपास सोला सिविल अस्पताल में थीं, जैसा कि शाह ने कहा है, जो जो मोटे तौर पर एसआईटी के पक्ष से भी मेल खाता है.

और यह बात कि सुबह 8:30 बजे के आसपास एक शोक प्रस्ताव पारित करने के लिए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया गया था- यह भी रिकॉर्ड में दर्ज है. यह मानना तर्कसंगत होगा कि सारे भाजपा विधायक, खासकर अहमदाबाद शहर के सभी विधायक, जिनमें माया कोडनानी भी एक थीं, इस सत्र में मौजूद होंगी.

नरोदा पाटिया और नरोदा गाम का इलाका, उनके ही विधानसभा क्षेत्र में आता है. वे प्रैक्टिशनर डॉक्टर- स्त्री रोग विशेषज्ञ थीं. शहर का ये इलाका उनके प्रभावक्षेत्र वाला था.

अब सवाल ये है कि आखिर इस समय अंतराल यानी 8:30 से 11 या 11:30 के बीच क्या हुआ? 8:30 बजे वहां कई विधायक थे और शाह की गवाही के मुताबिक उन्होंने कोडनानी के वहां देखा था. ठीक है, ये बात मान लेते हैं.

इसके बाद वे कहते हैं कि उन्होंने कोडनानी को फिर 11-11:30 के आसपास अस्पताल में देखा. उनके ऐसा कहने से यह संभावना खत्म नहीं हो जाती, जैसा नरोदा पाटिया और नरोदा गाम मामले में कई चश्मदीद गवाहों का कहना है कि उन्होंने कोडनानी को अपने इलाके में देखा था. उनका कहना है कि उन्होंने उनकी गाड़ी देखी और उन्हें तलवार बांटते, लोगों को भड़काते और उनके साथ बात करते हुए देखा.

सिद्धार्थ: और उन्होंने यह सब 9:30 या उसके आसपास होते देखा?

मनोज: हां उन्होंने कोडनानी को उस दौरान देखा.

सिद्धार्थ: इन दो (विधानसभा और अस्पताल में देखे जाने के समय) के बीच के समय में देखा?

मनोज: हां, इन दो समयों के बीच देखा.

सिद्धार्थ: शाह ने जहां होने के कोडनानी के दावों की पुष्टि की है.

मनोज: इसलिए अगर किसी को इस बात की जानकारी न हो कि इस केस में पहले से कौन सी बातें ‘ऑन द रिकॉर्ड’ हैं, तो उन्हें यह लग सकता है कि इतने अरसे के बाद गुजरात चुनाव से ठीक पहले शाह की गवाही से कोडनानी का हिंसा-स्थल पर मौजूद न होने का दावा सही साबित हो रहा है.

लेकिन, पहली बात, शाह के बयान में कुछ भी नया नहीं है. दूसरी बात, इससे किसी भी तरह से दोनों मामलों में मामलों में मौजूद चश्मदीद गवाहों के बयानों का महत्व घट नहीं जाता है, न उन पर कोई सवालिया निशान खड़ा होता है.

सिद्धार्थ: तो उस हद तक यह वास्तव में…

मनोज: (ये सब) सवाल… धारणाएं (हैं)…मेरे लिए अपने आप में यह मुकदमा ही अहम है. देखिए, यह मुकदमा सिर्फ इसलिए अहम नहीं है कि इसमें माया कोडनानी का नाम है.

सिद्धार्थ: नरोदा गाम में मारे जाने वाले लोगों की वास्तविक संख्या…

मनोज: ग्यारह लोग. नरोदा पाटिया में मारे गए लोगों की संख्या 96. वह सबसे बड़ा नरसंहार था. गुलबर्ग सोसाइटी नरसंहार, जो दोपहर में हुआ, उसमें 69 लोग मारे गए. नरोदा पाटिया में हिंसा सुबह में शुरू हुई और शाम तक चलती रही. वहां से करीब 40-50 शवों को बरामद किया गया. यह हिंसा पूरे दिन चलती रही.

इसी तरह से नरोदा गाम में, जो कि नरोदा पाटिया से सटा हुआ है, यह हिंसा चलती रही. नरोदा गाम मामले में ये बात अहमियत नहीं रखती कि माया कोडनानी का इसमें नाम है, क्योंकि वे पहले ही (नरोदा) पाटिया में नामित और दोषसिद्ध हैं.

सांप्रदायिक दंगों का अध्ययन करने वाले हम जैसे लोगों के लिए, यह (उनकी दोषसिद्धि) एक ऐतिहासिक घटना थी, क्योंकि आजाद भारत में इससे पहले किसी सांप्रदायिक हिंसा के लिए किसी राजनीतिक नेता को सजा देने की कोई मिसाल नहीं मिलती.

इसलिए इस घटना की अहमियत काफी ज्यादा है. जब, उन्हें सजा दी जा रही थी, जब उन्हें वहां हुए नरसंहारों का सरगना करार दिया गया था. और उन्हें 28 वर्षों की सजा दी गई थी.

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गुजरात दंगा (फाइल फोटो: पीटीआई)

इसलिए अगर उन्हें नरोदा गाम मामले में दोषी करार दिया जाता है, तो यह दूसरा मामला होगा, जिसमें उन्हें सजा होगी. इसलिए यह (उन्हें सजा मिलना) अपने आप में उतना अहम नहीं है. नरोदा गाम मामले में ज्यादा अहमियत इस बात की है कि इसमें संघ परिवार के एक और महत्पूर्ण नेता, जयदीप पटेल का नाम भी है, जिसके बारे में हमने अभी बात की.

सवाल है, जयदीप पटेल इतने अहम किरदार क्यों है? क्योंकि माया कोडनानी के मामले की ही तरह, इस शख्स के कई पुलिस अधिकारियों के संपर्क में होने की बात को साबित करने के लिए पर्याप्त टेलीफोन सबूत और फोन कॉल्स के रिकॉर्ड उपलब्ध हैं.

वे संजय भाऊसार के भी संपर्क में थे, जो मुख्यमंत्री कार्यालय में था. वह मोदी के पर्सनल स्टाफ के तहत पर्सनल सेक्रेटरियों में से एक था. चूंकि गोधरा में वह (जयदीप पटेल) इनके (भाऊसार के) संपर्क में थे इसलिए वह ऐसी चिट्ठी (शवों की कस्टडी लेने वाली) लेने में कामयाब हो सके.

इतना बड़ा अपराध हो जाए और सारे शवों को आधिकारिक रूप से उन्हें (पटेल को) सौंप दिया जाए..(इसका कोई तर्क नहीं है).. और याद रखिए, इस चिट्ठी के अस्तित्व से कभी इनकार नहीं किया गया है.

यह पब्लिक रिकॉर्ड का हिस्सा है, जिसके आधार पर कुछ पूछताछ भी की गई थी. इस पर कई तरह के अजीब जवाब सुनने को मिले. जैसा कि मोदी ने कहा, मुझे याद नहीं कि मैंने 27 फरवरी की शाम में कलेक्टरेट में हुई मीटिंग में उन्हें (जयदीप पटेल को) देखा था.

लेकिन यह काफी दिलचस्प है कि कलेक्टर जयंती रवि ने एसआईटी के समक्ष अपनी गवाही में उस मीटिंग में जयदीप पटेल के मौजूद होने की बात कही थी, जिसमें अगले दिन शवों को अहमदाबाद भेजने का फैसला लिया गया था.

वैसे मोदी के इस दावे को उन्होंने भी दोहराया कि शवों को जयदीप पटेल को सौंपने का फैसला उन्होंने नहीं किया था, क्योंकि जैसा कि मैंने पहले ही कहा, यह पूरी तरह से कानून के खिलाफ होता. वे यह कबूल नहीं कर सकते थे.

इसलिए इसकी जगह उन्होंने यह कहा कि यह चिट्ठी मामलातदार महेंद्र नालवाया, एक जूनियर जिला कर्मचारी ने खुद से जारी की थी. इस बात पर वैसे भी भरोसा करना मुश्किल है. जब हम इस तथ्य की ओर ध्यान देते हैं कि जयंती रवि ने खुद शवों को गोधरा भेजने से पहले देर रात को (जयदीप पटेल से) मुलाकात की बात को कबूल किया है, तब इस बात पर यकीन करना और भी मुश्किल हो जाता है.

तो हमें यह यकीन करने के लिए कहा जा रहा है कि एक तरफ शवों को गोधरा भेजा जा रहा था, दूसरी तरफ जयंती रवि और पटेल के बीच मुलाकात हो रही थी, लेकिन वह चिट्ठी जिसे प्रशासन द्वारा इस शख्स को जारी किया गया (जिसके आधार पर शवों का हस्तांतरण किया जा रहा था) उसे किसी और ने लिखा था.

आप मौखिक (तौर पर ऐसे) फैसले नहीं कर सकते और शवों को इस तरह किसी को भी सुपुर्द नहीं कर सकते, क्योंकि एफआईआर दर्ज हो जाने के कारण यह एक कानूनी मामला बन चुका था. और यह एक या दो लोगों की हत्या का मामला नहीं था, यह 58 लोगों की हत्या का मामला था.

इतने बड़े पैमाने के अपराध के लिए आप इतने लापरवाह तरीके से किसी चीज (शवों) को नहीं भेज सकते. जिस आधार पर यह (शवों का) हस्तांतरण किया गया, उसे याद करना महत्वपूर्ण है. यह याद रखना जरूरी है कि शवों का गोधरा से अहमदाबाद हस्तांतरण इन बेहद संदेहास्पद हालातों में किया गया.

सिद्धार्थ: इसने साबित किया…

मनोज: ये स्थितियां खुद सब कुछ बयान करती हैं.

सिद्धार्थ: और आपके हिसाब से इससे इस पूरे घटनाक्रम में जयदीप पटेल की अहम भूमिका साबित होती है.

मनोज: और इससे यह भी साबित होता है कि किस तरह से सरकार प्रदर्शन कराने वालों, हिंसा कराने वालों और भीड़ को जमा करने वालों के प्रति नरमी बरत रही थी. और ये बात निश्चित है कि सोला सिविल अस्पताल में लाए गए 54 शवों में से, 10 को बड़े जुलूस में श्मशान स्थल तक लाया गया, जो नरोदा पाटिया इलाके के करीब था. चश्मदीदों के वर्णनों और उस समय की मीडिया और अन्य रपटों का कहना है कि यही फसाद की जड़ बना.

फसाद तब शुरू हुआ जब लोगों को इकट्ठा किया गया. इसलिए इसका मतलब है कि जयदीप पटेल (की इस सबमें अहम भूमिका थी). आप जानते हैं, उनके खिलाफ इस तरह के कॉल डेटा रिकॉर्ड थे. और ध्यान देने वाली बात ये है कि यह कॉल डेटा रिकॉर्ड सामान्य तरीके से सामने नहीं आया.

जब भी इस तरह की कोई घटना होती है, मिसाल के तौर पर गोधरा घटना से कुछ महीने पहले, दिल्ली में संसद पर हमला हुआ था. उस मामले को कॉल डेटा रिकॉर्ड के आधार पर ही सुलझाया गया.

लेकिन किसी तरह से मोदी प्रशासन, कानून एवं प्रशासन के मोर्चे पर काफी मजबूत होने के दावे के बावजूद.. और जब मैं मोदी सरकार कहता हूं, तब मेरा मतलब सिर्फ मोदी से नहीं है. गृहमंत्री से भी है, जो उस समय मोदी ही थे… लेकिन उस राज्य के राजनीतिक नेतृत्व में उनकी मौजूदगी के बावजूद गुजरात पुलिस के दिमाग में काॅल डेटा रिकाॅर्ड के सबूत को खंगालने की बात नहीं आई.

यह काम व्हिसिल ब्लोअर राहुल शर्मा को करना पड़ा, जिनका अचानक अपने जिले से तबादला कर दिया गया था, क्योंकि…

सिद्धार्थ: अच्छा तो वे भावनगर में थे?

मनोज: हां वे भावनगर में थे. वे काफी अच्छे से अपना काम कर रहे थे.

सिद्धार्थ: कुछ पुलिस वाले ही ऐसे थे, जिन्होंने उन कठिन दिनों में भी कानून को बना रखा.

मनोज: भावनगर, सूरत…ऐसे कुछ जिले थे, जहां के पुलिस अधिकारी काफी कुशल थे और उन्होंने हिंसा को काबू में करने के लिए काफी सख्ती दिखाई. तो इसके कुछ दिनों के भीतर ही उनका तबादला अहमदाबाद कर दिया गया और वे नरोदा पाटिया और गुलबर्ग सोसाइटी मामले की जांच के साथ जुड़ गए.

वहां, उन्होंने, एक तो आईआईटी की पृष्ठभूमि से आने के कारण और दूसरा जैसा कि मैंने कहा कि ऐसा करना काफी तर्कसंगत था, उन्होंने दो टेलीकॉम कंपनियों से कॉल रिकॉर्ड मांगी. और इस तरह से कॉल डेटा रिकॉर्ड अस्तित्व में आया.

लेकिन इस मुकाम पर एक बार फिर वहां से उनका तबादला कर दिया गया. और इस तरह से कॉल डेटा रिकॉर्डों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई. इसके दो सालों के बाद उन्होंने 2004 में इस बात को नानावती आयोग के सामने उठाया.

उनके द्वारा इस बात को उठाए जाने के कारण और सबके सामने रिकॉर्ड में लाए जाने के कारण यह सार्वजनिक हो पाया. इंडियन एक्सप्रेस में ब्यौरों के साथ इस बारे में कई रपटें प्रकाशित हुई थीं.

कॉल डेटा रिकॉर्डों से उजागर होनेवाली सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण जानकारी माया कोडनानी और जयदीप पटेल के बारे में थी… कि उस समय अंतराल में (27 -28 फरवरी) वे दोनों किस तरह के कॉल कर रहे थे. इनसे हमें यह पता चलता है कि उस समय दरअसल क्या चल रहा था?

उनकी संलिप्तता, ऊंचे स्तर पर राजनीतिक नेताओं और अधिकारियों की मिलीभगत और भी बहुत कुछ जिसका नतीजा इस तरह की हिंसा के रूप में सामने आया. लेकिन फिर भी आगे कोई कार्रवाई नहीं की गई, क्योंकि अगर आप ठीक से याद करें, तो यह मामला गुजरात पुलिस के तहत था.

बाद में जाकर सुप्रीम कोर्ट ने इन महत्वपूर्ण मामलों को (एसआईटी को सौंपा)- इससे पहले सुप्रीम कोर्ट को बेस्ट बेकरी और बिल्किस बानो गैंगरेप मामले को गुजरात से बाहर भेजना पड़ा था. इसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण मुकदमों को एसआईटी के हवाले किया.

एसआईटी का गठन इस समय ही किया गया था. ऐसा एक मामला नरोदा पाटिया का था और दूसरा मामला नरोदा गाम का था. अब जबकि उन्होंने इसकी निगरानी कर रहे थे, तब जाकर 2008 में उन्होंने इनकी (कॉल रिकार्ड्स की) जांच करनी शुरू की…

सिद्धार्थ: कॉल डेटा रिकार्ड्स?

मनोज: इन दो लोगों (माया कोडनानी और जयदीप पटेल) के (कॉल डेटा रिकार्ड्स). और इसमें यह पता चला कि कॉल डेटा रिकार्ड से सामने आ रही जानकारियों और इनके द्वारा किये जा रहे दावों के बीच काफी फर्क है.

वे हिंसा के वक्त नरोदा पाटिया या नरोदा गाम के आसपास भी होने की बात से इनकार कर रहे थे. लेकिन डेटा रिकॉर्ड कुछ और ही कह रहा था.

इसके मुताबिक जब हिंसा शुरू हुई, तब ये हलचल कर रहे थे…इन गंभीर अंतरों के कारण एसआईटी को उन पर कार्रवाई करनी चाहिए थी. लेकिन वह राजनीतिक रसूख के कारण उनके साथ नरमी बरत रही थी.

याद कीजिए, 2007 में चुनाव जीतने के बाद मोदी ने कोडनानी को एक विधायक से मंत्री बनाया था. वे महिला और बाल-कल्याण मंत्री थीं. वे उनकी सरकार का भाग थीं.

इसलिए वे इस मसले को लटकाए हुए थे और 2009 में, जैसा कि दुनिया की कोई भी पुलिस करती, पुलिस को कोडनानी को सीधे गिरफ्तार करना चाहिए था. लेकिन, इसकी जगह, कोडनानी को पेश होने के लिए नोटिस भेजा गया.

हालांकि, उन्होंने पहले ही उनसे पूछताछ कर ली थी और उनका बयान दर्ज कर लिया था! लेकिन उन्होंने यह तरीका अपनाया और उन्हें इस बात का समय दे दिया कि…

सिद्धार्थ: समय दिया कि वे फरार हो जाएं..

मनोज: हां, फरार हो जाने का.. हमारे सामने यह विचित्र दृश्य था कि एक मंत्री अंडरग्राउंड होकर जमानत मांग रही है.

सिद्धार्थ: यह सब 2009 की बात है.

मनोज: हां, यह 2009 की बात है. 2009 की शुरुआत की. जनवरी में उन्होंने यह प्रक्रिया शुरू की. जनवरी मेें वे निचली अदालत से जमानत लेने में कामयाब रहीं. उसके बाद ये लोग हाई कोर्ट गए. ये दोनों लोग, माया कोडनानी और जयदीप पटेल, साथ मिलकर काम कर रहे थे.

यह अलग बात है कि एसआईटी की जांच के खत्म होने पर दाखिल की गई चार्जशीट में जयदीप पटेल को सिर्फ नरोदा गाम मामले में नामजद किया, नरोदा पाटिया मामले में नहीं.

नरोदा गाम मामले की अहमियत इसी वजह से है, क्योंकि उनका नाम नरोदा पाटिया मामले में नहीं था. इस तरह नरोदा गाम एकमात्र मामला है, जिसमें इस व्यक्ति की संलिप्तता साबित होगी, अगर होती है, तो.

सिद्धार्थ: और यह तथ्य कि जयदीप पटेल.. और यह साबित करने के लिए तमाम कॉल रिकार्ड्स हैं, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के दफ्तर में काम करनेवाले संजय भाऊसार के संपर्क में था.

मनोज: अंत तक.

सिद्धार्थ: इससे कहानी को अलग ही मोड़ मिल जाता है.

मनोज: उन्होंने एसआईटी के सामने इसलिए गवाही दी, क्योंकि यह सब पहले से ही रिकॉर्ड मे दर्ज था. और उन्हें (एसआईटी को) इन सारे सुरागों पर काम करना था. इसलिए यह रिकॉर्ड में मौजूद था और जब उन्होंने हाईकोर्ट में एंटीसिपेटरी बेल के खिलाफ अपील की, तब वे इसे खारिज कराने में कामयाब रहे.

इन हालातों में कोडनानी को सामने आना पड़ा और मंत्री पद छोड़ना पड़ा. माया कोडनानी और जयदीप पटेल के बीच कड़ी लगातार जुड़ी हुई थी.. अब आपके सामने एक ऐसा मामला है, जिसमें चश्मदीद गवाह उनके (कोडनानी के) खिलाफ नरोदा पाटिया के मामले की ही तरह गवाही दे रहे हैं…जिसके आधार पर उन्हें दोषी भी करार दिया गया है.

और अगर इस आधार पर उन्हें (कोडनानी को) इस मामलें में भी एक बार फिर दोषी करार दिया जाता है…और ऐसे ही सबूतों के आधार पर जयदीप पटेल को भी दोषी करार दिया जाता है, तो यह आगे की ओर एक बड़ा कदम होगा. जयदीप पटेल के नजरिए से देखने पर यह केस बहुत ज्यादा अहमियत अख्तियार कर लेता है.

सिद्धार्थ: तो आप कह रहे हैं कि इस केस के महत्व के हिसाब से बात करें, तो इसमें माया कोडनानी गौण भूमिका में हैं.

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फाइल फोटो: पीटीआई

मनोज: हां, मेरा मतलब है कि माया कोडनानी के मामले में जो समान अहमियत रखता है… और नरोदा गाम के इस लंबे मुकदमे में, जो, जैसा कि आपने कहा वास्तव में एक अपेक्षाकृत छोटा मामला है… नरोदा पाटिया मामले में अपील कार्रवाहियां लगभग समाप्त होने के कगार पर हैं. बहस समाप्त हो चुकी है.

फैसले को सुरक्षित रखा गया है. इस स्थिति में (अमित शाह) चाहे जो भी (बयान दें) उसका नरोदा गाम या नरोदा पाटिया मामले पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए. क्योंकि उन्होंने पहले से पता चीजों से हटकर शायद ही कोई नई बात कही हो.

सिद्धार्थ: और नरोदा पाटिया मामले में उनकी दोषसिद्धि में कई कारकों की भूमिका रही.

मनोज: इसलिए अगर उन्हें अब भी यह लगता है कि इससे उनके मामले में कोई बड़ा बदलाव आ जाएगा- सुनवाई के इस आखिरी मुकाम पर अमित शाह को बुलाना, उनकी पहल थी, वे देश के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण नेता हैं. अगर उन्हें बुलाया गया, तो सिर्फ उनके आग्रह पर.

उन्होंने शायद यह हिसाब लगाया कि अगर वे कुछ कहते हैं, तो वह बड़ी भूमिका निभा सकता है. कोर्ट के विचार को प्रभावित कर सकता है. लेकिन, उनके बयान को देखें, तो इससे इस मामले में कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा है, जो पहले से मालूम न हो, न ही इससे चश्मदीद गवाहों के बयानों पर कोई सवालिया निशान खड़ा होता है.

सिद्धार्थ: शायद वे यह उम्मीद लगाए बैठी हैं कि कोर्ट को किसी तरह से प्रभावित किया जा सकता है, जबकि इसकी कोई संभावना नजर नहीं आती.

मनोज: यह पूरी तरह से जोड़-घटाव का मामला लगता है, क्योंकि उन्होंने (अमित शाह) ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा, जो उनके घटनास्थल पर मौजूद न होने की बात को साबित करे, या उनकी मदद करे.

सिद्धार्थ: और यह भी दिलचस्प है कि नरोदा पाटिया मुकदमे के दौरान उन्होंने अमित शाह को अपना डिफेंस विटनेस बनाने की कोई कोशिश नहीं की.

मनोज: यह उनकी तरफ से हताशा में उठाया गया एक कदम है. वे मौजूदा माहौल का भी लाभ उठाने की उम्मीद कर रही हैं. 2014 से गुजरात दंगों, फर्जी एनकाउंटर के मामलों और हिंदू आतंकवाद के कई मामलों में चीजें उलटी दिशा में जाती दिख रही हैं. इसलिए वे इस स्थिति का लाभ उठाना चाहती हैं.

सिद्धार्थ: अगर मैं तथ्यों के सहारे थोड़ा दोष निकालते हुए कहूं, तो उन्होंने अमित शाह को नरोदा पाटिया मुकदमे के दौरान शायद इसलिए नहीं बुलाया, क्योंकि शाह खुद आरोपी थे. उन पर कौसरबी, सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति की हत्या का आरोप था और इस हालात में वे एक चरित्रवान गवाह नहीं होते. लेकिन, अब वे इन तीनों की हत्या के मामलों में बरी कर दिये गए हैं और भाजपा के अध्यक्ष हैं…

मनोज: आपने सही जगह पर चोट की है. सबूत के लिहाज से (उनकी गवाही) का कोई ज्यादा महत्व नहीं है. लेकिन राजनीतिक दृष्टि से इसका जवाब शायद हां में दिया जा सकता है.

वे यह उम्मीद कर रही हैं कि इन बाहरी कारकों से फैसला प्रभावित हो सकता है. हम बस यह उम्मीद कर सकते हैं कि ये कारक जज को डिगा नहीं पाएंगे और वे पूरी तरह से सबूतों के आधार पर फैसला देंगे, जैसा कि नरोदा पाटिया मामले में जज ने किया था.

सिद्धार्थ: मुझे लगता है कि हमने इन मामलों पर काफी तफसील से बात कर ली है, लेकिन मैं इस बातचीत का थोड़ा फायदा उठाना चाहूंगा, क्योंकि 2002 की हिंसा के जानकार होने के अलावा आपने 1984 के नरसंहार और कत्तेआम का काफी गहन अध्ययन किया है और कानूनी मुकदमों पर भी लिखा है.

आपने यह कहा कि कोडनानी किसी सांप्रदायिक नरसंहार में शामिल होने के लिए सजा पाने वाली पहली नेता थीं. लेकिन निश्चित तौर पर वे पहली नेता नहीं थीं, जिनकी किसी सांप्रदायिक दंगे में भूमिका निभाने का आरोप लगा था.

1984 के सिख नरसंहार में एचकेएल भगत, सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर के खिलाफ काफी ठोस आरोप और कई चश्मदीद गवाह थे. लेकिन, इन में से कोई भी मामला अंजाम तक नहीं पहुंच सका. लेकिन आपको पता है कि इनमें से एक मामले में जिसमें सज्जन कुमार की साफ संलिप्तता कही जाती है, एक अलग तरह के नतीजे की उम्मीद की जा सकती है.

मनोज: चूंकि, आपने दोनों मामलों के बीच तुलना की है, मैं एक और कारण की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहूंगा कि कोडनानी की उपस्थिति (नरोदा गाम नरसंहार की सुबह विधानसभा और अस्पताल में) से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.

उनके खिलाफ साजिश रचने का आरोप है. साजिश रचने वाले का घटनास्थल पर उपस्थित होना जरूरी नहीं है. क्योंकि यह किसी ने नहीं कहा है कि उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर किसी की हत्या की है.

उन पर ये आरोप है कि वे सुबह में किसी वक्त उस जगह पर थीं और उन्होंने लोगों को भड़काया, उन्हें हथियार मुहैया कराया आदि. अब 1984 के मामले पर आएं, तो एचकेएल भगत के खिलाफ ऐसे ही आरोप थे. उनकी तुलना भगत से करने का कारण ये है कि भगत उसी (लोकसभा ) क्षेत्र के थे, जो हिंसा का सबसे ज्यादा शिकार हुआ था- पूर्वी दिल्ली. त्रिलोकपुरी पूर्वी दिल्ली में आता है.

किसी ने यह आरोप नहीं लगाया था कि वे खुद सड़कों पर थे और दंगाई भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे. या उस दंगाई भीड़ का हिस्सा थे, जिसने लोगों की हत्याएं कीं. लेकिन, ध्यान देने वाली बात ये है कि सज्जन कुमार पर, जो कि इससे भी बड़े संसदीय क्षेत्र- बाहरी दिल्ली के एमपी थे, कई लोगों ने ऐसे आरोप लगाए. सुल्तानपुरी, मंगोलपुरी, दिल्ली कैंट…, ये सब दिल्ली के बाहरी इलाके हैं.

वहां एक के बाद एक गवाहों ने कहा कि यह आदमी, जो उस वक्त काफी युवा था और संजय गांधी ब्रिगेड का हिस्सा था, वहां खुद मौजूद था और दंगाई भीड़ की अगुआई कर रहा था- ऐसा कहने वाले कई चश्मदीद गवाह थे. इसलिए मुझे लगता है कि यह बात अहमियत रखती है कि (कोडनानी के खिलाफ) आरोप कहीं न कहीं इन दोनों के बीच में पड़ते हैं. वे घटनास्थल पर मौजूद थीं, लेकिन भगत के मामले की तरह वे भीड़ का नेतृत्व नहीं कर रही थीं.

लेकिन सज्जन के खिलाफ आरोप इससे ज्यादा हैं- कि वे दंगाई भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे. इस तरह के सबूतों के बावजूद कुछ मामलों में वे बरी हो गए, लेकिन एक मामला है, जो हाई कोर्ट में विचाराधीन है.

हममें से जिन लोगों ने इस मुकदमे का अध्ययन किया है, जिसमें एचएस फुल्का जैसे वकील भी हैं, जो मेरी किताब के सह-लेखक भी हैं, इस बात को लेकर काफी आश्वस्त थे कि यह दोषसिद्धि का स्पष्ट मामला है.

लेकिन कुछ तकनीकी आधारों पर, कुछ आधार जो काफी संदिग्ध हैं, इस शख्स को मुकदमे में बरी कर दिया गया. किस्मत की बात है कि हाई कोर्ट में की गई अपील एक निष्ठावान जज गीता मित्तल के समक्ष विचाराधीन है. जिन्होंने इस अपील को काफी गंभीरता से लिया है और हफ्ते में दो दिन इसकी सुनवाई कर रही हैं.

सीबीआई की ओर से एक काफी अच्छे वकील, चीमा, सबूतों को सामने रखने के मामले में काफी सराहनीय भूमिका निभा रहे हैं. इसलिए तीन दशकों में पहली बार हमये उम्मीद कर रहे हैं- जबकि नरोदा पाटिया मामले में कोडनानी को दोषी करार देने की नजीर हमारे सामने है- कि हम ऐसा ही कुछ दिल्ली में भी देख सकते हैं.

अगर ऐसा होता है तो इससे कानून के शासन को काफी बल मिलेगा और सांप्रदायिक दंगों में सजा न मिलने की परंपरा कमजोर होगी.

सिद्धार्थ: हमें अपनी बात को यहीं समाप्त करना होगा. अपनी विशेषज्ञता को हमारे साथ साझा करने के लिए आपका धन्यवाद. इससे पहले कि हम अपनी बात को समाप्त करें, हमने यह देखा है कि भले यह 84 का दंगा हो या 2002 का, माया कोडनानी की बात हो या सज्जन कुमार की, या किसी अन्य राजनेता की, राजनेता विचारधारा या राजनीतिक विचारों में एक दूसरे से अलग हो सकते हैं लेकिन जब बात नरसंहार या जातीय संहार की आती है, जैसा कि हमने इन दो और अन्य उदाहरणों में देखा है, न्याय के लिए संघर्ष, भले वह 1984 के पीड़ितों के लिए हो या 2002 के पीड़ितों के लिए हो, लंबा और कठिन है. लेकिन, नरोदा पाटिया मामले में और हम उम्मीद कर सकते हैं कि नरोदा गाम और दिल्ली कैंट के मामले में भी, जिनमें नेताओं की भूमिका लंबे अरसे से संदिग्ध रही है, अंततः न्याय हो सकता है.