राजनीति

यूपी चुनाव के चौथे चरण का ‘चौधरी’ कौन?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के चौथे दौर में बसपा और सपा की सीधी टक्कर है, यह देखना दिलचस्प होगा कि इनकी लड़ाई में भाजपा अपना फ़ायदा कैसे ढूंढ पाती है.

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उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में बसपा सुप्रीमो मायावती की रैली में जुटी भीड़. (फोटो: राजन पांडेय)

बुंदेलखंड के बांदा जिले के तिंदवारी में एक भाजपा नेता बातचीत के दौरान बताते हैं, ‘चौथे चरण में हम लोग चौथे नंबर पर रहेंगे.’ अगले दिन स्वामी प्रसाद मौर्या की रैली है, बांदा-फतेहपुर रोड पर हेलीपैड बनाया जा रहा है, कई पार्टी नेता-कार्यकर्ता पास ही अलाव जलाकर काम देखते हुए बातचीत कर रहे हैं, एक दूसरे नेता कहते हैं, ‘तभी तो इस इलाके को चौथे चरण में रखा गया जिससे यहां के लोग पहले, दूसरे और तीसरे दौर में जो ‘हवा’ रही उससे हमारे पक्ष में प्रभावित हो जाएं.’

बसपा और सपा से पिछड़ने की यह बात ज़मीन पर काम कर रहे इन भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं से केवल बांदा में ही नहीं सुनने को मिलती बल्कि कमोबेश पूरे बुंदेलखंड के सातों ज़िलों में सुनने को मिलती है. यहां आज 23 फरवरी को चौथे चरण में चुनाव होने हैं. यहां तक कि फतेहपुर, जो बुंदेलखंड का क्षेत्र नहीं है, में भी भाजपा के कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास की कमी साफ़ दिखती है.

यहां भी ज़्यादातर सीटों पर लड़ाई सपा-बसपा के बीच ही है. मायावती की फतेहपुर रैली में आए हुए एक स्थानीय पत्रकार बताते हैं, ‘भाजपा सिर्फ़ तब चुनौती दे सकती थी जब फतेहपुर सदर सीट पर हिंदू-मुस्लिम एंगल होता पर इस बार इस सीट पर कोई भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं खड़ा है.’ एक स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता के अनुसार, ‘पर फिर भी, प्रधानमंत्री की फतेहपुर रैली से कुछ संभावना बन सकती है.’

और फतेहपुर रैली में प्रधानमंत्री श्मशान और कब्रिस्तान जैसे सांप्रदायिक बयानों से यहां का माहौल बदलने की शुरुआत कर चुके हैं. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हिंदू और मुस्लिम त्योहारों के समय बिजली देने में भेदभाव किया जाता है. यह बयान एक अपेक्षाकृत कमज़ोर दौर के बहुत नाज़ुक समय पर आया है. पार्टियों की कमजोरियों पर काम करने की बजाय पार्टी का पूरा ध्यान हिंदू वोटरों को बांटने में लगा है.

दूसरे चरण के चुनाव के बाद मुस्लिम वोटरों के बंटने का डर भी कम हुआ है. जालौन के एक भाजपा नेता नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘अगर इन चरणों में मुस्लिम वोट बंट भी जाते हैं तो कोई ख़ास फर्क़ नहीं पड़ेगा क्योंकि एक तो उनकी संख्या कुछ ज्यादा नहीं है, दूसरे वो कुछ भी हो, हमारे ख़िलाफ़ ही वोट करेंगे. पर हिंदुओं के बंटने से भाजपा को फ़ायदा होगा और यही हमारा मकसद है.’

बुंदेलखंड में 19 सीटें हैं. 2012 के चुनाव में भाजपा को यहां महज़ 3 सीटें मिली थीं. इस बार पार्टी को हमीरपुर के रथ (एससी), महोबा की चरखारी, झांसी की झांसी सदर और गरौंथा और जालौन की तीनों सीटों से उम्मीद है. पर इस उम्मीद पर खरे उतर पाना उतनी ही बड़ी चुनौती है, इसीलिए शायद पार्टी हर वो पैंतरा लगा रही है, जो वो लगा सकती है.

हमीरपुर सीट से अशोक चंदेल को टिकट मिला है, जिन पर क्षेत्र के एक प्रभावशाली ब्राह्मण परिवार की हत्या से जुड़े होने का आरोप है. नतीजा यह है कि ब्राह्मण बंट गए हैं और भाजपा के ख़िलाफ़ जाते हुए बसपा के संजीव दीक्षित के साथ हो गए हैं.

पर भाजपा अकेली पार्टी नहीं है, जिसमें ऐसे दाग़ी प्रत्याशियों को जगह मिली है. बसपा के संजीव दीक्षित इस इलाके के ‘माइनिंग माफिया’ के रूप में मशहूर हैं. जालौन की माधोगढ़ सीट पर खड़ी कांग्रेस प्रत्याशी उमा कांति सिंह के पति पर दो हत्याओं के आरोप हैं.

चित्रकूट सीट पर खड़े सपा उम्मीदवार और वर्तमान विधायक वीर सिंह पटेल मशहूर डकैत ददुआ के बेटे हैं. ददुआ की कुछ सालों पहले एक पुलिस एनकाउंटर में मौत हो चुकी है पर कहते हैं कि वीर सिंह को अब भी इस क्षेत्र में सक्रिय डकैत समूहों का समर्थन प्राप्त है.

इसके अलावा बुंदेलखंड में कुछ प्रत्याशी सहानुभूति के नाम पर वोट मिलने की आशा से भी खड़े हुए हैं. महोबा सदर सीट पर खड़े बसपा के अरिमर्दन सिंह को महोबा को अलग ज़िले का स्टेटस दिलवाने का श्रेय दिया जाता है. इस बार वे लोगों से उन्हें वोट देने की अपील यह कहकर कर रहे हैं कि ये उनका आखिरी इलेक्शन है. अरिमर्दन 2012 में कांग्रेस के टिकट पर लड़े थे और उन्हें पांच हजार वोटों से शिकस्त मिली थी.

हर पार्टी का दुख एक

इन सबके अलावा जिस समस्या से हर पार्टी जूझ रही है वह है इस क्षेत्र के बाग़ी. ललितपुर की महरोनी (एससी) सीट पर बसपा के पूर्व मंडल प्रभारी रहे बृजलाल खबरी कांग्रेस के टिकट पर खड़े हैं, पर गठबंधन होने के बावजूद सपा के रमेश खटीक ने खबरी के ख़िलाफ़ अपना नामांकन वापस लेने से इनकार कर दिया है. इसके अलावा सपा में अंदरूनी कलह भी चल रही है.

झांसी की बबीना सीट के लिए सपा के स्थानीय नेता चंद्रपाल सिंह यादव ने श्याम सुंदर परीचा और पंजाब सिंह यादव को किनारे करते हुए अपने बेटे यशपाल को टिकट दिलाया है. इस बात से यादव वोटर कोई ख़ास ख़ुश नहीं हैं.

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इलाहाबाद के नज़दीक कौशांबी ज़िले में बसपा की बाग़ी प्रत्याशी शिखा सरोज की रैली. (फोटो: राजन पांडेय)

हालांकि सपा-कांग्रेस गठबंधन का बांदा-चित्रकूट में कई मज़बूत उम्मीदवारों जैसे दलजीत सिंह (तिंदवारी), विवेक सिंह (बांदा), विशंभर यादव (बबेरू) और वीर सिंह पटेल (कर्वी) की वजह से पलड़ा भारी दिखता है पर गरौंथा को छोड़कर पूरे बुंदेलखंड में संभावनाएं क्षीण हैं. वही गैर-यादव (कुर्मी-कुशवाहा) वोटों के कम होने की बावजूद भी बसपा दलित वोटों और समाज के कई वर्गों को अपने साथ जोड़ पाने की प्रतिभा के चलते अपेक्षाकृत मज़बूत नज़र आती है.

पर भाजपा इलाहाबाद, प्रतापगढ़ और रायबरेली जैसे ज़िलों में जीत की दौड़ में शामिल है. राजनीतिक रूप से देखें तो इलाहाबाद प्रदेश का सबसे बड़ा ज़िला है जिसमें 12 विधानसभा क्षेत्र आते हैं. यानी पूरे बुंदेलखंड की आधे से ज्यादा सीटें. 2012 में यहां सपा का सिक्का चला था, उसे 8 सीटें मिली थीं, बसपा को 3, कांग्रेस को एक.

भाजपा यहां एक सीट भी हासिल नहीं कर सकी थी. पर इस बार लखनऊ की तरह शहरी वोट भाजपा की तरफ लौट रहे हैं, जिससे सपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता बताते हैं कि पार्टी के लिए ज़िले की आधी सीटों पर भी बने रह पाना मुश्किल होगा.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दो पूर्व छात्रनेता इस बार ज़िले में सपा-कांग्रेस गठबंधन के उम्मीदवार हैं- इलाहाबाद उत्तर से अनुग्रह नारायण और इलाहाबाद पश्चिम से ऋचा सिंह. जहां ऋचा बसपा की पूजा पाल के सामने कोई भी प्रभाव बना पाने में असमर्थ रही हैं, वहीं भाजपा के हर्ष वाजपेयी अनुग्रह नारायण के सामने कड़ी चुनौती बनकर खड़े हैं. हंडिया और मेजा सीटों पर भी सपा कमज़ोर है, असली मुक़ाबला बसपा और भाजपा के बीच ही है.

ऐसा ही हाल रायबरेली और प्रतापगढ़ का भी है, जहां भाजपा के बेहतर करने की संभावनाएं नज़र आती हैं. कुंडा रघुराज प्रताप सिंह उर्फ़ राजा भइया की सीट है, इतनी सुरक्षित कि कोई विपक्षी उनके ख़िलाफ़ कैंपेन करने की भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है और यह एक ऐसा तथ्य है जिसका राजा भइया अपनी रैलियों में मज़ाक उड़ाते नज़र आ रहे हैं.

हालांकि, रामपुर खास सहित (जिसे कांग्रेस के प्रमोद तिवारी की बपौती भी कह सकते हैं) ज़िले की बाकी सीटों पर गठबंधन के प्रत्याशी अच्छी चुनौती देंगे. यहां लड़ाई इसलिए भी साफ़ दिखती है क्योंकि अब तक कांग्रेस द्वारा कथित तौर पर तीन बार भाजपा और बसपा के प्रत्याशियों पर हमला करवाया जा चुका है. पट्टी और प्रतापगढ़ सदर सीट पर सपा कम प्रभावी है और असली लड़ाई बसपा और भाजपा के बीच है.

गांधियों के गृहक्षेत्र रायबरेली में गठबंधन का कोई ख़ास असर देखने को नहीं मिलता. ज़िले की दो सीटों- ऊंचाहार और सरेनी में दोनों पार्टियों के उम्मीदवार एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े हैं. रायबरेली सदर सीट पर कांग्रेस की अदिति सिंह मज़बूत हैं पर इसके अलावा बाकी सीटों पर भाजपा और बसपा में टक्कर है. (ऊंचाहार को छोड़कर जहां कांग्रेस ही केंद्र में है) कौशांबी ज़िले में मंझनपुर (एससी) सीट पर बसपा के जोनल कोऑर्डिनेटर इंदरजीत सरोज का पलड़ा भारी है पर बाकी दो सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच घमासान होने की उम्मीद है.

पिछले चुनावी चरणों की तुलना में हो सकता है भाजपा की लहर इस चरण में कम हो, पर सपा के लिए स्थिति वैसी ही है, जैसी पिछले तीनों दौर में रही. उनके लिए अपनी वर्तमान सीटें बचा पाना भी मुश्किल लग रहा है.

सपा-कांग्रेस गठबंधन के एक बड़े नेता इलाहाबाद में इस बात को स्वीकारते हैं, हमें 140-50 सीटें मिल सकती हैं पर हम उम्मीद करते हैं कि भाजपा को भी कोई फायदा नहीं हो क्योंकि ऐसा लग रहा है कि बसपा से जितनी उम्मीद है, वो उससे बेहतर प्रदर्शन करेगी.’