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विशेष रिपोर्ट: मज़दूरों के शोषण और प्रताड़ना का नया कीर्तिमान रच रहा है जेके टायर

मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के बानमौर स्थित जेके टायर ने पिछले साल जून में अपनी एक यूनिट को घाटे में बताकर बंद कर दिया और करीब 900 मज़दूरों को एक झटके में काम पर न आने का नोटिस थमा दिया. मज़दूर तब से इसके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं.

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फोटो : दीपक गोस्वामी

महेश दुबे चार महीने से घर पर बैठे हुए थे. बेटी की शादी नज़दीक थी. हाउसिंग लोन की किश्त चुकाने के लिए नोटिस आ रहे थे. इस दौरान जो थोड़ी-बहुत बचत थी, वो भी जवाब दे गई थी. घर ख़र्च चलाना भी मुश्किल हो रहा था. इसलिए उस रात वे कुछ अधिक तनाव में थे. नींद की गोली खाने के बावजूद भी उन्हें नींद नहीं आ रही थी.

सुबह जब उनकी पत्नी और बेटियां जागे तो उन्होंने बताया कि वे सारी रात सो नहीं सके हैं. ऐसा कहक़र वे बाथरुम में चले गये और कुछ मिनट बाद फिनायल पीकर बाहर निकले. परिजन उन्हें अस्पताल लेकर भागे. तीन घंटे की नाकाम कोशिशों के बाद डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

महेश दुबे मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के बानमौर स्थित जेके टायर की निर्माण इकाई में काम करते थे. वे छंटनी के शिकार उन 256 स्थायी श्रमिकों में से एक थे जो प्रबंधन की हठधर्मिता के चलते आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं. जेके टायर बानमौर औद्योगिक क्षेत्र में ढाई दशक पुराना उद्योग है.

यहां रेडियल और बायस टायरों का निर्माण होता था. लेकिन 1 जून 2016 से प्रबंधन ने बायस टायर यूनिट को घाटे में बताकर बंद कर दिया और इसके 256 स्थायी व 562 अस्थायी श्रमिकों को काम पर न आने का नोटिस थमा दिया. श्रमिकों को तब से न तो वेतन दिया गया और न ही उन्हें श्रम कानूनों के तहत स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (वीआरएस) का लाभ दिया गया.

तभी से सभी श्रमिक यूनियन के बैनर तले अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत हैं. इसी कड़ी में 28 अगस्त 2016 को महेश दुबे ने हालात के आगे घुटने टेककर आत्महत्या कर ली. बाकी मज़दूरों की बात की जाए तो उनके भी हालात अच्छे नहीं है. कोई उधारी से अपना घर चला रहा है, तो कोई अपने बच्चों की स्कूल की फीस नहीं भर पा रहा है.

लगभग हर मज़दूर अपनी भविष्य निधि की राशि का 90 प्रतिशत खर्च कर चुका है. मज़दूरों की मानें तो महेश दुबे के अतिरिक्त पिछले आठ महीनों में तीन और मज़दूर आर्थिक तंगी के चलते अपना इलाज न कराने के कारण दम तोड़ चुके हैं.

मज़दूरों के मुताबिक प्रबंधन ने बायस यूनिट नियम-कायदों को ताक पर रखकर बंद की है. जो प्रक्रिया होती है उसका पालन नहीं किया गया. साथ ही क्लोज़र की अनुमति पाने के लिए सरकार के सामने घाटे से संबंधित गलत तथ्य और दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे.

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महेश दुबे की पत्नी और बेटी (फोटो : दीपक गोस्वामी)

एसोशियसन ऑफ केमिकल वर्कर्स के सचिव सुनील शर्मा बताते हैं, ‘यूनिट बंद करने का फैसला प्रबंधन के शोषण के खिलाफ बुलंद होती मज़दूरों की आवाज को दबाने के दूषित उद्देश्य से लिया गया है. लंबे समय से जेके टायर में श्रमिकों का हर स्तर पर शोषण हो रहा था. जो मौजूदा मज़दूर संघ था, वह प्रबंधन के इशारों पर काम करता था. जिसके चलते मज़दूर अपनी आवाज नहीं उठा पा रहे थे. इसलिए हमने एक नया संघ खड़ा करना शुरू किया ताकि हम अपने हक़़ के लिए लड़ सकें. प्रबंधन को यह बात रास नहीं आई और उसने हमें प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. नये संघ से जुड़ने वालों को बाहर का रास्ता दिखाया जाने लगा. लेकिन जब प्रबंधन अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो सका तो उसने बायस यूनिट को बंद करने की साजिश रची और सरकार के सामने फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत करके अनुमति भी प्राप्त कर ली.’

वास्तव में 1 जून 2016 से नहीं, 22 अक्टूबर 2015 से जेके टायर प्रबंधन ने बायस यूनिट को बंद कर रखा है. इस दौरान मज़दूरों को बिना काम के ही 15 दिन का वेतन दिया जा रहा था. कुछ दिन बाद उनसे कहा गया कि वे फैक्ट्री भी न आएं और 15 दिन का वेतन लेते रहें. कंपनी की नियत पर शक हुआ तो श्रमिकों ने श्रमायुक्त और मुख्य सचिव (श्रम) को पत्र लिखा.

श्रमायुक्त ने जवाब तलब किया तो प्रबंधन ने इकाई को संचालित बताया. श्रमिकों ने श्रमायुक्त के समक्ष वह नोटिस प्रस्तुत किया जिसमें उन्हें काम पर आने से मना किया गया था. श्रमायुक्त ने इस पर संज्ञान लेते हुए प्रबंधन के खिलाफ सख्ती दिखाई तो उसने स्वीकारा कि यूनिट को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है.

प्रबंधन पर कानूनी शिकंजा कसने लगा तो उसने यूनिट को घाटे में दर्शाकर और बायस टायर की बाजार मांग कम होने का हवाला देकर मध्यप्रदेश सरकार से मार्च 2016 में 256 स्थायी कर्मचारियों की छंटनी और यूनिट क्लोजर की अनुमति मांगी. जो 30 अप्रैल 2016 को उसे मिल भी गई. लेकिन यह अनुमति सरकार द्वारा कुछ हफ्तों बाद ही तब निरस्त कर दी गई, जब मज़दूर संघ ने सरकार के सामने जेके टायर प्रबंधन के फर्जीवाड़े का खुलासा किया.

सुनील शर्मा बताते हैं, ‘जिन दो आधार पर प्रबंधन ने अनुमति मांगी थी, वे दोनों ही झूठे थे. कंपनी ने 2014-15 की अपनी बैलेंस शीट में 8,060 करोड़ रुपये का लाभ दिखाया था. उसका लाभ पिछले पांच साल में 43 प्रतिशत बढ़ा है. इसलिए न तो कंपनी कभी घाटे में रही और न ही बाजार में बायस टायर की मांग में कोई कमी आई थी. अगर मांग में कमी थी तो कंपनी क्यों अन्य यूनिटों में सरप्लस में बायस टायरों का उत्पादन कर रही थी? वास्तव में हुआ यह था कि कंपनी ने यहां उत्पादन बंद करके अपने दूसरे कारखानों में बढ़ा दिया था.’

शर्मा आगे कहते हैं,’ कंपनी ने राजस्थान के कांकरोली स्थित अपनी इकाई में 160 टन प्रतिदिन के उत्पादन को बढ़ाकर 210 टन और बंगलुरु की यूनिट में 150 टन से बढ़ाकर 205 टन उत्पादन कर दिया गया. वहीं हरिद्वार में बायस टायर बनाने वाली बिड़ला टायर की यूनिट को भी कंपनी ने खरीद लिया. बायस टायर की अगर वास्तव में बाजार मांग कमजोर है तो क्यों कंपनी ने अन्य यूनिट में उत्पादन बढ़ाया? क्यों हरिद्वार में उसी टायर के नए यूनिट पर 2200 करोड़ रुपये खर्च किए? इन्होंने सरकार से यह भी छिपाया कि इनके देश-विदेश में कुल 9 कारखाने हैं और सभी कारखानों के विज्ञापन और ओवरहेड आदि के खर्चे बंद बायस यूनिट के खाते में जोड़कर उसे घाटे में दिखा दिया.’

अनुमति निरस्तीकरण के आदेश के खिलाफ प्रबंधन 31 मई को जबलपुर हाईकोर्ट से स्टे ले आया और 1 जून से कारखाना बंद कर दिया. असली विवाद यहीं से शुरू हुआ और लगभग 900 श्रमिकों के सामने रोज़गार का संकट खड़ा हो गया.

मज़दूरों का कहना है कि जेके टायर प्रबंधन ने कोर्ट के स्टे की मनमाने ढंग से व्याख्या की है. हाईकोर्ट ने अनुमति निरस्तीकरण के जिस सरकारी आदेश के खिलाफ स्टे दिया था, प्रबंधन ने उसका मतलब यह निकाल लिया कि सरकार द्वारा पहले दी गई क्लोजर की अनुमति का आदेश बहाल हो गया है. जबकि ऐसा नहीं है.

सुनील कहते हैं, ‘एक समान मामले में सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कहता है कि दूसरा आदेश स्टे होने का मतलब यह नहीं होता कि पहला वाला स्टैंड हो गया है. यही हमारी लड़ाई है जिसे प्रशासन और प्रबंधन को हम समझाने की कोशिश कर रहे हैं.’

पूरे मामले में गौर करने वाली बात यह भी है कि अगर पहला आदेश बहाल मान भी लिया जाए तो भी सरकार ने क्लोजर की अनुमति प्रबंधन को इन शर्तों पर दी थी कि छंटनी में ‘लास्ट कम फर्स्ट आउट’ का सिद्धांत अपनाया जाएगा (यानी कि जो बाद में आए हैं, वे पहले निकाले जाएंगे), भविष्य में प्लांट फिर चालू होता है या रेडियल टायर यूनिट में नियुक्तियां होती हैं तो प्रभावित कर्मचारियों को प्राथमिकता दी जाएगी और छंटनी का मुआवजा या वीआरएस की राशि में जो अधिक होगा, वो दिया जाएगा.

1 जून से इकाई तो बंद कर दी गई लेकिन किसी भी कर्मचारी को मुआवजे या वीआरएस की राशि नहीं दी गई. मज़दूर कहते हैं, ‘1 जून से फैक्ट्री बंद की गई तो 31 मई तक हमारा हिसाब कर दिया जाना चाहिए था. तब मालिक और नियोक्ता का संबंध-विच्छेद माना जाता. पर ऐसा नहीं हुआ इसलिए कानूनन हम जेके टायर के कर्मचारी थे और अब तक हैं. बावजूद इसके हमारा वेतन 1 जून से बंद कर दिया गया.’

मज़दूरों ने श्रमायुक्त और जिला कलेक्टर के सामने गुहार लगाई. कलेक्टर ने कंपनी को वेतन जारी करने के आदेश दिए, लेकिन कंपनी ने मामले को अदालत में विचाराधीन बताकर तब भी वेतन जारी नहीं किया तो श्रमिकों ने पहले जिला कलेक्टर और फिर श्रमायुक्त कार्यालय पर धरने दिए. इस बीच कंपनी ने हर श्रमिक को 6 लाख रुपये वीआरएस के तहत देने का प्रस्ताव रखा. पर श्रमिकों ने इसे ठुकरा दिया.

सुनवाई न होती देख वे 21 सितंबर 2016 को जिला कलेक्टरेट के सामने क्रमिक भूख हड़ताल पर बैठ गए. 92 दिन की भूख हड़ताल के बाद भी जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो उन्होंने 21 दिसंबर से फैक्ट्री गेट पर धरना देना शुरू किया. इस धरने को रेडियल यूनिट में काम कर रहे लगभग 500 मज़दूरों ने भी समर्थन दिया और काम बंद कर वे भी आंदोलनकारियों के साथ शामिल हो गए. इस पर कंपनी ने इन कर्मचारियों का भी दिसंबर माह का वेतन रोक दिया. आज भी सभी कर्मचारी फैक्ट्री गेट से 500 मीटर की दूरी पर आंदोलनरत हैं.

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प्रदर्शन करते श्रमिक (फोटो : दीपक गोस्वामी)

बलदेव सिंह की नियुक्ति स्थायी कर्मचारी के तौर पर 2003 में हुई थी. फैक्ट्री प्रबंधन के खिलाफ श्रमिकों में पनप रहे आक्रोश पर वे बताते हैं, ‘यह फैक्ट्री अनियमितताओं का भंडार रही है. 400 खातेदारों की 500 बीघा जमीन का अधिग्रहण कर इस फैक्ट्री की नींव रखी गई थी. समझौते में तय हुआ था कि सभी 400 खातेदारों के परिजनों को फैक्ट्री में स्थायी रोज़गार दिया जाएगा. जो अगर शिक्षित नहीं हैं, उन्हें पहले कंपनी शिक्षित कराएगी फिर रोज़गार देगी. शुरुआती कुछ साल कंपनी ने ऐसा किया भी. ग्रामीणों के बच्चों को पढ़ाई का खर्चा दिया. लेकिन जब वे पढ़ गए तो उन्हें नौकरी देने से इंकार कर दिया. खातेदारों के परिजनों की भर्ती बंद कर दी गई. इस तरह 1991 में फैक्ट्री की शुरुआत से लेकर 1998 तक कंपनी ने 400 में से कुल 37 खातेदारों को स्थायी रोज़गार उपलब्ध कराया. 48 को अस्थायी तौर पर नौकरी पर रख लिया जो कि समझौते के खिलाफ था. 2003 में ग्रामीणों ने इसके खिलाफ विरोध दर्ज कराया तो कंपनी ने 14 खातेदारों को और नौकरी दे दी. वहीं दूसरी तरफ कई खातेदारों की रिक्त नौकरियों पर इन्होंने अपने आदमी नियुक्त कर लिए.’

वे आगे बताते हैं, ‘जो कर्मचारी यहां 2003 से काम कर रहे हैं. उन्हें अब तक स्थायी नहीं किया गया है. लोग 10-10 साल से यहां ट्रेनी के तौर पर काम कर रहे हैं. उन्हें तय न्यूनतम वेतनमान भी नहीं दिया जाता. उनका वेतन 217 रुपये से 240 रुपये के बीच है. यहां पे स्लिप तक कर्मचारियों को नहीं दी जाती ताकि वे यह न जान सकें कि किस मद में उन्हें कितना भुगतान हो रहा है. इसी के चलते कंपनी में भविष्य निधि घोटाला तक हो चुका है. एक आरटीआई लगाई तो खुलासा हुआ कि 2007 से 2011 के बीच कर्मचारियों को भविष्य निधि का लाभ ही नहीं दिया गया. ऐसे ही अनेकों कारण रहे कि इस शोषण के विरुद्ध हमने आवाज उठाने की ठानी और नये मज़दूर संघ के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई. कंपनी को यह रास नहीं आया. पहले उसने हम पर दबाव बनाने की कोशिश की. जब सफल नहीं हुए तो बायस यूनिट को बंद करने की साजिश रची, जहां नयी यूनियन बहुमत में थी.’

मज़दूर बताते हैं कि जहां कंपनी 25 साल पुराने ईमानदार श्रमिकों को बाहर निकाल रही है, वहीं भविष्य निधि घोटाले में जेल की हवा खा चुका अधिकारी अपने पद पर बैठा हुआ है. येंद्र सिंह उपाध्याय बताते हैं, ‘2003 से में यहां काम कर रहा हूं. 14 साल की नौकरी के बाद भी मैं स्थायी नहीं हूं और मेरी पगार 7500 रुपये प्रतिमाह है जबकि मैं ‘ए’ ग्रेड का कर्मचारी हूं.’

रामनरेश यादव कहते हैं, ‘11 साल की नौकरी में वेतन 11 हजार नहीं हुआ. 8 हजार मिलते हैं. छह महीने का ट्रेनी एग्रीमेंट हुआ था. हमें स्थायी होना था, पर स्थायी किया ही नहीं. अब तक ट्रेनी हैं. ट्रेनिंग आखिर कितने समय होती है? एक साल, दो साल? यहां श्रमिकों को 12-12 साल ट्रेनिंग में हो गए हैं. हमारी उम्र इतनी हो गई है कि कहीं और नौकरी के लिए भी आवेदन नहीं कर सकते. हमें स्थायी न करना पड़ें इसलिए बंदीकरण का बहाना कर निकाल दिया.’

मज़दूर 55 वर्षीय आसिफ़ खान की ओर इशारा करते हुए बताते हैं, ‘जब हम यहां काम करने आए थे, तब से इन्हें यहां देख रहे हैं. 25 साल से ये अस्थायी ही हैं. न ट्रेनिंग हुई, न बदली जबकि ये सारे काम जानते हैं. वेतन इन्हें कैजुअल में मिलता है हर दिन के हिसाब से 210 रुपये. अब इन्हें ओवरएज बताकर बाहर कर रहे हैं. जबकि अभी इनके 5 साल की नौकरी बाकी है. इनके दो बच्चे विकलांग हैं. कहां जाएंगे ये?’

सुनील कहते हैं, ‘कंपनी का ही नियम है कि 6 महीने की ट्रेनिंग होती है. अगर श्रमिक सीखता नहीं है. तो अधिकतम दो बार छह-छह महीने ट्रेनिंग बढ़ाई जा सकती है. 15 साल तक कोई कैसे ट्रेनिंग पर रह सकता है? अगर उसका काम संतोषजनक नहीं है तो उसे निकालो, अन्यथा स्थायी करो. सिर्फ यही नहीं, हमारे यहां एक कॉरपोरेटिव सोसायटी सिक्टोरिटी (सीएसएस) फंड भी कटता है. इसके कानून में लिखा है कि इस सोसायटी का चुनाव हर दो साल में होगा. लेकिन 1997 से यह सोसायटी अस्तित्व में आई है, पर अब तक चुनाव नहीं हुआ. कौन इसके पदाधिकारी हैं. कब चुने जाते हैं. कब बदल जाते हैं. पता नहीं चलता. ये भी कानून में है कि इसकी पासबुक सभी कर्मचारियों को दी जाएगी. ताकि उसे अपना हिसाब किताब पता हो कि कितना पैसा जमा है, उस पर कितना ब्याज मिला. पर किसी को नहीं मिली.’

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रामेश्वर चौधरी, जो फैक्ट्री में काम करते हुए अपना पांव गंवा चुके हैं (फोटो : दीपक गोस्वामी)

वे आगे कहते हैं, ‘दूसरी यूनिट के मज़दूरों का समर्थन इसलिए भी मिला क्योंकि अंदर इस तरीके से व्यवहार हो रहा था कि प्रबंधन बस ‘हां’ या ‘न’ सुनना चाहता था. प्रबंधन और मज़दूर संघ का समझौता होता है कि इस मशीन पर पचास टायर बनेंगे. उसी के तहत मज़दूर पचास टायर बनाता है. लेकिन पिछले कुछ समय से ऐसी कोई सीमा नहीं रही. उन्होंने समझौता मानने से इंकार कर दिया. बस जितना काम वे बताएं कीजिए. एक मशीन पर खत्म तो दूसरी पर लग जाइए. दूसरी से खत्म तो तीसरी पर. बस हां या ना बोलिए, करेंगे या नहीं? इसलिए सबने हड़ताल के लिए कहा और कहा कि अगर संघ नहीं लगाएगा तो माना जाएगा कि वह भी प्रबंधन से मिला है.’

सामलिया काका की उम्र 55 साल है. वे बताते हैं, ‘मेरे परिवार में जमीन का बंटवारा हो गया था. हम छह खातेदार थे. लेकिन जब नौकरी देने की बारी आई तो सिर्फ एक को दी. अब वो भी छीन ली. मेरी जमीन भी ले ली और अब 25 साल बाद नौकरी भी. मेरा लड़का भी यहीं कैजुअल में काम करता था. उसे भी हटा दिया. अब बताइए कि कैसे घर चले? जमीन होती तो उसकी कीमत आज करोड़ों में होती. इन्होंने हमारा इस कदर शोषण किया कि हमारे कम शिक्षित होने का लाभ उठाकर हमसे कागज पर हस्ताक्षर करा लिए और इंसेंटिव देना बंद कर दिया. वेतन फिर उतना भी नहीं रहा. वह चाहते थे कि हम हारकर फैक्ट्री छोड़ दें.’

मज़दूर बताते हैं, ‘अगर फैक्ट्री में काम के दौरान किसी व्यक्ति के साथ कोई दुर्घटना भी हो जाए तो प्रबंधन उनका इलाज नहीं कराता. कहता है कि हम जानबूझकर ऐसा करते हैं. एक मज़दूर की टांग कट गई, क्या वह अपनी टांग जानबूझकर काटेगा?’ रामेश्वर चौधरी के साथ ऐसा ही हुआ.

ऐसे ही एक शख्स रहे शेरसिंह परमार. ड्यूटी हावर्स में अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी. वे चकराकर गिर पड़े. कंपनी ने उनका एक्सीडेंट फॉर्म भी भरा और हॉस्पीटल रैफर किया. लेकिन बाद में यह कहक़र इलाज कराना बंद कर दिया कि उन्हें तो पहले से ही कोई बीमारी रही होगी. वे आज पैरालाइज्ड हैं. उनके शरीर का आधा हिस्सा काम नहीं करता. न उन्हें इलाज मिला और न अब तक मुआवजा और न वीआरएस.

बृजेश पाराशर जो स्वयं कंपनी में 25 सालों से काम कर रहे थे, बताते हैं, ‘पिछले दिनों उनकी बेटी की शादी थी. सभी मज़दूरों ने चंदा करके वह शादी कराई. उनका अब तक जितना भी थोड़ा-बहुत इलाज हुआ है, वह चंदे से ही हुआ है. उनका इलाज बहुत मंहगा है. एक हजार रुपये प्रतिदिन का खर्च आ रहा है. इसलिए कंपनी ने हाथ खड़े कर लिए.’

कुछ ऐसा ही कंपनी ने चिम्मनलाल बाथम के साथ किया. सुनील बताते हैं, ‘वे भी फैक्ट्री में ही एक दुर्घटना से पैरालिसिस का शिकार हो गए. एक्सीडेंट फॉर्म भरकर उन्हें उन्हें छुट्टी पर भेज दिया गया. उनका इलाज नहीं कराया गया, उन्होंने अपने पैसों से कराया. मुआवजा भी नहीं दिया और कह दिया कि ठीक होने पर आपको कोई लाइट जॉब दे देंगे. बाद में वे नौकरी लायक हुए तो उनके मांगने पर भी उन्हें नहीं दी. उन्हें वीआरएस लेने को मजबूर किया गया. उनकी माली हालत इतनी बिगड़ गई कि उनके पास मुकदमा करने लायक पैसे ही नहीं थे. वास्तव में घर पर भूखे रहने की नौबत आ गई थी. आखिरकार उन्हें कंपनी द्वारा तय वीआरएस लेना ही पड़ा. वहां भी उनके साथ धोखा किया. उनकी 18 साल की नौकरी बाकी थी. फॉर्म भरवाते वक्त 15 लाख रुपये का आश्वासन दिया और बाद में 6 लाख रुपये देकर चलता कर दिया.’

वहीं मज़दूरों के अनुसार प्रबंधन ने अब उनकी आवाज को दबाने के लिए उन पर फर्जी मुकदमें दर्ज करवाना शुरू कर दिया है. वे बताते हैं कि हम पर फैक्ट्री के कर्मचारियों की बस पर हमला करने का मुकदमा दर्ज हुआ है. जबकि सच तो यह है कि उस मुकदमें में नूराबाद गांव के ऐसे व्यक्तियों के नाम दर्ज हैं जो उस वक्त ग्वालियर में अपने ऑफिस में काम कर रहे थे.

मज़दूरों के अनुसार प्रबंधन हमारे आंदोलन को दबाने के लिए हर हथकंडा अपना रहा है. एक तरफ वह प्रशासन को कहता है कि क्लोजर से संबंधित मामला कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए मज़दूरों के वेतन की मांग को फैसला आने तक पूरा नहीं किया जा सकता, तो दूसरी ओर कोर्च में मामले के विचाराधीन होने के बावजूद मज़दूरों के घर पर वीआरएस के चैक भेजे जा रहे हैं ताकि वे पैसे के लालच में आंदोलन से किनारा कर लें.

वहीं फैक्ट्री से सटा नूराबाद गांव भी मज़दूरों के साथ खड़ा हो गया है. गांववासियों का कहना है कि इस फैक्ट्री ने गांव को गोद लिया है. नियमानुसार इसे मुनाफे का दो प्रतिशत गांव के विकास पर खर्च करना चाहिए था लेकिन 25 सालों बाद भी गांव की तस्वीर नहीं बदली है. उल्टा इस रबर उघोग से फैलने वाले प्रदूषण से यहां की नदी प्रदूषित हो गई है, पेड़-पौधे प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं. गांव के युवक बेरोज़गार हैं. जिन्हें रोज़गार भी दिया अब उन्हें निकाल भी दिया. जिनकी जमीन ली, उन खातेदारों को नौकरी नहीं दी. जिन्हें दी भी, तो अब वापस ले भी ली.

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एक प्रदर्शन के दौरान (फोटो : दीपक गोस्वामी)

विवेकानंद झा जेके टायर में 25 सालों से काम कर रहे थे. छंटनी की गाज उन पर भी गिरी. वे कहते हैं, ‘हम शासन-प्रशासन और स्थानीय नेता से लेकर प्रधानमंत्री तक हर जगह गुहार लगा चुके हैं. लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. प्रबंधन की तानाशाही का विरोध करने का खामियाजा पहले तो हमें नौकरी गंवाकर भुगतना पड़ा और अब नौकरी के बाद के हमारे हक़ पर भी डाका डाला जा रहा है. 1000 से ज्यादा मज़दूर महीनों से गुहार लगा रहे हैं, पर सब अंधे, गूंगे, बहरे बने बैठे हैं.’

अंत में आंदोलनरत मज़दूर कहते हैं, ‘साहब! अब ये लड़ाई सिर्फ 256 स्थायी कर्मचारियों के हक़ की नहीं है. अब यह लड़ाई जेके टायर के काले कानून के खिलाफ है. फैक्ट्री के अंदर लागू उस जंगलराज के खिलाफ है जिसका हर मज़दूर और ग्रामीण शिकार है. यह लड़ाई अब उन 1000 से अधिक अस्थायी श्रमिकों को स्थायी कराने की है जो फैक्ट्री कुप्रबंधन के चलते दशकभर से ट्रेनी के तौर पर काम कर रहे हैं.

लड़ाई उन खातेदारों के लिए है जिनकी जमीन तो चली गई पर समझौते के तहत नौकरी नहीं मिली. यह नूराबाद गांव के विकास की भी लड़ाई है. कंपनी को अब सोशल रिस्पांसबिलिटी की राशि का सौ प्रतिशत गांव के विकास पर खर्च करना होगा. गांव के युवाओं को योग्यतानुसार रोज़गार देना होगा.’

मामले के संबंध में हमने जेके टायर, बानमौर के प्रबंधन से भी बात करने की कोशिश की. लेकिन उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया.

वहीं ज़िले के कलेक्टर विनोद कुमार शर्मा का कहना है कि मामला अदालत में विचाराधीन है इसलिए प्रशासन इसमें कुछ नहीं कर सकता. फिर भी प्रशासन का काम है कि वह स्थिति सामान्य बनाए रखे. इसके लिए हमने प्रयास भी किए. अब तक हम मज़दूरों और प्रबंधन के बीच 15 बैठकें करा चुके हैं और प्रयास कर रहे हैं कि कोई बीच का रास्ता निकाला जा सके. लेकिन मज़दूर अपनी मांग पर अड़े हैं और वे चाहते हैं कि फैक्ट्री प्रबंधन उन्हें वापस काम पर रख ले. लेकिन जब तक अदालत का फैसला नहीं आता, तो वे इन्हें कैसे काम पर रखें? यह तो अदालत तय करेगी न कि उन्हें काम पर रखा जाए या नहीं रखा जाए.’

वे आगे कहते हैं कि हम भी समझते हैं कि पिछले आठ महीने से वे हड़ताल पर हैं. उनका परिवार भी है, उसे भी चलाना है. इसलिए हमने एक बीच का रास्ता भी निकाला कि मज़दूरों को कुछ हालिया राहत देते हुए मैनेजमेंट से एक राशि दिलवा दें ताकि उनका परिवार चल सके. लेकिन वे इस पर भी तैयार नहीं हुए. और अपनी मांगों पर अड़े रहे.’

वे कहते हैं, ‘सच तो यह है कि वे इस फैक्ट्री को बंद करवाना चाहते हैं. 256 मज़दूरों को बायस यूनिट से निकाला गया था. उन्होंने 750 को जोड़ लिया. और फैक्ट्री में काम नहीं होने दे रहे हैं. काम नहीं होगा तो फैक्ट्री तो बंद ही होगी न. इससे जो नया औद्योगिक क्षेत्र इलाके में बन रहा है उस पर भी दुष्प्रभाव पड़ रहा है. निवेशक यहां निवेश नहीं करना चाहते. मज़दूर चाहते हैं कि फैक्ट्री पूरे गांव को ही रोज़गार दे दे. गांव भी उनके समर्थन में हो गया है. बताइए कैसे प्रबंधन रोज़गार दे देगा. और पूरा विवाद तो यहीं से हुआ कि फैक्ट्री वालों ने प्लांट का नवीनीकरण करना चाहा, जो कि सभी को हक़ है तो मज़दूरों को यह रास नहीं आया. इसलिए बाद में फैक्ट्री ने प्लांट बेद करने का सोचा. पहले कलेक्टर के पास ही क्लोजर की अनुमति मांगी. हमने तो मना कर दिया. लेकिन शासन ने दे दी और फिर बाद में कैंसिल भी कर दी. बस यही एक गफलत विवाद का कारण बनी. मंत्री जी ने भी मध्यस्थता की और कहा कि आप पहले हालात सामान्य करो मतलब कि हड़ताल वापस लो और फिर बैठक करके हल निकालिए. लेकिन वे हड़ताल वापस नहीं ले रहे. वे समझौता करें. उनके खिलाफ जो भी पुलिस मुकदमें हैं, वे सब हम खत्म करा देंगे.’

जब उनसे पूछा गया कि वहां मज़दूरों का आरोप है कि उनका शोषण होता है तो उनका जवाब बेहद ही लापरवाही वाला था कि इस आंदोलन से पहले तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी जो भी हो रहा था फैक्ट्री के अंदर. बात ये है कि हर जगह कई अंदरूनी विवाद होते हैं और जब झगड़ा होता है तो बाहर आते ही हैं. इसी तरह ये चीजें बाहर आ रही हैं.

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प्रदर्शन के दौरान (फोटो : दीपक गोस्वामी)

वहीं, हालिया घटनाक्रम में मज़दूर जिला कलेक्टर पर भी प्रबंधन से मिलीभगत का आरोप लगाते हैं. सुनील शर्मा का कहना है, ‘जिला प्रशासन प्रबंधन के हाथ की कठपुतली बना हुआ है. प्रशासन की पहल पर प्रबंधन के साथ समझौते के लिए हमारी एक बैठक होनी थी. हमने उस बैठक के लिए अपने कुल 13 मुद्दों का एक पत्र तैयार किया. वहीं एक ऐसा ही पत्र प्रबंधन ने तैयार किया कि वह किन शर्तों पर समझौते के लिए राजी है? हमारी तरफ से 7 लोगों का नाम उस बैठक में मज़दूरों के प्रतिनिधित्व के तौर पर भेजा गया. लेकिन हमें बिना सूचना दिए ही वह बैठक 21 फरवरी को हो गई. सूची के 7 लोगों में से दो लोगों को प्रशासन और प्रबंधन ने खरीद लिया. और बाकी पांच सूची के बाहर के किन्हीं दूसरे लोगों से समझौता पत्र पर हस्ताक्षर कराकर हमें समझौता पत्र भेज दिया. जबकि भेजी गई सूची के अन्य 5 लोग जिनमें संघ के सचिव, संयुक्त सचिव और उपाध्यक्ष भी शामिल थे उन्हें इस बैठक से संबंधित कोई सूचनी ही नहीं दी गई. यह समझौता अवैधानिक और श्रमिक विरोधी है.

उस फर्जी समझौते के तहत उन्होंने हमारी यूनियन को ही खत्म करने की साजिश रच दी. उस समझौते में दर्ज है कि हम प्रबंधन की सभी शर्तों पर राजी हैं और अपनी यूनियन रिज़ॉल्व करके नयी यूनियन बनाने के लिए तैयार हैं. साथ ही हम वीआरएस स्कीम का लाभ लेने के लिए पहले प्रबंधन के खिलाफ सभी अदालत मुकदमों को वापस लेंगे. और हमें यह हड़ताल खत्म करनी होगी, नहीं तो हम पर आपराधिक मुकदमें दर्ज होंगे.’
मज़दूरों का आरोप है कि कलेक्टर ने ऐसा सरकार के दबाव में और वाहवाही लूटने और फर्ज़ी तरीके से हड़ताल खत्म कर प्रबंधन को लाभ पहुंचाने किया है ताकि स्थिति को सामान्य दिखाया जा सके. इसके विरोध में सैकड़ों मज़दूरों ने मुरैना कलेक्टर और एसपी के कार्यालय के सामने प्रदर्शन भी किया.