भारत

द वायर को चुप कराने की जय अमित शाह की कोशिश

द वायर द्वारा जारी प्रेस वक्तव्य

द वायर को कल, यानी 16 अक्टूबर, 2017 की दोपहर में एक लिफाफे में भेजे गए दस्तावेजों का एक सेट मिला. यह लिफाफा मिलन एस. भट्ट, एडवोकेट, अहमदाबाद, के नाम से भेजा गया था.

इसमें दस्तावेजों के साथ कोई आवरण पत्र (कवरिंग लेटर) नहीं है और पूरा सेट फोटोकॉपी किया हुआ मालूम पड़ता है. इनमें कुछ का यहां जिक्र किया जा रहा है:

1. अहमदाबाद, ग्रामीण (मिर्जापुर) अहमदाबाद के चौथे एडिशनल सीनियर सिविल जज की अदालत में जय अमित शाह द्वारा दायर किया गया विशेष सिविल मुकदमा (स्पेशल सिविल सूट) सं. 442/2017.

2. लंबित सिविल सूट पर सुनवाई और उस पर अंतिम फैसले से पहले अंतरिम रोक लगाने के लिए आवेदन.

3. एक लिखित अंश, जो कथित तौर पर अहमदाबाद ग्रामीण (मिर्जापुर), अहमदाबाद के चौथे एडिशनल सिविल जज, बीके. दासोन्दी द्वारा 12 अक्टूबर, 2017 को दिया गया (ऑर्डर बिलो एग्जीबिट 5 एसपीसीएस नं. 442/2017) आदेश है. इसके मुताबिक-

Pending hearing and final disposal of the interim Injunction, defendants are restrained by order ad-interim injunction from using and publishing or printing in any electronic, print, digital or any other media, or broadcast,telecast, print and publish in any manner including by way of interview, holding Tv talks, debate and debates, news items, programs in any language on the basis of the article published in ‘THE WIRE’ (dated 8/10/2010) either directly or indirectly on the subject matter with respect to the plaintiff in any manner whatsoever.

Order-below-Exhibit-5

चौथे एडिशनल सीनियर जज, अहमदाबाद ग्रामीण (मिर्जापुर) अहमदाबाद जारी किया गया आदेश.

इस आदेश पर इस इतने धुंधले तरीके से दस्तखत किया गया है कि उसे पढ़ा नहीं जा सकता. इसके कुछ अक्षर देवनागरी जैसे लगते हैं.

यह आपातकालीन एकतरफा अंतरिम आदेश देने या उसकी सुनवाई से पहले, द वायर को न तो कोई कानूनी नोटिस दिया गया, न ही उसे अपना पक्ष रखने का ही मौका दिया गया.

इस स्पेशल सिविल सूट को पढ़ने वाला कोई भी व्यक्ति यह समझ सकता है कि (अभियोजन पक्ष द्वारा) द वायर की एक भी तथ्यात्मक गलती ठोस तरीके से सामने नहीं नहीं लाई जा सकी है, न उस पर ऐसी किसी गलती का कोई आरोप लगाया गया है. द वायर के खिलाफ झूठ बोलने का कोई मामला नहीं बनाया गया है.

वास्तव में, याचिकाकर्ता इस बात को स्वीकार करता है कि (जय शाह के) वकील का द वायर के साथ संवाद बिना किसी कांट-छांट के इस मुकदमे को दायर करने के दिन, यानी 12 अक्टूबर, 2017 को, वेबसाइट पर उपलब्ध था. संयोग से 12 अक्टूबर, 2017 ही आदेश के लिखे जाने का भी दिन है. इस मुकदमे को दायर करने की तारीख या आदेश सुनाने के वक्त की जानकारी द वायर को नहीं है.

यह अलग से कहने की कोई जरूरत नहीं कि द वायर की आवाज को दबाने की हर कोशिश को चुनौती दी जाएगी.